“हलो, हलो…मीरा बोल रही हूं, इट इज 57839…जी, जी…क्या?”

दीदी की इस ‘क्या’ के साथ हौक की सर्पीली दौड़ फिर से सीना रौंदने लगती है-‘धड़, धड़, धड़’…

रहा नहीं जाता । कातर दृष्टि से दीदी का चेहरा छीलती हूं, उनका तनाव से टूटता खिंचता चेहरा! घुटनों के नीचे ठंडी शून्य टांगों में सहसा हजार-हजार चींटियां रेंगने लगी हैं । मैं दीदी के तने हुए चेहरे को पुकारती हूं, “दीदी, दीदी!”

दीदी सुनने में व्यस्त हैं । क्या मेरी आवाज उन तक नहीं पहुंच रही? उनकी हुंकारियां तो बराबर मेरे कानों में गूंज रही!

“प्लीज!…प्लीज!…” गिड़गिड़ाती हुई-सी दीदी ने रिसीवर रख दिया । क्षण-भर बुत-सी टेलीफोन के करीब खड़ी रहीं, फिर मुड़कर मेरे निकट आ गई झुकीं, उनका हाथ मेरे माथे पर टिक गया ।

“ऐसे क्या देख रही है, पगली!” उनकी उंगलियां माथे से सरककर मेरे बालों को सहलाने लगीं । किंतु… सहलाहट रेंग-सी महसूस हुई । इच्छा हुई कि उनका हाथ झटक दूं…कुछ बताती क्यों नहीं कि…

“पुलिस का फोन था, कुकी!…सोनू की हुलिया के किसी बच्चे के पकड़े जाने या दुर्घटनाग्रस्त होने की उनके पास कोई सूचना दर्ज नहीं…”

दीदी का लंबा नि:श्वास ताजा हवा के ठंडे झोंके-सा महसूस हुआ ।

धीरे-से आंखें मूंद लेती हूं ताकि इस राहत को अगली सूचना तक अपने भीतर संजोए रख सकूं। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता । अगली सूचना के पूर्व ही वह आशंकाओं और अविश्वास के आवृत्त में कैद उद्विग्न-सी छटपटाने लगती है…

“कुकी!” दीदी की आवाज मुझे कहीं दूर-दराज से आती अनुभव हुई, “हिम्मत बांध । मुझे विश्वास है, बच्चा जहां भी होगा, सही-सलामत होगा, “दीदी कहे जा रही हैं, “तू तो जानती है, मेरा सोचा हुआ कभी गलत नहीं निकलता… याद नहीं, अम्मा अकसर बचपन में कहा करती थीं, मैया बैठी है बड़ी के कपाल में…”

लॉक खुलने की ध्वनि के साथ अचानक घर का दरवाजा खुला । दीदी चुप हो गईं। फिर “आइए!” कहकर मेरे सिरहाने से उठ खड़ी हुईं ।

“कइसा है दीदी कुकी को?”

आवाज पहचान लेती हूं । पड़ोसिन मिसेज पाटिल हैं ।

“क्या बताऊं ।” दीदी के स्वर में चिंता गहरा आती है, “बस इसे तबसे यही समझा रही हूं-हिम्मत बांध…”

“वो तो है, “मिसेज पाटिल सहमति में सिर हिलाती हैं, “देखो दीदी, आपको विश्वास होगा न, तो मैं एक बात बोलती… बांद्रा वेस्ट को वो ‘जरी-मरी’ का मंदिर है ना, उधर एक पंडित है, बोत पहुंचा हुआ । विचार करके बता देता है कि बच्चा किधर है, कब तलक वापस आएगा… कुछ जादू-टोने का लफड़ा होगा न… वो भी पता चल जाएगा-चलें क्या?”

दीदी ऊहापोह में पड़ गईं, “पीछे फोन वगैरह आया तो…?”

“सीमा है न! तब तलक बैठेगी । अपुन ताबड़तोड़ टैक्सी से जाएंगे ।”

“चलते है, चलो… कहीं कुछ…” कहकर दीदी अटकती हैं, फिर प्रश्न करती हैं, “कुछ लेकर चलना है साथ?”

