कृष्णा मोहन बाबू इस सुहावने हरे – भरे मौसम में शाम की चाय का कप लिये बालकानी में चले आये। आज मन घर के कामों में व्यस्त पत्नी के साथ चाय न पीकर अकेले में चाय पीने का हो रहा था।

उन्होंने अपने मकान के चारों ओर के वृक्षों को देखा। वह भी इस बारिश में हरे भरे धुले होकर अपने नये रंग रूप पर गौरान्वित हो खुशी से झूम रहे थे। चारों ओर छाई हरियाली सबको लुभाने लगी थी। प्रकृति का यह हरा-भरा मन मोहिनी रूप भी कृष्ण मोहन बाबू को रिझा नहीं पा रहा था। वह चाय के हर सिप के साथ सोच रहे थे कि उनके इकसठ वर्षीय जीवन में अभी भी कहां है प्रकृति सा हरा -भरा सुख। उन्हें तो लगता है जैसे वह भीतर से जेठ की दुपहरी सा तप रहे हैं। कई दिनों से उनका मन बेचैन चल रहा था।

कृष्ण मोहन स्कूल व्याख्याता से एक वर्ष पूर्व ही रिटायर हुए थे। उन्हें पेंशन व अन्य स्त्रोतों से मिलने वाली धनराशि दस लाख बनी थी। वह सोचते थे कि इस धनराशि और बैंक में जो कुछ बैलेंस  शेष है उसे मिलाकर वह सत्ताईस वर्षीय बिटिया प्रीति का साधारण स्तर का विवाह तो कर ही देंगे। कृष्ण मोहन एक पुत्र व एक बेटी के पिता है।

उनके जीवन में थोड़ी बहुत खुशी आई तो यह कि उनके पुत्र कमल की एक सरकारी स्कून में छः माह पूर्व शिक्षक पद पर नौकरी लग गई थी। पत्नी निर्मला अपनी घर गृहस्थी चलाने में बड़ी होशियार थी। वह फिजूल खर्ची को रोक, आने वाले समय के लिये पैसा जोड़ने में विश्वास रखती थी। वह अच्छे से जानती थी कि आज अपने स्तर के अनुकूल साधारण विवाह में भी दस पन्द्रह लाख रूपये खर्च होना मामूली बात है। वह भी अपने पति के साथ बेटी की नित बढ़ती उम्र को लेकर चिंतित रहती। चाहती थी कि जल्द ही कोई अपने समाज का सुन्दर अनुकूल और सरकारी नौकरी वाला लड़का मिल जाए।

प्रीति ने एम.ए. करने के बाद टीचर बनने के लिये बी.एड. भी कर लिया था। दो बार टीचरशिप के लिये प्रतियोगी परीक्षा भी दी लेकिन हर बार असफल रही। लगता जैसे उसकी मेहनत व भाग्य के साथ छत्तीस का आंकड़ा हो। और इतना ही नहीं शायद शादी के लिये भी जैसे भाग्य रूठा हुआ हो। वह लंबे कद की गौरी और सुन्दर चेहरे वाली लड़की थी। लेकिन वह शरीर से सामान्य लड़कियों की तुलना में कुछ भारी बदन की थी। वह इसके लिये सदा चिंतित रहती। पर वह करे तो क्या करें ? डाइटिंग की और कुछ योगा भी किया, पर विशेष फायदा नहीं हुआ।

कृष्ण मोहन बाबू प्रीति के सम्बन्ध के लिये जहां भी अपने समाज का समारोह पर रिश्तेदारों में शादी विवाह होते तो वह लड़का निगाह में निकालने के लिये जाना नहीं भूलते। पर जहां कहीं भी बात होती तो लड़के वाले कह देते ”नौकरी वाली लड़की चाहिये। आज जमाना बदल गया, दोनों की कमाई से ही घर में सम्पन्नता बनी रहती है।” इस पर कृष्ण मोहन कहते-” एक बार लड़की देख लें ,हो सकता है आपके विचार बदल जाएं।” पर उन्हें तुरंत जवाब मिलता ”लड़कियां तो कई सुन्दर और एम.ए. तथा डिग्री धारी मिल जाएगी पर नौकरी वाली मिले तभी देखना दिखाना सार्थक हो सकता है।”

कृष्ण मोहन अब तक कई जगह घूम आयेे। हजारों रूपये खर्च कर दिये पर होया गया कुछ नहीं। उन्हें याद आने लगा जब वह पढ़ाई के दिनो में प्रीति से कहा करते थे-”मन लगा कर पढ़ाई किया करो। आज फर्स्ट डिवीजन का नहीं अच्छे प्रतिशत मार्क्स लाने का महत्व है। प्रतियोगी परीक्षाओं में हजारों प्रतियोगी बैठते हैं। बहुत काॅम्पीटीशन है। अतः सफल होने के लिए बहुत अधिक लगन से मेहनत करने की जरूरत होती है।”  पर उनकी हिदायतों को कहां सुना गंभीरता से ? अब सरकारी नौकरी तो जैसे दूर की कौड़ी हो गई। और इधर सबको चाहिये सरकारी नौकरी वाली लड़की।

