Hindi Motivational Story: मां, दादी बाबा कहां हैं”?
छुट्टियों में छात्रावास से घर लौटते ही बेहद शांति महसूस करते हुए सौरभ ने मधु से पहला प्रश्न पूछा|
“इतनी जल्दी क्या है?
पहले अपना कमरा तो देख ले कैसा सजा है! उसके बाद मामाजी के यहां चलना है गृहप्रवेश में” मधु ने बेहद उत्साह से कहा।
सौरभ अंदर गया तो उसने पाया कि दादी बाबा का कमरा ही उसके लिए सजाया गया था।
अगले दिन भी वह बार-बार उन दोनों को पूछता रहा और मधु टालती रही सौरभ के प्रश्न को|
वो दोपहर का खाना खाकर थोड़ा आराम करने के बाद अपने पड़ोस में ही रहने वाले दोस्त मुकुल से मिलने चला गया।
मुकुल ने उसे जो बताया उसे सुनकर तो उसके पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन ही खिसक गई ।
वापस आकर काफी देर तक कमरे में अकेले ही, किसी तरह रुलाई रोककर बैठा रहा।
वह अपनी मां के कर्कश और मतलबी स्वभाव से परिचित था ।
बात-बात में उनके मायके की सम्पन्नता के बखान का आदी भी था शुरू से ही।
पर उसके बाबा भी किसी से कम न थे, रिटायर्ड सरकारी अधिकारी और, शहर के सम्पन्न इलाक़े में थी उनकी कोठी।
उसके पिता गोपाल को दादी बाबा ने कई बच्चों को खोने के बाद पाया था।
मधु को अलग रहने की ही कामना थीं इसलिए वह हर प्रयास करती जिससे घर में कलह-क्लेश का माहौल बने।
सौरभ को छात्रावास भेजना भी उसी का हिस्सा था।
सौरभ ! मधु ने आश्चर्य से कहा, “अरे! तुम तैयार क्यों नहीं हुए अभी तक”?
“ऐसे ही मेरा मन नहीं हो रहा जाने का,”उसने उचाट मन से बोला
तब तक गोपाल मिठाई के कई डिब्बे को साथ लिए हॉल में दाखिल हुआ ।
उन्हें देखकर ही मधु का स्वर और तिक्त हो गया।
“ये किसके यहाँ से मिठाई उठा लाये,वो बड़े लोग हैं डिब्बा ही स्टेन्डर्ड बताता है कि चीज़ ऊँची दुकान की है”,उसने बिगड़े स्वर में कहा।
अरे …..शांति निकेतन वालों की ही है पर उनकी दुकान में डिब्बे खत्म थे तो मैंने पड़ोस वाले के ही डिब्बों में पैक करवा ली, वैसे भी खानी तो मिठाई ही है डिब्बे को थोड़ी न खाना है, गोपाल ने लापरवाही से कहा।
तुम भी न…मेरी नाक कटवा कर रहोगे, मेरे मायके वाले बड़े लोग है,ये सब नहीँ खाते फ़ेंक देँगे या नौकर को दे देंगे,मधु का रोष उग्रता पकड़ता जा रहा था।
मम्मी… बस भी करो टाइम कम है जल्दी तैयारी करो डिब्बे को इतना तूल क्योँ दे रही हो;जाना तो उसे कबाड़ में ही है न सुबह, सौरभ ने समझाते हुए कहा ।
“सौरभ तुम अभी छोटे हो, तुम क्या जानो” ?
