वह याद करती है भाई का प्यार। 16 साल पहले वह भी तो कुछ ऐसी ही खुशियां मनाया करती थी। रक्षाबंधन का उसके जीवन में कितना महत्व था। रक्षाबंधन को सोचकर उसके दिल में हूक-सा उठी और उसका मन हुआ कि वह फूट-फूट कर रो पड़े। थकी-थकी निढाल उसके दिल-दिमाग सुन्न से थे। न उनमें कोई सोच भी ना ही भावना। तभी दरवाजे पर आहट हुई। गायत्री ने दरवाजा खोला, सामने विमला दीदी खड़ी थी, जो कुछ महीने पहले मानसिक अस्पताल में आई हैं। उन्होंने गायत्री को ऊपर से नीचे तक घूरा, गायत्री कांप ही गई थी। फिर बोली, क्या अंदर आने को नहीं कहोगी?

‘आइए ना’ गायत्री ने जवाब में कहा। उन्होंने गायत्री से पूछा, ‘तुम्हे यहां आए हुए कितने साल हो गए, गायत्री सोचने लगी, क्योंकि उसे कुछ याद नहीं, वह यहां कब और कैसे आई?

हां इतना जरूर है जैसा मानसिक अस्पताल के स्टाफ बताते हैं कि मैं ने जीवन के 14 साल यहां बिता दिए और उपर वाले से कोई न्याय नहीं मिला। वह बोली। गायत्री बीते दिनों में लौटती है, हर लड़की की तरह भविष्य के सुनहरे सपने लिए मैं भी ससुराल पहुंची। ससुराल पहंचते ही ऐसा लगा मेरी महत्वाकांक्षाओं के पंख कट गए हों। एक साल तक जैसे-तैसे सब ठीक-ठाक चला, लेकिन मेरे पति प्रकाश के जीवन में जीवन साथी का कोई खास महत्व नहीं था। कभी-कभी तो ऐसा लगता, उनके जीवन में यह अनावश्यक हस्ताक्षेप करने मैं क्यों आ गई?

एक-एक करके दिन अपनी रफ्तार से गुजरते जा रहे थे। प्रकाश भी मेरी तरफ से लापरवाह हो गए थे। दो चार माह के लिए कभी मायके चली जाती तो कभी ससुराल। परंतु अपने हृदय की पीड़ा को मैंने कभी किसी से नहीं कहा। मेरा दोष सिर्फ यह था कि रंग रूप देते समय ईश्वर ने थोड़ी-सी कृपणता की थी, उपेक्षा का यह दुःख मैं बहुत दिनों तक झेल नहीं पाई और मानसिक रूप से अस्वस्थ रहने लगी। आज भी मुझे वो दिन याद है जब भैया ने कहा था कि देवी मां के दर्शन करने हैं । मैंने देवी मां के दर्शन किए या नहीं। ये तो मुझे याद नहीं, लेकिन अपने आप को मानसिक अस्पताल में पाया। 14 बरस गुजारे हैं मैंने यहां।

भैया भाभी ने मुझे बोझ समझा तभी तो लेने नहीं आए। जीवन का कड़वा सच आज गायत्री की जुबान पर आ गया था। जहां तक आपका सवाल है मैं ने तो यह सुना है दीदी आप तो विश्वविद्यालय में अंग्रेजी की प्रोफेसर थी। आप यहां कैसे आई? उसने पूछा।

यह तो सच है मेरा खुद का बड़ा घर है सारे सुख-साधन मौजूद हैं। दो छोटे भाई विदेश में शादी कर वहीं बस गए। बहन से पूछना मुनासिब नहीं समझा। डर के आगे जीत है, जैसी बातें एकदम गलत है। डर सबको लगता है। डर मुझे भी लगता है, तन्हाई से बड़े शहरों की व्यस्त दिनचर्या से उपेक्षित वृद्धों की व्यथा से। अकेलेपन का एक तल्ख अनुभव मैंने भी झेला है। कभी-कभी रोती भी थी। साधारण भाषा में इसे पागलपन मानते हैं। जबकि मनोचिकित्सक डिप्रेशन मानते हैं।

सवाल तो यह है आखिर समाज रिश्तेदार, भाई-भाभी पड़ोसी हमें किस नजर से दिखते हैं? क्या पता हमारी इन्हीं हरकतों को फिर से पागलपन करार दिया जाए। आज एक ऊंचाई एक प्रतिष्ठा और एक स्थापित जिंदगी जी रही विमला दीदी को गायत्री का दुःख कहीं न कही से अपना दुःख लगा। तभी दरवाजे पर खटखट हुई।… शायद दोपहर के खाने का समय हो गया था।

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