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रिश्तों को पैसे से ना तोलो—गृहलक्ष्मी की कहानिया
Rishto ko Paise se na Toulo

रिश्तों को पैसे से ना तोलो-“हैलो गिरीश बाबू …मैं रानी बोल रही हूँ। रमा बहुत बीमार है। यहाँ के डाॅक्टर को दिखाया तो उन्होंने कहा है की शहर में किसी बड़े डाॅक्टर को दिखाओ। इस सरकारी अस्पताल में उतनी सुविधाएं नहीं हैं। आप क्या कहते हैं बाबू?”
दूसरी तरफ से गिरीश ने कहा “भाभी ये भी कोई पूछने की बात हैं! कल रमा को लेकर यहां आ जाइए। बच्ची का सही समय पर इलाज जरूरी है। मैं बरखा को भी इस बारे में बता दूंगा अभी वो बच्चों के साथ मार्केट गई है।”

“धन्यवाद बाबू”

“भाभी आप ये धन्यवाद कहकर पराया मत बनाइए, जल्दी आ जाइए।” गिरीश ने कहा और फोन रख दिया।

अब बरखा को समझाना गिरीश के लिए चुनौतीपूर्ण था क्योंकि वो जानता था कि बरखा ने सिर्फ और सिर्फ रानी भाभी का अपमान ही किया है। आज भी वो दिन याद है जब बरखा ने पहले ही दिन रानी भाभी को नौकरानी कहकर संबोधित किया था। वो तो भाभी का बड़प्पन था जो उन्होंने बरखा की बातों का बुरा नहीं माना। आज भी वो भाभी को पसंद नहीं करती है, वो लोगों को उनके कपड़े, तौर-तरीके, रहन—सहन के हिसाब से ही उनका आंकलन करती है न कि उसके व्यवहार से।
अभी इसी सोच में डूबा था तभी बरखा और बच्चे मार्केट से वापस आ गए। बच्चों ने गिरीश से लिपट कर कहा “पापा आज हमने बहुत मज़े किए, माॅम ने हमारे लिए बहुत सारे कपड़े खरीदे और हमने चाउमिन खाया और कोक भी पिया।”
तभी बरखा ने कहा चलो “अब जाओ पहले हैंडवाश करके कपड़े चेंज कर लो।”
“बरखा सुनो जरा” गिरीश ने पुकारा।
“हां बोलो क्या हैं?”
” जाओ पहले फ्रेश होकर आओ फिर बताता हूं…।” गिरीश ने सोचते हुए कहा।
कुछ देर के बाद बरखा आई तो गिरीश ने कहा “बरखा, रानी भाभी का फोन आया था। रमा बहुत बीमार है। गिरीश की बात बीच में काटते हुए बरखा बोली ….. “तब तो वो पैसे मांग रहीं होंगी, भेज दो पैसे।” इस पर गिरीश ने गुस्से से कहा….. “तुम हमेशा उन्हें गलत समझती हो। उन्होने पैसे नहीं मांगे। डॉक्टर ने बच्ची को बड़े अस्पताल में इलाज कराने के लिए कहा है।”
” अच्छा अब समझी वो यहां आएंगी इसीलिए इतना घुमा-फिराकर बातें कर रहे थे।”
” हां और मैं यह चाहता हूं कि तुम उनके साथ अच्छे से पेश आओ… समझी।” बरखा बिना कुछ बोले वहां से चली गई और बच्चों के कमरे में जाकर सो गई।
दूसरे दिन रानी, रमा को लेकर शहर आई। गिरीश उन्हें रेलवे स्टेशन से घर ले आया। बरखा ने उन्हें देखकर खुश होने का दिखावा किया। तभी रानी ने पूछा “बच्चे कहां हैं? दिखाई नहीं दे रहे हैं।”
” बच्चे स्कूल गए हैं” बरखा ने बताया।
बरखा ने उन्हें स्टोर रूम में ठहरा दिया।
गिरीश ने कहा “भाभी… मैं आज डाॅक्टर से अपॉइनमेंट ले लूंगा।” इतना कहकर वह आफिस के लिए निकल गया।

