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बंजर का बीज-  गृहलक्ष्मी की कहानियां: Story in Hindi
Banjar Ka Beej

Story in Hindi: रात के करीब बारह बजे होंगे, मैं अपने बिस्तर पर लेटी करवटें बदल रही थी. बगल में उमेश मजे से खर्राटे भर रहा था. लेकिन नींद का दूर-दूर तक कोई नामों निशान नहीं था. मेरी नाज़ों की पाली बिगड़ैल नींद को जब तक अपना कमरा, अपना बिस्तर और अपना तकिया ना मिले, वह मुझे यूं ही सताती है. 

मैं बरसों बाद अपनी सासू माँ के घर, यानी अपनी ससुराल आई थी. ये वही घर है जिसके आँगन में कभी मेरी डोली उतरी थी. ये वही कमरा और वही सपनों का पलंग है जहाँ से अरसे पहले मैंने अपने  विवाहित जीवन की शुरुआत की थी. 

 मैंने अपने वैवाहिक जीवन के शुरुआती कुछ साल यहीं बिताए और फिर उमेश की नौकरी के चलते हमें यहाँ से जाना पड़ा. अब हालत ये है कि घर गृहस्थी की व्यस्तताओं की वजह से कई-कई साल में आना हो पाता है. यही कारण था कि मेरी निंदिया रानी इस पलंग और इस बिस्तर को पहचान नहीं पा रही थी. मैं एक बार फिर अपनी नींद को बहलाने, फुसलाने की कोशिश कर ही रही थी कि तभी पड़ोस के घर से आती कुछ आवाज़ें मेरे कानों में पड़ी।

   इस कॉलोनी में बनी समान आकार की छोटी-छोटी कोठियां एक दूसरे से इस कद्र सटी हुई हैं कि  किसी भी घर में सामान्य से थोड़ी ज्यादा आवाज हो, तो वह दोनों तरफ के घरों में सुनाई देती ही है.  अब तो वैसे भी रात का वक़्त था.        

 मैं नींद को भूल, इन आवाजों को ध्यान से सुनने की कोशिश करने लगी. मुझे लगा जैसे कोई लड़ाई-झगड़ा हो रहा है. कुछ देर तक तो मैंने इस शोर को अनसुना करके फिर अपनी सोने की कोशिश जारी रखी, लेकिन जब इस शोरगुल में मार-पीट की आवाज़ें भी शामिल होती सी लगीं तो मैं परेशान होकर पैरों में चप्पल डालकर अपने कमरे से बाहर निकल आई. 

बराबर वाले कमरे से मम्मी जी भी बाहर निकल आई और कुढ़ते हुए बोली-

‘लो शुरू हो गया इनका महाभारत. अब ना तो ये खुद सोऐंगे ना हमें ही सोने देंगे’. 

‘मम्मी जी पड़ोस के इस घर में तो गुप्ता आंटी रहतीं थीं ना?’- मैंने अपनी याददाश्त पर जोर डालते हुए पूछा. 

‘हाँ बेटा, वही रहती है’।– मम्मीजी ने बताया. 

‘जहां तक मुझे याद है, वे तो यहाँ अपने पति के साथ रहती थी. उनके सभी बच्चों की तो शादी हो गई थी और वे सब यहाँ से चले गए थे, तो फिर आंटी झगड़ा किसके साथ कर रहीं है और ये दूसरी औरत की आवाज किसकी है?’- मैंने अपनी जिज्ञासा प्रकट की. 

‘हाँ बेटा, बच्चे तो सब अपनी-अपनी गृहस्थी में रच बस गए है, बस वो जो इनका छोटा लड़का है ना, अनुपम..’ 

‘वो ही ना जिसे सब अन्नू बुलाते थे?- मैंने मम्मीजी की बात बीच में काटकर पूछा’. 

‘हाँ वही. ये उसी की बीवी है, कणिका. वो ही रहती है यहाँ इनके साथ. उसी के साथ रोज जंग होती रहती है, गुप्ता आंटी की.’ – मम्मी जी ने परेशान होकर बताया. 

‘लेकिन मम्मीजी, जब मै पिछली बार यहाँ आई थी तब तो आपने बताया था कि अन्नू तो कहीं विदेश में सैटल हो गया’. – मैंने अपनी शंका जाहिर की. 

‘हाँ बेटा, वो तो बाहर ही रहता है, वो क्या नाम है उस देश का, हाँ – डेनमार्क.’ – मम्मीजी ने अपनी जागती सोती याददाश्त पर जरा जोर डालकर बताया. 

‘तो फिर उसकी बीवी यहाँ क्यूँ रहती है? और उसका तो एक बेटा भी हुआ था ना?’- मेरी याददाश्त के पन्ने एक-एक कर खुलने लगे. 

‘हाँ है ना, बेटा भी यहीं है. दो साल का हो गया है. होने को तो सब सुख है, पर इस बहु को तो किसी की कदर ही ना है. इनकी ये बहु ही कुछ टेढ़ी आई है’. – मम्मी जी ने लंबी साँस लेकर  अपना एक तरफा मत स्पष्ट कर दिया. 

‘टेढ़ी, वो कैसे?’- मैंने उत्सुकता से पूछा. 

