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चक्की वाली राम सुखी-गृहलक्ष्मी की कहानियां
Chakki Wali Ramsukhi

चक्की वाली रामसुखी-कोयला गांव के रघुनाथ और उसकी पत्नी सरला ने उनकी इकलौती पुत्री राम सुखी की शादी मांगरोल कस्बे के एक मध्यम वर्गीय परिवार में की थी। शादी के समय रामसुखी की उम्र चौबीस वर्ष थी। उस का पित राम धन एकनिजी स्कूल में अंग्रेजी का टीचर था। जल्द ही शिक्षा विभाग में सरकारी नौकरी लग ने की संभावना थी पर साल भर इंतजार कर ने के बाद भी सरकारी नौकरी का कुछ नहीं हुआ। अत: रामधन अपने पिता के व्यवसाय में हाथ बटा ने लगा। रामधन किसी काम से कोटा शहर गया हुआ था। वहां लोगों से मिला – जुला। लेकिन जब लौटकर वापिस आया तो खांसी बुखार बना रहा। जांच कर ने पर मालूम पड़ा कि वह कोरोना पॉजिटिव है। समुचित रूप से इलाज प्रारंभ हुआ। लेकिन इलाज के दौरान उस की मृत्यु हो गई। रघुनाथ और उसकी पत्नी के सामने तो अंधेरा छा गया। एक मात्र पुत्री, वह भी विधवा हो कर रह गई। वह सदा के लिए ससुराल से अपने मायके
आ गई। रघुनाथ और सरला रह -रह कर अब अपनी पुत्री के भविष्य के बारे में ही सोचते रहते । रघुनाथ अपने गांव कोयला में आटा चक्की चलाते थे। उसी से वर्षों से अपनी गृहस्थी चला रहे थे। जैसे – तैसे कुछ बचा कर रामसुखी के हाथ पीले किये थे पर भाग्य ने उस का साथ नहीं दिया। रघुनाथ, बेटी की चिंता से परेशान रहने लगा था। जवान बेटी की शादी अब फिर से करना, आर्थिक दृष्टि से तथा समाजिक मान मर्यादा के चलते कोई आसान काम नहीं था। रामसुखी ने प्राय वेट बी. ए. पास कर ली थी। समय गुजरता रहा। रघुनाथ बीमार रह ने लगा। वह ब्लडशुगर और बी. पी. का पेशेन्ट भी था। इलाज कराता रहा। लेकिन एक दिन वह भी हृदयाघात से दुनिया को छोड़ चला। अब रघुनाथ के बाद घर का आर्थिक संकट गहरा ने लगा। रघुनाथ की आय का साधन आटा चक्की भी बंद रह ने लगी। रामसुखी व मां सरला को सूझ नहीं पा रहा था कि क्या करे, क्या न करे ? आखिर रामसुखी ने अपने पिता की आटा चक्की को संचलित करनें का निश्च्या किया। उस ने मां से कहा, ‘पिता के धंधे को मैं संभालती हूं। अपनी ज़िन्दगी तभी पटरी पर आएगी। कुछ तो कर ना ही होगा जीवन चलाने के लिए। सरला इस चिंता में घुली जा रही थी कि जवान बेटी चक्की चलाएगी तो दुिनया क्या सोचेगी और क्या कहेगी ? लोगों के ताने सुनने पड़ेंगे। पर वह सब कुछ सोच कर चुप हो जाती। मरता क्या न करता। कुछ धंधा तो कर ना ही होगा न! राम सुखी ने अपनी मेहनत लगन से फिर से पिता की आटा चक्की को शुरू कर दिया। कुछि दनों में चक्की पर महिला – पुरुष अनाज पिसवाने आने लगे। चार माह बाद घर का खर्चा सुगमता से चलने लगा। सांवले रंग की सत्ताईस साल की रामसुखी हंस मुख स्वभाव की थी। वह जो भी चक्की पर गेहूं पिसवाने आता सब से नम्रता भरा वयवहार करती। राम सुखी की चक्की पर जहां महिला पुरुष तो आते ही अब वहां तीस पैंतीस साल के युवा भी आने लगे। वह गेहूं पिसवाने के बहाने उससे रसरसीली बातें कर ते पर वह उन्हें कभी लिफ्ट नहीं देती। रामसुखी को चक्की चलाते कब एक वर्ष बीत गया, पता ही नहीं चला। पर सरला को चिंता थी कि अकेली जवान पुत्री कैसे और कब तक ज़िम्मेदारी उठाएगी ? यही सब सोच से वह चिंता ग्रस्त बनी रहती। चक्की पर कई लोग तो ऐसे भी आते गेहूं पिसवाकर जाते और कुछ ऐसे भी आते जो आज