“अभी नहीं, बच्चा मिल जाएगा तो जाके ग्यारह रुपए और फकत पांच नारियल दे देंगे ।”

करीब आकर मिसेज पाटिल ने सहानुभूति से मेरा हाथ अपने हाथों में दबा लिया, “ऐसा अफसोस करके नहीं बैठना… बच्चा स्कूल ड्रेस में है… बैग-बीग भी साथ में है, कुछ ऊंचा-नीचा घटता तो अभी तलक पता चल जाता…”

क्या जवाब दूं कहने के लिए है भी क्या? दीदी जैसी थीं ठीक वैसी ही पर्स उठाकर उनके संग निकल गईं । सीमा मेरे करीब आकर बैठ गई है, उसके शब्दों ने मुझे हलके से सहलाया, “सिर दबा दूं, मौसी ।”

“सीमा! सीमा!” मैं बेआवाज-सी बुदबुदाती हूं, माथे पर ठहरी हुई उसकी किशोर हथेलियों को खींचकर आंखों पर दबा लेती हूं। गोद में दुबके दुध-मुंहे बच्चे की गरमाहट-सा उसकी मुलायम गदेली का स्पर्श बूंद-बूंद धमनियों में उतर रहा है… भीतर कुछ घुमड़ने लगता है… सीमा क्षणांश जड़वत् बैठी रहती है, फिर धीरे-से अपनी हथेली मेरी पकड़ से छुड़ाकर उंगलियों से कनपटियों पर सरकता गीलापन कांछने लगती है, “तबीयत ज्यादा खराब हो जाएगी मौसी! चुप हो जाइए न, प्लीज!…”

 

आंखें खोलकर मैं सीमा को देखना चाह रही हूं.. सीमा का चेहरा मेरी भरी आंखों की जल सतह पर न किसी परछाईं-सा थर्रा रहा है… मैं उसे साफ देख भी नहीं पा रही… फिर सहसा लगता है, मैं उसे बिलकुल नहीं देख पा रही, सीमा मेरे पास बैठी ही कहां है… कमरे में सिर्फ मैं और सोनू हैं… सोनू स्कूल से लौटा है और पीठ मेरे सामने करके खड़ा हो गया है…

“बैग तो उतारिए जरा मम्मी!”

“बाबा, बैग है या आलू की बोरी”, मैं बैग उसके कंधों से अलग करती हुई बड़बड़ाती हूं, “पालने से उठकर खड़े नहीं हुए कि ढेरों कॉपी-किताबें… पढ़ाई है कि आफत ।” “फिर क्या! पीठ दुखने लगती है, मम्मी…”

“रोज इतनी कॉपी-किताबें लगती हैं तुझे कि सारी-की-सारी ढो ले जाता है?”

“फिर क्या!” सोनू अपने गालफुलाऊ अंदाज में जवाब देता है, “पता है कल इंग्लिश फर्स्ट की नोटबुक ले जाना भूल गया तो फादर ने रूलर से पिटाई की मेरी … मम्मी । एक नोटबुक भूल गया तो टीचर को फादर के पास नहीं भेजना चाहिए न? फादर बहुत गंदे हैं ।….”

“मौसी…ओ मौसी…” सीमा मुझे छूती हुई पूछती है, “कॉफी पीएंगी थोड़ी…?” सिर हिलाकर मना कर देती हूं उसे, घूंट भी नहीं भर सकूंगी… सोनू ने भला क्या खाया-पिया होगा… सुबह बस एक गिलास दूध पीकर-निकला था…

“पी लीजिए न… थोड़ी-सी बना लाती हूं, मौसी ।” सीमा अनुनय करती है । मैं फिर अकेली हो गई हूं…कुछ घंटों पहले बीत गई दोपहर, नीम के दातुन के कड़वे थूक-सी गले में रिसने लगी है… ।

तीन बज गए हैं और सोनू स्कूल से नहीं लौटा है… ।

मैं अधीर-सी बालकनी में जाकर खड़ी हो जाती हूं । दृष्टि मीलों लंबी हो गई है… सोसाइटी की चारों इमारतों के बीच भिंची हुई संकरी सड़क, स्टिल्स, छतें, गेट और फिर गेट से बाहर… दूर गायब होती हुई सड़क पर दौड़ने लगी है। इक्के-दुक्के दूधवाले मिल्क बूथ से स्टैंड में बोतलें लटकाए लौट रहे हैं ।

कुछ बच्चे नीचे आकर खेलने लगे है। उनका शोर मुझे अनमना कर रहा है… भरी दोपहरी में सोनू की जिद के बावजूद मैं उसे नीचे खेलने नहीं जाने देती लेकिन वह है कि आंख झपकती नहीं कि फट से नीचे भाग लेता और जब मेरी नींद उचटती है तो नीचे खेल रहे उद्दंड बच्चों की हुड़दंग में सोनू की आवाज सबसे तीखी होती… उसे बुलाने के लिए मैं बालकनी से आवाजें लगाती । पुकार सुनकर दुष्ट किसी

पेड़ के तने की ओट हो लेता ।… बच्चे कूदते-फांदते चिल्लाते, “आंटी! सोनू उधर छिपा है…उधर!”

