पतंग सी बेटी-गृहलक्ष्मी की कहानियां: Makar Sankranti Story
Patang si Beti

Makar Sankranti Story: संक्रांति की सुबह का अखबार खोलते ही सरला की खुशी का ठिकाना न था। सोनिया की तस्वीर मुख्यपृष्ठ पर छपी थी। उसे काशी विश्वविद्यालय की ओर से रिसर्च हेतु जर्मनी भेजा जा रहा। साथ ही वहीं नौकरी भी मिली है। उसकी सफलता की खबर पढ़कर सरला की आंखें छलक पड़ीं। इसी बेटी के लिए उसने क्या-कुछ नहीं सुना था। 

“न जाने किसका खून है। सारे दिन लौंडे की तरह पतंग उड़ाती फिरती है। लड़कियों वाले कोई लक्षण ही नहीं हैं। अभी आसमान में उड़ रही है। जिस दिन कटके गिरेगी किसी को मुँह दिखाने लायक न रह जाएगी।”

सास की इन चुभती बातों से आहत सरला ने उसपर हाथ उठाया था और गृहकलह से तंग आकर माँ के पास छोड़ आई थी। बढ़ते बच्चे को नानी भी कबतक बंद रखतीं तभी उसके बचपन की सहेली नीरा जो वाराणसी के एक गर्ल्स हाॅस्टल की वार्डेन थी। उसने हॉस्टल भेजने की बात कही जो सरला को जँच गई। वो दिन और आज का दिन बच्ची ने पीछे मुड़ कर न देखा।  

अब इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल करने वाली बेटी पर गर्व हो रहा था। इस बात की सूचना जब उसने सास को दिया तो उनका चेहरा सफेद पड़ गया था। उन्हें क्योंकर लगाव होता। वह उसके पहले पति की बेटी जो थी। वह शादी के पहले महीने ही गर्भ में रह गई थी। किसी तरह शादी के पांच महीने निकाले। रोज के लड़ाई व शारिरिक यातनाओं से परेशान होकर आखिरकार सरला ने तलाक ले लिया पर बच्ची पेट में थी तो उसे तो जन्म देना ही था। समय पूरा होते ही नन्हीं बच्ची दुनिया में आ गई। 

नखशिख से एकदम अलग थी। न तो वह मां की परछाई थी और न ही अपने पिता की। किसी को इस बच्ची से कोई लेना देना न था। राघव सरला से प्यार करता था और उसने बच्ची के साथ स्वीकार भी किया मगर अपनी माँ के साथ रहने के कारण वह भी कुछ न कर सका। ऐसे में नानी ने ही पाल पोस कर बड़ा किया। वही लाड़ दिखातीं मगर अन्य बच्चों की तरह सोनिया भी माँ के आँचल के लिए तरसती रहती।

सरला को उसके दुखों का आभास था। जानती थी कि अपनी मां की गोद के लिए सोनिया का मन तड़पता है पर वह अपनी नई घर गृहस्थी में व्यस्त हो चली थी। बेटे का जन्म के बाद तो सोनिया का रहा सहा हक भी जाता रहा। सब साथ रहते,हंसते बोलते,पर उसे सारे रिश्ते झूठे लगते,दिखावा लगता।

 अब इस छोटी सी उम्र में जिंदगी के हर थपेड़े से लड़कर उसकी बेटी विजेता बनी है। उसकी इस उपलब्धि की बधाई वह कलेजे से लगाकर देगी। सरला की ममता बेटी से मिलने के लिए तड़प उठी। उसके पास समय कम है। आज रात की फ्लाइट है। उसने तत्काल नीना को फोन मिलाया और टिकट लेकर ट्रेन में बैठ गई। दिलदारनगर से वाराणसी पास ही है। नीना के साथ पिछली बातें याद करने लगी

“तुम्हें याद है नीना जब सास की बात पर तड़पकर मैंने सोनिया के मुँह पर तमाचा जड़ा था और खुद ही रोने लगी थी मगर सोनिया के आँखों एक आँसू की एक बूँद न थी। जाने कैसे पत्थर हो गई थी।”

