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गृहलक्ष्मी की कहानियां :एहसास
Stories of Grihalakshmi

गृहलक्ष्मी की कहानियां : शकुंतला नींद से ऐसे जागी जैसे कोई बुरा सपना देखा हो। उसने घड़ी देखी, चार बजनेवाले थे। चादर समेटते हुए उसने पास में सोई हुई राधिका को देखा, वह गहरी नींद में थी। तकिया और चादर उठाते हुए वो बोली, ‘राधिका, चल उठ जल्दी से, तेरे जीजाजी के आने का समय हो गया है।

अंगड़ाई लेते हुए, राधिका धीमे-धीमे अपने बिस्तर से उठी और चादर हाथ में उठाकर वॉशरूम की तरफ जाने लगी। ‘अरे, फटाफट हाथ-पैर चला जरा, यूं कछुए की चाल से कुछ नहीं होने वाला। दीदी का यूं फटकारना शायद राधिका को अच्छा नहीं लगा था। वह झट से हाथ-मुंह धोकर दीदी के पास आ गई।

‘आ बैठ चपाती बनाते हैं। राधिका, दीदी के पास बैठकर चपाती सेंकने लगी।

दरअसल, शकुंतला का पति रमेश का फैक्टरी से पांच बजे तक रमेश घर पहुंच जाता था। सुबह साढ़े सात बजे घर से नाश्ता करके निकलता था। कभी-कभी उसे ओवरटाइम भी करना पड़ता था। फैक्टरी की कैंटीन का खाना उसे पसंद नहीं था, अत: वो जब घर लौटता तो उसे बहुत तेज भूख लगती थी। शकुंतला उसके लिए कुछ ना कुछ बनाकर रखती थी।

शकुंतला का विवाह तीन साल पहले रमेश के साथ हुआ था। उसके माता-पिता देहात में रहते थे जहां घर में उनके साथ बेटा राजन और सबसे छोटी राधिका थी। राजन देहात के पास वाले एक दफ्तर में लिपिक था। उसके ही कमाई से पूरे घर का खर्च चलता था। इसलिए जब बिटिया का जनम हुआ तो शकुंतला ने अपनी बहन राधिका को अपने पास बुला लिया था। मकसद यही था कि राधिका अठारह साल की हो चुकी थी तो उसके योग्य लड़का ढूंढऩा आसान हो जाता और वैसे भी रमेश की आमदनी भी अच्छी खासी थी।

चपाती बनाकर शकुंतला ने चाय बनाकर रख दी और वह रमेश की प्रतीक्षा करने लगी। बेबी के रोने की आवाज सुनकर राधिका उसके पास चली गई। कुछ देर में रमेश घर पहुंचा, शकुंतला बोली, ‘आप फ्रेश हो जाइए तब तक मैं चाय-नाश्ता लाती हूं। ‘हूं, ठीक है रमेश वॉशरूम की तरफ जाते हुए बोला, ‘राधिका नहीं दिख रही है, कहीं गई है क्या? वह चारों तरफ देखते हुए बोला, ‘नहीं, अंदर है बेबी के पास, बेडरूम में।

वह मेज के समीप पहुंचा और हाथ पोंछते हुए कुर्सी पर बैठा। उसकी नजरें अभी भी राधिका को ढूंढ़ रही थी। आजकल यही चल रहा था। बीस साल की राधिका शहर में आने के बाद और आकर्षक लगने लगी थी। अत: रमेश का उसकी तरफ खिंचाव बढ़ रहा था। ये सब शकुंतला के परोक्ष था। पर राधिका रमेश की नजरों में आए बदलाव को भांप गई थी। इस वजह से वह रमेश के होते हुए उसके सामने आने से बचती थी।

एक तरफ शकुंतला एक पतिव्रता की तरह रमेश को दिलो-जान से प्यार करती थी, उसे समय पर खाना और घर पर आराम मिले, इसलिए वह दिन भर व्यस्त रहती थी। राधिका को लाने की वजह यह भी थी कि ज्यादा से ज्यादा समय वह रमेश के लिए दे पाए। राधिका सब जानती थी, केवल दीदी के लिए वह चुपचाप थी। इन बातों की दीदी को भनक भी लगेगी तो दीदी पूरी तरह टूट जाएगी और उसका बसा-बसाया परिवार बिखर जाएगा, ये राधिका को पता था। इसीलिए वह ये सब चुपचाप सहन कर रही थी।उसने यह बात मन में गांठ बांध कर रखी थी कि अगर कुछ ऊंच-नीच हुआ तो अपना बचाव वो पूरी ताकत लगाकर करेगी।

