Hindi Story: घर में सभी के चले जाने के बाद मैं अपनी चाय ले कर बाल्कनी में आ कर बैठ गयी । ये मेरा रोज़ का शग़ल था ।बाल्कनी का एकांत और सामने सागर की लहरों की जुगलबंदी मुझे अत्यंत सुकून देती थी ।
सागर की लहरों का बार -बार किनारे को छूने का खेल मुझे अत्यंत प्रिय था ।लहरों में खोई मैं अपनी तमाम परेशानियों को कुछ देर के लिए भूल जाती थी …पर आज बात कुछ और थी ।आज मेरा पचासवाँ जन्मदिन था ।मेरे लिए और मेरे परिवार के लिए आज एक सामान्य दिन था ।बच्चे सुबह मुबारकबाद देकर कॉलेज चले गए और नवीन…..वे हमेशा की तरह मुझे मुबारकबाद
देना भूल गए ।
ख़ैर …उनका भूलना उनके नाम को सिद्ध करता
है अर्थात् भूलने में कुछ नया नहीं था ,ये भूलने का क्रम तो उसी वर्ष से शुरू हो गया था जिस वर्ष हमारा विवाह हुआ था। शुरू में बुरा भी लगता था , मैं उन्हें याद भी दिलवाती थी ,किंतु कब तक …….और अंतत: ये एक और समझौते में शामिल हो गया। जीवन के ऐसे ना जाने कितने समझौते मेरे हृदय की गुल्लक में पड़े है ।लहरों की अठखेलियों को देखते -देखते मैं अपने अतीत की गलियों में भटकने लगी ।हिंदी में स्नातक करने
के बाद मैं आगे पढ़ कर एक लेखिका बनना चाहती थी ।
हम तीन बहनें थी और पापा की सीमित आय ,इसलिए सामने से खुद आए नवीन के रिश्ते को माँ -पापा इनकार नहीं कर पाए ।
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वैसे …इनकार की वजह भी नहीं थीं क्यूँकि नवीन एक आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे ।गौर वर्ण ,
लम्बा क़द और गठीले तन के व्यक्तित्व के स्वामी नवीन पर उनकी उच्च नौकरी और उनकी विदेशी पढ़ाई ने चार -चाँद लगा दिए थे ।
शायद इसी बात का अहंकारनवीन के व्यक्तित्व पर हावी हो गया था ।हर बात में वे सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने को ही सर्वोपर मानते थे ,हर तर्क से अपनी बात मनवाते थे ।वे सिर्फ़ अपने काम से प्रेम करते थे ।मैं और मेरी इच्छायें कोई मायने नहीं रखती थी ।मेरा लेखिका बनने का स्वप्न भी टूट गया क्यूँकि उन्हें मेरा लिखना क़तई पसंद नहीं था ।कहीं बाहर घूमने जाना ,मूवी देखना या फिर कुछ और…नाम मात्र ही होता था ।उन्हें इन सभी चीजों में कोई रुचि नहीं थी ।मैं उनसे कभी अपनी कुछ इच्छा ज़ाहिर भी करती तो बहस ,लड़ाई -झगड़े पर बात ख़त्म
होती ।
धीरे -धीरे हमारे बीच वार्तालाप भी अत्यंत संक्षिप्त हो गयी ।जिस तरह एक कमरे में धूप -हवा की कमी से उसमें सीलन की दुर्गंध आने लगती है ,उसी तरह हमारे रिश्ते में भी प्रेम,समर्पण और अपनेपन की कमी से सीलन की दुर्गंध आनेलगी थी ।अंतत: मैंने इस सीलन भरे पति -पत्नी के रिश्ते को अपना भाग्य मान लिया और यहीं से शुरू हो गया था मेरे समझौतों का सफ़र ।
आदित्य और अदिति के जन्म के बाद भी नवीन में कोई बदलाव नहीं आया ।मैंने अपने आप को पूर्णरूप से घर -गृहस्थी और बच्चों को समर्पित कर दिया था ।किंतु मेरे भीतर की लेखिका सदा बाहर आने को व्याकुल रहती।मैं अक्सर सोचती की ईश्वर की अनुपम रचना है एक स्त्री ।ये एक स्त्री का उत्कृष्ट रूप ही होगा जो ईश्वर ने स्त्री को एकनए जीव को जन्म देने का वरदान दिया है ।