खाई तो मिठाई ही जाती है पर इस्तेमाल होने तक डिब्बा मिठाई की भी सुरक्षा करता है और लाने वाले के नाम जी की भी, कि किस दुकान से खरीदी है, तब तक उसे सम्भाल कर रखा ही जाता है ।
“जब मिठाई खत्म हो जाती है तब डिब्बा कबाड़ में फेंका जाता है, समझे कुछ …मधु ने अपने चौदह वर्ष के बेटे को समझाते हुए कहा।”
सौरभ ने गहरी नज़रों से देखते हुए ठहरी आवाज़ में कहा, “हाँ मम्मी …समझ गया, “जैसे दादा-दादी अब ओल्ड एज होम में फ़ेंक दिए गए है आप दोनों के मिठाई खाने के बाद।”
“सौरभ!तुम….. बहुत ज़्यादा बोलने लगे हो आजकल मधु ने लगभग चीखते हुए कहा “।
तुम्हारी पढाई पर हम लोग इसीलिए इतना खर्च कर रहे हैं कि तुम हमे ये बदला दो हमारे बलिदान और प्यार का?
क्या गलत कह रहा हूं मम्मी ….?
परिणाम तो एक दिन वही होना है आपका भी, ये घर आप से पहले दादी-बाबा का है ।
उन्होंने भी पापा के लिए यही किया जो आप मेरे लिए कर रही हैं पर तरीका उनसे बिल्कुल ही उल्टा।
“बेटा!ये सब कर तो आखिर, तेरे लिए ही रही हूं न “,मधु ने तड़प कर कहा।
उन्होंने आपके लिए यहां जीवन भर की कमाई लगा पर आपने सिर्फ अपना स्वार्थ देखा।
उन लोगों को सीधे अदालत का आदेश भेजा अपने बहू होने के अधिकार का उपयोग करके।
सब तो वो आप लोगों को दे ही चुके थे।
फिर भी अदालत में खींचने का डर दिखा कर आपने उन्हें इतना परेशान किया कि वो बेचारे घर की शान्ति की खातिर चुपचाप अपनी मेहनत के बनाए घर और बेटे को आपके लिए छोड़ गए ….
पापा भी आपके आभामंडल में इतना दबे कि आवाज़ भी न उठा पाए।
मां डिब्बा तो आपके घर का भी खानदानी था पर आप भी उस के स्तर की न थीं।आप इतना किसके लिए गिर गईं?
युवा होते बेटे के तर्क-वितर्क से निरुत्तर मधु का चेहरा सफ़ेद पड़ गया ।आखिर उसके कर्म बेटे के सामने खुल ही गए थे।
उसे सास-ससुर की बात याद आ गई जो उन्होंने आंसू भरी आंखों से घर छोड़ते समय कही थीं
,”मेरा घर तुम्हारे दहेज से नहीं बना है बहू, मुझे बिना किए जो दे रही हो वह तुम्हे न मिले क्यों कि उसमें भी मुझे ही दुःख होगा।
बुरे कर्म कभी चैन नसीब नहीं होने देते वो सामने आते ही हैं।”
वो धम्म से सोफे पर बैठ गई उसे सौरभ से ये आशा बिल्कुल न थीं ।
ये विद्रोह के स्वर उसे ये बतला चुके थे कि उसका किशोर मन भले बुरे का फ़र्क समझने लगा था
पार्टी जाने का उत्साह थम चुका था, सौरभ को साथ लेकर गोपाल भी कहीं निकल गया।
शहर से दूर ओल्ड एज होम के बाहर गाड़ी रुकी तो सौरभ को हॉल में ही अपने दादी बाबा हमउम्र लोगों के साथ नजर आये। उन्हें वहां आए हुए ज़्यादा दिन नहीं हुए थे।
“दादी-बाबा अपने घर वापस चलिये न” सौरभ ने मनुहार से कहा।
बेटा हमें कोई भी तकलीफ नहीं यहां ,फिर पेंशन आ ही रही है,तुम जब याद आए तो आ सकते हो, वो उसे समझाते हुए बोले।
लेकिन जब वह न माना तो सौरभ के आंसुओं से पिघलकर वो लौट आये
सौरभ और गोपाल फिर से जी उठे और मधु भी थोड़ा शांत रहने लगी थीं
उसे समझ में आ गया था कि परछाईं , काया का ही अनुसरण करती है,
सुखद बदलाव की किरणों ने खुलकर हर चेहरे पर मुस्कान बिखेर दी ।