“आंटी, आंटी! सोनू आया?…कुछ बच्चे मिलने आए हैं ।”

“आंटी! हम लोग उसका क्लासमेट विक्रम का घर जाकर आया, वो बोलता होता- आज सोनू क्लास में नई आया?… स्कूल बस में भी नई होता वो?”

बच्चों को जवाब देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं । मैं सिर्फ उन्हें सी नजर से ताकती रहती है…सूखे गले से कोई बोल नहीं फूटता ।

कंधों पर दीदी के हाथों का स्पर्श मुझे चौंका देता है ।

“कुकी, मिसेज स्वामी और मिसेज सिन्हा… कुछ को मैं पहचानती नहीं… मिलने आई हैं । बैठ तो जरा उठकर उनके मास…”

ड्राइंग रूम में वे सारे घर इकट्ठा हैं जिनके बच्चे सोनू के साथ पढ़ते हैं, खेलते हैं, पड़ोस में रहते हैं या किसी ने उसे गणेश उत्सव के ‘फैंसी ड्रेश शो’ में पुरस्कार पाते सराहा है ।… इतनी भीड़ देखकर मैं भीतर घबराहट महसूस करती हूं । घर में कभी पार्टी भी तो नहीं होती… दीदी से कहना चाहती हूं, बालकनी में खड़े रहकर मैं सिर्फ सोनू की प्रतीक्षा करना चाहती हूं…

“पुलिस में रिपोर्ट किया?” एक प्रश्न उन घरों में से उछला ।

जवाब दीदी देती हैं, “निखिलजी गए हैं रिपोर्ट करने…”

मिसेज स्वामी पूछती हैं, “सुबू, तुम उसको गुस्सा-वुस्सा तो नहीं किया?” मिसेज स्वामी का प्रश्न मुझे चौंका देता है । मैं रंगे हाथों पकड़े जाने के संकोच से सिमटकर नजरें नीची कर लेती हूं । किंतु अगले ही पल स्वयं को सहेज इनकार में धीरे से सिर हिला देती हूं और फर्श घूरने लगती हूं । मां और बेटे के बीच कुछ व्यक्तिगत नहीं हो सकता ।

“आजकल के बच्चे बड़े नाजुक मिजाज होते हैं । गुस्से-उस्से की तो छोड़ो, शिकन तक बरदाश्त नहीं कर पाते ।”

“एक ही लाठी से सबको हांकना ठीक नहीं… हां, बुरी संगत में पड़कर कोई दिमाग खराब कर ले तो बात और ।”

“सोनू किसी बुरी सोहबत में तो नहीं पड़ गया?”

“पड़ भी गया हो तो कोई अचरज नहीं”, मेरे जवाब देने से पूर्व ही कटाक्षपूर्ण स्वर में मिसेज श्याम कहती हैं, “स्कूल में आधे से अधिक बच्चे झोपड़पट्टी से पढ़ने आते हैं…मत पूछिए अंधेर! बाइयां चार घर भांडी कटका करती हैं पर बच्चों को पढ़ाएगी अंग्रेजी स्कूल में… आदतें बदलती हैं कहीं?…”

“झोपड़पट्टी वालों को ही क्यों दोष दे रहीं, लंबी गाड़ीवालों के बच्चों के ‘लच्छन’ किन चोर-उचक्कों से कम हैं? पिछले दिनों अखबारों में नहीं पोल-पट्टी छपी… सेंट जेवियर्स से लेकर ‘मॉडर्न स्कूल’ तक के अमीर बच्चों के कच्चे चिट्ठे… कि वे बस्तों में गांजा-चरस छिपाकर लाते हैं और दोपहर की छुट्टी में सुट्टा मारते हैं… पीते हैं तो संगी-साथियों को पिलाते भी होंगे… ।”

“मुझे तो सच पूछिए… यह स्कूल ही पसंद नहीं है । अगले साल मैं अपने रवि को निकाल लूंगी…”

“सोच तो मैं भी रही हूं । मुसीबत दाखिला मिलने की है।”

“सब हो जाता है; बस, जरा दौड़-धूप करनी पड़ती है।”

“दौड़-धूप धरी रह जाती है भैनजी, टेंट ढीली करनी पड़ती है, टेंट…काम तभी बनता है । मैंने तो इसी स्कूल में रिंकी के एडमीशन के पांच हजार भरे हैं…”

“सस्ते में छूट गई आप… मिसेज राठौर ने तो पूरे दस दिए है पिंकी के दाखिले के…”

टेलीफोन की घंटी ने एकाएक उनके बतरस में व्यवधान पैदा किया । दीदी उठकर सोने के कमरे में चली गईं… भीड़ के कान खड़े हो उनकी पीठ से चिपट लिये…

