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कथा-कहानी

एक रोज क्या हुआ कि मैं आंगन में दरी लगाकर प्राणायाम कर रही थी तभी शर्मा जी आ गए, जो पतिदेव के अच्छे दोस्त हैं। ‘भाभीजी, घूम कर घर जा रहा था, सोचा आप दोनों से मिल भी लूंगा और सुबह की चाय भी साथ में पी लेंगे।’ शर्माजी ने घर में प्रवेश करते हुए कहा, ‘वो सुरेश कहां है?’ मैंने बताया कि वो तो अभी सो रहे हैं तो वे बोले कि क्या वो देर से सोता है, जो अभी उठा नहीं?

‘नहीं-नहीं, हम दोनों सोते तो साथ में ही हैं, बस जागते अलग-अलग हैं।’ मैंने तपाक से उत्तर दिया तो वे मंद-मंद मुस्कुराने लगे। मेरी बात का दूसरा अर्थ निकलता देख मैं शर्म से लाल हो गई और मैं कुछ कह न पाई।

तन्वी कौशिश ‘रुद्राक्ष’, बीकानेर (राजस्थान)

कथा-कहानी

लड्डू खिलाने के दिन

ये बात 25 साल पहले की है, तब मेरे देवर की नई-नई शादी हुई थी और मेरी शादी को 10 साल हो चुके थे। मुझे कई दिनों से पीरियड नहीं आ रहे थे। मैंने सोचा कि हार्मोन्स चेंज की वजह से पीरियड नहीं आ रहे। मैं जब डॉक्टर को दिखाने गई तो मेरे दिन चढ़ गए थे। जब डॉक्टर ने मुझे ये बात बताई तो मुझे बड़ी शर्म आई। इसके बाद मेरी सास ने अपनी बेटी को ये बताई तो वो हंसने लगी और कहने लगी लड्डू खिलाने के दिन तो छोटी (देवरानी) के होने चाहिए और खिलाने की तैयारी बड़ी कर रही है। उसको सुनकर मुझे बहुत शर्म आई।

राखी मैहरोत्रा, नई दिल्ली

कथा-कहानी

फर्ज अदा करना था

शादी से पहले से मेरी आदत रही है कि चुनाव आने पर मैं वोट जरूर डालने जाती हूं और वो भी सुबह पहले-पहले। अभी संपन्न हुए लोकसभा के चुनाव में आदत के मुताबिक मैं मतदान करने सुबह-सुबह घर से निकल पड़ी। गर्मी का मौसम होने के कारण बूथ पर काफी भीड़ थी। ऊपर से कुछ देर के लिए ईवीएम भी बंद हो गई। नंबर बहुत देर से आया। वोट देकर घर पहुंची तो देरी हुई। देखती क्या हूं कि बूढ़े सास-ससुर, पतिदेव और बच्चे बिना चाय-नाश्ते के बैठे मेरी राह देख रहे थे। ‘यह तो अच्छा है कि चुनाव 5 साल में आते हैं, अगर रोज हों तो हमें यूं ही नित्य बगैर नाश्ते के रहना पड़ता।Ó पतिदेव ने चुटकी ली तो सभी मुस्कुरा दिए। इस पर मेरा चेहरा शर्म से लाल हो गया, पर मन ही मन इस बात का संतोष भी था कि मैंने वोट डालकर अपना फर्ज निभाया।

कुनिका शर्मा, बीकानेर (राजस्थान)

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