‘वो क्या है ना बेटा, जब अन्नू के साथ कणिका ना निभा सकी, तभी तो वह गुस्से में आकर उसको मैके छोड़ गया. अब अपने पति को खुश रखना, उसका ध्यान रखना तो बहु का ही फर्ज है ना? कोई सास ननद तो थी ना, वहाँ विदेस में इनके साथ. अब एक पति से भी ना बना सके तो कमी तो बहु में ही हुई ना?’- मम्मीजी की गवाही से मुझे एक औरत की बजाय एक सास झलकती सी लगी. वे शायद गुप्ता आंटी के शब्द दोहरा रहीं थीं.   

‘तो फिर कणिका अपने मैके से यहाँ कैसे आ गई, अपने सास ससुर के पास?’- मैंने कहानी के तारों को जोड़ने की कोशिश की. 

‘ज्यादा तो ना पता बेटा पर मिसेज गुप्ता ही बता रही थी, के कणिका के माँ बाप आकर उसे यहाँ छोड़ गए और कहने लगे कि ‘हम तो कन्यादान कर चुके हैं, अब तुम जानो या जाने तुम्हारा बेटा. हम बीच में ना हैं’।- मम्मीजी ने बतलाया.  

इस बीच पड़ोस से आती आवाज़ें कुछ कम हुई और मम्मीजी उठकर अपने कमरे की ओर जाते हुए बोली- 

‘जा बहु, अब तू भी सो जा. यूं भी आधी से ज्यादा रात तो बीत ही चुकी है.’

मैं अपने बिस्तर पर जा लेटी और कणिका के बारे में सोचते-सोचते कब नींद मुझ पर मेहरबान हो गई, पता ही नहीं चला.  

सुबह काफी देर से आँख खुली और जल्दी-जल्दी नित्य कर्म से निवृत होकर मैं नाश्ते की मेज पर पहुंच गई. 

मम्मीजी और उमेश नाश्ता कर रहे थे और मम्मीजी, उमेश को रात वाली घटना का विवरण सुना रहीं थी. उमेश हैरान था कि इतना शोर मचा लेकिन उसे पता भी नहीं चला. 

मम्मीजी ने बताया कि पाँच साल हो गए हैं, अन्नू और कणिका की शादी हुए, लेकिन एक दिन भी किसी ने उन्हे चैन से रहते नहीं देखा. जब वे दोनों डेनमार्क चले गए थे तब वहाँ से भी दोनों के झगडों की ही खबरें आती रहतीं थीं.

इसी बीच उनका एक बेटा भी हो गया, लेकिन बेटे के आने से भी अन्नू और कणिका के संबंधों में कोई सुधार नहीं आया. एक बार गुप्ता जी और उनकी मिसेज भी कुछ दिनों के लिए इनके पास डेनमार्क गए थे. लेकिन उसके बाद तो झगड़ा इतना बढ़ा कि अन्नू आकर कणिका को उसके मैके ही छोड़ गया.   

मैंने फिर अपनी जिज्ञासा को हवा दी और मम्मीजी से पूछा-

‘मम्मीजी, ये गुप्ता आंटी की बहु कणिका कुछ पढ़ी-लिखी नहीं है क्या?’

‘पढ़ी-लिखी तो है. मिसेज गुप्ता ने ही उसकी शादी के समय सबको बताया था कि इंजीनियर बहु आ रही है. अब ये तो भगवान ही जाने कि कौन सी इंजीनियरिंग करी है और कहाँ से करी है’. – मम्मीजी ने अपना पल्लू झाडा.    

‘बड़ी ताज्जुब की बात है, वैसे वह चाहती क्या है? किसी ने पूछा नहीं उससे?’- मैंने स्थिति को समझने की कोशिश करते हुए पूछा. 

‘ हम क्या जाने बेटा के वो, क्या चाहती है? पराए फटे में हम तो पैर फँसाना ना चाहते. पड़ोस का मामला है, फिर हमारा इतना पुराना संबंध है गुप्ता परिवार से साथ. हमें तो जितना मिसेज गुप्ता बता देती हैं, हम तो बस उतना ही जाने हैं. बहु के साथ तो हमारी कभी बातचीत होती नहीं है. यूं भी वो कौन से हमारी उम्र की है. तुम लोग यहाँ होते तो तुम्हारे पास उठती बैठती भी.’– मम्मीजी ने अपनी स्थिति का खुलासा किया.       

‘हूँ, बात तो बड़ी अजीब है. एक पढ़ी लिखी लड़की भला ऐसी कैसे हो सकती है’।– मैंने कुछ सोचते हुए कहा. 

‘तुम्हें क्या लेना है यार, उनका मामला है वे खुद संभाल लेंगे. अब तुम इस मामले को भी अपना प्रोजेक्ट मत बना लेना. यूं भी तुम्हें हर समय समाज सेवा का बुखार चढ़ा रहता है’।- मुझे सोच में डूबे देखकर उमेश थोड़ा चिढ़कर बोला. 

तभी उमेश का फोन बजा और वह टेबल से उठकर अंदर चला गया. उसके उठते ही मम्मीजी मेरे थोड़ा नजदीक खिसकते हुए फुसफुसा कर बोली-

‘एक बार तो मिसेज गुप्ता ये भी कह रहीं थीं के, कणिका तो घर बसाना ही नहीं चाहती. इसका तो किसी और के साथ चक्कर चल रहा है.’

