Hindi Poem: नैहर से निर्वासित बेटियाँ बूढ़ी होती हुई बुआ,आँगन की तुलसी नहीँ होतींवो उसी घर में पड़ी किसी दरार का,छत काअनचाहा उग आयापीपल हो जाती हैंजो पूज्य भी है और भय भी देता हैबस दूर से हरियाली बाँट देती हैं जड़ों से जुड़े मोह काआकार उन्हें धीरे धीरेतुलसी के पत्ते से ,न जाने कबबढ़ाकर पीपल के पत्ते […]
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सुखद हास परिहास पति पत्नी का-गृहलक्ष्मी की कविता
Hindi Poem: पति परमेश्वर ने एक दिन कहा हमसे कि अब तुम बहुत हसीन दिखने लगी हो,आकर उम्र के इस पड़ाव पर अब तुम बहुत खूबसूरत दिखने लगी हो। स्तब्ध थी मैं और अचंभित भी बहुत थी!क्या यह अल्फाज आज उनके ही मुख से थे निकले?जिन्होंने न की कभी तारीफ़ बीस पच्चीस की उम्र में,क्या […]
पुरुष कौन है?-गृहलक्ष्मी की कविता
Hindi Poem: पुरुष कौन है?जो निशब्द है, वह पुरुष है।जो कर्तव्य पथ पर खड़ा है।वह पुरुष है। जो ओढ़ता है आवरण, कठोरता का।जिम्मेदारियां का चोला पहनता है।वह पुरुष है।जिसका काम दो जोड़ी साधारण कपड़ों में भी चल जाता है।वह पुरुष है। जो बंधा रहता है स्त्री(माता, बहन, पत्नी, बेटी) के सानिध्य में।कभी माँ की ममता […]
फोन पर बातें-गृहलक्ष्मी की कविता
Hindi Love Poem: तुम्हारा फोन पर मुझसे बात करनामेरी आंखो में हज़ारों सितारों को रौशन कर देता हैतुम्हारे वो प्यारे मीठे शब्द जब मेरे कानों को छूते हैं तोलगता है मानो ठीक कानों के पास तुम बैठे हो औरकानों से धीरे धीरे मेरे अंदर उतर रहे होमैं गुदगुदा जाती हूं, जब तुम कहते हो तुम […]
सुहागन स्त्री-गृहलक्ष्मी की कविता
Hindi Poem: सुहागन स्त्री के दाह सँस्कार सेलौटे पति के सामने पड़ने सेस्त्री अपने जीवन के लिएअशुभता से न डरीमन में उसे शुभत्व मानअपने लिये उस नारी के जैसीमृत्यु की कामना कीवहीँ पुरुष के दाह सँस्कार के बादसमाज ने उसकी पत्नी केदर्शन से भयभीत होअपने अशुभ होने की भावना कीसोचा इस विपदा के बाद भीजी […]
बस जिस्म नहीं हूं मैं—गृहलक्ष्मी की कविता
Hindi Poem: बस जिस्म नहीं मैं एक कली हूं कब तक मुझको तोड़ोगेक्या दिल बहलाने का सामान बना कर मुझको छोड़ोगे रूहानी मोहब्बत होती है तुम जिस्मानी करते होहैवानो से बनकर के तुम वहशीपन मुझ पर करते होबेइज्जत और बदनाम कर बाजारू का इल्जाम दियाअस्मत लेकर रोटी देते पर कहते हो अहसान कियाखुद की आंखे […]
सोचती हूँ—गृहलक्ष्मी की कविता
Hindi Poem: सोचती हूँयदि स्त्रियाँदेवी या माया न होतींनर्क –स्वर्ग का द्वारअथवा अबला यानीर भरी दुःख की बदली न होतींतो क्या होतीं……?तब सम्भव हैवे भी मनुष्य होतींसिर्फ मनुष्य……न कम न अधिक।तब वे अपने कमजोर पँखो सेउड़ने का अभ्यास करने के स्थान परआसमान की ऊँचाई और गोलाई नाप रही होतींग्रह,नक्षत्रों से बातें कर रही होतींऔर तो […]
मोहब्बत भी इबादत है-गृहलक्ष्मी की कविता
Poem in Hindi: मोहब्बत भी इबादत हैउसकी नजरों ने छू लियापहली दफा जब उसे देखा थावो ख्वाब है या हक़ीक़तउस रात इस उल्झन में डूबा था ,तकते रहे उसकी राहें ये पन्ने भीडलती हूई शामों को उससे मिलने का इंतज़ार थाहर मौसम ज़िन्दगी का सुहाना हो गयाइन रातों को भी उससे मिलने का खुमार था […]
“पिता हूं मै”-गृहलक्ष्मी की कविता
Poem for Father: पिता हूं मैं मां तो नहीं बन सकता,पर हर सांस में तुझको जिया है मैंने भीगोद में लेकर मेरे लाल तुझे ,लगा क्या अनमोल मिला मुझेअपनी सभी तमन्नाओं का पिता बनते ही पाया आसमान मैंने।जब तूने मेरी पकड़ी उंगली, लगा रब ने थाम लिया मुझकोखुशियों के दीप जले दिल में,जब अपना नाम […]
सुनो सखी-गृहलक्ष्मी की कविता
Hindi Poem: सुनो सखी ! तुम कैसी हो ?जैसी पहले थी क्या अब भी वैसी हो ?या मेरी तरह आंसू झुर्रियों में छिपा लेती हो ,कोई हाल पूछता है तो मुस्कुरा लेती हो ।मैं नहीं देख पाती दीवार के उस पार तुम्हें ,मगर मैं हर रोज सुनती हूं ,तुम पर कसते हुए उन तानों को […]
