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जादू का तालाब-21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां बिहार
Jaadu ka Talab

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

हीनू और पुन्नू गांव आए थे। गाँव में खूब मस्ती भरे दिन गुजर रहे थे उनके। पढ़ाई, होमवर्क, प्रोजेक्ट वर्क और ग्रेड की ए बी सी से दूर निश्चिंत और मगन थे वे…। वे दादा जी के हृदय के टुकड़े थे। दादी पल-पल उनकी बलैयां लेती थीं। उनके खाने-पीने का पूरा ख्याल रखती थीं।

जैसे ही तारे आकाश में निकलते, वे दोनों दालान में बैठकर दादा जी से कहानियां सुनते। दादा जी की कहानियों में फैटम, बेताल, चाचा चौधरी,नॉडी, बॉब नहीं होते थे। होती थीं… परियां, राजा रानी की कहानियां, राजकुमार, नीला सियार, चूहे-कबूतर की दोस्ती की कहानियां…। ये सब उन दोनों के लिए एकदम नई बातें होती…मजेदार, जिज्ञासापूर्ण, संदेशपूर्ण। ये कहानियां हीनू-पुन्नू को रुलातीं, हँसातीं, डरातीं और शिक्षा भी देतीं।

आज शाम एक कहानी दादा जी की पोटली से निकलकर आई दोनों के सामने…वह कहानी थी गाँव के तालाब की।

दादाजी ने सुनाना शुरू किया-

“बच्चों, गांव के शिव मंदिर वाला तालाब देखा है न! उसकी कहानी सुनो, जो मैंने अपने दादा जी से सुनी थी।”

हीनू और पुन्नू की आँखे फैल गईं। दादा जी की कहानी चलती रही…. कहते हैं, कभी इस तालाब को बगल के बगीचे में उतरी परियों ने एक ही रात में खोद दिया था। सुबह हुई, तो यह देखकर गाँव के लोग चकित रह गये…इतना बड़ा तालाब…साफ पानी और चारों ओर पक्के घाट!

लोग डर गए इस जादुई चमत्कार से। गाँव वालों ने मिलकर बगल में एक शिव मंदिर तैयार करवा दिया। कोई भी उस तालाब का पानी नहाने में उपयोग नहीं करता था। कुछ साधु एक दिन घूमते हुए उधर से गुजरे। लोगों ने उन्हें अपने डर और तालाब बनने की कहानी सुनाई। साधुओं ने वहीं डेरा डाला और दूसरे दिन तालाब की पूजा की।

साधुओं ने तालाब में प्रेमपूर्वक स्नान किया और आंखे मूंदकर पानी में हाथ डाला, तो उनके हाथ में पीतल के कई बर्तन आ गये, जो रसोई और खाना खाने के काम आते थे।

इस करिश्मे को देखकर सभी चकित रह गये। साधुओं ने पुनः उन बर्तनों को पानी में डाल दिया।

लोगों ने साधुओं से इसका कारण पूछा, तो साधुओं ने बताया-परियों ने लोक कल्याण के लिए यह तालाब खोदा है। गांव वाले, बाहर से आये व्यापारी, साधु-महात्मा तालाब का स्वच्छ जल पियें, स्नान करें, बर्तन निकालकर रसोई बनाएं और जाते समय पुनः बर्तन को पानी में रख दें। किसी ने एक बर्तन भी चोरी की, तो फिर तालाब में कभी भी कोई बर्तन नहीं मिलेगा और तालाब सूखता चला जाएगा।

कई वर्षों तक ऐसा ही हुआ। एक बार एक लोभी व्यापारी गाँव में आया। जाते समय वह तालाब से बर्तन लेता गया। तब से यह तालाब छोटा होता गया। इसका जल गंदा हो गया। घाट टूट गए। यह किसी उपयोग के योग्य नहीं रहा।

कहानी सुनकर हीनू और पुन्नू बहुत दु:खी हुए। दादा जी का हाथ पकड़कर पुन्नू ने कहा-

“हम कभी किसी की कोई वस्तु चोरी नहीं करेंगे और सबको बताएँगे कि इससे दूसरों का बड़ा नुकसान हो सकता है।”

बच्चों को इस कहानी से बहुत बड़ी शिक्षा मिल गयी थी। दादा जी भी बच्चों को देखकर खुश थे।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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