मेरी शिराओं में खून नहीं, पड़ोसियों की बातें-घातें सनसनाती बहने लगीं मथती हुई; लगने लगा कि अभी देह के किसी हिस्से में एक भयानक विस्फोट होगा और मैं धज्जियों में विभक्त हो किरच-किरच हो जाऊंगी…

हमदर्दी की संस्कृति क्या इतनी विकृत और घिनावनी होती है? …संवेदन शून्य! …कि लग रहा है, चीख-चीखकर इनसे कह दूं-सब-के-सब चले जाओ । नहीं दरकार तुम्हारी सहलाहट की । सोनू तुम्हारी बघनख सहानुभूति की चचटाइट पाए बगैर भी लौट आएगा… ठीक ही होगा… मैं भी ठीक हूं.. ठीक ही रहूंगी… न भी रहूं तो क्या…. “निखिल का फोन है, कुकी । वे यातायात पुलिस के दफ्तर में हैं… अभी तक तो कहीं कुछ पता नहीं चला”, दीदी लंबी उसासें भरकर बैठ गई हैं मेरे सिरहाने ।

“बेचारा सोनू! पता नहीं भूखा-प्यासा कहां भटक रहा होगा…”

बघनख मेरे आसपास फिर से तनने लगे हैं और मुझे लग रहा है, मैं किसे आवाज दूं जो इन्हें धक्का मार-मारकर इस कमरे से बाहर फेंक दे ?…

“तुम अलमारी चेक किया, कुकी? कुछ चोरी-वोरी करके तो नई ले गया, सोनू! बच्चा लोगों को जास्ती सिद्धा नहीं समझना…” मिसेज कोटियन का संदिग्ध स्वर भाले की तीखी अनी-सा मेरी ओर तन आया । किसी को कोंचने की सीमा होती है ।

मेरी आंखों में भीतर का लावा फूटने लगता है…

दीदी संयम नहीं खोतीं, “सोनू ऐसा बच्चा नहीं है, मिसेज कोटियन, पूछे बिना वह किसी चीज को छूता तक नहीं, फिर..?”

दीदी मुझे टेका देकर उठाती हैं और हितचिंतकों के हमलों से बचाकर सोने के कमरे में लाकर लिटा देती हैं…

करवट भरकर तकिये में मुंह गड़ा लेती हूं । मिसेज स्वामी की कुरेद हथौड़ी की धमक-सी मस्तिष्क में प्रतिध्वनित हो रही, ‘गुस्सा-उस्सा तो नई किया तुम ?… गुस्सा-उस्सा तो… ‘

क्या सचमुच सोनू मेरी बात से नाराज होकर कहीं चला गया है? अनुशासन की बात इतनी कड़वी तो नहीं थी कि… दृश्य आपस में गड़मड़ा रहे हैं… ।

दरवाजे से बाहर होते-न-होते सोनू घूमकर खड़ा हो गया…”मम्मी टट्टी आई बैग पकड़ना जरा…”

“शिकार के समय कुतिया हगासी! कोई-न-कोई बहानेबाजी ताकि स्कूल-बस छूट जाए? हां ।” मैं उसकी बांह दबोचकर झकझोरती हुई भन्नाई, “चुपचाप बस्ता उठाओ और चलते बनो । परीक्षा सिर पर खड़ी है, नहीं जानते? उठाते-उठाते मैं तंग आ जाती हूं और तू है कि उठके ही नहीं देता । जैसे तुझे स्कूल नहीं, सैर-सपाटे के लिए निकलना है।”

सोनू कंधों पर बस्ता लादे अपलक मेरा मुंह ताकता रहा । उसकी ढिठाई देख मेरी खीज गहरा उठी, “घड़ी देख! देख, सात बज रहे हैं…”

“ममी, अगर मैं लैट्रिन जाता तो एक मिनट में बाहर भी आ जाता… अब तो सचमुच लेट हो गया…यह सब आप मुझे लौटने पर भी समझा सकती थीं न! चलिए, अब लेट नोट लिखकर दीजिए-मैं के.जी. वाली बस से चला जाऊंगा.. प्लीज, मम्मी ।…वरना फादर सीधा स्कूल से लौटा देंगे…प्लीज ।”

उलटा चोर कोतवाल को डांटे? मेरे अहम पर जैसे खौलता पानी पड़ गया । गले की कर्कशता चीख में बदल गई, “कुछ लिखकर नहीं दूंगी, समझे और इतना याद रखो, फादर ने अगर तुम्हें लेट होने पर लौटाया तो मैं तुम्हें घर में भी नहीं घुसने दूंगी, समझे?”

