Bidaai Story: सुर्ख लाल जोड़े में सजी खुशी आज दुल्हन के लिबास में किसी आकाश की अप्सरा से कम नहीं लग रही थी।रमा जी अपनी बेटी को दुल्हन के जोड़े में देखकर बार बार बलाये लिए जा रही थी।कि तभी कमरे में रघुनाथ जी रमा जी को आवाज देते हुए आये।
“अरे!रमा तुम यहाँ हो, नीचे चलो बराती किसी भी समय पहुँचने वाले होंगे ,चलो जल्दी करो।”
कि तभी उनकी नजर अपनी बेटी खुशी पर पड़ी।खुशी को देखते रघुनाथ जी के आंखों के कोर गीले हो गए। उन्होंने कहा” खुशी!एकतरफ तुझे मैं आज दुल्हन के जोड़े में देखकर जितना खुश हूं वही दूसरी तरफ मेरा मन दुखी भी हो रहा है ये सोचकर कि आज के बाद तू परायी हो जाएगी।”
चुपचाप पथरायी आंखों से आईने की तरफ निहारती खुशी ने कहा”पापा!मैं कभी आप की थी ही कहाँ? जो परायी हो जाऊंगी,आप सबके लिए तो मैं हमेशा परायी ही थी। आप ही तो कहते है बेटियां पराया धन होती है।”
इतना सुनते रघुनाथ जी निरुत्तर हो गए, उन्होंने चुपचाप खुशी के सिर पर हाथ रख कर उसे खुश रहने का आशीर्वाद देते हुए तेज कदमों से कमरे से बाहर निकल आये।
“जिसे देखकर उनके बेटे ने कहा,”पापा दीदी ने सही तो कहा,काश आप उसको एम.बी.बीएस के लिए होस्टल भेज देते तो आज दीदी बहुत खुश होती।” खुशी के चौदह वर्षीय भाई ने कहा
“तू चुपकर दीदी के चमचे तुझे क्या पता दुनियादारी, पहले बड़ा हो जा फिर समझ आएगा”
खुशी की शादी खुशी खुशी सम्पन्न हुई। रघुनाथ जी ने अपनी औकात से ज्यादा जो खर्च किया था। जो जो सामान खुशी के ससुराल वालों ने मांगे सोना, कार, फ्रिज ,ए.सी, इत्यादि सब कुछ दिया था। सभी घराती बाराती रघुनाथ जी को बेटी की ऐसी शादी सम्पन्न करने के लिए तारीफ कर रहे थे। लेकिन खुशी के चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी क्योंकि रघुनाथ जी ने उसका विवाह बिना उसकी मर्जी के किया था खुशी पढ़ना चाहती थी लेकिन रघुनाथ जी बेटी की शादी कर के बोझ से मुक्त होना चाहते थे।शादी सम्पन्न होने के बाद विदाई का समय आया। सब रो रहे थे। लेकिन खुशी के चेहरे पर अब भी ना खुशी थी ना गम।
खुशी की माँ रमा ने उसके आंचल में जैसे ही दूब, हल्दी,अक्षत का खोइच्छा दिया।खुशी ने बड़े ध्यान से अपने आँचल के खोइच्छे को देखा”फिर एक नजर अपने घर की दर दीवारों, खिलौनों, सामानों को देखते देखते अपने पापा रघुनाथ जी के पास गयी।
और उनसे कहा”पापा!आप रो क्यों रहे है? आज तो आपके लिए खुशी का दिन है। अब तो आप खुश रहिए, आज आप ने अपना 20 सालों का बोझ उतार लिया,मैं कहने के लिए आप की बेटी थी आपने मुझे जन्म दिया पाला पोसा भी। मैं डॉक्टर बनना चाहती थी। ये बात आप अच्छे से जानते थे।
