Tadap ko Sukoon
Tadap ko Sukoon

Hindi Kahani: दिल्ली में प्रसिद्ध टॉक शो पर मेज़बान बोलती हैं  “लेडिस एंड जैंटलमैन! हमारे शो पर हमेशा बड़े फिल्म स्टार, क्रिकेटर, नेता और अन्य प्रसिद्ध लोग आए हैं, लेकिन आज मैं उन्हें बुलाना चाहूंगी जिन्होंने अपना पैसा, समय और करीब 10 साल हमारे जीवन में हरियाली लाने पर, हमारा पर्यावरण खूबसूरत बनाने पर लगाए हैं। रघुनाथ जी ने दिल्ली से कुछ किलोमीटर दूर अपने पुश्तैनी गांव में करीब 5 लाख पेड़ लगाए और वहां की प्रसिद्ध पवित्र नदी की सफ़ाई का कार्यभार संभाला। तो चलिए स्वागत करते हैं इतनी छोटी उम्र में इतना महान काम करने वाले रघुनाथ जी का और बाकी बातें उनसे ही पता करते हैं।”
मेज़बान रघुनाथ जी से, “ नमस्कार सर! जनता जानना चाहती है कि आपने पर्यावरण के लिए अपने पुश्तैनी गांव में क्या-क्या करा है।”
रघुनाथ जी सबको संबोधित करते हुए बताते हैं, “ मेरे पुश्तैनी गांव में एक नदी है। अपने धन और संपर्कों का सदुपयोग करके मैंने नदी की सफ़ाई करवाई, उसके किनारों पर पक्के घाट बनवाए और कुछ ही दूरी पर कूड़ेदान भी रखवाए ताकि कोई भी नदी में या उसके पास कूड़ा डालकर उसे गंदा ना करे। वहां जो दो तीन फैक्ट्री हैं उनसे बात करके फैक्ट्री का गंद नदी में डालने से रोक दिया गया है। उन लोगों ने सहयोग करा और उस गंद को अलग तरीके से खत्म करते हैं।
नदी में एक सीमा तक पानी रहे इसके लिए वहां एक छोटा सा बांध बना है। बांध के इंजीनियर साहब के साथ बातचीत करके उसका नियमित रूप से ध्यान रखा जाता है। नदी के किनारों पर खाली ज़मीन पर मैंने करीब 5 लाख पेड़ लगवाए हैं और ऊंची घास तैयार करवाई है। शुरुआत मैंने 10 साल पहले करी थी। तब मैं अकेला था और बहुत कम पैसों की वजह से रोज़ कुछ ही पेड़ और पौधे लगा पता था। पर धीरे-धीरे मुझे मदद मिलने लगी, लोग मिलने लगे और आज वहां कईं लोगों की मदद से बहुत हरियाली है, साफ़ नदी है और एक मजबूत बांध है।”
तभी जनता में से कोई पूछता है, “सर! आपने अपना परिवार नहीं बनाया और इतनी छोटी उम्र से भलाई की तरफ रुझान करा। आपके घर में और कौन है? आपको किस चीज़ ने इस सेवाभाव के लिए प्रेरित करा?
  इस सवाल पर रघुनाथ मौन हो जाता है और कुछ देर तक उसी अवस्था में रहता है। उसकी पलकों पर आंखों से निकले आंसू ठहर जाते
हैं। वहां मौजूद सब लोग अचंभित से उसकी तरफ देखने लगते हैं। हमेशा खुश और सकारात्मक सोच रखने वाले इंसान आज अपने आंसू मुश्किल से रोक रहे हैं।
रघुनाथ के मुंह से एक गहरी तड़प के साथ निकलता है, “ मेरा परिवार….” और फिर वह करीब 10 साल पीछे पहुंच जाता है उसके बचपन के गांव में….