‘ओ, तो ये बात है.’- मुझे मामला कुछ समझ में आता सा लगा लेकिन अगले ही पल कुछ सोचकर मैं बोली-

‘लेकिन मम्मीजी अगर ऐसा है, तो फिर वो यहाँ आई ही क्यूँ?’  

‘क्या पता बेटा, उसकी माया वोही जाने.’–  मम्मीजी ने ऊपर की ओर देखकर हाथ जोड़ दिए और उठ खड़ी हुई. मै भी घड़ी की ओर देखकर फौरन खड़ी हुई और बुदबुदाई ‘हे भगवान कितनी देर हो गई. वक़्त का पता ही नहीं चला. आज तो हमें अपने दोस्तों से लंच पर मिलना है और उससे पहले ढेर सारी शॉपिंग भी निबटानी है’.        

शाम को शॉपिंग बैग्स से लदे फ़दे जब हम दोनों घर पहुंचे तो, थककर चूर हो चुके थे. मम्मीजी ने हमें देखते ही गरमागरम चाय बनवाई और हम सब साथ बैठकर चाय पीते हुए दिन भर की बातें करते रहे. चाय पीकर उमेश उठ खड़ा हुआ और बोला-

‘आज मौसम कितना सुहावना है. मैं तो इतने अच्छे मौसम में घर के अंदर नहीं बैठ सकता’. 

‘तो फिर कहाँ बैठोगे?’ – मैंने चुटकी ली.   

‘कहीं नहीं बैठूँगा, मैं तो सैर करने जा रहा हूँ. तुम आना चाहो तो आ जाओ.’– उसने पूछा.  

मैंने मम्मीजी की ओर देखा तो वे बोली-

‘जाओ बेटा घूम आओ. देखो तो सही जाकर, हमारी कॉलोनी का पार्क कितना अच्छा बन गया है’. 

हम दोनों सैर करते हुए अपनी गप्पों में खोए थे और कल रात की घटना को करीब-करीब भूल चुके थे. तभी सामने से एक लड़की आई और मुस्कुराकर बोली –

‘नमस्ते भाभी, नमस्ते भैया’.  

इस सलोनी सी लड़की को हम दोनों हैरानी से देखने लगे. लंबी,पतली इस लड़की को सुंदर कहा जा सकता था. आसमानी रंग के कुर्ते और चूड़ीदार में उसके लंबे चमकीले बाल हवा में लहराते बहुत प्यारे लग रहे थे. हमारे चेहरे पर परिचय का कोई चिन्ह ना आता देखकर, वह झेंप गई और बोली-

‘आपने शायद मुझे पहचाना नहीं?’

‘माफ करना, क्या हम एक दूसरे से पहले मिल चुके हैं?’- मैंने अपनी याददाश्त पर जोर डालते हुए उससे पूछा. 

‘जी मैं कणिका, आपके पडोसी अनुपम गुप्ता यानि अन्नू की पत्नी’।– वह नजरें झुकाकर बोली. 

‘ओ हो, तो तुम हो कणिका.’ – मैंने ‘तुम’ शब्द पर अपनी पूरी हैरानी उलेड दी फिर उसके चेहरे की असहजता देखकर मैंने अपने आश्चर्य को थोड़ा दबाया और कहा –

‘वो हम कभी मिले नहीं हैं ना, इसलिए पहचान नहीं सके, लेकिन मम्मीजी से तुम्हारे बारे में  काफी कुछ सुना है.’– मैंने नकली सी खुशी झलकाई. 

‘अच्छा तो नहीं सुना होगा?’- वह अपने में सिमटती सी, दबी आवाज में बोली. 

‘अरे नहीं ऐसा कुछ नहीं है. और बताओ कैसी हो और छोटा अन्नू, आई मीन तुम्हारा बेटा कैसा है?’

 हम दोनों औरतों को बातों में मशगूल देखकर, उमेश हाथ हिलाते हुए लंबे-लंबे डग भरता आगे निकल गया और कणिका मेरा हाथ पकड़कर एक बैंच की ओर इशारा करके बोली-

‘भाभी क्या आप थोड़ी देर मेरे साथ बैठ सकती है?’

‘हाँ हाँ, क्यूँ नहीं. पर बात क्या है?’- मैंने हैरानी से पूछा

‘भाभी मैंने सुना है कि आप औरतों के किसी एन.जी.ओ.से जुड़ी हैं. क्या आप मेरी कुछ मदद कर सकती हैं?’- इधर-उधर सशंकित नज़रों से देखते हुए उसने पूछा.    

‘वो एन.जी.ओ. मेरी फ्रेंड चलाती है, मैं भी कभी-कभी उसकी मदद कर देती हूँ. लेकिन प्रॉबलम क्या है?’- मैंने पूछा. 

‘सब बताऊँगी भाभी, लेकिन अभी नहीं. कल इसी वक़्त इसी पार्क में मुझसे मिलिये प्लीज? अभी मम्मीजी घर में है. कल मम्मीजी और पापाजी को दीदी के घर जाना है.’– कहकर कणिका याचना भरी नज़रों से मेरी ओर देखती हुई जल्दी से उठकर चल दी.  