गुस्से से उबलती हुई मैं रोज की तरह उसे लिफ्ट तक छोड़ने भी नहीं गई । डेढ़ बजे सारे बच्चे स्कूल से लौट आए, पर सोनू नहीं लौटा । मन को दिलासा देती रही, किसी के साथ खेल-खाल रहा होगा, कुछ देर बाद स्वयं ही आ जाएगा । लेकिन ढ़ाई-तीन बजे तक जब वह घर नहीं लौटा तो मन भांति-भांति की आशंकाओं से घिर उठा । वैसे भी स्वभाव से सोनू संकोची है, किसी के घर आता-जाता भी नहीं । और इतना लापरवाह भी नहीं कि स्कूल से लौटने के बाद घंटों वह बच्चों के संग खेलता रहे । समझ में नहीं आ रहा था करूं क्या? अस्थिर मन से पहले मैंने दीदी को फोन पर सोनू के न लौटने की इत्तिला दी; फिर थर्राती उंगलियों से निखिल के दफ्तर का नंबर घुमाया । उन्हें बता दिया कि स्कूल-बस आकर चली गई । साथ के बच्चे लौट आए । बच्चे बता रहे हैं कि वह बस में नहीं था ।…

निखिल और दीदी तकरीबन साथ-साथ ही घर पहुंचे ।

स्कूल, पास-पड़ोस, बगीचों…रिश्तेदारों…रेलवे प्लेटफॉर्म…पुलिस स्टेशन…ट्रैफिक दुर्घटना सूची…रेलवे दुर्घटना सूची…बाल सुधार गृह निखिल विक्षिप्त से स्कूटर लिये दौड़ रहे थे । दीदी ने ढूंढ-ढांढ़कर न जाने कितने रिश्ते के पुलिस अफसरों को फोन कर डाला है..सभी आश्वासन दे रहे हैं..बस, एक ही काम मुझसे नहीं हो रहा । निखिल ने सोनू का एक ताजा फोटो निकालकर रखने के लिए कहा है जो शायद वे दूरदर्शन और अखबारों में ‘गुमशुदा’ की तलाश के रूप में देना चाहते हैं ।

शाम को निखिल के दफ्तर से कई लोग हिम्मत बंधाने आ गए । सभी दफ्तर से सीधे मिलने आए थे । सोनू के खो जाने की चिंता में उनके जबरन ओढ़ी कुम्हलाहट से संवलाए चेहरे भीतर कुनमुनाती चाय की दरकार को छिपाए नहीं छिपा पा रहे थे । दीदी ने बैठक में ही उन्हें चाय पिलाई, फिर मुझसे मिलाने सोने के कमरे में ले आईं । सभी लोग मेरी नाजुक हालत देखकर परेशान हो गए । कोई एक शायद मिस्टर डेविस दीदी को सुझाव देते हैं कि मुझे एहतियातन डॉक्टर को दिखा लिया जाए । दीदी उन्हें मेरी हिम्मत के विषय में आश्वस्त करती हैं, “मां का दिल है, भाई साहब…पत्थर भी है, मोम भी…” वे दीदी से कह रहे हैं, “कल का पेपर आपने पढ़ा ही होगा! आजकल शहर में बच्चों को उड़ानेवाला एक खतरनाक गिरोह सक्रिय है ।”

“अच्छा!” दीदी का स्वर अनिष्ट की आशंका से कांप उठा । दूसरे सज्जन अपनी ताजा जानकारी परोसने को बेसब्र हो आए और उनके सुर-में-सुर मिला एक हादसा सुनाने लगे, “बहन मेरी अंधेरी में रहती है, साहब! उनकी बिल्डिंग का एक बारह साल का बच्चा अचानक खेलते-खेलते गायब हो गया । और साहब!…दो दिन बाद उसकी लाश पवई लेक में तैरती पाई गई । पुलिस का अनुमान है, इन अपहरणों में तांत्रिकों का हाथ है ।”

“उफ”, मेरा कंठ सूख रहा है, घूंट-भर पानी चाहिए… घूंट-भर मैं दीदी को पुकारना चाहती हूं… हाथ से संकेत करना चाहती हूं; मगर न स्वर फूट रहा है, न निर्जीव हो रही देह का कोई अंग ही नियंत्रण में है…

सूखे होठों पर जीभ फिराती हूं । दीदी क्यों नहीं डपट देती उन्हें? लेकिन पाती हूं कि दीदी भी अफवाहों की परिचर्चा में रस ले रही हैं, “ओफ, कितने निर्दयी होते हैं ये गुंडे! सुना है कि बच्चों को सम्मोहित करके ले जाते हैं और…।”