कृष्ण मोहन पत्नी निर्मला के साथ अपने दुख को व्यक्त कर, आये दिन प्रीति के बारे में सोचते नहीं थकते। कब तक घर पर बिठाये रखें। शादी की उम्र एक्सप्रेस ट्रेन की तरह भागी जा रही है। यों तो एक दो बार हल्के फुल्के अनमेल रिश्ते भी आये। पर उनके साथ बेटी की सम्बन्ध कैसे स्थापित कर दे ?

जैसे ही स्कूलों का नया शिक्षा सत्र चालू हुआ तो प्रीति ने अपनी काॅलोनी में संचालित एक निजी सीनियर सैकण्डरी स्कूल में अध्यापन कराना शुरू कर दिया। इससे उसका अच्छा टाइम पास होने लगा। लेकिन उसकी इस नौकरी से माता-पिता की चिंता दूर नहीं हुई ?

कृष्ण मोहन व निर्मला बहुत समय तक तो किसी अनुकूल रिश्ते की प्रतीक्षा करते रहे। पर कुछ हुआ नहीं। उन्होंने अब तो यहां तक भी मन बना लिया कि अपने समाज में नहीं तो अन्य समाज में भी कोई योग्य संस्कारित वर  मिल जाए तो भी वह अपनी बिटिया के हाथ पीले कर देंगे।

इधर उनके पच्चीस वर्षीय पुत्र कमल के लिये रिश्ते आना शुरू हो गये। तीन रिश्ते उन्हें पसंद भी आये। कहीं लड़की सरकारी स्कूल में टीचर, तो कहीं नर्स और कोई निजी संस्थान में टाइपिस्ट। सभी लड़कियां कमल को भी पसंद थी। बस निर्णय करना था कि किस रिश्ते को फाइनल करें। पर जब भी रिश्ता स्वीकारने की बात आती तो बेटी का ध्यान आ जाता। पहले बेटी की शादी हो जाये तो ठीक रहे। अगर पहले लड़के की शादी हो गई, तो समाज कहेगा, जवान बेटी को घर पर बिठा रखा है। बेटा छोटा है तो भी उसकी कि शादी करने चले। लड़की की तो कोई चिंता नहीं हाथ पीले करने की।

इसी पशो-पेश में दो माह निकल गये,। आखिर उन्होंने निर्णय कर ही लिया कि पहले बेटे कमल का विवाह कर दिया जाये। समाज कुछ भी कहे उन्होंने अजमेर वाली लड़की के लिये शादी की सहमति उसके परिजनों को भेज दी। लड़की सरकारी स्कूल में टीचर थी। अच्छी बात यह रहेगी कि दोनों शिक्षा विभाग में नौकरी मे रहेंगे। दोनों परिवार में सब कुछ तय हो गया। शादी फरवरी में होगा निश्चय हो गया। शादी समारोह अजमेर में ही होना था। अभी छः माह का समय शेष था।

कमल का रिश्ता तय हो जाने के बाद प्रीति अब परिवार में उदास सी रहने लगी। वह अपने भाग्य को कोसने लगी। सोचती क्या वह अविवाहित ही रहेगी और माता-पिता व भाई पर भार बनकर जीएगी?  अब वह शाम की चाय भी अलग ही कमरे में जाकर पीती । माता-पिता भी उसकी मन: स्थिति समझकर दुखी होते। वे उससे कहें तो भी क्या कहें ?

दीपावली की छुट्टियों लगी तो प्रीति इस बार अपनी मौसी के घर जयपुर चली गई। बहुत समय से मौसी उसे अपने यहां आने को कह रही थी। उसके मौसाजी रामेश्वर एल आई सी आफिस में अधिकारी थे। एक रविवार को उनका परिचित एक युवा सुधीर अग्रवाल उनसे मिलने आया हुआ था। वह मौसाजी से बातें कर रहा था। सरला मौसी तब पूजा पाठ में व्यस्त थी। प्रीति के मौसाजी ने उससे चाय बनाकर लाने को कहा। प्रीति को यहां आये अभी कुछ ही दिन हुए थे। पर उसे पता लग गया था कि किचन में कौन सी चीज कहां रखी है। उसने  लौंग, अदरक डालकर चाय बनाई। चाय लेकर वह ड्राइंग रूम में गई तो सुधीर उसे गौर से देखता रहा। जैसे वह उसमें अपने लिये कोई संभावना तलाश रहा हो।