कहीं पतली तो कहीं चौड़ी सड़क, कहीं कच्ची तो कहीं पक्की। कुछ सड़क के दोनों तरफ खाली मैदान तो कुछ के पक्के घर। गांव के बीचों-बीच सालों पुराना मंदिर था जिसके आंगन में बरगद, केले, पीपल और नीम के पेड़ लगे थे। थोड़ी दूर पर बच्चों के लिए प्राइमरी स्कूल और आगे चलने पर एक छोटा सा तत्कालीन सेवा के लिए अस्पताल था। कुल मिलाकर रघुनाथ का गांव छोटा ज़रूर था पर संपन्न था। गांव के किनारे प्रसिद्ध नदी भी बहती थी जिसमें समय-समय पर बहुत पुराना बना बांध का पानी छोड़ा जाता था। नदी के थोड़ी ही दूर पर रघुनाथ का घर था।
उसके घर में उसके पिता, मां और छोटी बहन रहते थे। रघुनाथ की बहन विनीता उससे करीब 10 साल छोटी थी और शायद इसलिए वह उससे बहुत प्यार करता था। दोनों साथ स्कूल जाते और मां उनके लिए खाना देती थी। स्कूल में भी रघुनाथ अपनी बहन का ध्यान रखता और अक्सर अपना खाना भी उसको दे देता था। पिता अस्पताल में डॉक्टर के सहायक की नौकरी करते थे। घर बहुत अच्छे से चल रहा था।
रघुनाथ के पिता ने नदी के किनारों पर पेड़ और घास उगाए थे। वह यही मानते थे कि पेड़ पौधे मिट्टी को बांधकर रखते हैं और बाढ़ से बचाते हैं। वह अपनी तनख्वाह से कुछ पैसे बचाकर गांव की भलाई का काम करते थे। इस काम में रघुनाथ, उसकी मां और बहन भी मदद करते।
एक दिन रघुनाथ के पिता ने देखा की नदी के थोड़ी दूर कुछ लोग खड़े होकर एक नक्शा देख रहे हैं। उनके पूछने पर उन्होंने बताया कि वह लोग वहां एक रसायन की फैक्ट्री लगाएंगे। रघुनाथ के पिता ने उनको समझाने की कोशिश करी, “साहब देखिए, बहुत मेहनत और खर्चा करके मैंने यह पेड़, पौधे, और घास उगाई है। आप फैक्ट्री के लिए इनको काटोगे और रसायन का कूड़ा नदी में डालोगे तो दोनों तरफ से  पर्यावरण का नुकसान होगा और गांव भी खतरे में आ सकता है। आप बल्कि बांध की मज़बूती के लिए कुछ करिए। आपके पास पैसा और जान पहचान दोनों हैं। बांध पुराना है, उसकी मरम्मत बहुत ज़रूरी है।” उन लोगों ने उनकी बातों को नज़र अंदाज़ करा और अगले दिन से सारी हरियाली को बंजर बनाने में लग गए।
रघुनाथ का परिवार रोज़ यह सब देखकर आंसू बहाता। कुछ दिनों बाद रघुनाथ अपना सरकारी इम्तिहान देने शहर गया और इधर फैक्ट्री का काम भी शुरू हो गया।           एक दिन मौसम ने अपना भयंकर रूप दिखाया और काले बादलों ने पूरे गांव पर अंधेरा कर दिया। बारिश ने बौछार से शुरू होते होते विकराल रूप ले लिया। बादल किसी नगाड़े की तरह बज रहे थे। तभी बिजली की तेज़ लहर बांध के कमज़ोर हिस्से पर पड़ी और वहां का बड़ा टुकड़ा नदी में गिरा। बांध का रुका पानी नदी में आने लगा और किनारों को चीरता हुआ गांव में भर गया। घरों से बर्तन, सामान, सब कुछ नदी के अंदर और ऊपर तैर रहे थे।
कईं लोग अपने साथ दूसरों को बचाने के लिए जो कर सकते थे कर रहे थे। गांव के नाविकों ने अपनी नाव में कईं लोगों को बैठा कर कईं बार मंदिर की छत पर पहुंचने में मदद की। रघुनाथ के पिता ने विनीता को स्कूल की छत पर छोड़ा और दोनों पति-पत्नी लोगों को बचाने में लग गए। करीब पूरा गांव बाढ़ के पानी से भर गया था। अचानक से तेज़ लहर आई और रघुनाथ के माता-पिता को न जाने कहां तक बहा कर ले गई।
