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मैं मां-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां पंजाब: Mother and Child Story
Mein Maa...

Mother and Child Story: मैं ही उसकी जन्मदात्री हूं परन्तु उसके सर्टिफिकेट्स के मां वाले कॉलम में मेरा नाम नहीं।

मैं रात को उन्नींदी हालत में थी। वह मेरे साथ खेल रहा था। कभी मुंह से बुलबुले निकालता, कभी कुछ। फिर उसने अपने पैर मेरे मुंह से लगा दिए। अब सुबह वह मेरी छाती पर हाथ मार रहा था। उसे फीड देने के लिए मैंने शर्ट को ऊपर किया कि मेरी आंख खुल गई।

इस समय बेड पर अकेली हूं। इतना बड़ा घर काटने को आ रहा है।

अब वह कौन-सा छोटा बच्चा होगा। पिछले दिन मैं उससे मिलने गई। उस युवा लड़के को मैं देखती ही रह गई परन्तु उसने मेरी ओर पुत्र की नजर से नहीं देखा। मां की ममता पसीज गई। आंखों से नीर बहने लगा। वहां से मैं सीधी अपने वकील के पास गई।

किम ने कोर्ट में एक अन्य केस फाइनल कर दिया। आज उस केस का फैसला है। मैं पूरी रात ठीक ढंग से सो नहीं पाई। मेरे पास उसकी कोई और फोटो भी नहीं, सिवाय जन्म समय के ही। एक दिन मैंने उसकी फोटो खींचने की रिक्वेस्ट करनी चाही परन्तु मेरी वकील ने मना कर दिया। वैसे जज कहां ऑब्जैक्शन करता? मुझे तो जज पर आज भी भरोसा है। वह मेरा बेटा नहीं लौटा पाएगा परन्त मझे मां का हक अवश्य दिला देगा? पिछली हियरिंग के समय जज ने यही कहा था. “मझे लगता है कि अदालत में ऐसा अनूठे किस्म का केस पहली बार ही आया है।”

अभी बाहर बहुत अंधेरा है। तब हमारे घर में बहुत रोशनी थी।

***

शहर के बाहर वार पॉश एरिया में हमारा बंगला था। बंगले की हर शै इंपोर्टेड थी। मुझे बंगले और शै से कोई अधिक अटैचमेंट नहीं थी। दाएं हाथ लॉन था। बड़े वृक्ष जंगल-सा भ्रम उत्पन्न करते। अनेक फलों के वृक्ष थे। हम तीनों बहनें जब भी मौका मिलता, वहां झूला झूलती।

बाहर पक्षियों के गीत सुनाई दे रहे हैं, तब हम भी चिड़ियों समान अंदर-बाहर फुदकती रहतीं। पढ़ते समय घर में पूर्ण खामोशी पसर जाती। पढ़ाई में हमेशा मैरिट पर आने के कारण घर पर बधाई देने वालों का तांता लग जाता। सभी कहते, “सरूप चंद जी या गुप्ता जी! भगवान् सभी को आपकी बेटियों जैसी लड़कियां दे।” ऐसा सुन कर डैडी का सिर गर्व से उठ जाता।

डैडी ने अपने दो सहयोगियों के साथ मिल कर फैक्टरी लगाई। सभी बैंक अधिकारी थे। फैक्टरी लगाते समय उन्होंने बैंक से रिटायरमेंट ले ली। फैक्टरी लगे आठ वर्ष हो गए थे। काम से थके-हारे आने पर भी हम तीनों को देख कर वह अपनी थकावट भूल जाते और कहते, “गणपति बप्पा! मुझे इतनी शक्ति देना कि मैं अपनी तीनों बेटियों को उच्च शिक्षा दे पाऊं।”

डैडी को तीनों बेटियों में से मुझ पर अधिक भरोसा था। मेरे द्वारा मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बी.टैक कर लेने से डैडी और भी अधिक गर्व महसूस करने लगे। उन्होंने कहा, “सुधा! तुम कुछ समय के लिए जॉब कर लो। हमारा बिजनेस घाटे में चल रहा है। फिर मैं तुम्हें यू. एस. ए. से एम. टैक करवाऊंगा। हमारा काम ठीक हो जाएगा। तब तुम वहीं सैटल हो जाना।

मेरी नौकरी तो आठवें सेमेस्टर में पढ़ते ही एक ऑटोमोबाइल कंपनी में लग गई थी। तीन लाख का सालाना पैकेज था। मैं नोएडा में नौकरी करने लगी।

नौकरी में जाते ही उन्होंने मुझे कलर डिजाईनिंग सैक्शन के डैश बोर्ड की फिनिंग में लगा दिया। मेरा दोस्त और क्लासफैलो राजीव गर्ग वहां वैल्डिंग सेक्शन में वैल्डिंग करते हुए रंग से भरे मेरे हाथ देख कर हंसने लगा। तीन महीने बाद मुझे डैश बोर्ड की प्लानिंग का काम मिला। पैकेज में भी एक वर्ष बाद मामली-सी वद्धि कर दी गई थी।

