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प्रोफेशनल: Professional Wife Story
Professional

Professional Wife Story: ‘ये वक्त है आने का? मनोहर से रहा न गया।
‘क्या करूं। काम ही ऐसा है? घर में घुसते हुए रागिनी ने जवाब दिया।
‘रात ग्यारह बजने को है। कौन सा काम कंपनी करवाती है जो समय से नहीं छोड़ती?
‘तुम कहना क्या चाहते हो? रागिनी की त्योरियां चढ़ गई।
‘ऐसा रोज-रोज नहीं चलेगा। अपने बॉस से कह दो कि समय से छोड़ा करे। इतनी रात छोड़ने का क्या तुक?
‘देर से आती हूं तो वे छुड़वाने की भी जिम्मेदारी लेते हैं। मैं उन्हीं की गाड़ी से आई हूं।
‘तो भी, तुम्हे समय का ख्याल रखना चाहिए।
‘मीटिंग में फंस गई थी।
‘बोल दो कि मीटिंग समय से रखा करे।
‘वे मुझे 15 लाख सालाना देते हैं, जो तुम्हारी तनख्वाह से दुगनी है। वे हमारे हिसाब से नहीं बल्कि मुझे उनके हिसाब से चलना होगा।
‘नौकरी छोड़ दो।
‘आवेश में आकर कह रहे हो। वर्ना तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं न कमाऊं तो न फ्लैट की किस्त भर पाएगी न ही कार का लोन।
‘मुझे क्या मालूम था कि उसकी इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।
‘कीमत? कैसी कीमत? मैं क्या बाजार में बिकने जाती हूं? रागिनी हत्थे से उखड़ गई।
‘मेरे कहने का यह मतलब नहीं था।
‘फिर क्या था? नौकरी तुम्हारी पसंद थी। वर्ना मैं तुम्हारी नौकरी से संतुष्ट थी। रागिनी ने जो कहा वह सत्य था। मनोहर हर हालत में प्रोफेशनल लड़की चाहता था। कई रिश्ते आए, उनमें से उसने रागिनी को पसंद किया। उस समय वह एमबीए करके एक कंपनी में मैनेजर पद पर थी। शादी के बाद उसने नौकरी छोड़ दी और दिल्ली आ गई। यहां उसकी रत्तीमात्र नौकरी की इच्छा नहीं थी। मगर मनोहर ने जिद की। कहने लगा, ‘दिल्ली में रहना है तो रुपया होना चाहिए। फ्लैट लेने हैं, आने-जाने के लिए कार खरीदनी है। बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाना है। कहां से होगा यह सब। मैं एक सरकारी बैंक का कर्मचारी हूं। मेरी आय सीमित है इसलिए तुम्हारा काम करना बेहद जरूरी है।Ó मनोहर ने इतना कुछ रागिनी के ऊपर लाद दिया कि वह दबाव में आ गई। उसे लगा मनोहर ने जितना कुछ सोच रखा है वह सचमुच में आसान नहीं था। लिहाजा उसे नौकरी करनी ही पड़ेगी। शुरू-शुरू में सब ठीक था। वह समय से घर आ जाती थी। शाम अक्सर दोनों घूमने निकल जाते थे।
बिस्तर पर आते ही रागिनी पड़ गई। मनोहर उसके करीब होना चाहता था मगर उसने मना कर दिया।
‘मुझे सोने दो। बहुत थकी हूं रागिनी उनींदी सी बोली।
‘थकी तो तुम रोज रहती हो मनोहर को उसका व्यवहार अच्छा न लगा।
‘प्लीज सो जाओ। उसने चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया। जल्द ही वह गहरी नींद के आगोश में समा गई। मनोहर कसमसाकर रह गया।
सुबह मनोहर का मूड उखड़ा हुआ था। एक तो रागिनी का अक्सर देर से आना उस पर सिर घुमाकर सो जाना। जब ऐसी ही जिंदगी जीनी थी तो क्या जरूरत थी शादी करने की? रागिनी बहुत जल्दी में थी। आज उसे सुबह नौ बजे तक ऑफिस पहुंच जाना था। सिंगापुर से कुछ डेलीगेट आ रहे थे। उनके साथ जरूरी मीटिंग थी।
‘तुम्हारी वहां क्या जरूरत है? मनोहर बोला।
‘मेरे पास तुम्हारी बकवास सुनने का वक्त नहीं। प्रोफेशन में आगे बढ़ने के लिए बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है। साड़ी ठीक करते हुए रागिनी बोली।
‘पति को भी? मनोहर चिढ़ा।
‘तुम कहां जाने वाले हो, कमाने वाली बीवी जो लाए हो। बस इतना रहम करो, सवाल करके छोड़ दो। बदले में मैं तुम्हारे हाथ में अच्छी खासी रकम लाकर देती रहूंगी।Ó
‘मैं कहूं कि मुझे सिर्फ तुम चाहिए, तब?
