‘बेटा पांच मिनट के लिए ठेले पर खड़े हो जाओ, मैं जल्दी ही खाना खा
लूंगा।’ हमेशा की भांति आज भी पिता के आग्रह को ठुकरा ठेले पर तिरष्कृत
दृष्टि डाल दीपक अपनी बाइक स्टार्ट कर तुरंत वहां से नौ दो ग्यारह हो गया। यह देख आत्माराम की आंखें नम हो गई क्योंकि आज करीब ही बचपन का साथी संतोष खड़ा था, सब्जी के ठेले के प्रति दीपक की इतनी बेरुखी देख संतोष से भी रहा नहीं गया, वह उबल पड़ा और आत्माराम की ओर मुखातिब हो बोला, ‘जिस सब्जी के ठेले ने दीपक को पाला पोसा, पढ़ाया-लिखाया, बाकि दिलाई यहां तक की इस बाइक में पेट्रोल भरवाने का काम भी यही सब्जी का ठेला कर रहा है फिर भी इससे इतनी नफरत, धिक्कार है ऐसे बेटे को। तुम बु सीधे हो आत्मराम,जो सब कुछ चुपचाप सहन कर रहे हो, और कोई होता तो… घर से बाहर
कर देता समझे।’
आत्माराम ने आंसू पोंछते हुए स्वयं को कोसते हुए कहा, ‘संतोष! दोष उसका नहीं मेरा है क्योंकि जब भी वह स्कूल जाने से आना-कानी करता था तब मैं उससे हमेशा यही उदाहरण दिया करता था देख पढ़ाई-लिखाई कर ले नहीं तो तुझे भी मेरे समान ही सब्जी का ठेला लगाना पड़ेगा। मेरे इस वाक्य की बार-बार पुनरावृति ने उसके बाल मन पर शायद बहुत गहरा प्रभाव डाला, इसी कारण वह अपने पैतृक व्यवसाय से बिल्कुल दूर हो गया है, काश! मैं इस बात को पहले समझ गया होता।’ संतोष अवाक सा आत्माराम के चेहरे को ताकता रहा क्योंकि उसे आत्माराम कथन सौ फीसदी सत्य प्रतीत हो रहा था।