भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
बच्चों का एक ग्रुप स्कूल के टूर पर जा रहा था। बहुत उत्साहित होकर सब बच्चे अपना सामान पैक कर रहे थे। बहुत वक्त के बाद उन्हें शहर से बाहर दर हरियाली के वातावरण में लेकर जा रहे थे। सब बच्चे बहत उत्साह मन में लिये हंसते-गाते पहाड़ों की वादियों को देखने निकल पड़े। बच्चों में जोश और उत्साह देखते ही बनता था।
“हँसते-हँसते कट जाये रस्ते जिन्दगी यूँ ही चलती रहे”
सब बच्चे ज़ोर-ज़ोर से मिलकर गा रहे थे सफ़र में गाते-बजाते सब बच्चे बहुत मजे कर रहे थे।
रास्ते में बहुत ट्रैफिक था। कहीं-कहीं तो लम्बा जाम लगा हुआ था। रास्ते में जगह-जगह बहुत से पेड़ कटे पड़े थे, सड़कों को और बड़ा बनाने के लिये। रास्ते में हरियाली पहले से भी कम होती नज़र आई। बच्चों को भूख लगी तो गाड़ी किसी होटल के पास रोकी तो सभी बच्चे आपस में हसीं-मज़ाक करते हुए बस से धीरे-धीरे नीचे उतरने लगे। होटल के मोड़ के एक किनारे पर बहुत बड़ा कूड़ेदान पड़ा था जिसके चारों ओर का अधिकांश कूड़ा बाहर गिरा हुआ था जो कि वहाँ आने वाले लोगों ने चलते-चलते खाया और वहीं बाहर फेंक दिया था। जो देखने में बहुत बुरा लग रहा था। सभी बच्चों ने ये बात नोटिस की, कि कूड़ेदान से बाहर फैला कूड़ा बदबू और गंदगी को बढ़ा रहा था। रोहन ने नाक सिकोड़ते हुए कहा- “कैसे असभ्य और आलसी लोग आते हैं यहाँ, कुछ भी खाने के बाद कूड़ा कूड़ेदान के अन्दर नहीं, पास ही बाहर फेंक देते है कितनी ग़लत बात है यहाँ चारों और गन्दगी और बदबू और बीमारी तो फैलती ही है शहर की सुन्दरता भी बिगड़ती है। हम सब बच्चे अपने आसपास साफ और स्वच्छ रखने का प्रण लेते हैं…” क्या आप सब बच्चे मेरा साथ देंगे…
“रोहन की बात सुन कर सब बच्चों ने हाँ में हाँ मिलाई केवल मानव को छोड़ कर”
“क्यूँकि उसे भी बहुत गन्दी आदत थी कूड़ा यहाँ-वहाँ फेंकने की, आज सबकी बातें सुनकर उसे बहुत शर्म भी आई और अपनी गलती का अहसास भी हुआ… तो मन ही मन मानव ठान लेता है कि वो अब घर-बाहर किसी भी जगह कूड़ा बाहर नहीं फेंकेगा केवल कूड़ेदान में ही डालेगा।”
फिर सब बच्चे शोर मचाते हुए होटल में गये और खाने का आर्डर दिया। होटल में पानी की बोतल 50 रूपये की मिल रही थी। पिज़्ज़ा/बर्गर आदि सब महँगा था। थोड़ा-बहुत सबने खाया और बस आगे बढ़ी अपने गन्तव्य की ओर। होटल पहुँचते-पहुँचते रात हो गई। रास्ते में ट्रैफिक में फंसे होने के कारण बच्चे बुरी तरह थक चुके थे। सबने खाना खाया और सो गये। सुबह उठकर ट्रैकिंग पर पाँच बजे निकलना था। तो सब बच्चे आस-पास पहाड़ों और वहाँ की संस्कृति और प्राकृतिक दृश्यों का आनन्द लेने के लिये निकल पड़े। ट्रैकिंग पर जाते हुए रास्ते में देखा कि बहुत से पेड़ों को काटकर उनकी जगह होटल बना दिये गये हैं। हरियाली का कहीं नामोनिशान नहीं था शहर के अन्दर। वहाँ अब कचरे और प्लास्टिक के ढेर लगे हुए थे जिसे देख सबका उत्साह मंद पड़ रहा था। और जहां भी खाने-पीने के लिये जाते सब जगह हर चीज महँगी मिल रहा थी। पहाड़ों में पानी की कमी होने के कारण पानी हर जगह महँगा मिल रहा था। बच्चों के चेहरे देख कर लग रहा था कि उन्हें आनन्द कम और थकान ज़्यादा हो रही है। कारण जहां भी जाते वहाँ बहत ही भीड और शहरीकरण दिख रहा था। जिस प्राकतिक सौन्दर्य के दर्शन करने आये थे वो तो बहुत कम नज़र आ रही थी। टूर खत्म कर सब वापिस लौट आये। अगले दिन अध्यापक ने कक्षा में सब बच्चों से “टूर के आनन्द” के विषय में सबके विचार पूछे।

