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फोन पर बातें-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Love Poem: तुम्हारा फोन पर मुझसे बात करनामेरी आंखो में हज़ारों सितारों को रौशन कर देता हैतुम्हारे वो प्यारे मीठे शब्द जब मेरे कानों को छूते हैं तोलगता है मानो ठीक कानों के पास तुम बैठे हो औरकानों से धीरे धीरे मेरे अंदर उतर रहे होमैं गुदगुदा जाती हूं, जब तुम कहते हो तुम […]

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बस जिस्म नहीं हूं मैं—गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: बस जिस्म नहीं मैं एक कली हूं कब तक मुझको तोड़ोगेक्या दिल बहलाने का सामान बना कर मुझको छोड़ोगे रूहानी मोहब्बत होती है तुम जिस्मानी करते होहैवानो से बनकर के तुम वहशीपन मुझ पर करते होबेइज्जत और बदनाम कर बाजारू का इल्जाम दियाअस्मत लेकर रोटी देते पर कहते हो अहसान कियाखुद की आंखे […]

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सोचती हूँ—गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: सोचती हूँयदि स्त्रियाँदेवी या माया न होतींनर्क –स्वर्ग का द्वारअथवा अबला यानीर भरी दुःख की बदली न होतींतो क्या होतीं……?तब सम्भव हैवे भी मनुष्य होतींसिर्फ मनुष्य……न कम न अधिक।तब वे अपने कमजोर पँखो सेउड़ने का अभ्यास करने के स्थान परआसमान की ऊँचाई और गोलाई नाप रही होतींग्रह,नक्षत्रों से बातें कर रही होतींऔर तो […]

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