मेरा और राजीव का अपार्टमैंट आसपास ही था। हम एक साथ घूमने-फिरने जाते, फिल्म देखते, रेस्तरां जाते। हम दोनों ने मन में एक-दूसरे के रंग भर लिए। डैडी मुझे मास्टरर्स के लिए जोर दे रहे थे जबकि राजीव नहीं चाहता था कि मैं उसे छोड़ कर जाऊं। जिस दिन मैंने ग्रैजुएट रिकार्ड एग्जामीनेशन (जी.आर.ई.) पास किया, उसी दिन डैडी की कार एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई। रिजल्ट का सुन कर घर से पैसों का बंदोबस्त करने के निकले थे।

डैडी का क्षत-विक्षत शरीर देख कर मैं कांप उठी थी। बहुत मुश्किल से मैंने खुद को संभाला।

मेरी खुशी गमी में बदल गई। कई महीने डिप्रेशन में रही। राजीव ने बहुत साथ दिया मगर मैं मन से एक्सीडेंट का डर दिल से ना निकाल सकी। हम अभी मातम से उबर नहीं पाए थे कि हिस्सेदारों ने परिवार को खाली बर्तन थमा दिया, जिसमें देनदारी और बैंक के लोन थे। मम्मी ने सारा हिसाब मेरे सामने रख दिया। उन्हें बेहोशी के दौरे पडने लगे।

छोटी-सी फैक्टरी चलने की बजाय बैंकरप्ट हो गई। मम्मी ने बिस्तर पकड़ लिया। मालती और वनिता का रोना रुकता नहीं था। मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था। राजीव द्वारा हौसला देने के बावजूद मेरे सामने अंधेरा ही पसरा था। बहनों का फ्यूचर खतरे में था। बीस-पच्चीस वर्ष पहले दिल्ली जैसे महानगर में तीन-साढे तीन लाख का पैकेज बहुत ज्यादा नहीं था। मुश्किल से ही गुजारा होता था। मंहगाई के दौर में कर्ज में डूबे घर को कैसे बचाया जाए, यह अहम् सवाल मेरे सामने था।

मैं अपना खर्च घटाने के लिए राजीव की रुममेट बन गई। सारे पैसे घर और बहनों की पढ़ाई पर लग रहे थे। मैं अमेरिका जाकर एम.टैक करने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी। वहां दो साल का खर्च सहन करना मेरे बस की बात नहीं थी। मेरे डैडी का सपना था परन्तु मैं क्या करती। बेबसी में केवल तकिया भिगोती रहती।

“क्या पढ़ी-लिखी, स्वस्थ और उच्च परिवार की लड़की या औरत किसी की मदद के लिए आना चाहेगी। वे उसकी मदद करेंगे।”

एक दिन समाचार-पत्र में ‘डांगी आई. वी. एफ. सेंटर’ का यह विज्ञापन देखा। मैं डरते-डरते सेंटर पहुंच गई। सिस्टर ने मेरा बायोडाटा देखा। मेरा शारीरिक और मानसिक मुआयना किया। यहां तक कि आदतें, सहनशीलता को परखने के लिए जीनोम के सीक्वेंस की भी जांच की। काफी औरतें इस विज्ञापन को देख कर वहां मौजूद थीं।

“मिस गुप्ता, आपको एक नि:संतान दंपति की मदद करनी है। उनका बच्चा आपकी कोख में पलेगा। मतलब आप सेरोगेट मदर बनना पसंद करेंगी?” डॉक्टर मझसे डील करने लगा।

“नहीं सर।” सरोगेट मदर के बारे में सुन कर मैं घबरा गई।

“मिस गुप्ता! इसमें आपका कोई नुकसान नहीं होगा। आप एक उदास परिवार में खुशियां ला सकती हैं।” डॉक्टर ममता डांगी ने भी मुझे मनाने की कोशिश की।

मैं उठ खड़ी हुई। उन्होंने आखिरी तीर छोड़ा, “किसी को खुशी देना बहुत पुण्य का काम होता है। फिर वह आपको दस साल जितनी सैलरी पे करेंगे। सोच-विचार कर लें, एक वीक तक बता दें।”

मैं अनमैरिड मां बनने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी। ऐसे बच्चे की जिसकी मां भी कहलवा ना पाऊं। सैंटर से निकल मैं तेजी से अपार्टमैंट पहुंची। बहुत रोई। डैडी की तस्वीर सामने रख बहुत रोई। आज वह जिन्दा होते तो ये दिन ना देखने पड़ते। राजीव ने मुझे दिलासा दिया।