खाना खत्म करके रमेश बेडरूम की तरफ बढ़ गया। तब तक राधिका किचन की तरफ चली गई थी। वहां उसे ना पा कर रमेश अपने दिल पर पत्थर रखकर, सोने चला गया। एक और दिन बिना किसी अनहोनी के बीत गया यह सोच कर राधिका को तसल्ली हुई। रमेश सपने में भी राधिका को किस तरह पाया जाए, इस बारे में ही सोच रहा था। उसके किसी भी मनसूबे से निपटने के लिए राधिका खुद को तैयार कर रही थी।

जिस दिन की रमेश राह देख रहा था, आखिर वो आ ही गया। गुरुवार को उसका साप्ताहिक अवकाश रहता था। अत: वह चुप रहकर किसी मुनासिब अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था। खाना खाने के बाद राधिका बिटिया के पास बिस्तर पर सो गई। रमेश हॉल में टीवी देख रहा था। आधे घंटे बाद शकुंतला उसके पास आकर बोली, ‘सुनिए जी, मैं आधा-पौना घंटे के लिए नीचे शीला के पास जा रही हूं, अगर देर हो गई तो चाय के लिए राधिका से कह दीजिए, वह बना देगी। रमेश ने मुंडी हिलाई।

दरअसल वह इसी मौके की तलाश में था। शकुंतला के जाते ही वह कुर्सी से उठा और दबे पांव से बेडरूम की तरफ बढ़ा। बेड पर राधिका गहरी नींद सो रही थी। उसके कपड़े अस्तव्यस्त थे। वह उसको निहारने लगा। उसका वहशीपन बेकाबू हो रहा था। एक भेडिय़ा जिस तरह अपने शिकार पर टूट पड़ता है, उसी बेहोशी में वह राधिका पर झपट पड़ा और उसे दोनों हाथों से अपनी बांहों में भरने की कोशिश करने लगा। इससे राधिका की नींद खुल गई। वह रमेश के हाथों को पूरी ताकत लगाकर ढकेलते हुए अपना बचाव करने लगी। किसी तरह से उसने रमेश को दूर ढकेल दिया।

राधिका का तन डर के मारे कांप रहा था। अचानक बदले इस रुख से रमेश जान गया था कि राधिका आसानी से हार मानने वालों में से नहीं है। पर उसे अब ये चिंता हो रही थी कि कहीं वह शकुंतला को ये सारी घटना ना बता दे। उससे उसकी बनती हुई बात बिगड़ जाती। उसने उसके पास जाकर कहा, ‘देखो, इन सब बातों का जिक्र अगर तुमने दीदी से किया तो मेरे जैसा बुरा कोई नहीं होगा। तुम तीनों को गांव छोड़ आऊंगा। समझ गई ना?

फिर रमेश अपने बेडरूम में सोने चला गया। उसे विश्वास था कि दी हुई धमकी से राधिका अपनी दीदी को कुछ नहीं बताएगी। वहां राधिका अब भी रोए जा रही थी। वह पूरी तरह ध्वस्त हो गई थी। रमेश इस तरह का कदम उठाएगा, यह उसने सोचा भी नहीं था। पर अब वह रमेश की धमकी के बारे में सोच रही थी। वह जानती थी कि रमेश ने अगर सच में ऐसा कदम उठाया तो उसके माता-पिता को बड़ा सदमा पहुंचेगा तथा परिवार का जीवन भी तहस-नहस हो जाएगा। इसलिए उसने अपना मुंह बंद रखने का इरादा बना लिया था। उसे तसल्ली थी कि उसने जिस तरह से रमेश का मुकाबला किया था, उससे वह अब ऐसा कदम दोबारा उठाने की सोचेगा भी नहीं। उसने अपने आपको संभाला और आंसू पोंछ लिए, फिर बेसिन में उसने अपना मुंह धो लिया और बेडरूम में आकर बिटिया के पास लेट गई। पूरी घटना से उसका मन व्याकुल हो गया था।

राधिका रोए जा रही थी। रमेश इस तरह का कदम उठाएगा, यह उसने सोचा भी नहीं था। पर अब वह रमेश की धमकी के बारे में सोच रही थी। वह जानती थी कि रमेश ने अगर सच में ऐसा कदम उठाया तो उसके माता-पिता को बड़ा सदमा पहुंचेगा तथा परिवार तहस-नहस हो जाएगा।

कुछ देर बाद शकुंतला लौटी तो रमेश सो रहा था। वह फिर बिटिया के पास गई। उसकी आहट पाकर राधिका उठ गई। वह शकुंतला के सीने से लग कर बोली, ‘दीदी मुझे घर की याद आ रही है, मुझे मां के पास जाना है।

‘क्या हुआ रे अचानक? हां, वैसे मैं भी सोच रही थी इतने दिन तूं गांव से दूर है, पर अब तक घर जाने की जिद कैसे नहीं की। अच्छा ठीक है, तेरा दादा आ रहा है ना अगले रविवार, उसकेसाथ चली जाना। अब हो गई खुश। राधिका ने सिर हिलाया तो शकुंतला ने उसके बालों में हाथ फेरकर उसे अपने गले से लगा लिया।

