सावन की बारिश—गृहलक्ष्मी की कविता
Sawan ki Baarish

Hindi Poem: नैहर से निर्वासित बेटियाँ
 बूढ़ी  होती हुई बुआ,
आँगन की तुलसी नहीँ होतीं
वो उसी घर में पड़ी
 किसी दरार का,छत का
अनचाहा उग आया
पीपल हो जाती हैं
जो पूज्य भी है और भय भी देता है
बस दूर से हरियाली बाँट देती हैं
 जड़ों से जुड़े मोह का
आकार उन्हें धीरे धीरे
तुलसी के पत्ते से ,न जाने कब
बढ़ाकर पीपल के पत्ते में बदल देता है
जिसकी जगह आँगन नहीं
 दूर पड़ा कोई एकान्त थान हो जाता है
सप्तपदी के सात पग
न जाने कब  घर की देहरी
बड़ी ऊँची कर देते हैं
भाँवरों की रस्म में गोते खाती
अपनेपन की आस लिये
गहरे डूब ही जाती हैं ,
अपने निर्वासन का छोर खोजते हुए,
 अवसर पर आना,
बिन बुलाये  अपमान होंता है
 की सीख आँचल के
खूँट में बाँध सती  विदा लेती हैं
 नहीं तो  कानों के कनखल में
इतने खल वचन आ गिरते है
कि शिव की गङ्गा और चन्द्रमा भी
शीतल न कर पाता उन्हें
इस   अपमान की
अन्तराग्नि मे सुलगतीं
धीरे धीरे रोज़  मरतीं वो,
न कोयला होतीं हैं न राख
कोई वीरभद्र उनका प्रतिशोध नहीं लेता
मैनाक सागर में डूब जाता
उनके शक्ति पीठ भी नहीं होते
बुआ भाग भतीजी आई की
कहावत का मर्म बाँच ही नहीं पातीं
 उसी आँगन में अधिकार से
कुछ लेने को लड़ने वालीं
कलेजे का टुकड़ा बनी बेटियाँ
 विदा लेने के बाद
राखी दूज की डोर निर्बल होते
ब्याह और तेरहवीं तक
 शेष हो जातीं है
छप्पन भोग की प्रेमिन
एक दिन   उस दहलीज़ के
सादे जल में भी
सन्तुष्ट होने का हुनर सीख लेतीं हैं
बड़ा भारी हैं आँगन की
तुलसी से छत की दरार का पीपल होना
सावन की बारिश कितना कुछ
 अनचाहा उगा देती हैं

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