डैडी की डैथ को दो बरस हो चुके थे। उन्हीं दिनों मम्मी का फोन आया, “सुधा, बैंक से बंगले की कुर्की के वारंट आ गए हैं।” एक और मुसीबत। मेरे कानों में डॉ. डांगी की दस सालों जितनी सैलरी की आवाज गूंजने लगी। मैं दुविधा में फंस गई। उसी दिन वनिता का खत आया कि पैसे ना होने के कारण उसका सेमेस्टर का दाखिला नहीं हो पाया। मैं खुद से बातें करने लगी। राजीव के मशवरे पर मैं डांगी सैंटर जा पहुंची। मैंने सेरोगेशन का मन बना लिया। मुझे देख, डॉ. ममता खिल उठी। उसने बताया, “उस दंपति के लिए तो सूटेबल मदर मिल गई थी। अमेरिका में एक और दंपति है। आप हां करो। मैं दोनों पार्टियों के बायोडाटा और जीनोम शेयर कर देती हूं। आप जैसी परफैक्ट मदर उन्हें कहीं नहीं मिलेगी। मैं उनसे डील फाइनल कर के आप को कॉल करूंगी।”

मुझे डॉ. ममता ने ब्राऊन दंपति के ब्लॉग के बारे में बताया। घर में आ कर मैंने कंप्यूटर खोल कर देखा। डैवी ने लिखा था, “कॉलेज में पढ़ते हुए स्वीटन ब्राऊन से उसे प्रेम हो गया। हमने एक साथ पढ़ाई की। कॉलेज में कई जोड़े या लिव-इन में रहते या विवाह के बाद बच्चा नहीं चाहते थे परन्तु स्वीटन ने हमेशा विवाह करने और बच्चे की ख्वाहिश की। शादी कर, हमने अपना इलेक्ट्रनिक सामान का बिजनेस शुरू किया जो दस सालों में ही पांच बड़े राज्यों में फैल गया। लेकिन हम बच्चे की किलकारी से वंचित रहे।

पिछले तीन-चार सालों से बहुत चैकअप करवाया परन्तु हम मां-बाप बन नहीं पाएं। डॉक्टर अनुसार, मेरी बच्चेदानी अविकसित है। इसीलिए वह हमें बच्चा गोद लेने को कह रहा है। हम अपना ही बच्चा चाहते हैं। जिसके लिए हमें इनविटरो फर्टिलाइजेशन’ तकनीक के बारे में बताया। जिसमें मां के अंडकोष और पुरुष के शुक्राणुओं से पैदा हुआ भ्रूण किसी अन्य औरत की कोख में रखा जाएगा। इसे ही सेरोगेसी कहा जाता है। इसके लिए बहत सारी पेड सरोगेट मदर मिल जाती हैं। हमें डॉ. हॉपकिंस की सलाह अच्छी लगी। न्यूयार्क में ‘सरोगेसी’ की मनाही है।

इंटरनेट पर सर्च करने पर मालूम हुआ कि भारत में किराए की कोख कानूनी तौर पर उपलब्ध है और प्रक्रिया काफी लचकदार है। हमने इस संदर्भ में काफी कंपनियों से संपर्क किया। हमें स्वस्थ, शिक्षित और उच्च परिवार की स्त्री चाहिए। क्या कोई हमें हमारे बच्चे की खुशियां दे सकती है? हम कभी उस का एहसान नहीं भूलेंगे।”

इस ब्लॉग को पढ़ने के बाद मैं डॉ. ममता की कॉल का इंतजार करने लगी।

अगले महीने स्वीटन ब्राऊन, डैवी, मम्मी और मैं डांगी आईवीएफ सेंटर में थे। डॉ. ममता और वकील की मौजूदगी में कानूनी वर्क हुआ। गर्भ धारण करने, प्रसव पीड़ा और प्रसूति के समय मम्मी और मुझसे सहमति के फार्म पर हस्ताक्षर करवाए गए। मैंने उनके साथ सरोगेट मदर संबंधी एग्रीमैंट किया। उन्होंने इस नाते मेरा बीमा भी करवा दिया। डिलीवरी के बाद बच्चा असली मां-बाप को सौंपने संबंधी एग्रीमैंट पर भी हस्ताक्षर करवाए गए। हमारा यह एग्रीमैंट ‘बेबी कंपनी’ की शर्तों के मुताबिक फाइनल हुआ।

अगले कुछ दिनों में इन विटरो फर्टिलाइशेजन की प्रक्रिया को आरंभ किया गया। जैविक मां डैवी के अंडकोष से अंडा हासिल करने के लिए एक बारीक सुई द्वारा उसके गुप्तांग से तरल निकाला गया। डैवी के इस अंडे की कल्चर-मीडियम द्वारा आधुनिक तकनीक की जांच की गई। फिर स्वीटन के वीर्य से शुकाणु निकाल कर उन्हें वैज्ञानिक विधि से तैयार किया गया।

इस वैज्ञानिक विधि को डॉ. ममता और डॉ. डांगी ने अपनी टीम के साथ मिल कर तैयार किया। दोनों के मेल से तैयार हुए एक सेल से बारह घंटों में एक से दो, दो से चार सेल बन गए। अड़तालीस से बहत्तर घंटों में आरंभिक भ्रूण बन गया। डॉक्टरों की टीम ने सात-आठ भ्रूण बना कर रख लिए। कुछ भ्रूण खराब हो गए। आखिर एक भ्रूण से बने जायगोट को मेरी कोख में टिकाने में वे कामयाब हो गए। कंपनी से लीव ले ली। प्रसूति के दिनों में मैंने टॉफिल का टेस्ट पास कर लिया था। इसकी सेफ्टी की खातिर राजीव से भी डिस्टेंस बना कर रखती।