‘सिर्फ रात गर्म करने के लिए। सुबह तो तुम्हें 15 लाख सालाना कमाने वाली बीवी चाहिए।Ó रागिनी ने तंज कसा। ‘वैसे अब मैं काफी दूर निकल चुकी हूं। पीछे लौटना आसान नहीं।Ó बाल ठीक करते हुए रागिनी बोली।
‘क्यों नहीं आसान, नौकरी छोड़ दो।
‘उसके बाद मैं क्या करूंगी?
‘घर संभालो, बच्चे पैदा करो।
‘सब कुछ तुम्हारी मर्जी से होगा? तुम्हे पहले सोचना चाहिए था कि एक स्त्री क्या-क्या करेगी। नौकरी करे, बच्चे पाले, तुम्हें समय से नाश्ता-खाना दे। मगर नहीं तुम्हे तो प्रोफेशन लड़की चाहिए थी। जहां मेरा रिश्ता जाता लड़के वाले कहते लड़की सादा-सादा बीए है, ऐसा नहीं चलेगा। फिर मैंने एमबीए किया। उसके बाद नौकरी, ताकि मेरा रिश्ता हो जाए।Ó किंचित वह भावुक हो उठी।
मनोहर ने सपने में भी नहीं सोचा था कि रागिनी इस कदर प्रोफेशनल हो जाएगी। रागिनी कंपनी की गाड़ी से ऑफिस के लिए निकल गई। थोड़ी देर बाद मनोहर भी ऑफिस के लिए निकल गया। आज उसका मन ऑफिस में नहीं लगा। खिन्न तो काफी दिनों से था मगर जिस तरीके से रागिनी ने अपने तेवर दिखाए वह असहनीय था। यह सत्य था कि उसे कमाऊ पत्नी चाहिए थी, मगर इस कीमत पर नहीं कि उसकी अंगुलियां भी बेमानी लगे। आज यही तो स्थिति थी। जिस्म की बात तो दूर वह बालों को भी हाथ लगाने नहीं देती। वजह वही, थकी हूं, मूड नहीं है, मुझे सोने दो।
रागिनी के हेड का नाम हेमंत था, वहीं रागिनी उसकी डिप्टी हेड। उसकी खुद की कार थी। यूं तो वह अपने स्कूटी से ऑफिस जाती मगर जब देर होती तो स्कूटी वहीं ऑफिस में छोड़ देती, फिर हेड की कार से घर आती। अगले दिन हेड उसे रिसीव करके ऑफिस ले आता। रागिनी ने पांच सालों में काफी तरक्की की थी। सामान्य मैनेजर से सीधे डिप्टी हेड तक पहुंच गई और सेलरी पूरे डेढ़ लाख महीना। यह कोई आसान काम नहीं था। मनोहर खुश था। उसके पास अच्छी खासी रकम आ रही थी। मगर जिस तरीके से रागिनी में बदलाव आने लगा वह उसके लिए नागवार था। रागिनी का देर से आना। मनोहर को कोई अहमियत न देना। घर के काम में रंचमात्र दिलचस्पी न लेना। तरक्की और हेड यही रह गया था उसके लिए मुख्य। बाकी सब गौण। मनोहर जितना सोचता दिल उतना ही डूबने लगता। वह परिवार बढ़ाना चाहता था, वहीं रागिनी इन पर चर्चा तक नहीं करना चाहती थी। रागिनी पीछे लौटने वाली नहीं थी। 15 लाख सालाना किसी को काटता है? तलाक देना आसान नहीं। देने की कोशिश भी करता हूं तो अच्छी खासी आमदनी से वंचित होना पड़ेगा। वह मंझधार मे पड़ गया था। न उगलते बन रहा था न ही निगलते। रागिनी दिन-प्रतिदिन हाथ से निकलते जा रही थ। उसे सिर्फ अपने काम के आगे कुछ नहीं सूझ रहा था। बच्चे की बात करता तो कहती अभी जल्दी क्या है। कहते-कहते सात साल गुजर गए। वह आज भी बच्चे के नाम से कतराती है। धन-दौलत किस काम का अगर बच्चे ही न हो।
शाम ऑफिस से मनोहर आया तो उसका दिल उचाट था। नौकरानी ने उसे चाय नास्ता दिया। वह आठ बजे तक खाना बनाकर चली जाती। उसके बाद उसके पास सिवाय रागिनी के इंतजारी के कुछ नहीं रहता। कितनी देर टीवी देखे। वह चाहता था कि उसके पास रागिनी बैठे, बातें करे, कुछ अपनी सुनाए कुछ अपनी कहे। वह रागिनी को अपनी बांहों में भरना चाहता था। उस पर खूब प्यार बरसाना चाहता था। मगर इससे उलट वह पास बैठने से भी कतराती। मानो उसके जिस्म से बू आ रही हो। ‘क्या मैं सिर्फ नाम का पति रह गया हूं? क्या रागिनी के जीवन में कोई और आ गया है? मेरे प्रति वितृष्णा की और क्या वजह हो सकती है?Ó यह ख्याल मनोहर के जेहन में उभरे। उसकी बेचैनी बढ़ जाती है।
आज वह रात दस बजे आई। कल से एक घंटे पहले कपड़े उतारकर सीधे बेड रूम में सोने चली गई।
‘अति हो गई? मनोहर फट पड़ा।
‘मुझे सोने दो। मैं कल बात करूंगी रागिनी ने मुंह फेर लिया।
‘आज क्यों नहीं?