इस बीच मौसी भी कमरे में आ गई। चाय की हर सिप सुधीर को बहुत भा रही थी। उसने चाय के दो तीन सिप लेने के बाद कहा-”वाह! क्या चाय बनाई है !बहुत अच्छी और मजेदार ” वह तो कहना चाह रहा था चाय बनाने वाली की तरह अच्छी व सुन्दर। पर उसके दिल से निकले शब्द होठों तक ही सिमट कर वह गये। मौसी उसके अनकहे चेहरे के बाहों को समझ गयी थी।

सुधीर बैंक में बाबू के पद पर कार्यरत था। उसे वेतन भी अच्छा मिलना था। उसकी पत्नी की छः माह पूर्व कूलर में आये करंट से मृत्यु हो गयी थी। उसकी शादी हुए भी दो साल ही हुए थे कि उसे इतना बड़ा हादसा दुखी कर गया। तभी से वह कभी छुट्टी के दिन रामेश्वर जी के यहां मिलने जुलने आ जाता। सुधीर का मन आज ऐसा हो रहा था कि प्रीति के हाथ की चाय एक बार और पी जाए। पर उसने संकोचवश कुछ कहा नहीं। लेकिन बातों का सिलसिला आज लम्बा चलता रहा था तो रामेश्वर जी ने पत्नी से कह दिया थोड़ी चाय और भिजवा दो। प्रीति फिर चाय लेकर आई। इस बार मौसी किचन में आई और नमकीन की प्लेट भी प्रीति से कमरे में भिजवा दी।

सुधीर ने प्रीति को फिर एक बार अपने दिल से जुड़़ाव वाले रिश्ते से उसे देखा। और मन ही मन मोहित हो गया। रामेश्वर जी ने जल्द चाय समाप्त की। उन्हें पत्नी सरला के साथ कुछ समय के लिये के डाॅक्टर के पास जाना था। सो वह सुधीर से यह कहकर चले गये कि अभी पन्द्रह-बीस मिनट में लौट कर आते हैं। उन्होेंने जाते हुए प्रीति से कहा कि -”वह सुधीर के साथ बातचीत करें।”

प्रीति का दिल नहीं चाह रहा था कि वह अनजाने युवक सुधीर से बातें करे। पर सुधीर तो चाही यह रहा था कि प्रीति से अकेले में बात करे। उसने रामेश्वर जी का आभार जताया कि उन्होंने उसकी मन की मुराद पूरी कर दी।

सुधीर धीरे-धीरे चाय के साथ नमकीन खा रहा था। उसने अपने सामने बैठी प्रीति से बातों की शुरूआत अपने परिचय से की। उसने अपने बारे में सब कुछ बता दिया कि वह बैंक में बाबू है और विधुर हैं। कुछ माह पूर्व ही पत्नी की बिजली के करण्ट से मृत्यु हो गई। सुधीर के दिल में प्रीति की चाहत दिल में ठक ठक करने लगी थी।

प्रीति ने भी अपने बारे में बताया कि वह भी एम.ए. बी.एड है। पर अभी तक सरकारी टीचर शिप के लिये चयन नहीं हुआ। प्रयास यही है कि नौकरी मिलने के बाद ही शादी की जाए। मेरे मम्मी-पापा भी यही सोचते हैं कि नौकरी लगने पर अच्छा परिवार व लड़का मिलने में सुविधा रहती है।”

अभी उनकी बातें चल ही रही थीं  कि रामेश्वर जी व सरला जी आ गये। उनकी भी यह सहमति बनी हुई थी कि दोनों को बातचीत करने का अवसर दें।

अब प्रीति उठकर दूसरे कमरे में चली गयी। रामेश्वर जी ने सुधीर से पूछा”बोर, तो नहीं हुए ?”

”नहीं, बोर होना तो छोड़ो, बातचीत में समय का ही पता नहीं चला। अच्छी लड़की है। हम आपस में एक दूसरे से परिचित हुए। तभी प्रीति की मौसी बोली-”कोई अच्छा लड़का मिले तो इसका विवाह करना है। ये एक भाई एक बहिन है। भाई अविवाहित व प्रीति से छोटा है वह सरकारी स्कूल में टीचर हैै। पापा रिटायर टीचर है। मां गृहिणी है। भाई की शादी फरवरी में होने जा रही है।”

प्रीति केन्द्रित बातें चलती रही। सुधीर ने घड़ी देखी। उसे बैठे हुए एक घंटे से अधिक हो गया था। यह उनसे विदा लेकर जाने को हुआ तो एक बार फिर रामेश्वर जी ने प्रीति को बुलाने की गरज से उसे आवाज देकर चाय की ट्रे ले जाने को कहा। उनका सोचा था कि सुधीर एक बार फिर प्रीति को देख ले। प्रीति आई तो सुधीर उसकी ओर मुस्करा देखा और चला गया।

