Kasauti aur Sona
Kasauti aur Sona

Hindi Kahani: “गलत लिखा है या सही,यह हमारा हाथ बता देता है ,यह सही स्पेलिंग  लिखने पर कंपकँपाता नहीं है” कोमल ने विद्यार्थियों को समझाते हुए कहा।
“मैम आप को डिक्शनरी यूँ ही नहीं कहा जाता स्कूल में ,आप नींद में भी सही ही बताती हैं यह ज़रूर कोई जादू है ,हम आपका सीक्रेट जानना चाहते हैं”?
“जरूर बताती पर अब बेल बजने वाली है”
 कहकर कोमल स्टॉफ रूम की तरफ़ चल दी ।
“कल शिक्षक दिवस पर , इस जादू को जरूर बताऊँगी “
अगले दिन माइक थामें उसके होंठ अपनी कहानी दोहरा रहे थे और उसका मन किसी फ़िल्म के फ्लैशबैक सीन की तरह बरसों पीछे लौट गया ।
बहुत  सालों पहले  एक बारहवीं कक्षा की बालिका लैंप की रोशनी में डिक्शनरी और किताब के सहारे भारी भरकम एक्सप्लेनेशन लिखा करती थी।
उस दिन भी “द पोएट  वांटस टू एस्केप फ्रॉम दिस मेटेरिअलिस्टिक वर्ल्ड”(कवि इस भौतिकतावादी सँसार से पलायन करना चाहता है।)
उसने बड़ी मेहनत से डिक्शनरी से एक एक शब्द बहुत परिश्रम और  सावधानी से चुन कर कर लिखा था।
सबके मेज पर अपनी अपनी कॉपी रखने के बाद अपनी  लिखी गयी व्याख्या को एक बार फिर पढ़ कर  उसने  भी अपनी कॉपी सर की टेबल पर रख दी।
उसे आज तो  शाबासी मिलने की पूरी उम्मीद थी सर ने  उसके लिखे एक एक शब्द को  ध्यानपूर्वक पढ़ा और उनकी पारखी नज़र जैसे ही एसकैपिज्म  पर रूकी उन्होंने प्रश्न कर दिया।
“इसका मतलब जानती हो”?
काले फ्रेम के चश्में के पीछे छुपी उन  तेज आँखों और विराट व्यक्तित्व के सामने कोई  झूठ बोलता भी तो कैसे उसने अधमरी आवाज़ में कहा ।
“नहीं”
“फिर तो यह चोरी हुई ।”
“सर मैंने किसी का एक्सप्लेनेशन देखकर नहीं लिखा” उसने रुआँसी आवाज में कहा और टप टप गङ्गा यमुना दोनों आँखों से बहने लगीं।
“देखो यह सच है कि तुमनें कोई चोरी नहीं है पर यह चोरी साहित्य की है ,तुमनें वह शब्द  क्यों लिखा जिसका तुम्हें अर्थ ही मालूम नहीं”
उसका रहा सहा आत्मविश्वास  भी जाता रहा,न गले में शब्द  थे ,न टाँगों में चलने की क्षमता वो घबराहट में वापस बैठ गयी।
सर ने उसे समझाते हुए कहा,
” जब शब्द को पढ़ो तो उसका अर्थ भी जानो फ़िर वो तुम्हारा हो गया।मिस्टेक्स आर वेरी शाय,गलतियाँ बहुत शर्मीली होतीं हैं आप पकड़ लीजिये वो भाग जायेंगी।”
उस दिन उसके इरादों पर भाग्य के स्वर्णकार की  फिर से एक और चोट पड़ी थी।
अपने घर और रिश्तेदारों में उसकी मेधा के चर्चे होते थे,चाहे वह साँस्कृतिक कार्यक्रम हों या पढ़ाई,उसे पढ़ने में समझौता कभी पसन्द नहीं था।
इसीलिये उसने बाबा से ज़िद करके अँग्रेजी की ट्यूशन गोस्वामी सर से ही पढ़ने की ठानी थी।पहली बार जब उसने अपनी कॉपी चेक करने को उनके हाथों में दी तो आत्मविश्वास बुलन्दी पर पहुँचा हुआ था।
पर जब कॉपी वापस मिली वो पूरे पेज पर  स्पेलिंग्स के चारों ओर लाल घेरों की भरमार से उसका मुँह अपमान से लाल हो उठा।
उसने चोरों की तरह कॉपी बैग में डाली और चुपचाप निकल गयी,उसका भरम बहुत बुरी तरह से टूटा था मेधावी होने का ।