“यही होता है…कुछ दिनों पहले एक ऐसी ही घटना कहीं पढ़ी…एक बच्चे को एक व्यक्ति न पता लिखा कागज पढ़ने को दिया । बस, उसके बाद उस बच्चे को होश ही नहीं रहा । घरवालों का अन्न-जल छूट गया । पर साहब, किस्मत के धनी थे घरवाले…दूसरे दिन सुबह दस बजे बच्चा अपने आप घर लौट आया । थका-हारा…जैसे रात-भर सोया न हो । पूछने पर बस यही जवाब देता, कुछ पता नहीं उसे कि कहां था, कैसे गया…इतना बताया कि एक आदमी उसे घर पहुंचा गया है, उसकी शक्ल भी उसे याद नहीं…”

सुनकर मेरी जान-में-जान आई, चलो बच्चा घर लौट तो आया…मेरे सोनू को भी कोई इसी तरह लौटा जाए…

“पुण्य किए होंगे किसी जन्म में सो बच्चा घर लौट आया”, दीदी उच्छ्वास भरकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती हैं, “वरना भरोसा क्या! सुना है कि हाथ-पैर तोड़कर भीख मंगवाते हैं…”

“बुरा वक्त है भई, बच्चों को कभी अकेला नहीं छोड़ना चाहिए ।”

“ठीक कहते हैं यार, मगर चौबीस घंटे की चौकीदारी थी तो आदमी के वश की नहीं ।”

मुझे सोनू के दोस्त राजू की मम्मी का स्वर सुनाई दिया, “मैंने कई बार कुकी को समझाया है…मियां-बीवी स्कूटर फटफटाते जब देखो चल देते हैं घूमने बच्चे को छोड़कर…वह बेचारा राजू के पास दस-ग्यारह बजे रात तक खेलता बैठा रहता है । कहता है, आंटी, बाई के साथ रहना मुझे अच्छा नहीं लगता है…”

“बड़ा मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है इन सब बातों का उनके कोमल मन पर । मुश्किल तो यही है कि पढ़े-लिखे मां-बाप ही बच्चों पर अधिक जुल्म करते हैं ।” मिस्टर डेविस ने तर्क किया ।

“हां, चौबीसों घंटे बच्चों का गो-मूत उठाना ही तो जीवन नहीं । खैर-ईश्वर सोनू को सही-सलामत लौटा दे…मैं तो सोनू के नाम का नारियल चढ़ाऊंगी श्रीराम मंदिर में ।” राजू की मम्मी कहती हैं ।

मंदिर की बात कानों में पड़ते ही मैं जैसे एकदम से निराधार हो उठती हूं । एकाएक मेरी सोई आस्था जागती है और सैकड़ों-सैकड़ों हाथ जोड़ असहाय-सी गिड़गिड़ाने लगती है । मैं आसपास के तमाम मंदिरों याद करने की कोशिश करती हूं और बारी-बारी से उनका प्रसाद मान लेती हूं कि सोनू लौट आएगा तो निश्चित ही मैं सबके दर्शन करूंगी ।

दफ्तर के लोग उठकर चले गए हैं…

दीदी टेलीफोन पर निखिल से बात कर रही हैं । सहसा उनका स्वर भराया-सा कमरे में धुंधलके में कांपता है…और मैं अपने ऊपर बर्फ की भीमकाय सिल्लियों का बोझ भारी होता महसूस करती हूं…

“निखिल सेंट जॉर्ज अस्पताल शिनाख्त के लिए जा रहे हैं…अपराह्न करीब साढ़े चार बजे एक छात्र लोकल ट्रेन के नीचे दबकर कट गया है…”

दिमाग की नसें एकबारगी भाड़ में भुन रहे मक्के के दानों-सी उछलती चटखने लगती हैं…दीदी से कहना चाहती हूं…निखिल से कह दें, मुझे भी वे अपने साथ लिये चलें । पर गले से आवाज नहीं फूट पाती…आवाज जैसे भाप बनकर उड़ गई है और गले की भीतरी दीवारें आवे-सी तप रही हैं …सोनू! कहीं मेरा सोनू ही तो नहीं ?…सोनू उतनी दूर विक्रोली में…कैसे पहुंच सकता है…कोई ले भी तो जा सकता है…कहीं तांत्रिकों के गिरोह ने तो सोनू को…

“निखिल की आवाज डरी हुई थी, रे ।” दीदी भीतर-ही भीतर किसी अनहोनी की आशंका को घुटकते हुए कहती हैं ।

घर पर अब सिर्फ मैं हूं दीदी हैं, सीमा है । मेरे तपते माथे पर बर्फ की पट्टी रखतीं, सूखे होंठों को उसी पट्टी से नमियाती! फोन की घंटी नहीं बज रही? क्यों? क्यों नहीं बज रही? निखिल भूल गए फोन करना? बच्चे की लाश देखने में इतना समय लगता है? एक पूरी सदी गुजर रही है मेरे ऊपर से आरी की भांति इस छोर से उस छोर तक खिंचते-छुटते । मैं रह सकूंगी अपने बच्चे के बिना? निखिल रह पाएंगे? नहीं, ये दीवारें बोलती है, किलकती हैं, आइसक्रीम खाना चाहती हैं, कामिक्स पढ़ना चाहती हैं, क्रिकेट का अच्छा बैट खरीदने की जिद ठान लेती हैं, जुहू बीच घुमाने के लिए मचलती हैं तो सोनू की ही वजह से न! उसके न होने से इनका अर्थ?