जब रमेश जाग गया तो शकुंतला के बर्ताव में कुछ बदलाव ना पाकर उसे संतोष हुआ।

एक के बाद एक दिन गुजर रहे थे। रमेश की नजर अब भी राधिका के ऊपर थी। अत: उसने शकुंतला से कहा कि राधिका का किसी लड़के के साथ चक्कर चल रहा है और वह बालकनी से ताकझांक करती रहती है। शकुंतला को रमेश की सभी बातें सच लगने लगी थी। वो राधिका पर नजर रखने लगी। एक बार जब वह बालकनी में खड़ी थी तो शकुंतला वहां आकर उसे निहारने लगी। राधिका ने पूछा,

‘क्या दीदी, आजकल मुझे बहुत घूरने लगी हो, क्या बात है?

‘अरे कुछ नहीं, पर क्या मैं तेरी तरफ देखूं भी नहीं। शकुंतला बोली।

‘नहीं-नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। तुम तो दीदी हो मेरी, तुमको पूरा हक है। वह शकुंतला से लिपट कर बोली। दोनों हंसने लगी। रविवार को राजन आया तो राधिका खुश हो गई। वह उसके साथ जाने वाली है यह बात रमेश को पता नहीं थी। जब वह बैग उठा कर जाने लगी तो शकुंतला की आंखें भर आई थी…

वो मनहूस खबर बिजली की तरह राधिका के घरवालों पर टूटी थी। शकुंतला जिस शहर में रहती थी वहां भूकंप से बड़ी हानि हुई थी। उनकी बिल्डिंग उस हादसे में तहस-नहस हो गई थी। शकुंतला को गंभीर चोट आई थी और रमेश को कमर से नीचे के हिस्से में अंदरूनी चोट आई जिसके कारण उसे चलने-फिरने में दिक्कत हो रही थी। सौभाग्यवश बिटिया सही सलामत थी। शकुंतला के परिवार के लोग उन सबको देखने अस्पताल पहुंचे।

राधिका ने शकुंतला के पास जाकर बिटिया को गोद में उठा लिया। डॉक्टर के अनुसार शकुंतला कुछ ही पलों की मेहमान थी। सबकी आंखों से आंसू बह रहे थे। तभी शकुंतला की सांस फूलने लगी और वह कुछ कहने की कोशिश करने लगी। राधिका ने उसको बताया कि वह बिटिया का खयाल रखेगी। तब अचानक उसकी सांस रुक गई। परिवार-जन रोने-बिलखने लगे।

थोड़े दिनों के बाद रमेश अस्पताल से घर आ गया। उसको अभी भी चलने-फिरने में परेशानी थी। इसलिए शकुंतला के माता-पिता और राधिका उसके घर पर रहने आए और राजन अपने गांव लौट आया। राधिका दिन-रात रमेश और बिटिया की देखभाल कर रही थी। उसकी मां खाना बनाती थी और पिताजी बाहर वाले काम देखते थे। राधिका की सेवा-सुश्रुषा से रमेश की सेहत सुधरने लगी और वह फिर से चलने-फिरने लगा। बिटिया की निगरानी में भी उसने कोई कसर नहीं छोड़ी। उसकी भाग-दौड़ देखकर रमेश को पछतावा होने लगा। राधिका जैसी सुशील लड़की पर उसने कहर ढाने की कोशिश की थी। आज उसी लड़की की मेहनत के कारण ही वह अपने पैरों पर खड़ा हो पाया था।

राधिका के बारे में सोचकर उसकी आंखें नम होने लगी और मन ही मन वह भगवान से क्षमा-याचना करने लगा। आंखें पोंछ कर वह राधिका के पास आया और बोला, ‘राधिका, मैंने इतना जुल्म ढाया तुम पर, लेकिन तुम ने सब भुलाकर मेरे लिए इतना कुछ किया, जिसका ऋण मैं कभी नहीं उतार पाऊंगा। वह भावुक हो गया था। उसके स्वर में पश्चाताप छलक रहा था। इस पर राधिका ने कहा, ‘जीजाजी, छोड़ दीजिए सारी बातें। मैंने कोई एहसान नहीं किया। मैं अभी भी आपको बड़ा भाई मानती हूं… फिर दीदी की याद में उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

रमेश अपने बेडरूम में जाकर बैठ गया। उसका दिल भर आया था। वह सोचने लगा कि कैसे राधिका के लिए अच्छा सा लड़का देखकर जल्द से जल्द उसके हाथ पीले कर दे, जिससे उसके पापों का परिमार्जन हो। साथ में शकुंतला की आत्मा को भी शांति पहुंचे।

राधिका ने अपने आपको संभाला और वह अपने रोज के कार्यों में व्यस्त हो गई। आखिर भूकंप से कभी निसर्ग का चक्र रुका है, उसे तो निरंतर चलते ही जाना है। 

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