Hindi Kahani: मनमोहन सिंह छोटे व्यापारी थे और एक छोटी दुकान से अपने बीवी बच्चों का पेट पाल रहे थे, उसी दुकान में एक राजू नाम का लड़का भी मजदूरी करता था पढ़ने लिखने में राजू ठीक था उसके घर की स्थिति सही नहीं थी इसलिए वह मनमोहन सिंह के यहाँ नौकरी करके अपना गुजारा करता था जैसे- जैसे समय बीतने लगा वैसे-वैसे मनमोहन सिंह को उसे लड़के के साथ लगाव होने लगा और राजू भी मनमोहन सिंह के ऊपर जान देता था उनकी डाँट को भी प्यार से सह लेता था एक दिन उसको पता चला कि राजू अपने चाचा चाची के साथ रहता है उसके माता-पिता नहीं है और उसकी चाची चाचा उसको खाना पीना नहीं देते मारते पीटते हैं तभी तो पढ़ने की उम्र में बच्चा 12 घंटे दुकान में काम करता है , शाम मनमोहन सिंह अपने घर में खाना खा रहे थे तब उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि एक लड़का राजू मेरी दुकान में काम करता है बहुत ही नेक और ईमानदार लड़का है, जाने क्यों उससे मुझे इतना लगाव हो रहा है बिन माँ बाप का बच्चा है क्यों ना उसको हम अपने घर में अपना बच्चा मान ले, ममता कभी खाली नही जाती तुम उसकी सगी माँ न सही किराये की माँ तो बन सकती हो न, उनकी पत्नी ने भी हामी भारी और उन्होंने दुकान देखने के साथ-साथ राजू का दाखिला एक स्कूल में करा दिया|
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और उसे अपने बेटे की तरह मान सम्मान देने लगे, मनमोहन सिंह का खुद का भी एक बेटा था उन्होंने उसको पढ़ने के लिए विदेश भेजा था बेटी उनको कोई थी नहीं तो सारी जमा पूंजी बेटे की पढाई में लगा दी.. अब मनमोहन जी का जीवन आराम से चल रहा था धीरे-धीरे उनका बेटा भी पढ़ाई के बाद बड़ी नौकरी में आ गया और इधर राजू भी छोटी सी नौकरी पकड़ लिया समय भी इतने लगा और एक दिन अचानक मनमोहन सिंह की तबीयत खराब हुई और वह गुजर गए क्योंकि बहुत ज्यादा कमाई थी नहीं इसलिए अपनी पत्नी के नाम बहुत कुछ छोड़कर नहीं जा पाए, पति के जाने के बाद गायत्री जी पूरी तरह से बेटे बहू पर निर्भर हो गई थी मनमोहन जी के जाने के बाद कुछ दिन के लिए वह अपने बेटे के घर विदेश चली गई लेकिन क्योंकि शहर में पढ़ने वाला बेटा और उसकी मॉडर्न बहू उन्होंने गायत्री जी को बात-बात पर डांटना और अपने बच्चों की देखभाल करने वाली आया समझ लिया था अकेले गायत्री जी बहुत दुखी रहने लगी थी मन में सोचती कि मैंने क्या अपराध किया है मेरे बेटे बहू इस तरह मेरे साथ व्यवहार कर रहे हैं बहू उनकी किटी पार्टी करती है बेटा दिन भर ऑफिस में रहता है शाम को आता तो खाना खा के सो जाता, राजू भी अपने गांव चला गया था और वहां पर उसकी शादी हो गई थी अपनी पत्नी के साथ वह आराम से रह रहा था दिन राजू की पत्नी ने कहा कि आपको जिन्होंने पाल पोस के बड़ा किया है उन माता-पिता के दर्शन मुझे भी करवाइये, राजू ने कहा पिता है नही माता जी तो विदेश में रहती है कैसे उनको यहां गांव में बुलाऊँ, पर पत्नी जिद करने पर राजू ने किसी तरह से चिठ्ठी लिखी ,
“सादर प्रणाम भैया माता जी से बहुत दिन से मिला नही आपकी इजाजत हो तो माँ को कुछ दिन के लिए यहाँ भेज दीजिये आपका राजू.! ..
गायत्री जी के बेटे को चिठ्ठी मिली तो उसके सर से तो बोझ उतर गया और उसने सोचा कितनी जल्दी माँ को यहां से हटाया जाए… तुरन्त राजू को बुला लिया और माँ को राजू के साथ भेज दिया ,,
गायत्री जी गाँव आ गई और राजू के साथ रहने लगी… अब यहाँ गायत्री जी घड़ी में सात बजे तक अपना खाना खा पी कर इस समय अपने रामायण पाठ कर सोने लगती हैं…..
रोज सुबह उठकर गाँव घूमने जाती हैं आज सुबह जब गायत्री जी उठी तो राजू और उसकी पत्नी गायत्री जी के पैर के पास बैठे थे
राजू अपनी महीने की कमाई और बहू घर की चाभी लिए खड़ी थी गायत्री जी ने दोनो को गले लगाया और रोने लगी राजू ने गायत्री जी को चुप कराते हुए कहा माजी ये सब आपका है आप यही रहिये हमेशा हमारे पास राजू की पत्नी चाभी का गुच्छा देते हुए बोली माजी ये आपका घर है अब सभालिये इसको हमको अपनी ममता की छाव में रखिये..
गायत्री जी दोनो बेटे बहू को गले लगाते हुए मनमोहन जी को याद करते हुए बोले जा रही थी आप सही बोलते थे किराये की माँ बनकर रहोगी तो बेटे का प्यार मिलेगा आज राजू ने मेरी अपनी संतान से भी ज्यादा मान दिया है.
मैं तुम दोनो को छोड़ कभी नही जाऊंगी आज मन से मनमोहन जी के राजू को गायत्री ने अपनाया था और घण्टों बाते की थी…
आँखों में आसू भरे गायत्री जी मनमोहन जी की तस्वीर के पास बैठी रही जिसको राजू ने भगवान के कमरे में लगाया था…
गायत्री जी के जीवन में मनमोहन जी की कमी तो भले ही थी पर राजू और उसकी बहू के प्यार ने उनका बुढ़ापा खुशियों से भर दिया था दिन भर राजू की बेटी के साथ खेलने में गायत्री जी अपना सारा दुःख भूल चुकी थी…