‘ठीक है.’-  कहते हुए हम इस तरह अलग-अलग दिशा में चल दिए जैसे एक दूसरे को जानते ही ना हों. 

रात भर मै यही सोचती रही कि कणिका मुझे क्या बताना चाहती है? और मुझे ही क्यूँ? मैं तो उसे ठीक से जानती भी नहीं. 

फिर इतनी स्मार्ट लड़की भला अब तक कुछ भी क्यूँ नहीं कर पाई? इस सारे मामले में अगर कोई पीड़ित है तो वो कौन है? कणिका? उसके सास ससुर या फिर अनुपम उसका पति?  

सुबह उठकर मैं चाय पीते हुए अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए मम्मीजी से पूछ बैठी-

‘मम्मीजी ये कणिका की प्रॉबलम क्या है? वह आखिर चाहती क्या है?’

‘क्या पता बेटा? मियां बीवी के बीच की सच्चाई को कोई तीसरा भला कैसे जान सके है? इधर अन्नू कहे है के कणिका उसके साथ रहना ना चाहवे  और उधर कणिका कहे है के अन्नू उसे अपने साथ रखना ना चाहवे. भगवान जाने कौन सही है और कौन गलत? लेकिन जिस दिन से कणिका यहाँ आई है, पूरी कालोनी की नींद हराम हो गई. कभी दिन भर सबको बिन पैसे का तमाशा देखने को मिलता है तो कभी रातों की नींद हराम हो जाती है. हमारा घर तो बिल्कुल उनके घर से लगा हुआ है इसलिए एक-एक बात सुनाई देती है.’ – मम्मीजी ने कणिका के बजाय अपनी स्थिति बताई. 

‘तो मम्मीजी आपको क्या लगता है, किसकी ज्यादा गलती है?- मैंने वापस उन्हे मुद्दे पर लाते  हुए पूछा. मैं कणिका का पक्ष सुनने से पहले अपने एक मात्र सोर्स से कुछ जानकारी हासिल करना चाहती थी. 

‘क्या पता बेटा. हमारी बात तो कणिका के सास-ससुर से ही ज्यादा होवे है और वो तो बहु का ही कसूर बतावे है. झगड़ों में भी पहले तो बहु की आवाज कम सुनाई देवे थी लेकिन अब तो वो भी एक के बदले चार सुनावे है. फिर ना तो वह पति के मन में जगह बना सकी ना ही सास ससुर के मन चढ़ी. हमें तो लगे है के बहु ही तेज है’. – मम्मीजी ने अपना विचार बताया. 

‘तो फिर आपके हिसाब से, बहु की ही गलती है?’- मैंने कन्फर्म करना चाहा. 

‘ऐसा ही लगे है मुझे तो. वरना तू ही बता और भी घरों में बहूऐं है और जहां चार बर्तन होवे  हैं वो खड़कते भी हैं लेकिन ऐसी झगड़ालू, रोने पीटने वाली और रोज मुहल्ला जमा करने वाली बहु हमने तो कहीं ना देखी.’ – मम्मीजी ने अपने विचार को न्यायसंगत ठहराते हुए कहा.  

तभी उमेश ने कमरे में प्रवेश किया और मुझे घड़ी दिखाते हुए बोला-

‘अब तुम सास बहु का कणिका पुराण खत्म हो गया हो, तो नाश्ता खत्म करके तैयार होने चलें. हमें बारह बजे सी.पी. भी पहुंचना है.’

‘ओ हाँ, मैं तो भूल ही गई.’ – कहते हुए मैंने जल्दी-जल्दी नाश्ता निबटाया और तैयार होने दौड़ी. 

शाम तक थकान से पस्त होकर जब हम घर पहुंचे तो मम्मीजी घर पर नहीं थीं. मैंने चाय बनवाई और अपना-अपना कप लेकर हम दोनों सोफ़े पर फैल गए. चाय पीकर उमेश तो आराम करने चला गया लेकिन मुझे कणिका से मिलने की बात याद थी सो मैं पार्क में जा पहुँची. 

वहाँ मैंने कल वाली बैंच पर कणिका को उसके बेटे सहित मेरा इंतजार करते पाया. औपचारिकताओं में समय नष्ट न करके, मैंने सीधे मुद्दे पर आते हुए पूछा –

‘हाँ कणिका, बोल क्या कहना चाहती है?’ 

‘भाभी आपने मेरे बारे में बहुत कुछ सुना होगा और आई एम श्योर कुछ भी अच्छा नहीं सुना होगा. मेरे बारे में पूरी कॉलोनी की ऐसी ही राय है’।- वह आत्मग्लानि से भर कर बोली. 

‘वो सब तू छोड़, मुझे तो ये बता कि जब तेरे सास-ससुर की तुझसे बनती भी नहीं है तो फिर तू यहाँ रहकर क्यूँ अपनी और उनकी ज़िंदगी खव्वार कर रही है?’- मैंने बिना किसी लाग लपेट के सीधा अटैक किया. 

‘आपने बिल्कुल सही कहा भाभी. शादी के बाद हर लड़की को अपने पति के साथ रहना चाहिए वरना वो शादी ही क्यूँ करती है.’ – कणिका ने मेरी बात का समर्थन किया.  