पीसना डाल जाते और दो दिन बाद लेने आते। जिसकी जैसी आवश्यकता होती वैसा ही निर्णय लेते। वर्षा के दिन थे। एक शाम हल्की कुहारें बरस रही थी। तभी एक पैर से थोड़ा विकलांग युवा साइिकल पर पैदल ही गेहूं कट्टे में डालकर पिसवाने आया। अभी उस ने कट्टा तुलवाया ही था, कि बारिश ने तेजी पकड़ ली। उसके पास छाता भी नहीं था। रामसुखी ने उसे अपने ही पास टीन शेड के नीचे, कुर्सी पर बैठने को कहा। वर्षा के कारण किसी का आना – जाना भी नहीं हो रहा था। रामसुखी ने उससे पूछा, ‘ आप विकलांग कब से हैं ? ‘ मेरी यह विकलांगता जन्म से ही है। इलाज भी करवाया, देवी – देवता भी ढोके पर कुछ हुआ नहीं। ‘इस कस्बे कोयला में आना कैसे हुआ?उसने रामेश्वर के दिल की तह में जाना चाहा। ‘ मैं यहां अभी नया आया हूं। सीिनयर सै कंडरी स्कूल में अंग्रेजी का लेक्चरर हूं। ‘ आप यहां कहां रहते है ? ‘स्कूल के पास एक मकान में। ‘आप परिवार सहित- मेरा मतलब पत्नी बच्चे भी साथ रहते होंगे ? उस के इस प्रश्न के जवाब में रामेश्वर मुस्कराया। और फिर बोला, ‘ मेरी उम्र तीस वर्ष की हो गई, लेकिन अभी तक शादी नहीं हुई। ‘इतना समय हो गया, फिर शादी क्यों नहीं हुई ? वह प्रश्न पर प्रश्न किसी पूर्व परििचत सी करती रही। ‘आजकल सब नौकरी वाले से शादी करना पसंद करते है। इसलिए अब कोई संभावना बन सकती है। पहले जो भी रिश्ते आते वह पैर की विकलांगता और बेरोजगारी के चलते आगे नहीं बढ़ सके। मैंने पहली बार ही यहां आप के गांव में ज्वाइन किया है। बातें कर ती वह एक दम उठी और जो पीपा पिस गया, उसे हटा कर दूसरा पीपा लगा दिया और फिर से बातें करनी लगी। ‘आपको लग रहा होगा कि मैं भी अपने बारे में कुछ बताऊं। ‘अच्छी बात है बताइयेगा। रामेश्वर ने उत्सुकता िदखाई। ‘मेरा नाम रामसुखी है। मैंने बी. ए. किया हुआ है। मैं अपने माता -पिता की इकलौती संतान हूं। मेरे पिता इस चक्की को संचलित किया करते थे। उन्होंने तीन वर्ष पहले मेरी शादी, पास के मांगरोल कस्बे में एक टीचर रामधन के साथ कर दी। वह भी सरकारी स्कूल में टीचर बनने के प्रयास में थे। तब तक वह निजी स्कूल में पढ़ाते थे। लेकिन उन का साथ जल्द ही टूट गया। वह कोरोना से पीिड़त हो गये। कई दिनों के इलाज के बाद वह इस दुनिया को अलिवदा कह गये। मेरे पिता रघुनाथ व मां सरला को इस हादसे से बहुत गम हुआ। िपता भी बीमार रहने लगे और उनकी भी चार माह पूर्व डेथ हो गई। अब
मैं और मेरी मां ही बचे हैं। आज भी उसकी इच्छा है कि मेरी शादी फिर किसी योग्य व्यक्ति से हो जाए। लेिकन हमारे सोचने से क्या कुछ होता है ? इस बीच रामेश्वर का आटा भी तैयार हो गया। रामसुखी ने उसे तो लकर, कट्टे का मुंह सुतली से बांध, उसे साइिकल के लगे जपर रख िदया। लेकिन अभी भी हल्की फुहारें आ रही थी। उसने रामेश्वर को कुछ देर और रूक जाने को कहा। रामेश्वर को भी कोई जल्दी नहीं थी। वह भी उसकी बातों में रस लेने लगा था। रामसुखी आकर्षक चेहरी वाली, सावलें रंग की मजबूत शरीर वाली महिला थी। वह फिर चक्की में नये पीपे में आटा संग्रह के लिए तैयारी कर रामेश्वर के पास बैठ गई। इस बार दोनों ने एक दूसरे को अपनेपन की आंखों से देखा। दोनों की कुछ समय तक और बातें होती रही। तभी वर्षा की रिमझिम रूक गई। रामेश्वर साइिकल लेकर धीरे – धीरे पैदल जाने लगा। रामसुखी ने उसे मुस्कराते हुए विदा किया। शाम होने को आई। वह चक्की