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गृहलक्ष्मी की कहानियां : दंगे वाली दुल्हन
Stories of Grihalakshmi

गृहलक्ष्मी की कहानियां : ‘अरी मुई! ध्यान कहां है तेरा? कढ़ाई जल कर राख हुई जा रही है और तू है कि हाथ में सब्जी लेकर न जाने कहां देख रही है’ पानी से भरी बाल्टी वहीं पटकती हुई अम्मी बोली।

अचानक अम्मी की आवाज सुनकर मैं चौंक पड़ी और हड़बड़ाहट में कटे हुए आलू नीचे गिर गए।

‘या अल्लाह…! तू छोड़ ये सब… मैं देखती हूं… एक ही तो बरतन बचा है वो भी लगता है तू जला कर ही छोड़ेगी, तू ये पानी मटके में रख ले और बाल्टी शकीला आपा को दे आ। अम्मी ने आंच बुझाई और सब्जी धोने लगी।

मेरी इच्छा तो नहीं थी आपा के घर जाने की मगर इसके सिवा और कोई चारा भी नहीं था। मैं जानती थी कि आपा मुझे बैठा कर फिर वही सब बातें करेंगी, जिनसे मैं भागना चाहती थी। मेरे दर्द से आपा का दर्द कुछ कम नहीं था, मगर मैं क्या करूं…? जिस दर्द को मैं भूलना चाहती थी, उसे कोई मुझे भूलने ही नहीं देता। छह माह से ऊपर हो गए थे मुझे इस पुनर्वास कैंप में रहते हुए, मगर जख्म है कि पुराना ही नहीं होता। एक जख्म हो तो भरने का उपाय भी करें… यहां तो मरहम बेअसर पड़ रहे हैं, और जख्म दिन-ब-दिन नासूर बनते जा रहे हैं।

वो तो अच्छा हुआ कि शकीला आपा घर पर नहीं थी, इसलिए मैंने उनके बेटे रहमान भाई को बाल्टी पकड़ा दी। हालांकि रहमान भाई की लिजलिजाती निगाहों का एहसास मुझे अपनी पीठ पर भी हो रहा था, मगर अब तो मैं ऐसी हवस भरी निगाहों और बदन को नंगा करते जुमलों की आदी हो चुकी थी। इतनी उमर में मैं इतना तो जान ही गई थी कि खुदा ने हम औरतों को बनाया ही इसलिए है कि मर्द हमारा उपभोग कर सकें। खुदा ने मर्द की हर भूख को मिटाने के लिए ही औरत को बनाया है। पेट की भूख हो या जिस्म की… मिटाने के लिए उसे औरत का ही आसरा होता है।

‘नजमा के अब्बू… आप कहीं से भी बेटियों के निकाह का बंदोबस्त कीजिए, आप समझते नहीं हैं… जवान बेटियां मां-बाप के घर में सुलगते हुए अंगारे के समान है। जमाने की जरा सी हवा भी लगी तो हमें राख का ढेर होते देर नहीं लगेगी…।

‘मैं तीन-तीन बेटियों के निकाह का कैसे इंतजाम करूं बेगम? किसी तरह तो नजमा की थोड़ी उम्र बढ़ा कर सरकारी निकाह में बैठाया था, सोचा था एक लाख की सरकारी सहायता राशि मिल जाएगी तो हमारे सारे दुख दूर हो जाएंगे। मगर दुख तो दूर होने के बजाए बढ़ते ही जा रहे हैं। मैं ये बूढ़ा शरीर लेकर किसी तरह दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर पा रहा हूं। इनके निकाह की बात मैं कैसे सोचूं?

