बात उन दिनों की है जब मेरी उम्र 6 साल की थी। उस समय मुझे मेकअप करने का बहुत शौक होता था। अक्सर मम्मी की लिपस्टिक, काजल यहां तक की सिंदूर भी लगा देती थी। मम्मी से बहुत डांट पड़ती, अक्सर मम्मी मुझे समझाने के लिए यह कहती हैं की शादीशुदा औरतें मेकअप करती हैं। बच्चे ऐसे ही क्यूट लगते हैं।
जब आपकी शादी हो जाएगी तब आप मेकअप करना। मैं तुरंत हाजिर जवाब देती कि ठीक है मेरी शादी करा दो आप जल्दी, ताकि मैं अच्छे से मेकअप करूं। आज भी मम्मी कभी-कभी इस बात का जिक्र करके हंसती है।
– सुधा सिंह
एटम (पिल्ला) के प्रति लगाव
मेरे पिताजी मंडलेश्वर में सत्र न्यायाधीश के पद पर नियुक्त थे। हमारे पड़ोस में एक कुतिया ने बच्चे दिए थे। उस छोटे से पिल्ले के प्रति मेरा और मेरे छोटे भाई विवेक का लगाव देख कर पिताजी ने उसे पाल लिया। उसका नाम एटम रखा। पिताजी के रिटायर होने के बाद हम इंदौर में बस गए। पिताजी सैर के लिए जाते तो एटम साथ में जाता। बड़े कुत्ते भौंगते तो एटम पिताजी की धोती में घुस जाता। पिताजी कुत्तों को भगाते तो वह धोती में से निकल कर भौंकता। नीलम के पापा हमारे यहां किराये पर रहते थे। एक दिन वह स्कूल गई तो एटम उसके पीछे-पीछे स्कूल चला गया। एटम को छोड़ने उसे घर आना पड़ा। उसे पता था कि मेरी मां को उसका रसोईघर में प्रवेश पसंद नहीं है। वह रसोईघर में कभी नहीं गया।

जन्म कुंडली के अनुसार जिस दिन मेरे छोटे भाई को चोट लगनी थी, उस दिन एटम लहूलुहान होकर घर लौटा। जिस दिन एटम की मौत हुई हमारे आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। युगों बाद मुंबई में रहने वाली मेरी बेटी ने रिज को पाला। लॉकडाउन में वह उसका सहारा बना। एक बार जब हम रिज से मिले तो वह मेरे चार वर्षीय नाती लक्ष्य की गोद में ऐसे स्नेह से बैठ गया जैसे पुराना रिश्ता हो। मैं सोचता हूं कि कहीं एटम ही तो रिज के रूप में वापस नहीं लौट आया है। मैं रिटायर होकर 66 वर्ष का हो गया हूं। बचपन का अनुभव भूल नहीं सकता। कुत्ता वफादार होता है। काश! इंसान भी ऐसा ही वफादार सकता।
– ललित कुमार शर्मा, इंदौर (म.प्र.)
बचपन की शरारतें
छह वर्ष पूर्व अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के सौर-सपाटे का वृतांत आज भी मेरे मानस पटल पर अंकित है। अंडमान पहुंचते-पहुंचते सूरज ढलने लगा था। पापा के मना करने के बावजूद मैं और मेरी छोटी बहन होटल से सीधे समुद्र तट की ओर चले गए क्योंकि सागर की लहरें मुझे हमेशा रोमांचित करती रही है।

हम समुद्र की लहरों से अठखेलियां कर ही रहे थे कि हाई टाइड्स का ऐलान होने लगा लेकिन हम इसे अनसुना कर लहरों के साथ आगे बढ़ते चले गए। तभी एक लहर इतनी वेग से आई कि हमारे पैर उखड़ गए और हम पानी में मछली की तरह तैरते हुए एक दूसरे का हाथ थामे हुए यह सोचने लगे कि अब बचना नामुमकिन है। भय के कारण हमारा कंठ भी सूख गया था तथा मन ही मन अपने ईष्ट देव को याद कर रहे थे। मानो ईश्वर ने हमारी प्रार्थना सुन ली। लहर उतरने लगा तथा हमारे पैर जमीन छूने लगे। हम सरपट दौड़ते हुए होटल पहुंचे तथा मम्मी-पापा से लिपटकर बिलख-बिलखकर रोने लगे। उन्होंने हमें ढाढस बंधाते हुए सांत्वना दी।
आज भी कभी टीवी पर समुद्र की लहरें दिखाई दे जाती हैं तो यादें ताजा हो जाती हैं और रूह कांप जाती है और वो बीते हुए लम्हे जीवंत हो चलचित्र की भांति हमारी आंखों के सामने चलने लगते हैं।
– शिवांगी गोयल, (सूरत गुजरात)
यह भी पढ़ें –सबूत – गृहलक्ष्मी कहानियां