“शाम को गिरीश बच्चों को लेकर आया। रानी भाभी को देख रोहन ने कहा ये मेड सोफे पर क्यों बैठी है? गिरीश ने रोहन को डांटते हुए कहा “ये तुम्हारी बड़ी मां हैं।” तभी आगे बढ़कर बरखा ने कहा बुरा मत मानिएगा भाभी, शायद इसने आपके कपड़े को देखकर ऐसा कहा।
रानी भाभी झेंप गई लेकिन बरखा मन ही मन बहुत खुश हुई। परिस्थिति को सामान्य बनाते हुए गिरीश ने कहा “बेटा किसी इंसान का आंकलन उसके कपड़ों से नहीं होता बल्कि उसके व्यवहार से होता हैं। चलो दोनों बड़ी मां को नमस्ते करो।
दोनों बच्चों ने उनके पैर छुए, रानी भाभी ने उन्हें खुब आशीर्वाद दिया और अपने कमरे से एक पोटली ले आई जिसमें नमकीन और खजूर था। उन्होंने बच्चों को दिया। गिरीश ने कहा “भाभी आज भी आपको मेरी पसंद का ख्याल हैं। इसे मुझे दे दीजिए बच्चों को शायद ये पसंद न आए। ये पिज्जा और नूडल खाने वाले बच्चे हैं। तभी रीता ने एक खजूर लेकर खा लिया और उसने कहा “पापा ये तो बहुत टेस्टी है… मम्मा आप खजूर क्यों नहीं बनाती?”
बरखा मन ही मन आगबबूला हो गई।
दूसरे दिन गिरीश रमा को लेकर अस्पताल पहुंचा। वहां उसका इलाज हुआ और कुछ ही दिन में रमा अच्छी हो गई। इधर बच्चे अपनी बड़ी मां और बहन रमा से घुल-मिल गए। दूसरे दिन रानी भाभी जाने वाली थीं तो उन्होंने बरखा से कहा “तुम्हारा बहुत धन्यवाद बहू, तुमने हमारी इतनी मदद की।”
बच्चे तो रोने लगे बड़ी मां को पकड़कर, राहुल कहने लगा अभी मत जाइए और रीता रमा दीदी के लिए रोने लगी। “मम्मा आप बोलो ना बड़ी मां और रमा दीदी अभी नहीं जाएं।” बरखा ने बच्चों की बातों को अनसुना कर दिया।

गिरीश की तरफ देखते हुए रानी भाभी ने कहा “हम तुमसे मिलने आए ना! अब बड़ी मां को अपने बच्चों के आने इंतजार रहेगा गर्मियों की छुट्टियों में। गिरीश ने सहमति दे दी। नम आंखों से रानी भाभी ने बच्चों से विदाई ली।
“मम्मा मुझे कुछ खाने को दो ना!”
“क्यों अब मम्मा याद आ गई जाओ अपनी बड़ी मां से मांग लो।” चिढ़ते हुए बरखा ने कहा।
“बरखा कितना जहर ऊगलोगी? देखा तुम्हारे दिए संस्कार पर भाभी का प्यार भारी पड़ गया। बच्चे कितना घुल-मिल गए थे। क्योंकि उन्होंने इन्हें अपना समझा, जो अपनापन तुम्हारे तरफ से रमा के लिए नजर नहीं आया।”
” बस जितना मैं अच्छी बन सकती थी उतना बनी, उनका क्या हमारे कितने पैसे खर्च हुए! हमारा अहसान कभी नहीं चुका पाएंगी।”
“अब समझ आया सारा माजरा। तुम्हें सिर्फ पैसे से मतलब है तो सुन लो …….चुका दिया है तुम्हारा एहसान उन्होंने। एक पैसा मुझसे नहीं लिया। समझी तुम! ये कहो की तुम उनका एहसान जिंदगी भर नहीं चुका पाओगी। भईया के ना रहने पर भी भाभी ने कभी मुझसे सहायता नहीं ली और आज जो ऐश आराम की जिंदगी तुम बसर कर रही हो ना… ये भईया – भाभी की बदौलत हैं। तुम हमेशा रिश्तों को पैसों के तराजू में तौलती हो, व्यक्ति तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण नहीं है। कभी ठंडे दिमाग से मेरी बात पे गौर करना तुम्हें अपना असली चेहरा नजर आएगा।”
बरखा को अपने किए पर पछतावा हुआ लेकिन अब समय निकल चुका था……….भाभी जा चुकी थीं।

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