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'बदलते रिश्ते'—गृहलक्ष्मी की कहानियां
Badlte Rishte

बदलते रिश्ते-“सारा सामान समेट कर क्यों जा रही हो?” सरला ने बेटी की आंखों में देखते हुए बड़ी ही सरलता से पूछ लिया।

“मुझे पता था कि आप ये सवाल करेंगी!”सोनिया ने बड़ी ही बेपरवाही से कहा और अपने सामान रखने लगी तो सरला से रहा न गया और वह बिफर पड़ी।
“नौकरी लगी है शादी थोड़े ही कर रही हो जो ऐसे विदा ले रही हो।”
“मां मैं आपको आजाद कर रही हूं। अब आप अपने पति और बेटे के साथ आराम से रहिए और मेरी चिंता छोड़ दीजिए।” यह सुनते ही सरला जैसे आपे से बाहर हो गई तो बेटी के मुंह पर एक तमाचा जड़ दिया।
“अच्छा किया आपने..अच्छी विदाई दी..एक बात आपको बताऊं कि ये नौकरी तो महज बहाना है। मुझे आप सबसे दूर जाना है।”

और वह सुबकने लगी। सोनिया सरला के पहले पति की बेटी थी। वह शादी के पहले महीने ही गर्भ में रह गई थी। किसी तरह वहां शादी के पांच महीने निकाले। रोज के लड़ाई व शारिरिक यातनाओं से परेशान होकर आखिरकार सरला ने तलाक ले लिया पर बच्चा पेट में था तो उसे तो जन्म देना ही था। समय पूरा होते ही नन्ही बच्ची दुनिया में आ गई। नखशिख से एकदम विदेशी सी दिखती। न तो वह मां की परछाई थी और न ही अपने पिता की। पूर्व पति को भी इस बच्ची से कोई लेना देना न था। खैर नानी ने ही पाल पोस कर बड़ा किया। वही लाड़ दिखातीं और अब जबकि वह भी करोना की शिकार होकर चल बसीं तो सोनिया का मन पूरी तरह भर गया। मां के साथ रहने आई तो दिल ही न लगा। उसकी पढ़ाई पूरी हो चुकी थी। एसिस्टेंस प्रोफ़ेसर के पद पर ज्वाइन करने के लिए घर छोड़ कर जाने लगी।

“बेटा तुम्हारे लिए मैने क्या क्या नहीं किया और तुम इसका ये सिला दे रही हो?”

“क्या किया मां? सारी उम्र अपनी ममता से मरहूम रखा। नानी के पास छोड़ दिया। एक तरह से अच्छा ही किया। अपने पति व बेटे के आगे मुझे पराया ही पाती होगी तभी तो तुम ऐसा कर पाई।”

“ये तुम क्या कह रही हो? मैंने तो तुम्हारी सुरक्षा को देखते हुए… “

“अच्छा अगर मैं आपकी दूसरी शादी के बाद जन्म लेती तो भी मुझे नानी के पास छोड़ देती?”

“इस घर गृहस्थी में आने जाने वालों के सवाल जवाब से तुम्हें दूर रखना चाहा। मुझसे गलती हो गई।”

“आपने मुझे जन्म दिया था। आप मुझे साथ रख सकती थीं। लोग दो दिन बोलते और तीसरे दिन चुप हो जाते। मैं आपसे ऐसा क्या मांग रही थी। अपना हक ही न! कुछ ज्यादा तो नहीं चाहा। रुपए पैसे नहीं बल्कि आपकी ममता की चाहत थी,जो आपके पास थी पर मेरे लिए नहीं बल्कि अपने बेटे के लिए थी। आप जी भरकर उसपर लुटाती रहीं और मैं दूर खड़ी आपके प्यार के लिए तरसती रही …क्या इस बात का जवाब आपके पास है ?”

सरला के पास कोई जवाब न था। उससे बेटी की अनदेखी हो गई थी। मां बेटी तो साथ ही रह रहे थे पर दूर के रिश्ते से उसकी दूसरी शादी का रिश्ता आया तो मां ने समझा बुझा कर उसे ब्याह के लिए राजी करा लिया। वह सोनिया को गोद में लेकर विदा तो हुई पर उसकी सास उसे स्वीकार कर न सकीं। अपनी बेटी के प्रति उनके नजरिये को पहचान कर ही सरला ने उसे वापस मायके पहुंचा दिया था। ऐसा न था कि उसे बेटी से प्यार न था। एक मां का मन कचोटता तो था ही फिर भी उसे विश्वास था कि वह नानी के साथ सुरक्षित है। बीच बीच में आकर मिलती। निकलते वक्त बेटी की सुनी आंखों को देखती हुई उसका मन भी तार तार हो जाता पर क्या करती। मन को मजबूत कर पति व बेटे में ही मन लगाने लगी। जबकि मां के साथ पिता और बच्चे को देख सोनिया ईर्ष्या से भर उठती थी पर क्या करती। उसे पता था कि उसके पिता यानि मां के पहले पति ने जो कुछ किया था वह उसी का खामियाजा भुगत रही थी। जैसे—जैसे बड़ी होती गई नानी ने सबकुछ बता दिया था। कुछ बातों में वह मां के पक्ष में थी पर मां के प्यार पर अधिकार का न होना ही उसे व्याकुल कर जाता।