नौ महीने बाद बेबी की डिलीवरी हुई, जो अब मेरा नहीं बन रहा बल्कि मझे कोर्ट के चक्कर लगवा रहा है। तब तो ब्राऊन दंपति की खशी का ठिकाना नहीं रहा था। दो सप्ताह बाद वे इंडिया आ गए। उन्होंने इस का नाम डेविड रखा। वे आठ महीने इंडिया में रहे। अपनी खुशी को मनाते हुए उन्होंने ‘बेबी कंपनी’ से सारे पेपरर्स तैयार करवाए। मुझे बकाया राशि का चेक दिया।

चेक रिसीव करते हुए मुझे घबराहट होने लगी। मैं डेविड को अपने से अलग नहीं करना चाह रही थी। मेरी रग-रग में उसके लिए प्यार और ममता थी। मैंने उसे अपने खून से पाला था। उसके दूर जाने का विचार ही मुझे पागल कर जाता। मैं उसे कस कर अपने साथ लिपटा लेती।

वह दिन में सोता रहता और रात को मेरे साथ खेलता। जब ब्राऊन दंपति अपने होटल के कमरे में सो रहे होते, वह मेरी बात पर हूं-हां करता। अपने नन्हें हाथ मेरे चेहरे पर फिराता। कभी मेरी अंगुली या बाल पकड़ लेता। ना चाह कर भी मुझे उसे ब्राऊन दंपति को सौंपना ही था। मेरे सामने कर्ज से डूबा घर था और जवान क्वांरी बहनें थी। मैंने ब्राऊन दंपति के साथ एग्रीमैंट पर हस्ताक्षर किए थे।

मैंने दुखी हृदय से डेविड उसके जैविक मां-बाप को सौंप दिया। उसके जाने के बाद मैं बहुत अपसेट हो गई। कुछ खाने या सोने का जी ना चाहता। मेरे पास उसकी एक तस्वीर, कुछ खिलौने व कपड़े थे। मैं उनसे दिल बहलाने लगी। राजीव ने मुझे बहुत संभाला परन्तु वह डेविड का स्थान ना ले पाया। मैं डेविड के बिना खुद को अधूरी समझने लगी। फिर मैंने अमेरिका जाने का निर्णय ले लिया। मैंने इस संबंधी आवश्यक जानकारी एकत्रित की और यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलीफॉर्निया में दाखिला ले लिया।

अमेरिका आ कर मैं पढ़ाई में व्यस्त हो गई। मम्मी, मालती और वनिता के खत आते रहते। मैंने पढ़ाई के साथ-साथ कई तरह के काम भी किए। दो वर्ष के सख्त परिश्रम के बाद मैंने मास्टर्स पूरा कर लिया। जॉब ढूंढते हुए मुझे कई कंपनियों में इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। अंत में मिस्टी ऑटोमोबाईल हैवड कंपनी में मेरा स्लैकशन हो गया।

इस मल्टी नेशनल कार कंपनी ने तीन नए प्रोजेक्ट आरंभ किए थे। मेरी ड्यूटी प्रोजेक्ट्स प्लानिंग और डिजाईन करने की थी। मैं अलग-अलग स्थानों पर मशीनों द्वारा हो रहे कार्यों को देखने के लिए उपस्थित रहती। कंपनी ने मेरे साथ एक इकरारनामा किया था कि जिसमें एक शर्त यह भी थी कि मैं दस वर्ष तक कंपनी के बांडिड रहूंगी। इसकी दूसरी शर्त यह थी कि यदि मैं दस वर्ष तक बेबी नहीं करती तो कंपनी मुझे पच्चीस प्रतिशत अधिक सैलरी देगी और पांच वर्ष बाद प्रोमोशन भी देगी। इन शर्तों को परा ना करने के एवज में अतिरिक्त सैलरी और प्रोमोशन वापस देने के लिए बाध्य किया गया।

‘दस वर्ष तक बेबी ना करने’ वाली शर्त पर हस्ताक्षर करते समय मेरे हाथ कांप गए। उस समय कॉलम में मेरी उम्र तीस वर्ष लिखी हुई थी। मैं सोचने लगी, क्या करूं? मेरे सामने कर्ज की किश्तें, बहनों की पढ़ाई और उनके विवाह मुंह बाए खड़े थे। मैं सोच में डूब गई। मेरे सामने डैडी आ गए, जो हमारे भविष्य के लिए दिन-रात एक किए रहते थे। उनका एक्सीडेंट भी इसी भागदौड़ के कारण ही हुआ था। बहनों की जिम्मेवारी मुझ पर थी। मैं मां कब बनूंगी? यह सोच कर मैंने आह भरी। मेरे सामने डेविड आ गया। परन्तु डैडी का सपना और जिम्मेवारियों का पलड़ा भारी रहा। मैंने अपने बारे में सोचना छोड़ दिया और एग्रीमैंट पर हस्ताक्षर कर दिए।