घंटे भर बाद निखिल का फोन आया है, “शिनाख्त हो गई है। वह किसी और का बच्चा है ।…”

किसी और का बच्चा है…यानी मेरा सोनू…थैंक्स गॉड! मैं कृतज्ञ-सी ईश्वर को धन्यवाद देती हूं । हाथ नहीं उठ पा रहे, पर भीतर किन्हीं अमूर्त हाथों ने जुड़कर अभ्यर्थना में माथा नवा दिया…उक्! मैं भी कैसी हूं? घर में भगवान का एक फोटो तक नहीं रख छोड़ा मैंने!

…वे सारे कैलेंडर कहां चले गए? बीड़ी बनानेवालों का जिस पर भगवान शिव का बड़ा-सा रंगीन चित्र अंकित था? क्लॉथ स्टोरवाला लक्ष्मीजी का, गणपतिजी का भी तो था कोई जो किसी कश्मीरी किमाम बनानेवाली कंपनी ने दिया था निखिल को । शायद…शायद झाडूवाली और धोबन को दे दिया मैंने!

“मौसीजी, बिचारी उस बच्चे की मां का क्या हाल होगा जो अस्पताल में डेड पड़ा हुआ है हाऊ सैड नो!”…व्यथित सीमा बुदबुदाती ही चली जा रही है, “उसके घरवाले भी उसे यूं ही खोज रहे होंगे न, मौसी?… उन्हें क्या पता कि उनका बच्चा गाड़ी के नीचे आ गया?”

मैं जैसे आगे सुन नहीं सकती । सोनू के सुरक्षित होने का संतोष किसी बारूद लगी चट्टान-सा विस्फोटित हो चूर-चूर हो उठता है…एक मुखौटाधारी भीड़ उस मां को आश्वस्त कर रही होगी…हमदर्दी के हथौड़े से कूट-कूटकर कुचल रही होगी और जब उसे पता चलेगा कि उसका बच्चा बर्फ की सिल्लियों के बीच लावारिस लाश-सा अपनी शिनाख्त की प्रतीक्षा में दबा पड़ा है तो…तो, विक्षिप्त-सी मैं तकिये पर सिर धुनने लगती हूं…लग रहा है, तकिये की जगह एक पत्थर की सिल धरी है, फिर भी न माथा फूटता है, न खून भलभलाता है।

“क्या हुआ, मौसीजी?…क्या हुआ?” सीमा मेरी इस हरकत पर भयभीत हो उठी है और दीदी को पुकारने लगती है । जरूर उसके मन में यह भाव आया होगा…मौसी का दिमाग तो नहीं चल गया कहीं? नहीं हुआ तो हो जाएगा…हरकतें तो ऐसी ही हैं…

“क्या पागलपन है, कुकी?” दीदी मुझे झकझोर रही हैं ।

मेरी बेचैनी सहसा चीखों की शक्ल में फूटने लगती है । मैं पूरी ताकत से उठकर सीमा को बांहों से दबोच लेती हूं “सीमा, सीमा …मेरे दिमाग से उस बच्चे की लाश हटा दो…हटा दो, सीमा…अच्छा हुआ वह बच्चा मरा, मेरा सोनू तो बच गया, सीमा ।” दीदी मुझे पकड़कर जबरन बिस्तर पर लिटा देती हैं और हलके-हलके माथा चांपने लगती हैं…सीमा मेरे बर्फ हो आए तलुवों को अपनी हथेलियों से मलती है । उसकी हथेलियों की ऊष्मा मुझमें चेतना रोप रही है। उसके शब्द जैसे सुखद सहलाहट में परिवर्तित हो उठे हैं ।” आप उस बच्चे को लेकर इतना क्यों परेशान हो रही हैं? भगवान से सोनू की खैरियत की प्रार्थना कीजिए ।”

चेतना कॉलेज की बगलवाले हनुमान मंदिर से लौट आई हैं दीदी । निखिल भी ‘बालसुधार गृह’ देखकर लौट आए हैं ।

