कल ही एक साथी कर्मचारी ने बताया था कि सोशल नेटवर्किंग के माध्यम से आप किसी से भी जुड़ सकते हैं, देख सकते हैं, बातें कर सकते हैं। अतुल के दिल में आशा की किरण जाग गई, शायद दुनिया की इस भीड़ में शेफाली से दुबारा मुलाकात हो जाये और दूसरे ही दिन न जाने क्या सोचकर अतुल ने इएमआई वाला एक स्मार्ट फोन ले लिया। उसकी उंगलियां शेफाली के नाम को ढूंढ़ती रहती पर…शेफाली नहीं थी, कहीं नहीं थी। नम्रता ने एक दिन दबे स्वर में कहा भी था, ‘वैसे भी घर के बहुत सारे खर्चे हैं, बच्चों के स्कूल की फीस भी अभी जमा नहीं हुई। इसकी क्या जरूरत थी।’

‘क्या अब तुम बताओगी मेरी क्या जरूरत है, क्या नहीं।’

अतुल की बात सुन नम्रता का चेहरा उतर गया। नम्रता की गलती सिर्फ इतनी ही तो थी, उसने अतुल से शादी की थी। अतुल को खुश रखने के लिए उसने कितनी कोशिश की थी, शादी के वक्त किसी ने उससे कह दिया था कि अमित को मीठा खाना बहुत पसंद है। मां-पापा को मधुमेह था पर वो बिना नागा उसके खाने के डिब्बे में मीठा रखना नहीं भूलती। शायद वो अपने सम्बन्धों के बीच आई इस कड़वाहट को मीठे से दूर करने की नाकाम कोशिश कर रही थी। अतुल जब ऑफिस में टिफिन बॉक्स खोलता सहकर्मी लपक कर उसकी तरफ चले आते। नम्रता के हाथों के स्वादिष्ट खाने के सब कायल थे पर जिसको खाना पसंद आना चाहिए वो मुंह में एक कौर भी न डालता।

‘…और अतुल बाबू, आज भाभी ने क्या भेजा है?’

अतुल चुपचाप डिब्बा साथी कर्मचारियों की तरफ सरका देता और मिठाई चपरासी के हाथों में दे देता, न जाने क्यों एक अजीब-सा सुकून उसके चेहरे पर पसर जाता। कभी-कभी उसे ऐसा लगता कि वो इस तरह से नम्रता को अतुल से शादी करने की सजा दे रहा हो। 

‘मैं नहीं मना कर पाया तो क्या नम्रता मुझ से शादी करने से मना नहीं कर सकती थी! कहां मैं और कहां वो, एक बार तो सोचना चाहिए था पापा को…, पर नहीं, ऐसी लड़की गले से बांध दी जिसका जीवन घर से शुरू होता है और घर पर खत्म होता है। पापा की दवाई, मां की एक्सरसाइज, बच्चों का स्कूल, बिजली का बिल, मौसी जी के पोते के मुंडन में नेग-व्यवहार हर चीज उंगलियों पर रहती है। क्या ऐसी लड़की चाहिए थी उसे जिसे दुनिया की तो फिक्र है पर अपने पति को क्या पसन्द है, इसका ख्याल भी नहीं।

शादी की शुरुआती दिनों में नम्रता अतुल की गाड़ी के हॉर्न पर दौड़ी चली आती, कमर तक झूलती चोटी, आंखों मे काजल, करीने से काढ़े बाल, माथे पर सिंदूरी बिंदी का रंग अतुल के आगमन की सूचना से और भी सिंदूरी हो जाता। उसकी खुशी चेहरे से टपकती थी। एक बार उसने कितना हुलस कर पूछा था, ‘चमचम कैसा बना था, मम्मी से पूछकर बनाया था।’ और अतुल ने कितनी बेदर्दी से कहा था, ‘पता नहीं, मुझे मीठा पसन्द नहीं, ऑफिस के चपरासी को दे दिया, कैसा बना, कल चपरासी से पूछकर बताऊंगा।’ नम्रता की आंखे छलछला गईं, पर अतुल का दिल नहीं पिघला।

मन की झुंझलाहट सम्बन्धों पर साफ दिखती थी। पापा सब चुपचाप देख और समझ भी रहे थे, पर जवान बेटे से कहते भी तो क्या। नम्रता पापा की पसन्द थी, धीरे-धीरे वो सबकी पसन्द बन चुकी थी पर जिसका हाथ थामे वो इस घर में आई थी वो उसकी पसन्द कभी न बन पाई। पापा ने एक दिन अतुल से कह भी दिया, ‘अतुल पानी पर लिखा इंसान खुद पढ़ता है, पर पत्थर पर लिखा दुनिया पढ़ती है, अब तय तुम्हें करना है कि अपनी जिंदगी की कहानी तुम पानी पर लिखना चाहते हो या पत्थर पर।’

अतुल की झुंझलाहट और भी बढ़ जाती, क्या था नम्रता में ऐसा जो हर आदमी उसके नाम की माला जपता है, वो…वो शेफाली के पैर की धूल भी नहीं। 