उसके बाद मैं काम में डूब गई। मेरे पास बिलकुल भी फुरसत ना रही। सुबह से ड्यूटी के बाद जब शाम को लौटती, शरीर थक कर चूर हो चुका होता। कभी जरा-सी फुरसत मिलती, मैं पर्स से डेविड की तस्वीर निकाल कर उसे चूम लेती। मेरा शादी करने का इरादा नहीं था परन्तु राजीव की जिद थी, इसलिए हम कानूनी तौर पर पति-पत्नी बन गए। राजीव अमेरिका आ गया। हम दोनों ही अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गए। मैं पीछे अपने घर की जिम्मेवारी निभाती रही, राजीव भी अपने भाई-बहन को सेट करने लगा।

घर में खुशहाली लौट आई। हमारा बंगला चमकने लगा। आसपास पक्षियों की चहचहाहट और फूलों से भर गया। मालती आर्थो की डॉक्टर और वनिता कंप्यूटर इंजीनियर बन गई। दोनों कनाडा में सेटल हो गई। उनके विवाह के बाद मैं अपनी जिम्मेवारियों से मुक्त हो गई।

मैं राजीव की आवश्यकताओं का ध्यान रखती जबकि कंपनी ने मुझे पूरी तरह से रोबोट बना दिया था। मैं काम के सिलसिले में कभी टैक्सास, न्यूयार्क, मिशीगन, कनाडा व जापान जाती रहती।

शुरू-शुरू में मैं कई बार ब्राऊन दंपति के घर डेविड से मिलने जाती रही। अपने पुत्र डेविड को चूम लेती। बाद में वहां कंपनी का यूनिट बंद हो गया। काफी अर्से के बाद जब मैं ब्राऊन के घर गई तो पता लगा, उन्होंने घर शिफ्ट कर लिया है। मेरे पास उनका नया पता नहीं था।

इस दौरान मुझे कंपनी में काम करते हुए दस वर्ष हो गए और मां बनने का एग्रीमैंट खत्म हो गया। तनख्वाह बहुत अच्छी थी। प्रमोशन डियू थी। मेरे अंदर की मां जाग उठी। इंस्टाग्राम पर बहनों और उनके बच्चों की तस्वीरें देख कर मेरा मन भी मां बनने के लिए उतावला होने लगा।

मैं और राजीव बच्चे के लिए कोशिश करने लगे, परन्तु हमारे पल्ले निराशा पड़ी। लगा, इस मामले में हम बहुत लेट हो चुके हैं। अनेक डॉक्टरों को दिखाया, टेस्ट करवाए। आखिर एक दिन डॉ. अलीसा ने कह दिया, “लेटर स्टेज पर कंसीव करना काफी मुश्किल काम है। फिर भी हम पूरा यत्न कर रहे हैं।”

मैंने और राजीव ने बहुत डॉलर कमा लिए थे। हेवड में ऊंची पहाड़ी पर बंगला ले लिया था। पिछले कुछ सालों से मैं बच्चे के लिए बहुत तड़पने लगी थी। राजीव भी बेकाबू हो जाता रहा। कुछ दिनों बाद प्रेग्नेंसी का पता लगा। उस समय हमने एग्रीमैंट तोड़ने का निर्णय किया। परन्तु उस समय बहनों के कैरियर और अतिरिक्त तनख्वाह के कारण मैंने मां बनने का गोल्डन पीरियड गंवा दिया था।

अब बहनों के पास मेरा फोन सुनने का भी वक्त नहीं था। वे बच्चों और काम में बिजी रहतीं।

पिछले चार-पांच वर्षों से बच्चे के लिए किए गए सारे यत्न असफल रहे थे।

मैं राजीव की तस्वीर की ओर देख रही हूं। आखिर यह आदमी भी बेवफाई कर गया। अमेरिका आते समय इसने साथ निभाने के वायदे किए थे परन्तु वह भी मुझसे ऊब गया। वह एक मैक्सीकन औरत के साथ फन करने लगा। वह क्यों उसकी ओर आकर्षित नहीं होगा। आखिर तीस बरस की अत्यन्त युवा औरत के आकर्षण ने उसे मुझसे छीन लिया। वो भी दिन थे, जब लड़के मुझे ताका करते थे परन्तु हालातों ने मुझे असमय ही बूढ़ा कर दिया था। मेरे गर्भवती होने पर कहने लगा, “यह बच्चा, मेरे बॉस का है। मैं उसके साथ अधिक समय बिताती हूं।”

मारिया के साथ उसके अफेयर को जान कर मैं पागल हो गई। पहले मैं बहुत दुखी हुई। घर में क्लेश होने लगा। बात बढ़ते-बढ़ते तलाक तक पहुंच गई। आखिर राजीव तलाक ले, मुझे छोड़ कर चला गया।