स्त्री भले ही शारीरिक रूप से पुरुष की अपेक्षा कमजोर क्यूँ ना हो किंतु मानसिक रूप से वो अधिक प्रबल है ।समझौते ,अपने अस्तित्व और सपनों का बलिदान अक्सर स्त्री की झोली में ही आते हैं ,जिसे वो अपना भाग्य मान कर स्वीकार लेती है …..अपनी इसी सोच- भावनाओं को मैं नवीन से छुप-छुप कर शब्दों में पिरो कर ,लेखनी का रूप देकर अपने आप को तृप्त कर लेती । समय पंख लगा कर उड़ने लगा ।बच्चे बड़े हो गए औरअपने -अपने जीवन का अध्याय लिखने के लिए अपनी -अपनी राह चल पड़े । हाँ ..पर बड़े होते बच्चे मुझे समझते और मेरा साथ देते , पर मुझे तो नवीन का साथ चाहिए था। इतने वर्ष बीत गए थे …अब तो नवीन के
भीतर बदलाव आना ,जीवन में उनके प्रेम के मेघों की वर्षा का अर्थ मेरे लिए ईश्वर का अनुपम उपहार होगा ।
“ मम्मी ..आप कहाँ है ?” बच्चों की आवाज़ से मैं अपने अतीत की गलियों से वर्तमान में आ गयी
“ अरे मम्मी आप यहाँ बैठी हो ..चलिए तैयार हो जाइए ,कहीं बाहर चलते हैं “
“क्यूँ भई ..आज ऐसा क्या ख़ास है “
“ अरे मॉम ..आज आपका पचासवाँ जन्मदिन है तो कुछ ख़ास तो बनता है ना …”
मैंने नम आँखों से उनकी तरफ़ देखा ….मेरी मौन आँखों की भाषा वे अच्छे से समझ गए थे ।कई बार शब्दों से ज़्यादा प्रबल होती है आँखों की भाषा ।
“मम्मी हम अच्छी तरह आपकी मन की बात समझते है ।आज आपका स्पेशल डे है ।प्लीज़ हमारे साथ बाहर चलिए ।”
बच्चों के स्नेह भरे निमंत्रण को मैं अस्वीकार नहीं कर पायी ।हमारी गाड़ी एक कैफ़े के सामने रुकी ।लाल गुलाब के फूल और लाल ग़ुब्बारों से सजा कैफ़े बहुत ख़ूबसूरत लग रहा था ।
“ये कैफ़े तो आज बहुत सजा है ?” मैंने विस्मय भरा प्रश्न किया
“ हाँ माँ ..वो दरअसल आज कैफ़े की फ़र्स्ट ऐनिवर्सरी है ना ..इसलिए ।माँ …..आप इतने
अंदर चलिए ,मैं अभी आती हूँ “ अदिति बेपरवाही से बोली
“ अच्छा माँ …आप चलिए ,मैं इतने गाड़ी पार्क करके आता हूँ “ कह कर आदित्य चला गया
मैंने जैसे ही कैफ़े का दरवाज़ा खोला ,रजनीगंधा के फूलों की भीनी -भीनी महक ने मेरा स्वागत किया । रजनीगंधा के फूल मुझे अत्यंत प्रिय था। मैं एकांत में कोने वाली टेबल पर बैठ कर बच्चों का इंतज़ार करने लगी ।तभी सामने से नवीन को आते देख मैं हैरान हो गयी ।मेरी सोचने -समझने की शक्ति शून्य हो गयी ।वे मेरे पास आकर ,घुटनों के बल बैठ कर ,एकगु लाब का फूल देते हुए बोले ,
“ हैपी फ़िफ़्टीएथ बर्थडे नैना” ।मैं जानता हूँ कि मैंने तुम्हारे साथ बहुत अन्याय किया है ।अपने अहंकार के मद में चूर मैंने कभी तुम्हारी कद्र नहीं की नैना ।
यहाँ तक कि तुम्हारे लेखिका बनने के सपने को भी बुरी तरह रौंद कर सबसे बड़ा अपराध किया । विवाह के बाद तुम जो सपने अपनी पलकों पर सजा कर मेरे घर आयीं ,मैंने उन्हें आंसुओं में बदल दिया ।एक प्रेम भरे पति -पत्नी के रिश्ते को सीलन भरा बना दिया ।अब में उसे अपने प्रेम की हवा दिखाना चाहता हूँ ।मैं तुम्हारा अपराधी हूँ नैना ….आई एम सॉरी फ़ॉर एव्री थिंग नैना ।आज तुम्हारे स्पेशल डेपर मैं तुम्हें तुम्हारा सपना उपहार देना चाहता हूँ ……ये तुम्हारी लिखी कहानियों की छपी किताब ….मेरे इस पहले उपहार को स्वीकार कर ,हमारे रिश्ते को सीलन -मुक्त कर दो प्लीज़ नैना ……” नवीन बोले जा रहे थे और मेरी आँखें अविरल बह रहीं थी। सामने खड़े आदित्य और अदिति मुस्कुरा रहे थे। ये सब उनका सर्प्राइज़ प्लैंड उपहार था । मुझे मेरे जन्मदिन पर इतना अनमोल …और वो भी पूरे फ़िल्मी अन्दाज़ में , पहला उपहार मिलेगा ….इसकी तो मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। सीलन की वो दुर्गंध अब रजनीगंधा के फूलों की भीनी सुगंध में परिवर्तित हो गयी थी