            जिस वक्त रघुनाथ के गांव में यह सब हो रहा था उस वक्त वह अपनी सरकारी अफ़सर की यूनिफॉर्म में गांव जाने की तैयारी कर रहा था, “मुझे इस वर्दी में देखने का मां-बाप का सपना आज पूरा हुआ। वह कितने खुश होंगे।”  वह स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार कर ही रहा था की घोषणा होती है, “ गांव की तरह जाने वाली ट्रेनें रद्द कर दी गई हैं। पूरा गांव बाढ़ ग्रस्त है।” रघुनाथ चौंक कर घबराकर फ़ोन लगाता है तो बहुत देर बाद बड़ी मुश्किल से विनीता का फ़ोन लगता है, “ बीनू तो ठीक है मां पिताजी….” रघुनाथ अपनी बात पूरी कर ही नहीं पाया था कि विनीता के चीखने की आवाज़ आती है। “बीनू! बीनू!” रघुनाथ फ़ोन की तरफ देखता हुआ चिल्लाता है। 

उसके बाद कितने घंटों तक वह उसी हालत में स्टेशन पर बैठा रहा। उसका एक दोस्त उसको घर लेकर आता है। किसी तरह जान पहचान निकाल कर बाढ़ का पानी उतरने के बाद वह हेलीकॉप्टर से गांव पहुंचता है। वहां उसे अपने पिता और माता क्या पार्थिव शरीर मिलता है, जिनका वह संस्कार कर देता है। विनीता का लेकिन कुछ पता नहीं चलता है। लोगों ने बताया कि जिस छत पर वह खड़ी थी वह टूट गई और विनिता पानी में बह गई।
अपने घर और गांव की बर्बादी देखकर रघुनाथ तड़प कर रह जाता है। उस वक्त तो वह वहां से चला आता है लेकिन कुछ समय बाद से ही उसके मन में बांध, नदियों की सफ़ाई और हरियाली ज़िद पकड़ लेती है। वह शुरुआत अपने क्षतिग्रस्त गांव से करता है। उसके बाद उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
रघुनाथ जब अपनी कहानी पूरी करता है तो वहां बैठे हर आदमी की आंखों में रघुनाथ की तड़प का पानी था और उसके लिए आदर भी।
टॉक शो से वापस आकर रघुनाथ अपनी रोज़मर्रा की दिनचर्या में व्यस्त हो जाता है। एक दिन जब वह घर पर था तो उसे लगता है कि कोई उसके पीछे खड़ा है। वह मुड़ कर देखता है तो एक लड़की करीब 20-25 साल की वहां खड़ी थी। रघुनाथ पूछता है, “जी! आप कौन?” वह लड़की आंसू के साथ रघुनाथ का हाथ आगे करती है और उस पर एक फटी पुरानी सी राखी बांधती है, “ दस साल से यह राखी आपका इंतजार कर रही थी भईया।”
रघुनाथ अचरज भरी नज़रों से उसको देखता है और यकायत बोलता है, “बीनू!!!” उसके ऐसा कहते ही विनीता रघुनाथ के गले लग कर रो पड़ती है। “बीनू, मेरी बहन तू कहां थी अब तक? मेरा पता जानती थी तो आई क्यों नहीं पहले?” विनिता ने जवाब दिया, “ मैंने तुम्हारा शो टीवी पर देखा तब तुम्हारे बारे में पता चला भैया। जब तुम शहर गए थे तो मैं कुछ भी नहीं जानती थी तुम्हारे बारे में।” रघुनाथ पूछता है, “ तू कहां थी अब तक?”
विनीता बताती है, “पानी में गिरने के बाद मैं बहकर किनारे पर पहुंची। वहां एक फौजी अंकल ने मुझे बचाया और उसके बाद उनके परिवार ने ही मेरा ध्यान रखा। वही मुझे यहां लाए हैं।”
रघुनाथ विनीता से कहता है, “ मेरे सालों की तड़प को आज सुकून मिला है। एक बार फ़िर से मेरे साथ अपने पुराने घर चलेगी।” विनीता और रघुनाथ खुशी से एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा उठते हैं।