उसके बाद मैं और भी टूट गई। किसी बात का होश ना रहा। मालती कहती, “दूसरी शादी कर लो।” अब मैं संतालिस बरस की हो गई हूं। पिछले साल से पीरियड्स भी बंद हो गए हैं। मीनोपॉज के बाद मेरी कोख कैसे हरी हो सकती है? मैं सोचती, अब तक मैं किसके लिए करती रही? कंपनी ने मुझ पर पूंजी का जाल फेंक कर मुझे मशीन बना दिया। उस समय मुझे पैसे की आवश्यकता थी।

‘हां मैं रोबोट हूं। एक दिन आएगा, मैं मर जाऊंगी। मेरा नाम भी नहीं रहेगा। आदमी अपने नाम के लिए क्या कुछ नहीं करता। इसीलिए ब्राऊन दंपति बच्चे के लिए इंडिया आए थे। राजीव के साथ चल रहे तलाक केस में मेरी अपनी वकील किम के साथ अच्छी-खासी दोस्ती हो गई। बातों-बातों में मैंने उसे अपनी किराए की कोख के बारे में बताया।

मेरी जिन्दगी में अंधेरा फैल गया। मैं रातों को डेविड से बातें करती, उससे खेलती। मैं बार-बार अपने अतीत को याद करने लगी।

एक दिन मैंने डेविड ब्राऊन के बिजनेस का एड्रैस सर्च किया। वह मुझसे हजारों मील दूर थे। अगले दिन मैं उनके मुख्य ऑफिस जा पहुंची। डेविड वहां का कारोबार देख रहा था।

मैंने उससे मिल कर बताया, “बेटा, मैं सुधा गुप्ता! तुम्हारी जन्मदात्री।” एक मां को अपने पुत्र से जान-पहचान करवानी पड़ी।

“मैं जानता हूं। आप मेरी सरोगेट मदर हैं।” उसने खुश होकर कहा।

उसे अपने जन्म संबंधी पूरी जानकारी थी। जब मैंने उससे खुद को मम्मा कनसीडर करने की रिक्वैस्ट की तो उसके तेवर बदल गए। वह एकदम चीख उठा, “ओ ओल्ड लेडी। तुम ने रकम की खातिर ऐसा किया था। वो रकम मेरे मम्मा-डैड ने पे कर दी और रकम चाहिए तो मैं दे सकता हूं। मेरी मम्मा डैवी ही है। उन्हीं के अंडे से मैं पैदा हुआ हूं। मम्मा-डैड ने ही मुझे इतने बड़े कारोबार का मालिक बनाया है। बोलो कितने डॉलर चाहिए?” उसने ड्राअर से चेकबुक निकाल कर मेरे सामने कर दी।

मैं यह सुन कर सुन्न रह गई। एक मां की कीमत उतारी जा रही थी। दिल्ली में ब्राऊन दंपति को डेविड सौंपते हुए चेक लेते समय भी मैं बहुत डिस्टबर्ड हो गई थी। तब मैं युवा थी, सहन कर लिया। अब बर्दाशत करना मुश्किल था। मैं उससे रकम नहीं मांग रही थी केवल उससे ‘मम्मा’ सुनना चाह रही थी।

“बेटा, उस समय मैं मजबूर थी। अब मुझे डॉलरों की आवश्यकता नहीं। तुम्हारे मम्मा-डैड के दिए डॉलर मैं उन्हें लौटा सकती हूं। मुझे मेरा बेटा चाहिए।” मैंने मां समान मिन्नत की।

जब लोगों को धन की आवश्यकता होती है, वे कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। फिर चार पैनी आ जाने पर चीटियों के भी पर निकल आते हैं।”

यह सुन कर मुझे चक्कर ही आ गया। संभलते ही मैं सीधा वकील किम के पास गई। मैंने उसे अपनी सारी राम-कहानी कह सनाई। डेविड का ‘गैट लॉस्ट’ कहना मुझसे बर्दाशत नहीं हो रहा था। मैं फूट-फूट कर रोने लगी।

“आप चिन्ता ना करें मिसेज गुप्ता! दुनिया यही खत्म नहीं होती। वैसे आप भी मां हो।” किम ने मेरे कंधे पर हाथ रख दिलासा दिया।

“लेकिन मैं उसकी बायोलॉजिकल मां नहीं हूं। वह डैवी है।” मैं आहे भरने लगी।

“अब वैज्ञानिक खोजों ने यह सिद्ध कर दिया है कि बच्चा जिस मदर की कोख में पलता है, उसका भी उस पर बराबर का अधिकार होता है।”

“किम, यह बात तुम कह रही हो। कोर्ट या कानून इस बात को नहीं मानता। मुझे कोई उम्मीद नहीं।”

“आप फिक्र ना करें। कोर्ट को मानना ही पड़ेगा।” किम ने हामी भरी, जैसे कह रही हो. वह कोर्ट से कहलवा लेगी।”

“कौन-सी कोर्ट, जो चौबीस-पच्चीस के लड़के पर केस करने की अनुमति देगी ?” मुझे संशय था।

“सुधा, वकील तुम नहीं, मैं हूं। मुझे रिट दाखिल करनी आती है।” किम ने मेरी पीठ को सहलाया।