‘काश कि हमारा फैजल जिंदा होता, नजमा के अब्बू तो…

‘उस आग में फैजल की जगह हम दोनों मर गए होते तो आज यह दिन न देखना पड़ता बेगम।

‘अम्मी! आपने हम तीनों बहनों को क्यों नहीं धकेल दिया उस आग में, आज इस तरह हर रोज मरना तो नहीं पड़ता। अब मुझे उनकी बातें सुनी नहीं जा रही थी।

मैंने आगे बढ़ कर चटाई पर सिमटी हुई अपनी दोनों बहनों को सीने से लगा लिया। मेरी बातें सुनकर अम्मी और अब्बू दोनो बाहर चले गए। मैं कहना तो बहुत कुछ चाहती थी मगर रकीला और शब्बो का दहशत भरा चेहरा देख कर आगे कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई। दस साल की रकीला और नौ साल की शब्बो निकाह और शौहर का सही मतलब भी नहीं जानती थी। मैं भी कहां जानती थी जब मेरा निकाह हुआ था। पंद्रह बरस की उमर में अब्बू ने उन्नीस बरस लिखा कर सरकारी निकाह में बैठा दिया था।

मैं याद तो नहीं करना चाहती थी मगर न जाने क्यूं जब भी मैं सोने जाती हूं तो मुझे उन्हीं पुराने दिनों की याद आने लगती है और मैं खोने लगती हूं अपने गांव की उन्हीं पुरानी गलियों में…

मोहब्बतनगर के खिताब से नवाजे जाने वाले शहर में छोटी सी एक नदी के किनारे बसा था मेरा गांव, जहां सब मोहब्बत की परिभाषा पर अमल करते थे। सुबह मस्जिद में पडऩे वाली अजान की आवाज जब कानों में पड़ती तो सब के बदन में मानो नया जोश भर जाता था। हर दिन खुशियां लेकर आती थी और हर रात मीठे-मीठे सपने दिखलाती थी। पर एक दिन न जाने कैसे लोगों के मन काले होने लगे। इंसान इंसान पर शक करने लगा। अब्बू ने हमारे मदरसा जाने पर भी रोक लगा दी। बाहर जाना होता तो अब्बू या फैजल भाईजान के साथ ही जाते, वो भी बहुत कम। फिर एक दिन जिस बात का खौफ था वही हुआ।

मुझे आज भी याद है वो मंजर, धू-धू करके जलता हुआ घर, खेत खलिहान… सब के सब अपनी जान बचा कर इधर-उधर भाग रहे थे, सड़कों पर मौत नंगा होकर नाच रही थी।

अब्बू ने हम तीनो बहनो को एक ट्रैक्टर की ट्राली में बैठा दिया। उधर फैजल भाई जान अम्मी को खोजने गए थे। थोड़ी देर में अम्मी को तो कुछ लोग लेकर आ गए, मगर फैजल भाईजान आज तक नहीं आए। किसी तरह हम अपने गांव वालों के साथ यहां कल्याणपुर पुनर्वास शिविर में पहुंचे। मगर यहां तो हमारी हालत जानवरों से भी बदतर हो गई। अपनों के खोने का गम, ऊपर से पेट की आग… अब हर रोज तिल-तिल कर हम सबको जला रही थी। इन सबके अलावा भी एक और आग थी, तन की आग, जो आए दिन किसी-न-किसी लड़की की आबरू के चिथड़े करने लगी थी। कैंप में सब कुछ बे-परदा था। छोटे-छोटे तंबुओं में बंटा जीवन हर पल असुरक्षित था।

ऐसे में जब सरकारी निकाह और शादीशुदा जोड़े को एक लाख रुपये की सहायता राशि की घोषणा की गई तो लोगों की बांछे खिल गई। बेटे वाले और बेटी वाले दोनों अपना-अपना फायदा सोचने लगे। मेरे अब्बू ने भी मेरा नाम उसमें लिखवा दिया। अपने होने वाले शौहर का मैंने चेहरा भी नहीं देखा था, न ही उसके बारे में कुछ जानती थी। मैं तो बस इतना जानती थी कि मेरे निकाह कर लेने से अम्मी अब्बू के दुख दूर हो जाएंगे। इसलिए मैंने इस निकाह को कुबूलने की मोहर लगा दी। अपने शौहर के घर जाने पर मुझे पता चला कि मैं यहां न तो नई-नवेली दुल्हन थी और न ही नजमा बेगम… मेरा नाम बदल चुका था, सबने मुझे दंगे वाली दुल्हन के नाम से नवाजा। मेरी सास ने भी सबसे मेरा परिचय इसी नाम से कराया।