‘मुझे नींद आ रही है।
‘कहां से गुलछर्रे उड़ा कर आ रही हो? दिल की बात जुबान पर आ ही गई।
‘तुम भी उड़ाओ, मैंने कब मना किया। मगर अभी मुझे सोने दो। रागिनी ने कान पर तकिया रख लिया। मनोहर बड़बड़ाता रहा।
सुबह मनोहर का सिर भारी था। रागिनी हमेशा की तरह ऑफिस के लिए तैयार हो रही थी। मानो कुछ हुआ ही न हो। मनोहर तिलमिलाकर रह गया। आज रागिनी स्कूटी से नहीं गई। उसने छत से देखा कुछ दूरी पर एक कार खड़ी थी। कार में एक शख्स बैठा था। कौन हो सकता है? मनोहर के दिमाग में शक के कीड़े कुलबुलाने लगे।
‘तुम्हारे साथ कौन था? जैसे ही रागिनी ऑफिस पहुंची मनोहर ने फोन मिलाया।
‘अचानक जिज्ञासा की वजह? रागिनी के स्वर में व्यंग्य का पुट था।
‘क्या मुझे इतना भी जानने का हक नहीं?
‘हां-हां क्यों नहीं। पति जो ठहरे। रागिनी ने आगे कहा, ‘वे मेरे हेड थे। कल रात अपनी स्कूटी ऑफिस में ही छोड़ आई थी। रागिनी ने फोन काट दिया। मनोहर को काटो तो खून नहीं। हो न हो यही आदमी रागिनी को प्रमोट कर रहा है। ‘क्यों? कुछ तो वजह होगी? वर्ना इतनी जल्दी-जल्दी वह इतनी ऊंचाई पर नहीं पहुंचती। कहीं दोनों में? मनोहर चाह कर भी रागिनी का कुछ बिगाड़ पाने में सक्षम न था। पुरुष होने के नाते उसका आत्मसम्मान जागता मगर अगले ही पल हारे हुए जुआरी की तरह बैठ जाता। दो दिन बाद रागिनी ने यह कहकर उसे चौंका दिया कि वह ऑफिस के काम से सिंगापुर जा रही है।
‘अकेले? हालांकि यह सवाल बेमानी था, तो भी एक पति होने के नाते जुबान से निकल ही आता।
‘नहीं मेरे साथ हेमंत भी जा रहे हैं।
‘हेमंत! हेमंत नाम ने नाक में दम कर रखा है। मनोहर चीखा।
‘चिल्लाओ मत, वह मेरा हेड है। आज तुम जो निश्चिंत जीवन गुजार रहे हो वह सब उसी की देन है। उसी ने एमडी से मेरी सिफारिश करके यहां तक पहुंचाया है।
‘बदले में तुमने क्या दिया?
‘चलो बता देती हूं, छिपाना क्या? मैं उसकी एक्सट्रा मेटेरियल अफेयर हूं।
‘धोखेबाज।
‘कह सकते हो। आगे बढ़ने के लिए अगर वह मुझे अपनी अंकशायिनी बना लेता है तो हर्ज ही क्या है। मैं नहीं बनूंगी तो कोई दूसरी तैयार हो जाएगी। वह आगे बढ़ जाएगी और मैं मामूली सी मैनेजर बनकर रह जाऊंगी। कारपोरेट सेक्टर में आगे बढ़ने का यही फंडा है, जो तुम्हारे सरकारी विभाग में नहीं।
‘रागिनी, मैं सोच भी नहीं सकता था कि तुम इतना गिर सकती हो?
