सोच का फर्क
soch ka farak

Hindi Kahani: सास-बहू का रिश्ता ऐसा होता है, जो परायेपन से अपने तक की दूरी तय करता है। ऐसा हो, इसके लिए जरूरी है बदला नज़रिया। पढ़िए, इसी महत्त्व को बताती ये कहानी-

अतुल सालों बाद विदेश से लौटा था। एयरपोर्ट से सीधे अपने शहर की ट्रेन उसने पकड़ी थी। चार सालों तक विदेश में रहने के बाद अबकी बार उसे छुट्टी मिली थी। शहर तक जाने के लिए रात की ट्रेन ही उसे सबसे सुविधाजनक लगी थी।

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एसी अपार्टमेन्ट में खुद को सहज महसूस करने के बाद उसने यादों की फेहरिस्त को टटोला। शहर की कचौरियां, नमकीन, मिठाई उसे याद आ गईं। मुंह में पानी आ गया। विदेशों में ऐसा स्वाद कहां था, बल्कि वहां तो यह व्यंजन देखने को भी नसीब नहीं होते थे। भूले-बिसरे, अच्छे-बुरे रिश्तेदार, मित्र भी उसे याद आ रहे थे। बड़े दिनों बाद उनसे वह मिलेगा। सुबह जब ट्रेन स्टेशन पर पहुंचने लगी तो मां का चेहरा उसे सबसे ज्यादा याद आने लगा।
छोटा भाई स्टेशन पर लेने पहुंच गया था। दोनों के बीच रास्ते भर बातों का आदान-प्रदान हुआ। घर पर मां प्रतीक्षा कर रही थी। बड़े बेटे को देख कर आंखों की चमक चौगुनी हो गई। मां ने उसके नहाने-धोने के बाद आराम करने को कहा। अतुल थका हुआ भी था, सो जल्दी ही नींद आ गई। बच्चों के शोर से नींद खुली तो दोपहर हो चली थी। दोनों बच्चे बड़े प्यार से ताऊजी से मिले। थोड़ी बहुत चॉकलेट्स, जो वो लाया था, उनमें बांट दी।
दोपहर के लंच के दौरान कई किस्से आदान-प्रदान हुए। मां के हाथ का ढोकला, मक्के के व्यंजन, अचार दोबारा चखने को मिला तो लगने लगा कि अपने देश में जिंदगी कितनी सुकूनदायक है। अपना देश, अपने लोग, अपना खाना-पीना। विदेशों में तो दशहरा, दीवाली भी अनुमति से मनानी पड़ती है, त्यौहार का मजा ही नहीं रह जाता। वहां पैसा तो है, पर एक अजीब सा खालीपन है। हालांकि वहां पर काम करने की जिद भी उसी ने की थी। फिर बहन और जीजाजी ने अपने माध्यमों के प्रभाव से उसकी नौकरी लगवा दी थी, पर काम का दबाव बहुत था और आराम-सुरक्षा तथा स्थायित्व तो बिलकुल नहीं। विदेशों में दो पैसा कमा के, वहां की लक्जरी लाइफस्टाइल से भले ही आप पड़ोसियों को प्रभावित कर लें, पर मन-ही-मन तो उस तोते की तरह महसूस करते हैं, जो पिंजरे में महंगा खाना खाता है लेकिन उड़ नहीं सकता। 10-15 दिन तो पंख लगा के उड़ गए। बच्चों के साथ वॉकिंग पर जाना, रिश्तेदारों से मिलना, अपने पुराने सहकर्मियों से मुलाकात, कुछ लाइफ इंश्योरेंस के काम…। भाई का घर और उसका घर एक ही बिङ्क्षल्डग में थे। पत्नी की कभी मां से बनी नहीं या यूं कहें कि उसने भी आर्थिक लालच में बनाने की कोशिश ही नहीं की, सो मां उसके पास कभी नहीं रही। वही अपने बीवी-बच्चों समेत त्यौहारों पर छोटे भाई के घर आ जाता था। मां के कुछ छुटपुट खर्चों के अलावा समस्त खर्चे, रिश्तेदारों से लेन-देन सब छोटे के माथे थे।


भाई की बीवी नौकरीपेशा थी। घर-दफ्तर दोनों संभालती थी। कामकाजी होने के बावजूद भी उसने घर में सामंजस्य रखा हुआ था। अतुल मां की सहनशीलता व कार्यशैली को इसका जिम्मेदार मानता था। मां बहू को कुछ कहती ही नहीं थी। आगे बढ़कर काम कर देती थी। बाइयों के रहते हुए भी घर-गृहस्थी में अनेक काम होते हैं, मां सभी को साध लेती थी। गेहूं बीनना, अचार बनाना, बड़ियां व चिप्स डालना, यह सारे काम कहां बहू से सधते। वह तो ठहरी कामकाजी महिला। उस दिन तो हद ही हो गई। बहू की जोरों की आवाज उसके कानों में पड़ी। वह सुबह बच्चों के टि$िफन में ब्रेड पकौड़ा देना चाह रही थी और घर में ब्रेड नहीं थी। उसने मां को कहा कि वह मार्केट में ही थी, बता देती तो लेती आती। इतना सुनना था कि अतुल को गुस्सा आ गया। इतना शोषण। बेचारी विधवा बेसहारा मां का यह हश्र।
अतुल मां को अपने कमरे में ले आया। उसने मां से कहना शुरू किया कि बहू उनसे नौकरानी की तरह ट्रीट करती है। उनका शोषण-सा हो रहा है। भाई भी कुछ नहीं कहता, पर मां ने उसे चुप करा दिया। खैर जाने का वक्त भी आ गया। भरे गले से उसने मां से विदा ली। लग रहा था, मानो मां को जुल्म सहने के लिए छोड़कर जा रहा हो। मां ने उसकी मन:स्थिति भांप ली। वे बोली कि वह उसकी चिन्ता न करे। वह छोटे बेटे के साथ खुश है। बहू उसकी अपनी ही है और उसमें तथा अपने बेटे में वे कोई फर्क नहीं समझती हैं। अतुल ने हैरानी से मां की तरफ देखा। उनकी आंखों में दृढ़ निश्चय था।


कामकाजी होने के बावजूद बहू ने कभी भी स्वयं को घर से अलग नहीं समझा था। उनकी भावनाओं और जरूरतों का हमेशा ख्याल रखा और उसे मां का दर्जा दिया। थोड़े-बहुत झगड़े या मत वैभिन्न तो हर घर में होते हैं, घर के काम तो वह स्वयं टाइम पास करने के लिए और फिट रहने के लिए खुद ही करती हैं। छोटी बहू ने स्वार्थ नहीं, हमेशा घर का हित देखा। अगर हम बहुओं में कमी और उनके काम में मीन-मेख निकाल कर उन्हें अलग मानते रहेंगे तो परिवार में एकता कैसे बनेगी? परिवार में सामंजस्य नहीं होगा तो काम सधेंगे कैसे? बहू भी तो अपना घर छोड़कर ससुराल की हर रीत अपनाती है, फिर उसे हमेशा संदेह से देखना कहां तक उचित है? नौकरीपेशा होते हुए भी कभी काम-काज में चोरी नहीं की। घर में बेटी की तरह रही। देर हो रही थी अतुल को जाने के लिए। मां ने आशीर्वाद दिया तो उनके चेहरे पर तृप्ति थी। अतुल मां के इस मॉडर्न दृष्टिकोण पर हैरान था।