‘वही तो, अन्नू वहाँ अकेला है. उसका ध्यान रखने वाला वहाँ कौन है भला? यूं भी जवान जहान मर्द को कहीं यूं अकेले छोडा जाता है. फिर वो अपने बच्चे को भी तो मिस करता होगा और तू ही कौन से यहाँ सुखी है.’ – मैंने सारे पहलूओं को एक साथ ही उलेडते हुए कहा. 

‘बिल्कुल ठीक भाभी, काश मेरी ज़िंदगी का समीकरण भी इतना ही सीधा और सरल होता जितना आपके अनुसार सबकी ज़िंदगी का होता है’. मैं उस सवाल का क्या करूँ, जिसका जवाब ही मेरे नसीब में नहीं लिखा. पिछले पाँच साल से मैं अपने अनुभव की किताब का हर पन्ना खंगाल रही हूँ लेकिन मेरे ‘क्यूँ’ का जवाब कहीं नहीं मिलता’ – कणिका की आँखों से टपकता दर्द कराह उठा.  

‘कैसा सवाल? कौन सा ‘क्यूँ’?’- अपनी अपेक्षा के विपरीत सच्चाई सुनकर मैं थोड़ी बिदक गई. मेरी अब तक की जानकारी के मुताबिक, मैं तो कणिका को कटघरे में खड़ा कर चुकी थी.   

‘सवाल ये भाभी, कि मेरी शादी ये कहकर अनुपम से की गई थी कि शादी के बाद मैं भी जॉब करूँगी और हम एक आम पति-पत्नी की तरह मिल जुलकर अपनी गृहस्थी चलाएंगे’।– कणिका ने अपना जख्म खोलना शुरू किया.   

‘हाँ तो, ये तो ठीक है. कौन रोकता है तुझे ये सब करने से?’- मैंने हैरानी से पूछा. 

‘वही जिसके रोकने से मुझे सबसे ज्यादा फर्क पड़ता है.’ – कणिका नजरें झुकाकर बोली.  

‘अन्नू यानी अनुपम?’

‘जी, उसे ना तो ये शादी चाहिए, ना ही बीवी. उसने तो अपने माँ बाप के दबाव में आकर मुझसे शादी की थी. वह मुझे अपने साथ रखना ही नहीं चाहता. इसीलिए उसने मुझे वहाँ डेनमार्क में नौकरी भी नहीं ढूँढने दी. अगर नौकरी मिल जाती तो मुझे वहाँ रहना पड़ता, जो वह हरगिज नहीं चाहता था.’ – कणिका के बरसों से बंधे जख्म रिसने लगे.  

‘हाँ तो, तुम्हें वहीं रहना चाहिए था और जो भी प्रॉबलम हो, वह तुम दोनों को मिलकर सॉल्व करनी चाहिए थी. वैसे भी पति पत्नी की प्रॉबलम्स को तीसरा व्यक्ति तो सिर्फ बढ़ा ही सकता  है. सॉल्व तो वे ही दोनों कर सकते हैं’. – मैंने समझाने की कोशिश की.  

‘पर भाभी मेरी क्या प्रॉबलम? प्रॉबलम तो अनुपम की ही है. मेरे वहाँ रहने से वह खुलकर अय्याशी नहीं कर पाता. उसकी आवारागर्दी पर अंकुश लग जाता है, उसे घर आना पड़ता है. भाभी, वो किसी खूँटे से बंधने वाला जीव है ही नहीं. उस आजाद परिंदे को गृहस्थी का पिंजरा रास नहीं आता. इसीलिए मुझपर झूठे सच्चे आरोप लगाकर मुझे बहाने से इंडिया छोड़ गया और फिर मुड़कर भी नहीं देखा.’ – कणिका की सूनी-सूनी आँखों ने कहीं दूर शून्य में देखते हुए कहा. 

‘और उसके माता-पिता यानी तेरे सास ससुर? वे कहाँ हैं इस सब में? उनका क्या रोल है?’  

‘सब उन्ही के तो बोए बीज हैं भाभी. उन्हे तो सारी कहानी का पहले से पता था. लेकिन अब भी अपने बेटे की कमियाँ छुपाने के लिए मुझमें ही कीड़े निकालते रहते है. ना अपने बेटे को मुझे बुलाने के लिए कहते हैं ना मुझे शांति से यहाँ जीने देते हैं. सोचते होंगे कि एक दिन मैं ही इनके अत्याचरों से तंग आकर भाग खड़ी होऊँगी और मेरे चरित्र के बारे में जो गंदगी ये लोग फैला रहे है वह खुद-ब-खुद सिद्ध हो जाएगी’. – कणिका का गुबार उफान पर था.   

‘हूँ, हो तो सकता है.’ – मैंने पहली बार इस तरफ से पिक्चर को देखा.    

‘और इसी अभियान के तहत, सारी कॉलोनी में मुझे बदनाम कर रखा है कि मेरा मन कहीं और लगा है.’ – अपमानित सी कणिका ने भरे गले से कहा.  

‘तो क्या ऐसा नहीं है?’- मैंने उसकी आँखों में झाँककर पूछा. 

‘आप ही सोचो भाभी, अगर मेरी लाइफ में कोई और होता तो मेरे मैके में ही तो होता. फिर मैं यहाँ क्यूँ आती इनके जुल्म सहने को?’ 

‘तो क्या सच में कोई नहीं है?’- मैंने फिर पूछा. 