अतुल शेफाली को कभी भूल नहीं पाया, शेफाली उस चांद की तरह थी जिसे न पा पाने की कसक अतुल को जीवन भर सालती रही। दिन गुजर रहे थे पर अतुल की जिंदगी मानो थम सी गई थी। वो मशीन की तरह काम करता, इन दिनों उसका अवसाद और भी बढ़ता जा रहा था। वो घर से बाहर रहने के बहाने ढूंढने लगा था, बॉस से कहकर वो ओवर टाइम भी करने लगा। वो नम्रता की परछाई से भी दूर भागने लगा था। आज ऑफिस में सुबह से ही बहुत चहल-पहल थी। एक नई महिला बॉस की नियुक्ति हुई थी, सुना था बड़ी सुंदर और तेज तर्रार है। एक साथी मित्र ने चुटकी लेते हुए कहा भी था…चलो ऑफिस में मन लगा रहेगा।

अतुल मुस्कुरा कर रह गया। सब नए बॉस से मिलने ऑफिस की तरफ चल पड़े, उसी भीड़ में अतुल भी था। नई बॉस सभी का अभिवादन स्वीकार कर रही थी।

‘थैंक यू, थैंक यू वेरी मच, अच्छा लगा आप सभी से मिलकर। उम्मीद करती हूं आप लोगों को भी अच्छा लगा होगा।’

सबके चेहरे पर एक मुस्कान आ गई, अपनी नई बॉस से मिलकर एक-एक कर सभी कमरे से बाहर निकल जाए।

‘मिस्टर अतुल…! आप यहीं रुकें, आपसे कुछ जरूरी बात करनी है।’

‘जी! शेफा…!!’

शब्द गले में अटक से गए, शेफाली को अपने बॉस के रूप में देखकर अतुल आश्चर्य में था। उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि शेफाली से इस तरह से मुलाकात होगी। सबके जाने के बाद शेफाली तेजी से उठी और पर्दा खींचकर अतुल की बगल वाली कुर्सी पर बैठ गई।

‘व्हाट ए प्लेज़ेंट सरप्राइज अतुल!! तुम यहां, मैं तो सोच भी नहीं सकती थी कि तुमसे जीवन में इस तरह मुलाकात होगी। और सुनाओ शादी-वादी की कि नहीं।’

शेफाली एक सांस में बोलती चली गई, अतुल के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कुराहट फैल गई। अतुल को अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हो रहा था जिस लड़की को उसने इतनी शिद्दत से चाहा था उससे इस तरह मुलाकात होगी। कुछ भी तो नहीं बदला था, शेफाली वैसी ही चंचल, शो$ख और बिंदास थी। बिना बांह के ब्लाउज पर प्योर शिफॉन की साड़ी को उसने बड़े सलीके से लपेट रखा था। तीर कमान सी भौहों के मध्य एक छोटी-सी गोल काली बिन्दी, लाल रंग की लिपस्टिक से रंगे होंठ और बालों को करीने से काढ़कर बनाया हुआ फ्रेंच नॉट उसके चंचल चेहरे को एक अलग आभा दे रहे थे। कान के पास लटकती लटें, मानो उसके चेहरे के साथ आंख-मिचौली कर रही थी।

‘हेलो मिस्टर अतुल…!! मैं आपसे ही बात कर रही हूं। कहां खो गए यार। आदत नहीं गई तुम्हारी। कॉलेज में भी तुम ऐसे ही बात करते-करते न जाने किस दुनिया में खो जाते थे। और सुनाओ सब कहां हैं। राहुल, विनय, संतोष और वह जया, गीता और हां सीमा की शादी कहां हुई?’

‘सब ठीक हैं। राहुल, संतोष जॉब में हैं। विनय अपने पापा के साथ बिजनेस संभाल रहा है। मिल तो नहीं  पाता पर फोन से कभी-कभी बातचीत हो ही जाती है।’

‘गुड यार…अर्चना कहां है?’

‘तुम्हारे जाने के बाद एक-एक करके सबकी शादी हो गई। शादी के बाद उनसे कोई कांटेक्ट नहीं हो पाया।’

‘क्यों! आजकल के जमाने में इतने सारे तरीके हैं फिर भी।’

शेफाली ने बड़े ही आश्चर्य से अतुल की तरफ देखा, ‘शेफाली शादी के बाद जिंदगी इतनी आसान नहीं होती है। हो सकता है उसके ससुराल वाले इतनी खुली सोच के ना हों, इस कारण वह कॉलेज के मित्रों से संपर्क नहीं रख सकी। कभी-कभी पतियों की भी रजामंदी नहीं होती ऐसे में किया भी क्या जा सकता है। छोड़ो यह सब बातें।’

न जाने क्यों शेफाली का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।

‘नफरत है मुझे ऐसी सोच से।’

‘क्या हुआ शेफाली तुम इतनी नाराज क्यों हो गई, इसमें नया भी क्या है। यह तो हमारे समाज में हमेशा से होता आया है। क्या तुम्हारे पति ने तुम्हें कभी नहीं रोका।’