‘गिरा कौन रहा है? सफलता पतिव्रता बनने से नहीं आती। फिर ये फंडा सिर्फ स्त्री पर ही क्यों? क्या पुरुष नहीं गिरते? मैं गिरी तो चरित्रहीन और पुरुष गिरे तो पुरुषार्थ। यह अन्याय नहीं है तो क्या है। वैसे भी एक स्त्री कमाने के लिए बाहर निकलती है तो उसे यह सब सहना पड़ता है।
‘यही काम मैं करूं तो?
‘बेशक करो। तब एक स्त्री सिवाय लड़ने झगड़ने के और कर भी क्या सकती है? क्या तुम मानोगे? तुम तो यही कहोगे सब कुछ तो दिया, रहने के लिए फ्लैट, कार, गहनें, अच्छे लिबास साथ में खर्च करने के लिए रुपयें। रागिनी कहती रही, ‘मैं भी तो यही कर रही हूं। जमाना बदल चुका है। बाहरी तड़क-भड़क को ही लोग महत्व देते हैं। हम दोनों रुपया कहां से लाते हैं यह कोई नहीं देखता। वैसे भी बाहर निकलने वाली महिलाएं कितनी भी चरित्रवान हो उन पर आरोप लगते ही हैं। शादी के पहले मैं जिस कंपनी में काम करती थी वहां के पुरुष एक भी महिलाओं को लांक्षित करने से नहीं चूकते। उनका एक ही फंडा था, मिली तो ठीक वर्ना पीठ पीछे कह दिया रंडी है।Ó इतना जानने के बाद शायद ही कोई पुरुष अपनी पत्नी को अपनाए। पर यह सवाल सिर्फ स्त्री के लिए ही क्यों? पुरुष नौकरानी तक से संबंध बनाकर पति बना रह सकता है तो पत्नी क्यों नहीं। दोहरे मापदंड क्यों? सिर्फ इसीलिए न कि पुरुष कमाते हैं, लिहाजा उसे मनमानी की छूट है। तब तो रागिनी भी छूट के दायरे में आती है।
‘निकल जाओ मेरे घर से। मनोहर चीखा। मर्द होने के नाते इतना तो हक बनता है। स्त्री का तो कोई घर होता नहीं जो इतने स्वाभिमान से कह सके निकल जाओ मेरे घर से।
‘सोच लो, नुकसान तुम्हारा होगा। यह फ्लैट मेरे लोन से खरीदा गया है, बेघर तुम होगे, मुझे क्या, मैं किसी और के साथ घर बसा लूंगी। सब नहीं पूछते अपनी बीवी से कि रात कहां से बिता कर आई हो। सब कुछ जानकर भी अंजान बने रहते हैं। मैट्रोपोलिटन सिटी में रहना होगा तो दौलत चाहिए। कितना कमा लोगे जो दिल्ली में फ्लैट खरीद सको। मनोहर के पास इसका कोई जवाब नहीं था।
परसों रागिनी सिंगापुर चली गई। पांच दिन बाद आई। काफी फ्रेश लग रही थी। काफी कुछ महंगे सामान खरीद कर लाई थी। मनोहर मूर्तिवत उसे देखता रहा। जब तंद्रा लौटी तो लगा जैसे उसके भीतर कुछ मर सा गया। वह एक-एक कर उन सामानों को बटोरता रहा, जो रागिनी उसके लिए लाई थी। सचमुच महंगे थे, जो उस जैसे आम आदमी के लिए असंभव थे।
‘रागिनी, मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं।
‘सचमुच? वह मेरे गले लिपट गई। वह आगे कही, ‘तुम्हें मुझसे कोई शिकायत नहीं?
‘बिल्कुल नहीं? बस एक शिकायत थी सोचा कह दूं।
‘वह क्या? वह मेरे बदन से छिटकर दूर खड़ी हो गई।
‘हेड क्यों? एमडी क्यों नहीं? वह हंस पड़ी।
‘मैंने तुमसे झूठ बोला था। रागिनी की आंखें खुशी से चमक उठी। वह आगे कही, ‘इस बार एमडी ही था। मैंने हेड को दरकिनार करवा दिया। अब वह नहीं, मैं हेड हूं। इसके आगे मेरे पास कुछ पूछने के लिए बचा ही नहीं था। मनोहर ने अधेड़ नौकरानी को हटाकर जवान रख लिया। अब उसे रागिनी से कोई शिकायत नहीं थी। समय के साथ चलने में ही बेहतरी थी। इसे वह बखूबी समझ चुका था।

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