भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
आज पिंकी का जन्मदिन था। उसने स्कूल की अपनी सहपाठिनों तथा मोहल्ले की कुछ सखियों को निमन्त्रण दिया था। प्रतिवर्ष मनाये जाने वाले इस जन्म दिन की विशिष्टता इसलिए भी थी कि पिंकी अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। जन्मदिन खूब धूम-धाम से मनाया जाता था।
इस बार जब सभी को निमन्त्रण मिला तो सभी की सभी हैरान थी कि इस बार सायं के समय न बुला कर प्रात: ग्यारह बजे बुलाया गया है। इस अवसर पर जहां पिंकी ने अपनी सखियों, सहपाठिनों तथा अध्यापिकों को बुलाया था, वहीं उसके माता-पिता ने मोहल्ले के कुछ ऐसे परिवारों को भी बुलाया था, जिनके साथ उनके घनिष्ठ सम्बन्ध थे।
आज इत्तेफाक से छुट्टी का दिन था, इसीलिए प्रात: समय आने में किसी को भी कठिनाई नहीं हुई। घर में सुबह से ही हवन की तैयारियां चल रही थी। हवन का कार्य सम्पन्न कराने के लिए किसी पण्डित को नहीं अपितु पिंकी के ही विद्यालय की, गायत्री परिवार से जुड़ी, संस्कृत की अध्यापिका सुश्री नमिता से यह पुनीत कार्य करवाने का निर्णय लिया गया था। वह बहुत ही दक्ष एवं निपुण थी। पिंकी की सभी सहपाठिनों तथा सखियों के लिए यह एक नया अनुभव था। न तो पिछले वर्षों की भांति कमरों को गुब्बारों अथवा झुमरुओं से सजाया गया था और न ही कहीं केक अथवा मोमबत्तियां ही दिखाई दे रही थी। जब से पिंकी ने, उसके माता-पिता ने सुना था कि मोमबत्तियां बुझाने का मतलब है, अपने को रोशनी से अन्धेरे की ओर ले जाना अर्थात् ज्ञान से अज्ञान की ओर जाना, तभी से उन्होंने मन बना लिया था कि अगली बार वे जन्म दिन अपनी संस्कृति के अनुसार ही मनायेंगे।
यज्ञ प्रारम्भ करने से पहले सभी अपने-अपने स्थान पर बैठ गए थे। सर्वप्रथम अध्यापिका नमिता ने पिंकी को उसके माता-पिता के साथ बैठा कर, क्योंकि वह आठवें वर्ष में प्रवेश कर चुकी थी, इसलिए उसके हाथ से देसी घी के आठ दीपक प्रज्वलित करवाए। उसके उपरांत विधिवत् यज्ञ का प्रारम्भ हुआ। हवन में मन्त्रोच्चारण के साथ-साथ आहुतियां डाली जाने लगी। प्रज्वलित हो रहे घी तथा सामग्री की सुगन्ध से पूरे के पूरे घर का वातावरण बहुत ही उज्जवलता से भर गया था। वहां उपस्थित छोटा-बड़ा प्रत्येक प्राणी आनन्द से विभोर था। तभी पूर्णाहूति का समय हुआ और सभी ने खड़े होकर अपने-अपने हाथों में सामग्री लेकर पूर्णाहुति डाली। यज्ञ पूर्ण होने के बाद और जितनी भी क्रियाएं थीं, उन्हें पूर्ण करवाने के उपरांत पण्डित की भूमिका में कार्य कर रही, अध्यापिका नमिता ने पिंकी को एक स्थान पर बैठा कर मन्त्रों का उच्चारण किया तथा वहां उपस्थित सभी से पिंकी पर फूलों की वर्षा करने के लिए कहा। मन्त्रोच्चारण के साथ सभी ने पिंकी को दीर्घायु होने का आशीर्वाद दिया और खूब पढ़ने-लिखने के लिए मंगलकामनाएं दी।
हवन की समाप्ति पर आये हुए मेहमानों तथा पिंकी की सखियों को डोनों में प्रसाद के रूप में हलवा डाल कर दिया गया। हलवा इतना स्वादिष्ट था कि सभी आनन्द से उसका सेवन कर रहे थे। हवन कुण्ड से उठ रहा पावन सुगन्धित धुंआ जहां घर के भीतर घूम-घूम कर वातावरण को पावन बना रहा था वहीं सभी के हृदयों को भी सुगन्धित कर रहा था।