सच्चाई तो यह थी कि उसका भी मन करता कि वह अपनी मां की गोद में सिर रख कर सोये पर सरला शादी के बाद अपनी नई घर गृहस्थी में व्यस्त हो गई थी। बेटे का जन्म के बाद तो सोनिया का रहा सहा हक भी जाता रहा। सब साथ रहते,हंसते बोलते,पर वहां उसका कोई नहीं है और अब जबकि उसकी नौकरी लग गई है वह सारे झूठे रिश्तों को छोड़कर नई जिंदगी शुरू करना चाहती है।

हां! उसे सारे रिश्ते झूठे लगते हैं। सबकुछ दिखावा लगता है और सहन नही होता है। ऐसे भी जितना सहना था वह सह चुकी है। उसे सब भुलाकर अब वर्तमान में जीना है और यही सोचकर उसने वाराणसी के एक प्रसिद्ध कॉलेज में आवेदन दिया और अच्छे अंकों के कारण उसे नौकरी मिल भी गई। वहां एक से बढ़कर एक लड़के उसके लिए विवाह का प्रस्ताव लेकर आए पर उसकी रुचि उस ओर न थी। उसका मन तो अपने बचपन में ही अटका था। खुद को संभाल कर उसने स्वयं को काम के प्रति समर्पित कर दिया। पहले तो अपनी खोज खबर सरला को फोन पर दिया करती पर धीरे धीरे वह भी बंद हो गया।

आज सुबह जब सरला ने अखबार खोला तो देखा कि सोनिया की तस्वीर मुख्यपृष्ठ पर छपी है। आगे का समाचार पढ़कर उसकी आंखों से आंसू छलक आए। उसकी बेटी को काशी यूनिवर्सिटी की ओर से रिसर्च के लिए जर्मनी भेजा जा रहा है साथ ही उसी यूनिवर्सिटी में स्थाई नौकरी भी दी गई है। ऑफर लेटर के साथ सोनिया की संलग्न तस्वीर देखकर गर्व से उसका सीना चौड़ा हो गया। आज उसे विश्वास हो गया कि उसकी जुझारू बेटी कोई आम बच्ची नहीं वल्कि असाधारण प्रतिभा की धनी है। उसके मन में आत्मग्लानि के ऐसे भाव उठे कि वह अपनी ही नजर में शर्मिंदा महसूस करने लगी। बेटी के विदेश जाने से पहले अतीत की गलतियों के लिए क्षमा मांगने की इच्छा तीव्र हुई तो बिटिया से मिलने निकल पड़ी।

“मैं कमजोर थी बेटी! इसलिए दूसरों के अनुसार समझौते करती चली गई। मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची!”

“आपका अपना परिवार था जहां मेरा अपना कोई भी नहीं था। शायद इसी अहसास ने मुझे इन किताबों में डुबो दिया और देखो ना! आज इनके बदौलत ही आप मुझे वापस मिल गई!” सोनिया बाहें फैलाए राह देख रही थी।

“मेरे बच्चे! मुझे तुम पर गर्व है!”

सीने से लगाकर इतना ही कहा पर बरसों के जज्ब आंसू दोनों को भिगो गए और यह महसूस हुआ सच्चा सुख मोहब्बत में है न कि नफरत में। असली राहत तो अपनों से मिलकर ही महसूस होता है और माँ-बेटी के रिश्ते से बढ़कर तो कुछ भी नहीं। एक खूबसूरत रिश्ता जो मलिन हो चला था वह नफरत की आग बुझते ही चमक उठा। आपसी भाव बदल गए। जिन लोगों में उसे झूठ दिखता था वहां सच्चा स्नेह नजर आने लगा। अतीत का दर्द कम हुआ तो राहत पाकर सोनिया ने अपने कदम स्वर्णिम भविष्य की ओर बढ़ा लिए

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