चुनाव सर पर था। हाईकमान का आदेश था कि हम आचार-संहिता लागू होने के पहले पूरे क्षेत्र का सघन दौरा कर लें। कोई गांव, कस्बा, वार्ड, शहर किसी प्रकार छूटने न पाए। हाईकमान के आदेश पर इसके लिये हमने पिछले महीने जनता-रथ निकाला था। अब उन्होंने हमें जन-रैली करने का आदेश दिया है। क्षेत्र के गांव-गांव, वार्ड-वार्ड जाकर जनसम्पर्क हम पहले ही निबटा चुके थे। सच कहूं तो हमें सांस लेने तक की फुर्सत नहीं थी। हाल यह था कि रात सपने में भी हम अपने को चुनाव प्रचार करते देखते।

अभी पिछले दिनों रात सपने में मैंने देखा कि मैं अपने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ चुनाव प्रचार करते हुए नारा लगा रहा हूं। जैसे ही मैंने मुक्का बांध कर नारा लगाया, ‘जनतंत्र पार्टी जि़ंदाबाद, जि़ंदाबाद…!’ वैसे ही मुझे श्रीमती जी की हृदय विदारक चीख सुनाई पड़ी, ‘हाय, मैं मर गई रे…!’ मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। देखा तो सामने श्रीमती जी नाक दबाए चीख रही थीं और उनकी नाक से खून का परनाला बहा जा रहा था। उन्होंने प्रगट में और छुपे रूप में मुझे कैसा-कैसा सरापा यहां बताना सम्माननीय पति महोदयों का घोर अपमान होगा। मैं उन्हें तुरंत अपने फैमिली डाक्टर के पास ले गया। एक्स-रे से पता चला कि नाक की हड्डी टूट गई है। इलाज-उपचार में हजारों खर्च हो गये। महीनों मुझे पार्टी के चुनाव प्रचार के साथ घर की रसोई संभालनी पड़ी। कामवाली बाई के न आने पर झाड़ू-पोंछा करना पड़ा, उसका दर्द मैं ही जानता हूं। अब वो ठीक हैं पर इधर वो दूसरे कमरे में मुन्नू के साथ सोती हैं।

आजकल की राजनीति तो आप जानते ही हैं बिना बानरीय उछल-कूद, मार-पीट, पत्थर-बाजी सर फुटौव्वल, हाथ-पैर तुड़व्वल के चुनाव-प्रचार का न श्री-गणेश होता है न समापन! अब तो इधर पिस्तौल-बंदूक से गोलिया भी चलने लगीं हैं, बम भी फटने लगे हैं। हो सकता है आने वाले अगले दशक में चुनाव-प्रचारक-महावीर अपने साथ अणु-परमाणु बम और मिसाइल लेकर निकलें! लगता है यह चुनाव प्रचार न हो, रावण की हुड़दंगी, राक्षसी बेलगाम सेना हो। कल मैंने घबराए हुए, भयभीत पार्टी कार्यकर्ताओं की सलाह पर हाईकमान के नाम चिट्ठी लिखकर निवेदन किया है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव-प्रचार के लिए जाने के पहले वे पार्टी कार्यकर्ताओं को जिरहबख्तर प्रदान करने की अनुकम्पा करें। अब देखिये आगे क्या होता है!

अरे देखिये तो, अपनी चुनावी रोना रोते-रोते मैं पार्टी के जिला-अध्यक्ष राय साहब के पास जाना ही भूल गया! वे क्षेत्र के लोकप्रिय और कद्दावर नेता हैं। उन्हें कैसे भी करके चुनाव-प्रचार के लिए मनाना जरूरी है। चुनाव में जातीय वोट भी बड़े माने रखते हैं। अभी आठेक दिन ही हुए हैं उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिले। जनता-रथ निकालने के समय किसी विरोधी पार्टी के मुक्केबाज गुंडे के मुक्के से उनके सामने के तीन दांत टूटकर उनकी हथेली में आ गये थे। एक पत्थर उनकी खोपड़ी को खून से खोलती निकल गई थी वह अलग! वे घटना-स्थल पर खून से नहाए साक्षात भैरो बाबा के अवतार लग रहे थे। वे मेरी बाहों में गिरे और शक्तिबाण खाए लक्ष्मण की तरह चेतना खो बैठे। हालांकि विरोधी पार्टी के किसी लठ्ठबाज गुंडे के अचूक प्रहार से मेरी भी खोपड़ी रक्तरंजित थी पर मैं किसी तरह अपने को संभाले हुए उन्हें तुरंत अस्पताल ले आया था।

अब जब वे स्वस्थ हो गये थे तो मैं अगले चुनाव-प्रचार की रणनीति हेतु तैयारी के लिए उनसे मिलने उनके घर पहुंचा। वे अब भी बिस्तर पर ही थे। मुझे देखकर वे हल्के से मुस्कुराए। किसी कमरे की टूटी खिड़की की तरह बिना दांतों वाला उनका मुंह हल्का-सा खुला। मेरे कुछ बोलने के पहले वे तुतलाते हुए बोले, ‘दिनेश दी… मुझे थमा करें। मैंने पोट्टी को अपना इस्तीफा-लेटर भेद दिया है। दान है तो दहान है। ये थाला तुनाव पचार है कि लाम-लावन-युद्ध! ऐथी मार पचास थाल की उम्र में मैंने कभी नहीं थाई! विपत्थी हैं कि दुन्दों-बदमाथों, हतियारों  की पोट्टी…! थाला लोकतंत्र है कि ठोक-तंत्र…! बस हाथ में जो मिले, विपत्थी को ठोको…! दान ले लो…!’ तभी कमरे में उनकी श्रीमती जी का प्रवेश हुआ। उन्होंने आग्नेय नेत्रों से मुझे वैसे ही घूरा जैसे कभी महाभारत कथा में गांधारी ने दुर्योधन के मारे जाने पर कृष्ण को शाप देने के पहले घूरा होगा! मैं फिर मिलने का बहाना बना, दोनों हाथ जोड़ते हुए उठा और बाहर चला आया। खामोख्वाह कौन शाप मोल ले…!

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