लेकिन आपने कहा “कि आपके पास इतने पैसे नही की आप मेडिकल कॉलेज का फीस दे सको। आपने मुझे ग्रैजुएट भी नही होने दिया। और मेरी शादी कर दी।”
“कहने को मैं आपकी अपनी थी फिर भी मेरे मांगने पर भी आपने मुझे शिक्षा का अधिकार नही दिया। और इन अनजान लोगों को मुँह माँगी चीजे अपनी औकात से ज्यादा लाकर दे दी। वो भी अपने सिर पर कर्ज का बोझ रख कर। क्या मैं इस कर्ज के बोझ से भी ज्यादा बड़ी बोझ थी” कहकर खुशी वहाँ से विदा होकर ससुराल चली गयी।
तभी नर्स ने कहा ,” पेशेंट से जो मिलना चाहे मिल सकता है।”
रघुनाथ उठकर भागते हुए अंदर आई सी यू में गए,जहाँ अपनी बेटी को जिंदगी मौत के बीच जूझते हुए देखकर वो उसका हाथ पकड़कर रोते हुए बोले,”मुझे माफ़ कर दे बिटिया,मुझे नही पता था कि मैं अपनी बेटी का हाथ इंसानों के हाथ मे नही जल्लादों के हाथ मे दे रहा हूँ। मैं तेरा दोषी हूँ। बस मुझे एकबार माफ़ कर दे बेटी”
बदले में खुशी ने कहा,”पापा अब बहुत देर हो चुकी है।” कहते हुए उसने अपनी आखिरी साँसे ली।
रघुनाथ जी की वेदना आज वैसे ही थी जैसे जल से किसी मछली को निकाल दिया जाए । आज उनका मन वैसे ही तड़प रहा था।
भीड़ से निकलकर उनके रिश्तेदार ने कहा,”रघुनाथ ,भाई रोना बंद कीजिए।खुशी के आखिरी विदाई का समय हो गया है। जल्दी कीजिये। अब होनी को कौन टाल सकता है? लेकिन रघुनाथ जी बेटी के शव से लिपटकर बिलख बिलख कर रोये जा रहे थे। उनके कानों में अपनी बेटी के कहे आखिरी शब्द गूंज रहे थे। जिसको सोच सोच कर पछतावे के शब्द उनके मुख से निकल रहे थे। वो लगातार कहे जा रहे थे “आज ये दिन देखने से अच्छा होता कि काश उस दिन तूने पीछे मुड़कर ना देखा होता। “
“काश!तुझे मैंने पिता होने की दुहाई देकर घर छोड़ने से ना रोका होता। मैंने तेरी बात मान ली होती और तुझको पढ़ने के लिए बाहर भेज दिया होता। तो शायद आज मेरी खुशी बेटी दहेज की बलि ना चढ़ती।”
उन दहेज के लोभियों ने दिन पर दिन अपनी मांगे बढ़ानी शुरू कर दी। जिसके ना पूरा होने पर उन लोभियों ने खुशी को ही दहेज की आग में जला डाला।
इंस्पेक्टर ने रघुनाथ जी को सांत्वना देते हुए कहा,”आप चिंता मत कीजिए। उनको सजा भी मिलेगी और उन लोगो को आपको मुआवजा भी देना पड़ेगा।”
“लेकिन साहब मुझे तो सिर्फ मेरी बेटी चाहिए”,रघुनाथ जी ने रोते हुए कहा।
आज खुशी के पार्थिव शरीर को एक बार फिर लाल जोड़े में अपनी आखिरी विदाई पर खामोश थी लेकिन बहुत से सवाल थे जो उसकी मृत शरीर पूछ रही थी। कि आखिर इसका जिम्मेदार कौन कौन है। मुखाग्नि देते रघुनाथ के हाथ कांप रहे थे। आज उनके पास छाती पीटने के अलावा कुछ भी नही था क्योंकि हाथ खाली थे। कि तभी मूसलाधार बरसात भी होने लगी। शायद आज कायनात भी रो रही थी।