बंद कर जाने को हुई, तभी दो महिलाएं, अपने आटे का पीपा लेने आई। उसने जल्दी से तौलकर, उनके सिर पर पीपा रख दिया। अब वह चक्की का गेट बंद कर घर पर आ गई। सरला अपनी बेटी रामसुखी की मेहनत से खुश थी। वह उस की शादी के बारे में सोचती रहती। वह घर पर रोज भगवान से प्रार्थना करती। कहीं अच्छे से सम्बन्ध हो जाए तो वह सुख से जी ले। रामसुखी रोज की तरह गहरी नींद में नहीं सो सकी। उस की आंखों में रामेश्वर की यादें घुलती रही। उसी के खयालों में देर रात तक जागती
रही। अब पता नहीं कब उससे मिलना होगा ? यही सोचती उसे नींद आ गई। लेकिन कुछ ही समय बाद उसे सपना आ गया जिसमे रामेश्वर उसके हाथ में हाथ लिए झील के किनारे घूमता नजर आया।
उधर रामेश्वर भी खाना खा कर लेटा। पर आंखों में नींद का दूर – दूर तक पता नहीं। बस रामसुखी के युवाग दरा ये बदन की हसंती हुई आंखे बार बार िदल में ठक – ठक कर ती रहीं। एक बार तो उसे लगा कि वह चक्की पर कोई बहाना बना कर पहुँच जाये। हर दिन मिलने की या दबना ये रखने वाला रामेश्वर आखिर दस दिनों बाद फिर शाम को चक्की पर गेहूं पिसवाने पहुंच गया। वहां तीन महिलाएं खड़ी थी। और अपने आटे का तौलकरवा रही थी। रामेश्वर वहां पड़ी एक कुर्सी पर किसी अनजाने अधिकार के साथ बैठ गया। महिलाओं के जाने के बाद उसने रामसुखी से कहा है, ‘ मैं
कल कट्टा लेने आंऊगा। ‘ वह बोली, ‘ सर! कल ही क्यों, अभी पीस देती हूँ। थोड़ा आज रूकोगे नहीं क्या ? थोड़ा जल्दी में हूं। उसने संक्षिप्त जवाब देकर उसके मन को टटोला। वह यह जानता है कि इंतजार प्रेम की डगर को लम्बा लेकिन प्यार से सम्पन्न बना देता है। रामेश्वर तीन दिन बाद गया। रामसुखी चिंता में बैठी हुई थी। उसने पूछा, ‘ आज चेहरे पर उदासी भरी चिंता क्यों लिए हुए हो तुम्हारे चेहरे पर तो मुस्कान ही बहुत अच्छी लगती है। ‘चिंता इसी बात की है, मां चाहती है जल्द ही कोई अच्छा सा लड़का मिलजाए तो शादी कर दे। ‘ पर यह तो सब आप के भाग्य पर है। कब, कहां मिलेगा कुछ कह नहीं सकते ? ‘ मैं तो चाहती हूं कि कोई आप जैसा व्यक्ति मिल जाए तो उसके साथ विवाह बंधन में बंध जाऊं। उस की बातों से लगा विवाह भी उसकी पसंद है। रामेश्वर ने भी दिल की मुराद पूरी होती देख देर नहीं की अपनी बात कहने में। ‘ यदि आप को मैं पसंद हूं तो बात आगे बढ़ाएं। रामसुखी उस की बात से गद्गद् हो गई। एक बार तो उस की इच्छा हुई कि वह उसे अपनी बाहों में समेट ले। वह उसके साथ अपनी ज़िन्दगी गुजारना चाहती थी। रामसुखी बेहद खुश थी। अब उस की मां की चिंता सदा के लिए दूर हो जाएगी। उसमे रामेश्वर को रविवार को सुबह अपने घर पर आने के लिए आमंत्रित किया और घर का पता बता कर, समय पर आने का आग्रह किया। रामेश्वर भी इस घर बैठे आये अच्छे अवसर को खोना नहीं चाहता था। सो वह रविवार को सुबह रामसुखी के घर पहुंच गया। रामसुखी ने अपनी मां को रामेश्वर का पूरा परिचय दिया। उस ने बताया कि वह भी यहां के सी. सै. स्कूल में अंग्रेजी के व्याख्याता हैं। हम दोनों विवाह बंधन में बंधने को तैयार हैं। सरला ने जब यह जाना तो वह भगवान को शुक्र करने लगी। घर बैठे ही किस्मत ने एक अच्छा ऑफर भेज दिया। कुछ दिनों मे एक मंदिर में दोनों का विवाह समंपन्न हो गया। अब रामेश्वर राम सुखी के मकान में उसकी मां के साथ रहने लगा।

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