‘कोई नहीं है भाभी, मैं अपने बच्चे की कसम खाकर कहती हूँ.’ – एक सच्चाई की आभा कणिका के चेहरे पर साफ झलक रही थी. 

‘तो फिर भी तेरे सास-ससुर अनुपम को नहीं समझाते?’- अब मेरी तवज्जो उसके सास-ससुर यानी गुप्ता और मिसेज गुप्ता जी की और मुड़ी.  

‘वे तो धृतराष्ट्र ही तरह पुत्र मोह में अंधे है भाभी. जिस बहु को वे बेटे को सुधारने के लिए लाये थे, अब वही बुरी हो गई है. बहु ना हुई, सुधारगृह हो गई’।– कणिका की झुंझलाहट बह निकली. 

‘और तुम्हारे माता-पिता. वे क्या चाहते है इस स्थिति से?’- मैंने स्थिति का चौतरफा जायजा लेते हुए पूछा.   

‘वे क्या चाहेंगे भाभी? उन्होंने तो अपनी सारी जमा पूंजी लगाकर मेरी शादी कर की. भर-भरकर दहेज दिया, सोचा उनकी बेटी को किसी चीज की कमी ना रहे. लेकिन उस कमी के बारे में नहीं सोचा जिसके बिना उनकी बेटी के घर का अस्तित्व ही नहीं है. पति- पत्नी के प्यार, विश्वास  और साथ की बुनियाद पर हर घर खडा होता है भाभी. पर मेरा घर तो कार, टी वी, फ्रिज, सोफ़ा सैट के दहेज पर खड़ा किया गया था.’ – उसके चेहरे पर दर्द की अनेक रेखाएं एक साथ उभर गईं. 

‘पर अब इतना कुछ होने के बाद भी, उन्होंने तुझे यहाँ क्यूँ भेज दिया?- मैंने थोड़ा और खोदा. जानना चाहती थी कि साफ पानी के स्त्रोत तक पहुँचने के लिए कितना नीचे उतरना होगा’.   

‘मेरे पापा को तो अब भी लगता है कि शायद इस राख में कहीं कोई दबी चिंगारी निकल आए. मैं उन्हे कैसे बताऊँ की वे अपने सारे बीज बंजर भूमि में बो रहे हैं. अपनी बेटी के जिस घर को वो बसाना चाहते हैं, वह तो बना ही नहीं है.’ – निराशा के गहरे कुए से कणिका बोली.  

इसके साथ ही कणिका ने अपने सोते हुए बच्चे को प्यार से सहलाया और उठकर घर की ओर चल पड़ी. जाते जाते मेरी ओर देखकर याचना भरे स्वर में बोली- 

‘भाभी, प्लीज हेल्प मी’. 

घर आकर भी कणिका की बातें मेरे ज़हन में घूम रहीं थीं. 

क्या वह सच कह रही है? लेकिन उसके झूठी होने का कोई कारण नहीं मिल रहा था. फिर सालों से महिलाओं के साथ काम करते हुए मुझे सच झूठ की इतनी पहचान तो हो गई थी, और कणिका झूठ नहीं बोल रही थी. 

रात को अपने बैड पर लेटी हुई मैं कणिका की समस्या में गले तक धँसी हुई थी, तभी उमेश ने कमरे में प्रवेश किया और मेरे सोच में डूबे चेहरे को देखकर बोला- 

‘तुमने आखिर कणिका के किस्से को खुद पर हावी कर ही लिया ना? हम यहाँ छुट्टियों पर आए हैं यार, थोड़ा तो चिल करो.’

अब मैं उसे कैसे बताऊँ की मेरी एक छुट्टी की कीमत पर अगर किसी बच्चे को अच्छी परवरिश और औरत को सम्मानजनक राह मिल जाए, तो सौदा बुरा नहीं है. लेकिन ये होगा कैसे? ऐसा कौन है जो बैसखियों पर चलती कणिका को अहसास दिलाए कि उसके पास भी पैर हैं. उसे बताए कि वह रेगिस्तान में पानी ढूंढकर, अपनी मेहनत से रेत में रेत बो रही है. उसके पास उसके जीवन का मकसद है, उसका बेटा, बशर्ते की वह इस बेशकीमती बीज को बंजर में ना रोपे. 

घूम फिरकर मेरी सुई फिर कणिका के माता-पिता पर ही आ रुकी. ऐसे कैसे कोई माता-पिता अपनी बेटी को शिक्षा के पंख देकर भी समाज की झूठी शान के नाम पर खुद ही उन्हे कतर सकता है? अपनी बेटी के लिए सँजोई गई थाती को दहेज की नाली में बहा सकता है? अपनी झूठी शान के लिए उसे दामाद और सास ससुर के बीच फुटबॉल बना सकता है. 

फिर ये कणिका भी क्या चीज है यार, सब सह रही है पता नहीं किस आस में? जिस घर को वह बसाना चाहती है, वह घर है कहाँ? 