उसने मेरा केस तैयार किया। उसने अकेले डेविड की बजाय, ब्राऊन फैमिली को पार्टी बनाया था। उस केस के हवाले से मैंने कोर्ट का दरवाजा खटखटकाया।

“मीलॉर्ड, यह उसकी मां नहीं। ब्राऊन दंपति ने इसे किराया दिया है। जैसे कोई एक स्टोर को किराए पर ले। किराया देकर स्टोर खाली कर दिया गया। मिसेज गुप्ता सामान की भी मालिक बनना चाहती है।” ब्राऊन की ओर से वकील ने बहस आरंभ की।

“मीलॉर्ड, मां की कोख कोई स्टोर नहीं होती। जहां मर्जी दस क्विंटल आलू रख दिए जाए। किराया दे कर उसे उठा लिया गया हो। फिर किसी ने उस स्टोर में प्याज मे रख दिए। यदि सुधा की कोख स्टोर ही थी, फिर मिसेज डैवी अपनी कोख को स्टोर बना लेती। यह ब्राऊन दंपति इंडिया क्यों जाता?” किम ने विरोधी वकील की दलील को काटा।

कोर्ट की अगली तारीख पर ब्राऊन फैमिली के वकील ने सरोगेसी के कानूनी पक्ष को जज के सामने रखते हुए कहा, “मी लार्ड, किसी दंपति के शुक्राणु और अंडे से पैदा हुआ भ्रूण को किसी सरोगेट मदर की कोख में रखने से बच्चे का उस कोख के साथ कोई जैनेटिक संबंध नहीं बनता। बच्चे की पैदाइश तक ही उसे कोख में रखा जाता है, फिर बच्चा उसके जैनेटिक मां-बाप को सौंप दिया जाता है। मिसेज गुप्ता ने भी ऐसा ही किया। उसे पूरी रकम की अदायगी की गई। इसीलिए वह मां के अधिकार का दावा हर्गिज नहीं कर सकती।” वकील ने इकरारनामे और अदायगी के पेपरर्स की प्रति जज के सामने रखी।

“जज साहिब! मेरे हाथ में ‘मेडिकल साइंस’ का यह मैगजीन है। इसमें एमनीओटिक फ्लाऊड टेस्ट की खोज छपी है। इस नए टेस्ट के अनुसार, डॉक्टर सीरिंज द्वारा मां की कोख में पल रहे बच्चे तक सूई लिजाते थे। इससे दर्द भी होता और भ्रूण के गिर जाने की भी संभावना रहती थी। अब इस टेस्ट को रद्द करके, मां के ब्लड सैंपल से ही बच्चे के डी.एन.ए. की जांच की जाती है। यह टेस्ट डाऊन सिडरम जैसे खतरनाक रोगों के लिए किया जाता है। यह अत्याधिक संवेदनशील टेस्ट है। कोख में पलते बच्चे का फ्लाऊड लीक हो कर मां के ब्लड में मिल जाता है। मां से ही बच्चे को खुराक मिलती है। बच्चे का डी.एन.ए. मां के डी.एन.ए के साथ मिल जाता है। सर, मेरी विनती है कि आज भी मिसेज गुप्ता के खून में बच्चे का डी.एन.ए है तो मां का डी.एन.ए बच्चे के खून में क्यों नहीं हो सकता? मी लार्ड, मेरी मुव्वकिल को इस खोज के आधार पर न्याय दिया जाए।” वकील किम ने ‘मैडिकल साइंस’ के औमनीओटिक टेस्ट की खोज का हवाला दे कर जज से विनती की कि वह मुझे मां का अधिकार दे।”

“सॉरी, मेरे लिए बड़ा अजीब केस है। यहां कुछ शहरी सज्जन मौजूद थे। वे भी हमें सलाह देंगे। बाकी जजों का पैनल इस केस की स्टडी करेगा। अगली तारीख तक मैं इस केस का फैसला आरक्षित करता हूं।” जज ने किम से मेरी डी.एन.ए रिपोर्ट और नई खोज के डॉक्यूमैंटस ले लिए।

मैं डर रही थी। वास्तव में इस केस में ‘बेबी कंपनी’ भी आ फंसी थी। आजकल मम्मी भी मेरी बात नहीं सुनती। कहती है, “कौन दो-दो घंटे कानों से फोन लगा कर सुने। बहरा थोड़ा होना है।” क्या यह वही मां थी, जो कहा करती थी, “बेटी, तुम ही परिवार को बचा सकती हो।” एक दिन वनिता कहने लगी, “दीदी, क्या हर वक्त बच्चे की रट लगाए रखती हो। जिस हाई क्लास की तुम हो, उसमें रिश्तों के लिए कोई स्थान नहीं। बच्चे वाला यह मामला बहुत ही छोटा है। लाईफ में फन करो।” मालती ने तो हद ही कर दी, “दीदी, जैसे तुम डेविड के लिए सरोगेट मदर बनी थी, वैसे ही किसी नीडी को अपने लिए सरोगेट मदर बना लो।”