शेफाली के चेहरे का रंग बदल गया।

‘शादी माई फुट। मुझे इस शब्द से भी नफरत है।’

शेफाली का चेहरे का रंग बदल गया, शेफाली धम्म की आवाज के साथ कुर्सी पर बैठ गई। वो गुस्से से कांपने लगी। कमरे में गहन सन्नाटा पसर गया। शेफाली की हालत देखकर अतुल की आगे पूछने की हिम्मत नहीं हुई। तब शेफाली ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘विराट और मैं दो साल पहले ही अलग हो चुके हैं।’

‘मैं माफी चाहता हूं, मुझे पता नहीं था कि तुम्हारा तलाक हो चुका है।’

‘तुम क्यों माफी मांग रहे हो, जिसे माफी मांगनी चाहिए उसे तो इस बात का अहसास भी नहीं था कि मैं पल-पल कैसे जी रही थी।

अतुल को समझ में नहीं आ रहा था कि इस परिस्थिति में वह क्या करे, क्या न करे। वह अजीब सी स्थिति में उलझ गया था पर शेफाली उसकी मनोस्थिति से अनजान अपनी ही रौ में बोलती जा रही थी।

‘विराट एक मल्टीनेशनल कंपनी में बहुत बड़े पद पर थे। शादी के वक्त मैंने सोचा था कि हम दोनों जॉब करेंगे। ऐश से जिंदगी कटेगी पर जानते हो अतुल, विराट और उसकी फैमिली। ओ माय गॉड। विराट अपने माता-पिता के इकलौते बेटे हैं। छोटी बहन की शादी नोएडा में हुई है, विराट और उसका परिवार मुझसे चाहते थे कि मैं घर में बैठ कर गृहस्थी संभालूं। गृहस्थी! हम्म! यही सब करने के लिए क्या मैंने इतनी पढ़ाई की थी! उस घर में कोई चैन से सोने भी नहीं देता था। 8.00 बजे सुबह मम्मी जी के मंदिर की घंटी बजने लगती। शेफाली बेटा 8.00 बज गए हैं, कह-कह कर पापा घर सर पर उठा लेते।’

न जाने क्यों अतुल के चेहरे पर एक मुस्कान आ गई। 

‘जानते हो अतुल, विराट के पापा एकदम फिल्मी टाइप वाले ससुर थे, उन्हें पार्वती और तुलसी टाइप वाली बहू चाहिए थी। जानते हो क्या कहते थे! शेफाली हम लोगों के सामने नहीं तो कम से कम रिश्तेदारों के सामने पल्लू कर लिया करो। बहू पल्लू करने वाली चाहिए थी तो ले आते किसी छोटे शहर या गांव की लड़की, मेरी जिंदगी क्यों बर्बाद कर दी। कहते थे, शेफाली चार लोग का ही तो परिवार है, विराट को ऑफिस से आ जाने दो, साथ मिलकर खाते हैं।

अरे यार भूख लगी है तो खाओ, टीवी देखो और अपने अपने कमरे में जाकर सो जाओ, पर नहीं। अतुल हमारी तो कोई पर्सनल लाइफ ही नहीं थी। झक मारकर सबके साथ खाना खाना पड़ता, जब विराट से कहती तो विराट भी हंसकर टाल देते। मैडम इसे ही परिवार कहते हैं, इन सब छोटी-छोटी बातों से ही प्यार बढ़ता है। सच बताऊं तो मेरा खून जल जाता, ऊपर से विराट की छोटी बहन जब देखो तब हर दूसरे महीने टपक पड़ती। आते ही फरमाइश कार्यक्रम शुरू, भाभी बहुत दिन हो गए आपके हाथ का कुछ खाये। अरे यार मैं कुक थोड़ी हूं। इतना ही खाने का मन है तो चले जाओ होटल, खा लो जी भर के।’

शेफाली लगातार बोलती जा रही पर अतुल… वो अपने ही खयालों में गुम था। नम्रता का मासूम चेहरा उसकी आंखों के सामने से गुजर गया। दिनभर परिवार के लिए जीती और जूझती अचानक से उसे खूबसूरत लगने लगी थी। वर्षों पहले शेफाली के साथ जीवन बिताने का सपना तो कब का चूर-चूर हो चुका था पर ईश्वर ने उसकी झोली में जो अनमोल उपहार के रूप में नम्रता को डाला था, वो उसकी कदर भी न कर पाया। नम्रता ने तो सिर्फ उसकी आंखों में अपने लिए विश्वास और प्यार ही तो चाहा था और वो उसे भी न दे पाया। अतुल काम का बहाना करके शेफाली के केबिन से बाहर निकल आया। आज वर्षों बाद उसने अपना टिफिन खोला। नम्रता के हाथों का बना लड्डू बड़ी उम्मीद से उसे देख रहा था। अतुल ने वो लड्डू मुंह में डाल लिया, उसके चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान थी। आज उसे अपने पापा की पसन्द पर गर्व हो रहा था।

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