जिस पति में वह प्यार और विश्वास ढूंढ रही है, उसमें कोई भावना कोई अनुभूति अगर होती तो क्या वह अपने बेटे तक को त्याग देता, जो उसका अंश है और जिसकी कोई गलती होने का सवाल ही नहीं उठता. ऐसा पुरुष क्या किसी भी औरत के लायक हो सकता है? किसी का भी संबल बन सकता है? वह भला पुरुष ही कहाँ है. वह तो बस मांस का एक दंड है जो पौरुषत्व की नहीं पशुत्व की पहचान है. कैसे कोई एक पशु के हाथ में अपनी सर्वश्रेष्ट कृति को सौंप सकता है? कैसे बंदर के गले में अपनी मोतियों की माला को डालकर, दूर बैठकर बंदर को एक-एक मोती तोड़कर चखते हुए देख सकता है? कैसे? कैसे?  

 नहीं, मैं अपने जानते बूझते ये नहीं होने दे सकती. मैं अभी एक हफ्ता यहाँ और हूँ और जाने से पहले इस कणिका नामक हनुमान जी को उसकी विस्मृत शक्ति याद दिलवाकर ही जाऊँगी. उसे बताना होगा कि वह किसी अनुपम, किसी गुप्ता जी के अत्याचार तभी तक सह सकती है जब तक वह खुद को ये सहने की अनुमति देती रहती है. 

 मैं अपने आपको कणिका के केस की बारीकियों में उलझाते, सुलझाते नींद की आगोश में समा गई. सुबह उठकर पहला काम जो किया वो ये कि शाम को कणिका से मिलने का समय निश्चित किया. 

उसने बताया कि दोपहर को सास-ससुर के सो जाने के बाद वह छत पर आ सकती है. दोनों घरों की छतें आपस में जुड़ी हुई थी सो बातें की जा सकतीं थीं।

मैंने आज उमेश के साथ जाने से मना करते हुए तबीयत खराब होने का बहाना बनाया और आराम करने के लिए ऊपर बने कमरे में जाकर लेट गई. दोनों घरों की छतों के बीच छोटी सी मुंडेर थी जिसे आसानी से लांघकर, कुछ देर में कणिका ने अपने बेटे सहित मेरे कमरे में प्रवेश किया. मैंने सीधे बिंदू पर आते हुए कहा-

‘देख कणिका, जितना मैंने तेरी समस्या के बारे में तुझसे और आस पड़ोस से जाना, उससे मुझे एक बात तो साफ हो गई है’. 

‘और वो क्या भाभी?’- कणिका ने उम्मीद भरी नज़रों से पूछा. 

‘वो ये कि समस्या की गंभीरता को ना तू समझ रही है ना तेरे माता-पिता. अपनी सामर्थ्य को भी ना तू पहचान रही है ना तेरे माता-पिता’।– मैंने शक्ति स्मरण करवाने की ओर कदम बढ़ाया.  

‘आप कहना क्या चाहती है भाभी?’- कणिका ने अपनी सारी जिज्ञासा को आँखों में समेंटकर पूछा. 

‘देखो जब किसी पर भी कोई मुसीबत आती है, तो वह अपनी सारी शक्ति समेंटकर उस मुसीबत से भिड जाता है. लेकिन एक तुम हो कि अपनी शक्ति, अपनी योग्यता के इस्तेमाल की बजाय, समस्या के कदमों में पड़ी हो, कि आओ मुझे तबाह करो, मुझे रोंधो, कुचलो मुझे. उधर तुम्हारे माता-पिता हैं, जिन्हे तुम्हारा साथ देना चाहिए था लेकिन, वे तो तेरे सास-ससुर को एक बिना वेतन की नौकरानी मुहैया करवाकर चलते बने’।– मेरे आक्रोश का ज्वार उफान पर था.  

‘मेरे माता-पिता ही मेरी सुनते और मुझे समझते तो ये दिन ही क्यूँ  देखना पड़ता भाभी?- कणिका रूँआसी होकर बोली’.  

‘पर तूने ही क्या कर लिया? ना माता-पिता को तेरी अनचाही शादी करने से रोक सकी ना अब अपने पति और ससुराल वालों को तेरे साथ ज्यादती करने से. तू मुझे एक बात बता, जब ये लोग तुझे रखना ही नहीं चाहते, फिर भी तू यहाँ क्यूँ पड़ी है? रोज इनके अत्याचार क्यूँ सह रही है? तेरा स्वाभिमान ये कैसे गवारा करता है?’- मैंने उसके अंदर सोये स्वाभिमान की सुगबुगाहट को कुरेदते हुए कहा. 

‘तो क्या करूँ?’- असहाय सी कणिका बोली. 

‘कर तो बहुत कुछ सकती है. पर पहले तो पढ़ी लिखी है, दो वक़्त की रोटी तो इज्जत से कमा ही सकती है’. इतनी लानत मलानत की रोटी भी कोई रोटी है’।– मैंने सीधा वार उसके आत्मसम्मान पर किया.    

‘जरूर कमा सकती हूँ भाभी, लेकिन कहीं एक पैर रखने की जगह तो मिले. अपने बच्चे को किसके भरोसे छोड़ूँ.’ – उसका स्वाभिमान जरा सा कुलबुलाया.              

‘सबसे पहले तो तुझे अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा करना होगा और कमर कसकर खड़े होना होगा. अपनी काबिलियत से अपने लिए एक नौकरी का इंतजाम करना होगा.’ – मैंने सीधे लक्ष्य पर नजर साधी.  