मेरे शौहर और ससुर दोनों पास के ही चौराहे पर सब्जी की ठेली लगाते थे। मैं सुबह उठ कर घर के सारे काम निबटा कर खाना बनाती। दोनों बाप-बेटे खा-पी कर मंडी चले जाते। वहां से आकर सब्जियों को धो-पोंछ कर ठेली पर सजाते, जिसमें मैं भी उनकी मदद करती। दो छोटी ननदें भी थी, जिनकी खिदमत भी मुझे ही करनी पड़ती थी। उम्र में वो मुझसे ज्यादा छोटी तो नहीं थी मगर अब मैं उनकी भाभीजान थी, सो मैं ही बड़ी थी।

मैंने इसी जिंदगी को अल्लाह की सौगात मान कर अपना लिया था, मगर मेरी खुशियों की उमर ज्यादा न हो सकी, एक दिन जब मेरे ससुराल वालों ने सुना कि एक लाख मिलने वाली सहायता राशि योजना सरकार ने बंद कर दी है, उसी दिन से मेरी किस्मत के दरवाजे पर भी ताला लग गया। ससुराल के सभी लोग मुझे हिकारत भरी नजरों से देखने लगे। मुझ पर दबाव डालने लगे कि मैं वो रुपये अब्बू से मांगू, जिसे देने का वादा करके सरकार मुकर गई थी। जब इस बाबत मैंने अपने शौहर से बात करनी चाही तो उसने भी टका सा जवाब देते हुए कहा, ‘हमारी तो किस्मत ही फूट गई, इससे तो अच्छा होता कि हम अपने रिश्तेदारों की लड़की ले आते। एक तो दंगे वाली लड़की को घर लाने की जहमत की, ऊपर से कुछ हाथ भी नहीं लगा। अब तुम अपने अब्बू के पास जाओ या न जाओ, मैं तो अगले महीने बंबई जाने की सोच रहा हूं। रहमत चचाजान रहते हैं वहां… कहा है वहीं पर कुछ अच्छा काम दिला देंगे। अभी दो-दो बहनों का निकाह करना है। मैं भौचक्क होकर अपने शौहर का चेहरा देखने लगी।

ओह! तो यहां भी परेशानी लड़कियों को लेकर ही है, इन मर्दों ने अपनी किफायत के लिए औरत को ही औरत का दुश्मन बना दिया है।

अपनी बहन बेटी के लिए दूसरे की बहन बेटी की बलि चढ़ाने में जरा भी नहीं हिचकिचाते हैं। काश… मैं लड़की नहीं होती, मगर अल्लाह ने न मेरी कभी सुनी ना ही उनके नुमाईंदों ने…। मेरे शौहर के चले जाने के बाद ससुर ने मुझे अम्मी के पास पहुंचा दिया और कहा जब एक लाख रुपये हों तभी आना।

कभी-कभी तो दिल करता है कि शकीला आपा की बेटी रेहाना की तरह मैं भी जहर खा कर जान दे दूं।

‘आपा! आप रो रही हो? मेरी आंखों से आंसू बहकर रकीला के चेहरे पर पड़ी तो उसकी नींद खुल गई।

‘तू सो जा रक्कू… ये आंसू तो अब लगता है मेरी मइयत के साथ ही जाएंगे।

‘ऐसा मत कहो आपा… आप हमेशा हमारे साथ रहना, हम तीनों बहन ही एक-दूसरे से प्यार करेंगे और एक-दूसरे के साथ जिएंगे। हम अम्मी अब्बू का भी सहारा बनेंगे ताकि उनको भाईजान की कमी न महसूस हो।

‘ऐसा नहीं हो सकता रक्कू… समाज में एक दंगे वाली लड़की के लिए कोई जगह नहीं है। हमारी जिंदगी भी इन्हीं तंबुओं की तरह है, हमेशा दूसरे के रहम-ओ-करम पर गुजारा करना पड़ता है। लोग अपनी सहूलियते के हिसाब से इसे तोड़-मरोड़ कर जिस दिशा में चाहें उसी दिशा में लगा लेते हैं। इन तंबुओं की तरह हमारी भी कोई जमीन नहीं, कोई नींव नहीं, कोई मंजिल नहीं…!

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