रसोई में खाना बनाते मौसी ने प्रीति से सुधीर के बारे में जानकारी लेनी चाही।” कैसा लगा सुधीर ? सुधीर तेरे मौसाजी का बहुत सम्मान करता है। कभी छुट्टी के दिन यहां आ जाता है। इसकी पत्नी की कुछ माह पूर्व मृत्यु हो गई। बैंक में नौकरी करता है। ”वेतन भी अच्छा मिलता है।”

प्रीति ने बस इतना ही कहा,”ठीक है।”

”तेरे बारे में बात चलाऊँ क्या ?” उसने मुस्करा कहा-मम्मी -पापा और आप जानो।”

उसी दिन शाम को मौसी सरला ने अपनी बहिन प्रीति की मम्मी निर्मला से बातचीत की। लड़के और परिवार के बारे में सब कुछ बता दिया। यदि सहमत हो तो बात आगे बढ़ाई जाए ?”कृष्ण मोहन और निर्मला ने अच्छे से विचार कर कहा कि इतना अच्छा रिश्ता है। रिश्ते के लिये हां भर ली जाए। पर एक बार प्रीति की राय भी ली जाए।

प्रीति ने बढ़ती उम्र और नौकरी मिलने की क्षीण होती संभावना को देख अच्छी नौकरी वाले सुधीर अग्रवाल के लिये हां भर दी। अब उसके हां भरने के बाद उन्हें बड़ी राहत मिली। अब वह चाह रहे थे कि सब कुछ तय हो जाए तो दिसम्बर में शादी करदी जाए।

प्रीति के माता-पिता और प्रीति की सहमति मिलने के बाद रामेश्वर बाबू ने एक दिन सुधीर को अपने घर बुलाया। इधर-उधर की बातों के बीच प्रीति चाय नमकीन लेकर आ गई। उसकी मौसी भी वहीं आ गई। चाय पीते सुधीर ने एक बार प्रीति की ओर प्यार भरी नजरों से देखा। जैसे उसका मन कह रहा हो- आओ हम साथ जीएं।

प्रीति कुछ देर खड़ी रह चली गई। तभी मौसी ने सुधीर का मन टटोलते हुए कहा-”इसके लिये लड़का तलाशना है, जल्द ही शादी करनी है।”

सुधीर ने रामेश्वर जी और सरला जी की ओर देख कर कहा-”यदि आप चाहें तो मैं प्रीति के बारे में सोचूं ? वैसे मुझे प्रीति पसंद है।” सुधीर के मुंह से उन दोनों की मन चाही बात पूरी होती देख, उन्होंने एक दो दिन में फायनल जवाब देने को कहा। मैं भी अपने परिजनों से विचार विमर्श कर जानकारी दे दूंगा। सुधीर के वाट्स ऐप पर प्रीति का फोटो डालकर रामेश्वर जी ने कहा” सब कुछ दोनों ओर से अनुकूल होता है तो इसके माता-पिता की इच्छा है कि शादी आगामी दिसम्बर में कर दी जाए क्योकि फरवरी में इसके छोटे भाई कमल की शादी है।”

सुधीर के परिवार को भी प्रीति पसंद थी। दिसंबर में जयपुर में ही शादी समारोह आयोजित करने का निर्णय हुआ। सुधीर ने रामेश्वर जी से कहा-कि शादी सादे समारोह में होगी तथा लेन -देन जैसा कुछ नहीं होगा।”

प्रीति की छुट्टियां पूरी होने को थी। वह अपने माता-पिता के घर लौट आई। आज वह बहुत दिनों बाद खुश थी। उसके माता-पिता शादी की तैयारी में जुट गये। उन्होंने ईश्वर की कृपा पर प्रसन्नता प्रगट की आज घर बैठे अच्छा रिश्ता आ गया। अब बहिन की शादी भाई के पहले हो जावेगी।

शादी की तैयारियां करते दिसम्बर माह का वह दिन भी करीब आ गया जिस दिन शादी होनी थी। रामेश्वर सरला भी अपने परिवार व रिश्तेदारों सहित जयपुर पहुंच गये। निश्चित दिन व समय पर प्रीति और सुधीर विवाह बंधन में बंध गये।

अपनी बेटी को विदा करने का समय आ गया। वर्षो तक माता-पिता के आंगन में खेल कूद कर बड़ी हुई प्यारी बेटी विदा  हो रही थी। वह सबसे गले लग कर आंसू बहाती रही। पर यह अच्छा दृश्य देख प्रीति की मौसी व मौसाजी खुश थे कि आज वर्षो की इच्छा पूरी हो गयी।

प्रीति व सुधीर के साथ कार में बैठ अपने नये घर की ओर चल दी। उसने अपने परिजनों से हाथ हिलाकर विदा ली। वहां खड़े सभी लोग विदा होती बेटी की कार की दूर तक देखते रहे।

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