‘पर भाभी मेरे बेटे का क्या होगा? उसका ध्यान कौन रखेगा?’- उसने फिर पूछा. 

‘उसी को सम्मानपूर्वक पालने का ये एकमात्र रास्ता है. औरत अगर बच्चे को दुनिया में ला सकती है, तो उसे दुनियाँ की आखों में आँखें डालकर, जीना भी सीखा सकती है. उस नन्ही सी कोंपल को एक मजबूत दरख्त में भी बदल सकती है. रही बात फिलहाल उसका ध्यान रखने की तो मुझे जरा अपने पापा का नंबर देना. उनको भी झिंझोड़कर जगाना होगा और समाज के झूठे डर के खोल से बाहर निकालना होगा’.  

मेरे दिमाग की हार्ड डिस्क जितनी तेजी से धूम रही थी उससे ज्यादा उछाल मेरे अंदर का अभिभावक मार रहा था. अगर अनुपम ने अपने बेटे का त्याग कर दिया तो वह तो बुरा है ही. लेकिन क्या कणिका के माता-पिता जैसे माता-पिता ठीक करते हैं, जो अपनी बेटियों को डोली में विदा करते वक़्त ये सीख देते हैं कि जिस घर में तेरी डोली जा रही है वहाँ से अर्थी में निकलना. जिस बेटी को नाज़ों से पालते है उसे फेरे लेते ही यूं बेसहारा क्यूँ कर देते हैं?   

भला अपनी बेटी के सुख-दुख से कोई इतना बेज़ार कैसे हो सकता है? और क्या उनकी यही बेज़ारी बेटी के ससुराल वालों के हौसले बुलंद नहीं कर देती. बेटी तुम्हारी जेब में पडा कोई सौ का नोट नहीं है जिसे आप किसी को दान में दे दें. वह आपके दिल का टुकड़ा है, आपके खून की उतनी ही पहचान है जितनी आपका बेटा. 

अरे आप बढ़कर एक बार उसका साथ देकर तो देखो, वह आपका सहारा जन्म-जन्म के लिए बन जाएगी. आप अपने आशीर्वाद का हाथ उसके सिर पर रखो तो सही, वह वक़्त पड़ने पर आपके चरणों में बैसाखी बनकर बिछ जाएगी. ‘बेटी पराया धन है’ मुझे तो इस सोच का आधार ही खोखला लगता है. बेटी ना तो पराई है और ना ही धन. वह एक इंसान है और उसे वही सारे हक हांसिल है जो किसी भी इंसान को होते है.   

इन्ही सब भावनाओं के बहाव में गोते लगाते हुए मैंने कणिका के पिताजी को फोन लगाया-

‘हैलो, जी मैं कणिका के पड़ोसियों की बहु मीता बोल रही हूँ’.- मैंने कहा 

‘जी कहिए’।– वे जरा हैरानी से बोले.  

‘देखिए, कणिका मेरी छोटी बहन जैसी है उस नाते आप मेरे पिता समान हुए. इस अधिकार से क्या मैं आपसे कुछ पूछ सकती हूँ?’- मैंने भूमिका बनाई. 

‘जी पूछिए?- वे स्थिति को समझने की कोशिश करते हुए बोले’.  

‘जी अगर कल आपकी बेटी को कुछ हो जाता है, तो क्या आपका तथाकथित समाज आपके दुख को दूर कर सकेगा? आपकी ज़िंदगी में आपकी बेटी की कमी को पूरी कर सकेगा? क्या आपने बेटी के जन्म के वक़्त उसके सुख-दुख का जिम्मा अपने समाज को सौंप दिया था?’

‘जी, कैसी बातें कर रही हैं आप? कणिका मेरी बेटी है, तो जिम्मा समाज का क्यूँ होगा?’

‘बिल्कुल सही, यही समझाना था आपको कि कणिका आज भी आप ही की बेटी है. जिसे कल   अपनी पलकों के साये तले आपने प्यार से पाला था, उसे आज यूं तूफ़ानों में अकेला कैसे छोड़ दिया?- मेरे उद्गार उफान पर थे’. 

‘जी, बस क्या करे. ये दुनियाँ दारी—-. – उनकी तरल होती आवाज आगे कुछ ना कह सकी’ 

‘वो आपकी बेटी है चाचाजी, दुनियाँ की नहीं. आज उसे जरा सा सहारा दे दीजिए. कल आपको उस पर नाज़ होगा. अपनी बेटी को उस गलती की सजा भुगतने पर मजबूर मत करिए जो उसने की ही नहीं है. ये मेरी आपसे बिनती है. उसे ले जाइए, वो यहाँ पागल हो जाएगी. आज उसे आपके सहारे की जरूरत है, हमेशा नहीं होगी’.   

‘जी मैं आज ही अपनी बेटी को उसके अपने घर लेकर आता हूँ. देखता हूँ किसकी मजाल है कि मेरी बेटी को तिरछी नजर से भी देखे’।– रुँधे हुए गले से कणिका के पापा बोले.  

नमस्ते के साथ ही मैंने फोन रख दिया. मेरा प्रोजेक्ट पूरा हो चुका था और छुट्टियां सफल. मैं लंबी तानकर सो गई. मेरे चेहरे पर फैली सुकून की लाली देख मेरी नींद भी मुस्कुरा उठी.                      

कथा-कहानी

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