परसों मैं बहुत ही अपसेट थी। मुझे एक लोक कथा याद आ गई। “पुराने समय की बात है। किसी का बच्चा बचपन में मां से बिछुड़ गया। बड़ा होने पर दो औरतें उस पर मां का हक जताने लगीं। मामला राजा के दरबार में जा पहुंचा। राजा ने कहा, “तुम दोनों, बच्चे की एक-एक बांह पकड़ कर, जोर से अपनी ओर खींचों। जो औरत बच्चे को खींच लेगी. बच्चा उसी का होगा। दोनों औरतें बांहें खींचने लगीं। असली मां को लगा, बच्चे को दर्द होगा और उसकी बांहें निकल जाएगी। उसने बच्चे की बांह छोड दी। दूसरी ओर जोर से बच्चा एकदम गिर गया। असली मां ने भाग कर बच्चे को उठा कर सीने से लगाया और पूछा, तेरी बाहें तो ठीक हैं न। अब तक नकली मां ने बच्चे को उठा लिया। राजा को समझ में आ गया, उसने बच्चा उसकी असली मां को सौंप दिया।

रात को मैं यही सपना देखने लगी। कोर्ट में मैं और डैवी डेविड को अपनी ओर खींच रही हैं। जज ध्यान से हमें देख रहा था। वकील अपने-अपने मुव्वकिल की बांहें खींच रहे थे। मुझे लगा, डेविड को दर्द हो रहा होगा। ऐसा ही डैवी को भी लगा, उसने भी उसकी बांह छोड़ दी।

“अरे! कितना समय हो गया। मोबाईल पर लगे अलार्म से होश आया, आज कोर्ट में फैसला था। मैं तैयार होने लगी। नाश्ता करते हुए टेलीविजन ऑन किया। ग्रीस की अदालत की एक न्यूज प्रसारित हो रही थी। जिसमें कहा जा रहा था, “अदालत ने आज एक अहम् फैसला सुनाया। जिसके अनुसार सरोगेट मदर का भी बच्चे पर उतना ही अधिकार होगा, जितना कि बायोलॉजिकल मदर का। अदालत ने यह फैसला एमनीओटिक फ्लिर्डि टेस्ट की खोज के आधार पर ही दिया था।”

“हिप…हिप…हुर्र…।” खुशी से मेरे मुंह से निकला।

मैं गीत गुनगुनाते हुए कार चला रही थी। ग्रीस की अदालत का थैक्स कर रही थी। इस फैसले से जज मेरे पक्ष में ही फैसला सुनाएंगे। मैं प्रसन्न रूप में कोर्ट पहुंची।

कोर्ट रूम वैज्ञानिकों, पत्रकारों और प्रभावशाली व्यक्तियों से भरा था। सभी लोग इस केस के निर्णय को जानने के लिए उत्सुक थे। आज जज ने कंपनी के वकील की भी दलील सुनी। कंपनी के वकील ने कहा, “जब किसी औरत को सरोगेट मदर के लिए साइन किया जाता है, तब उसे कंपनी के टर्स और कंडीशन्स के बारे में परिचित करवाया जाता है। फिर कानूनी कार्रवाई की जाती है। कंपनी के साथ हुए एग्रीमेंट को रद्द नहीं किया जा सकता।”

“यदि डॉक्टर मां के खून के सैंपल से बच्चे के डी.एन.ए का पता लगाया जा सकता है तो वह उसकी मां क्यों नहीं कही जा सकती? वह मां है, जिसने उसे अपने खून से पाला है।” किम ने आखिरी दलील दी।

जज मुस्कुराया। मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई। मुझे इस देश के कानन पर बहत भरोसा है कि फैसला मेरे पक्ष में जाएगा। फिर ग्रीस की कोर्ट के फैसले से भी मुझे उम्मीद बंधने लगी थी।

“कोर्ट इस नतीजे पर पहुंची है कि एग्रीमेंट के अनुसार, डैवी ब्राऊन ही डेविड ब्राऊन की वास्तविक मां है ना कि सुधा गुप्ता। एमनीओटिक फ्लिऊड टेस्ट की खोज अनुसार जैविक मां और किराए की कोख वाली मां, दोनों का बच्चे पर अधिकार बनता है। परन्तु जब दोनों पक्षों में यह एग्रीमेंट हुआ था, उस समय यह खोज नहीं थी। इसलिए इस केस में इस खोज को आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट सुधा गुप्ता को हिदायत देती है कि वह ब्राऊन फैमिली की खुशियों में रूकावट ना बने और अपनी ममता की पूर्ति के लिए कोई अन्य विकल्प तलाश करे।”

जज का यह फैसला ममता विरोधी है। मुझसे दूसरी बार मेरे जिगर का टुकड़ा छीन लिया गया। हम कोर्ट से बाहर निकले। ब्राऊन फैमिली एयरपोर्ट जाने के लिए टैक्सी की ओर बढ़ गई। मेरी टांगों में जैसे जान ही बाकी ना रही। मैं बुत बनी खड़ी रह गई।

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