“हाँ! सरला खूब याद है तुमने जब कहा कि उसके लिए क्या-कुछ नहीं किया तो उसने कहा था,सारी उम्र अपनी ममता से मरहूम रखा। नानी के पास छोड़ दिया। एक तरह से अच्छा ही किया। अपने पति व बेटे के आगे मुझे पराया ही पाती होगी तभी तो तुम ऐसा कर पाई।”

“हाँ और इस बात का मेरे पास कोई जवाब न था। यह सब एक दिन की बात नही थी। ससुराल में सोनिया की हरक़तों पर नजर रखी जाती थी जैसे वह अपने नहीं बल्कि पराए घर में पल रही हो। वह एक गलत विवाह की पैदाइश थी तो इसमें उसकी क्या गलती थी? उस रोज पतंग उड़ाने के कारण हुए हंगामे को तुमने न संभाला होता तो आज यह शुभ दिन कैसे आता।”

उस रोज नीना ने ही दोनों को अच्छी तरह समझा-बुझाकर शांत किया। उसने ही सोनिया का दाखिला वाराणसी के एक बोर्डिंग में करा दिया। नानी ने इतना बैंक बैलेंस तो छोड़ा ही था जो उसके निर्बाध शिक्षा के लिए काफी था। अब तो वह स्वयं ही अपनी योग्यता के बल पर विदेश जा रही है। आज उसके बेटी के लिए उसका रोम-रोम हर्षित था। बातों-बातों में स्टेशन आ गया। रिक्शा कर हॉस्टल पहुँची तो जैसे उसका इंतज़ार हो रहा था। बेटी की मासूम आँखों में अपनी झलक पाकर पिघल गई।

“मैं बहुत कमजोर थी बेटी! इसलिए दूसरों के शर्तों पर जीती चली गई। समझौते कर लिए। मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची!”

“कोई बात नही माँ! तुम अकेली न छोड़ती तो किताबों से दोस्ती कैसे होती। अकेलेपन के अहसास ने मुझे इन किताबों में डुबो दिया और देखो ना! आज इनके बदौलत ही मुझे तुम वापस मिल गई!” सोनिया बाहें फैलाए राह देख रही थी।

“मेरे बच्चे! मुझे तुम पर गर्व है!”

सीने से लगाकर इतना ही कहा पर बरसों के जज्ब आंसू दोनों को भिगो गए। असली राहत तो अपनों से मिलकर ही महसूस होता है और माँ-बेटी के रिश्ते से बढ़कर तो कुछ भी नहीं। एक खूबसूरत रिश्ता जो मलिन हो चला था वह नफरत की आग बुझते ही चमक उठा। आपसी भाव बदल गए। जिन लोगों में उसे झूठ दिखता था वहां सच्चा स्नेह नजर आने लगा। 

अतीत का दर्द कम हुआ तो राहत पाकर आसमान निहारने लगी। आज फिर आसमान रंग-बिरंगे पतंगों से आच्छादित था। कुछ हवा में तैर रहे थे तो कुछ आसमान की ऊँचाइयों को छू रहे थे। तभी एक पतंग कटकर जमीन पर आ गिरा जिसे देखकर उसका मन भर आया। न जाने ऐसे कितने बच्चे हैं जो माँ-बाप के क्षणिक आनंद की प्राप्ति का परिणाम होते हैं। जिन्हें परिवार का सुख नसीब नहीं होता। कभी माँ-बाप के नाजायज संबंध तो कभी अहं के टकराव के कारण हुए तलाक की सजा भुगतते हैं। 

उसने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया। उन्होंने ही उस रोज नीना को भेजा और उसके ही माध्यम से सोनिया को एक नई राह दिखाई। ऐसा न हुआ होता तो शायद वह भी टूट कर बिखर गई होती! ओह!बातों में समय का पता ही न लगा। रात के दस बज गए तो नीना और सरला सोनिया को छोड़ने लाल बहादुर शास्त्री एयरपोर्ट आ गईं। सोनिया चेक-इन के लिए अंदर चली गई। कुछ ही देर में वह पतंग के समान अपने आसमान को छूने हेतु हर पीड़ा से स्वतंत्र होकर उड़ जाएगी।