रोते हुए उसने बाबा से कहा, “मैं कल से पढ़ने नहीं जाऊँगी सर बहुत डाँटते हैं,ये देखिये मेरी कॉपी।”
मगर जब बाबा ने उसकी कॉपी को देखा यो उनका चेहरा ख़ुशी से दमक उठा।
बोले “बिटिया अब तुम्हारी डोर सही हाथों में गयी हैं गोस्वामीजी की कसौटियों पर जो बच्चा खरा उतरा वह सोने सा निखरेगा।”
ऐसा गुरु मुश्किल से मिलता है जो आपको बदलने में जीजान लगा दे ,नहीं तो मातापिता के अलावा किस को फ़िक़्र है ,शिक्षक बस अपनी फ़ीस से मतलब रखते हैं ,बच्चे से नहीं।
उस दिन उसे समझ में आ गया कि निखरने के लिये  टिकना ज़रूरी है।
अब वह आख़िरी के पाँच मिनट में सर से अपनी कमियों के बारे में पूछती और उन्हें  जी जान से सुधारती भी,
कुछ दिनों में सर ने एक कॉपी की हैंडराइटिंग की बड़ी तारीफ़ की बालिका ने फिर अपना सवाल रख दिया सर मैं कैसे ठीक करूँ।
“हुँह इंटरमीडिएट में हैंडराइटिंग न बाबा,बूढ़े तोते राम राम नहीं पढ़ते।”फि
र उसे आश्चर्य तब हुआ जब सर ने  सब बच्चों को करसिव राइटिंग की प्रारंभिक जानकारी भी दी,उसने पहली बार वर्णों के समूहों के बारे में जाना।
वह दिन रात खुद को सुधारने में लगी रही,वह उन की बताई पंक्तियों को दोहराती।
घने काले जँगल भरपूर
मुझे रखना है याद जरुर
अभी सोने से पहले किन्तु
मुझे जाना है मीलों दूर
और एक दिन वह भी आया जब उसे सर ने पूरे  पाँच में पाँच अँक प्रदान किये।
तालियों की गड़गड़ाहट से  उसका ध्यान टूटा ,क्लास के कई बच्चों की आँखों में हल्की नमी थी,कारण उसे भी ज्ञात था।
तब तक सवाल उठा,उसके बाद क्या हुआ मैम,
उसके बाद उसने तीन साल बी.ए. फिर एम ए किया।
उसे याद आता कि जब सर कहते कि तुमसे नहीं होगा तो मुझे अपनी  कोशिश और तेज़  करनी है,मुझे उस पल का इंतज़ार करना है जब मुझे अपने सर पर नहीं,सर को मुझ पर गर्व हो।
कहते हैं कि शिक्षा दोमुखी प्रक्रिया है हम जीवन भर किसी न किसी से सीखते ही रहते है।
सर ने मुझे विषय के अलावा भी  बहुत कुछ सिखाया वरना आज न मैं  तो मैं अच्छी नागरिक होती न अच्छी शिक्षक होती और न ही लेखिका।
मैम क्या आपके सर से आप बाद में कभी मिलीं दोबारा,
हाँ उन्होंने मुझे आशीर्वाद देते हुए कहा ,मैं तुम्हारी रचनाओं को पढ़ता हूँ ,मुझे लगता है कि मैं सूर्य हूँ और तुम सब बेटियाँ मेरी किरणें।
ये बहुत बड़ी निधि है जब शिक्षक को अपने पढ़ाये  अनगिनत बच्चों में  अपना कोई बच्चा याद रह जाये।
शिक्षक की डाँट ,डाँट नहीं सुनार की आँच होती है जिससे  बच्चा आभूषण बनता  है।
बस यही है मेरा सीक्रेट ,सर की डाँट को  पॉज़िटिव लेकर आत्म सुधार और आत्म अनुशासन का पालन करना
मैम हमें भी आपके सर को देखना है,बच्चों की भारी माँग पर उसने अपने गुरुजी की तसवीर दिखाई।
मैम आप टीचर्स डे कैसे मनाती हैं,
उनसे बात करके ,उनका आशीष लेकर ,क्योंकि शिक्षक से ज्यादा शिष्य के  आगे बढ़ने पर कोई ख़ुश नहीं होता।
और उसके होंठ थैंक यू सर कहकर मुस्कुरा उठे।