“तो कक्षा के एक बच्चे विकास ने कहा कि सर हमें वहाँ बहुत अच्छा तो लगा लेकिन जिस प्रकृति, हरियाली का आनंद लेने हम वहाँ पहाड़ों में गये थे, वहाँ वो बहुत कम देखने को मिली अधिकतर हर जगह अप्राकृतिक रूप से सजाया गया था।”
तभी बीच में एक बच्चा मोहन बोला… “ यस सर हमने हरे-भरे पेड़ों के साथ फोटो भी नहीं खिंचवाई”
उसकी बात सुनकर सारे बच्चे ज़ोर से हँस पड़े। “मोहन ने आगे कहा क्यँकि सर वहाँ से सब पेड काट दिये गये थे तो हमें मजा भी नहीं आया। तभी विकास बोला…. और तो और सर, “पानी तो प्राकृतिक स्त्रोत है वो भी वहाँ पीने को बहुत ही महँगा मिल रहा है ऐसे तो सर वहाँ केवल वही व्यक्ति जा सकते हैं जिनके पास बहुत पैसा हो।
तो सर क्या ये प्रकृति का आनन्द भी अब बस कुछ ही लोग ले पायेंगे।
सर ने विकास को बहुत शाबाशी देते हुए कहा कि “विकास ने बहुत अच्छा प्रश्न किया है और प्रकृति के धीरे-धीरे समाप्त होने के दर्द को महसूस किया है।”
सारे बच्चों ने तालियाँ बजाकर विकास का उत्साह बढ़ाया।
सर ने कहा – “बच्चों दुनियां का भविष्य अब केवल तुम्हारे हाथों में है तुम लोग ही दुनियां को बचा सकते हो। अपने आसपास सबको प्रकृति के प्रति जागरूक करो।” आज पानी के स्त्रोत सूखते जा रहे हैं तो पानी बोतलों में भरकर महँगा बेचा जा रहा है। पेड़ काटकर घर-होटल आदि बनाये जा रहे हैं। हर जगह प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। पशुओं के रहने की जगह जंगल है उसे हम सब मिलकर काट रहे हैं तो…. वो बेचारे निरीह पशु कहाँ जायेंगें?
पक्षियों के घोंसलों को हम सब तोड़ रहे हैं।
हर जगह ट्रैफिक, कारखानों की वजह हवा में ऑक्सीजन कम हो रही है। अब ऑक्सीजन का भी व्यापार शुरू हो गया। हर चीज की कालाबाज़ारी हो रही है। सब महँगा हो रहा है। आम इन्सान कैसे जियेगा? हम सबको मिलकर बहुत सारे पेड़ लगाने होंगे यदि भविष्य में जीने के लिये शुद्ध हवा चाहिए तो?
हमें अपने जल स्त्रोतों को बचाना होगा। यदि पीने के लिए पानी चाहिये तो?
हमें प्लास्टिक का प्रयोग ना कर हमें प्रकृति को प्रेम से संरक्षित करना होगा। यदि प्राकृतिक आपदाओं से बचना है तो?
हमें अपनी पृथ्वी को बचाना होगा। संस्कृति को बचाना होगा। विदेशी सभ्यता को छोड़ आयुर्वेद को अपनाना होगा। यदि धरती पर मानव को बचाना है तो?
सब बच्चों को अभी से प्रण लेना होगा। यदि हर बच्चा अपने ही घर में और अपने आसपास सबमें जागरूकता फैलाये तो हम अपने देश, पृथ्वी को फिर से रहने लायक बना सकते हैं। तालियाँ बजाते हुए “सब बच्चों ने बुलन्द आवाज़ में प्रण लिया कि…. “हम सब अपनी धरती को मिलकर हरा-भरा बनायेंगे, खुशहाल जीवन के लिये हवा-पानी-पेड़ों को भी बचायेंगे।”
जय हिन्द
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
