Summary: 3–7 साल में identity निर्माण पर पेरेंटिंग का गहरा प्रभाव
3–7 साल की उम्र में बच्चे अपनी पहचान बनाते हैं। इस दौरान पेरेंट्स की ओवर-कंट्रोलिंग, तुलना और भावनाओं को अनदेखा करना उनकी identity कमजोर कर देता है।
Parenting Mistakes for 3 to 7 Children: 3 से 7 साल, बच्चे के लिए वह उम्र है जब बच्चा खेलने, खाने और रोने से ज्यादा सीखता है। जैसे पूरे वाक्य के साथ अपनी बात को कहना, उसे क्या पसंद है या नहीं बात को कहना, यह बताना वह रो रहा है पर क्यों, यह बता पाना मेरा क्या नाम है, मैं कौन हूं, मैं क्या करता हूं या कर सकता हूं जैसी चीज सीखना है। अगर इस उम्र में बच्चों को सही माहौल और परवरिश न मिले तो बच्चे का सामाजिक विकास, आत्मविश्वास मजबूत नहीं बनता। आइए जानते हैं, इस लेख में इस उम्र के बच्चों के पेरेंट्स कौन सी गलती ना करें।
आइडेंटी क्या है और इसके विकास चरण
अगर हम 3 से 7 साल की उम्र से देखे तो आइडेंटी का अर्थ होगा बच्चा अपने आप को किस तरह देखा है। अपने बारे में क्या सोचता है। वह क्या कर सकता है। लोगों उसे किस तरह देखते हैं बच्चे में इसका विकास होना।
आइडेंटी का विकास चरण
3 से 4 साल में बच्चों के अंदर मैं खुद कर सकता हूं या करूंगा की भावना का विकास होता है। वह अपनी पसंद और ना पसंद समझने लगता है।
4 से 5 साल की उम्र में बच्चा समझ सकता है कि उसे कौन अच्छा लगता है, वह कैसा बनना चाहता है, जैसे खुद को डॉक्टर, टीचर, मम्मी पापा के रोल में रखना। इसी उम्र में बच्चा दूसरे को देखकर उसके व्यवहार को भी अपनाता है।
5 से 6 साल की उम्र में बच्चा अपने और दूसरों के बीच फर्क करने लगता है। उसमें लिंग की भी समझ विकसित हो जाती है। वह लड़का है, मैं लड़की हूं। वह कैसा दिखता है, मैं कैसा दिखता हूं बच्चा समझने लगता है।

6 से 7 साल इस उम्र में बच्चा समझ जाता है कि उसे क्या करना पसंद है और क्या नहीं। वह सामाजिक नियमों को समझता है। वह अपनी तुलना दूसरों से कर पाता है। बच्चा तुलनात्मक व्यवहार समझता है। इसी उम्र में बच्चों में किसी परेशानी से कैसे निपटे इसकी क्षमता का विकास होता है।
पेरेंट्स द्वारा करी जाने वाली गलतियां
बच्चों की स्वतंत्रता को कंट्रोल करना: अक्सर देखा जाता है, माता-पिता अपने 3 से 7 साल की उम्र के बच्चों को इतना छोटा समझते हैं कि वह उन्हें स्वतंत्र रूप से किसी काम को करने नहीं देते जैसे कि बच्चों को कौन से कपड़े पहने हैं, यह फैसला भी पेरेंट्स करते हैं।
तुलना करना: अरे देखो शर्मा जी का बेटा हमारे बेटे की उम्र का ही है पर वह कितना अच्छा बर्ताव करता है। अपनी मां की सारी बात मानता है, एक हमारा बच्चा कुछ भी नहीं समझता।
बच्चों की भावना को कम समझना: तुम्हें किसी भी काम के लिए कहो तो तुम्हें डर लगता है। अकेले कमरे में रोने लगते हो। मैं यहां थी तो तुम्हें रोना क्यों आ रहा है। छोटे बच्चों की इस तरह की भावना को अक्सर माता-पिता इग्नोर करते हैं। जिससे बच्चा खुद को कमतर समझने लगता है।
बच्चों की आलोचना करना: बच्चों के कुछ भी नया करने या सीखने पर उसका प्रोत्साहन बढ़ाने की बजाय उसमें कमियां निकालना या उसकी आलोचना करने से बच्चे का आत्मविश्वास गिरता है।
पेरेंट्स क्या करें
अपने बच्चों को अपनी पसंद बताने की स्वतंत्रता दे। उन्हें छोटे काम जैसे उन्हें क्या पहनना है, क्या खेलना है इसका निर्णय लेने दे।
अगर बच्चा कह रहा है, उसे डर लग रहा है, उसे आपकी याद आ रही है तो उसका भरोसा करें। उसकी भावना को समझे।
बच्चा जब आपसे कुछ कह रहा हो तो उसे अनदेखा करने की बजाय उसे ध्यान से सुने।
बच्चों के रिजल्ट से ज्यादा उसके प्रयास को देखें और उसकी तारीफ करें।
बच्चों को स्वतंत्रता दे परंतु नियम तय करें।
उनकी गलतियों से उन्हें सीखने की प्रेरणा दें।
बच्चों की तुलना या आलोचना के बजाय उनका मार्गदर्शन करें।
बच्चों को हर समय चुप रहने के निर्देश की बजाय उनके बातों को पहले सुने, फिर उनसे कुछ कहें।
माता-पिता ध्यान रखें, आपका बच्चा खुद को वैसा ही देखने लगता है जैसे आप उसे देखते हैं। अब यह आप पर है आप उसे खुद पर निर्भर और कमजोर आत्मविश्वास वाला देखते हैं या स्वतंत्र और आत्मविश्वास से भरा हुआ देखते हैं।