इस बीच चाय भी आ चुकी थी। सभी को चाय के साथ मिष्ठान आदि भी परोसा गया। चाय आदि ग्रहण कर सभी ने पिंकी को जन्मदिन की शुभकामनाएं दी तथा अपने-अपने उपहार उसे सौंप दिए। जब सभी मेहमान जाने लगे तो उन्हें एक-एक लिफाफा लड्डूओं का भी दिया गया। सभी एक बार फिर पिंकी को शुभकामनाएं देने के उपरान्त लौटने लगे। मन ही मन सभी सखियां संकल्प लेकर निकली थी कि वह भी आगे से अपना जन्म दिन इसी तरह मनाया करेंगी।
इस अवसर पर उसकी सहेली रेणु भी आई थी। रेणु एक बहुत ही गरीब परिवार की लड़की थी, पिंकी की बहुत पक्की सहेली। जब सभी चले गये तो उसने भी शर्म से अपनी गर्दन नीचे करते हुए एक डिब्बा पिंकी के हाथ में पकड़ा दिया। उपहार देते समय रेणु की आंखें भर आई। वह रुकी नहीं, भीगी आंखों से शुभकामनाएं देकर चली गई थी।
अब उपहार खोले जाने की बारी थी। पिंकी उपहार खोल कर एक ओर रखती जा रही थी। वैसे तो सभी के उपहार उसे बहुत पसन्द आये। सब से उत्तम उपहार उसे रेणु का लगा, क्योंकि उसके उपहार से प्यार और समर्पण की खुशबू का आभास हो रहा था। उसके छोटे से डिब्बे के भीतर एक टहनी पर गुलाब का एक सूर्ख लाल फूल था तथा हाथ से बना एक ग्रीटिंग कार्ड था। वह दौड़ कर अपनी मम्मी के पास गई तथा मम्मी का हाथ पकड़ कर बोली-‘देखो मम्मी, रेणु ने क्या दिया है?’ फिर पास ही बैठे पापा की ओर देख कर बोली-‘देखो पापा गुलाब का फूल कितना सुन्दर है, यह ग्रीटिंग कार्ड, हाथ से बनाया गया है, कितना आकर्षक है।’
पापा ने उसके हाथ से गुलाब का फूल लेकर सूंघा तो लगा जैसे कि प्यार की एक बूंद उनके भीतर अन्त:स्तल तक उतर गई हो। उन्होंने पिंकी से पूछा-‘कौन है ये।’
‘पापा ये रेणु है। इसके पापा सब्जी की रेहड़ी लगाते हैं। रेणु पढ़ाई में बहुत होशियार है। वैसे भी यह सभी लड़कियों में अलग ही है। सभी मैडम इसे बहुत प्यार करती हैं।
‘अच्छा…तो तुम्हारी इससे दोस्ती है।’
‘हां पापा।’ इतना कहते हुए वह अपने में गर्व महसूस कर रही थी।
‘बहुत ठीक। यह जो इसने उपहार दिया है, यह मेरे विचार में सबसे उत्तम है। इसे उसने अपने अन्तर्मन से तैयार किया है। यह तुम्हारे प्रति उसके मन में जो समर्पण की भावना है, उसी को दर्शाता है।’
‘हां पापा।’ वह गद्गद् मन से बोली थी।
‘बेटा, तुम्हें भी तो इसे कुछ उपहार देना चाहिए।’ उसकी मम्मी ने भी बीच में बोलते हुए अपनी बात रखी।
‘पर मम्मी, ये लोग तो जन्मदिन मनाते ही नहीं।’
‘फिर क्या हुआ, हम एक दिन इसके घर चल पड़ेगें।’
‘पर मम्मी, इनका घर ऐसी जगह पर है, जहां गाड़ी जा नहीं जा सकती।’
इस बार पापा ने उत्तर दिया-‘फिर क्या हुआ बेटी, जहां तक गाड़ी जायेगी वहां तक गाड़ी में, आगे पैदल ही सही।’
‘ओह! पापा।’ अगले ही क्षण फिर कुछ सोचकर बोली- ‘पापा, उपहार क्या लेंगे?’
‘बेटा, यह तो तुम्हें ही पता होगा कि उसके पास किस चीज की कमी है। अगर तू मेरा विचार पूछती है तो मैं तो कोई पुस्तक देना ही पसंद करूंगा। किसी भी महापुरुष की जीवनी हो सकती है या उसके द्वारा लिखी हुई ऐसी पुस्तक हो, जिसे पढ़ कर उसे अच्छे बनने के संस्कार मिलें।’
‘पापा, बात तो आपकी ठीक है। इतना तो मुझे पता है, उसके पास डिक्शनरी नहीं है।’
‘तो क्या हुआ, एक अच्छी-सी डिक्शनरी तथा एक पुस्तक विवेकानन्द साहित्य में से दी जा सकती है।’
‘हां पापा, यही ठीक रहेगा।’ इतना कह कर वह पापा के गले में बाजू डाल कर लिपट गई थी।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