“जितने भी बच्चे वहां भेजे गए हैं, सोनू उनमें नहीं है…अपना फोन नंबर सभी जगह दे आया हूं “…वे उतरे-थके-टूटे स्वर में कहते हैं । उम्मीद की आखिरी निचुड़ी बूंद-सी हताशा उनके चेहरे को लीले हुए है ।…

“पंडितजी ने विचारकर बतलाया है…बच्चा सुरक्षित है ।” दीदी भभूत की पुड़िया खोलते हुए आशान्वित स्वर में कहती है, “इसी इलाके के भीतर ही है…”

मेरी निगाह दीवार-घड़ी की ओर उठ जाती है…रात के बारह बज रहे है. इसी इलाके में है सोनू तो कहां भटक रहा होगा? इतनी रात हो गई है..अंधेरे से उसे बहुत डर लगता है…रात को पेशाब करने के लिए भी उठता है तो मुझे आवाज लगाए बगैर नहीं । अकसर मुझे पाखाने के बाहर खड़े रहना पड़ता है ।

“यह भभूत दी है पंडितजी ने, जबान खोल जरा, “मुझे खिलाकर दीदी निखिल की ओर बढ़ती है। निखिल चुपचाप मुंह खोल देते हैं । और कोई दिन होता तो ठठाकर दीदी का मजाक उड़ाने लगते…

“सोनू घर आ जाए तो उसे लेकर मंदिर में हो आना…पांच नारियल और सवा ग्यारह रुपये रख देना ‘जरी-मरी’ वाले पंडितजी के हाथ में और अपने हुनमानजी के मंदिर में मंगल को सिंदूर चढ़ा आना ।”

फिर बड़बड़ाती हैं, “हमेशा कहती रहती हूं जरा-सा पूजा-पाठ कर लिया कर, पर तेरा दिमाग ही उलटा है…”

मैं निरंतर छत को ताके जा रही हूं । सोनू को दिन में तीन-चार बार भूख लगती है…आठ बजा नहीं कि फौरन पलकें झपकने लगती हैं । पढ़ने के लिए मुंह पर छींटे मार-मार कर जगाना पड़ता है, तब कहीं बमुश्किल साढ़े नौ-दस तक वह जग पाता है और इस वक्त बारह बज रहे हैं !…

“कुकी, सोनू सुबह कोई गरम कपड़ा पहनकर गया था?” निखिल भर्राए स्वर में प्रश्न करते हैं । कोशिशों के बाद बस इतना ही मुंह से निकल पाता है, “नहीं ।” वे सिरहाने तकिया खड़ा कर अधलेटे-से आंखें मूंद लेते हैं । कुछ पल नहीं बीतते कि एकाएक उठ बैठते हैं और टेलीफोन की तरफ लपकते हैं । कहीं का नंबर घुमाते हैं । कुछ पूछते हैं । वहां से कोई जवाब देता है । प्रत्युत्तर में निखिल का कुछ ऊंचा हुआ करुण स्वर अपराध-बोध से बोझिल हो उठता है।

“क्या करें, साहब । चैन नहीं पड़ रहा, इसलिए आपको कष्ट दे रहे हैं.. “वे फोन पर शायद किसी पुलिस अधिकारी से बातें कर रहे हैं।

“ठीक है, ठीक है..मैं फोन के करीब ही बैठा हूं ।”

निखिल लौटकर उसी तकिये के सहारे अधलेटे-से हो आंखें मूंद लेते हैं ।

“निखिल, गरम पानी में थोड़ी-सी ‘ रम ‘ दूं?” दीदी उनके करीब खड़ी हो पूछती हैं, “स्कूटर दौड़ाते-दौड़ाते थक गए होंगे ।”

दीदी पीने-पिलाने के सख्त खिलाफ हैं । निखिल का कभी-कभार किसी पार्टी या उत्सव में एकाध पेग ले लेना भी उन्हें नहीं रुचता । वही दीदी उदार हो स्वयं निखिल को रम देने को कह रहीं । सुनकर उसे विस्मय हुआ । एकदम से विश्वास नहीं हो रहा । दरअसल निखिल की दयनीय अवस्था दीदी से सहन नहीं हो पा रही । निखिल उठते-चलते हैं जो उनकी पौने छः फिटी काया किसी डोलते पुतले में परिवर्तित हो उठती है। ठीक ही आग्रह कर रही हैं। एकाध पेग उन्हें अनमनाहट से तो संभवतः मुक्त न कर पाए किंतु लस्त देह को हलकी झपकियों में अवश्य थपका देगी ।

“इच्छा नहीं हो रही, दीदी ।” निखिल की विरक्ति बुझे चैलों के धुएं-सी कमरे में घुटन बोने लगी ।

मैं उनके चेहरे की ओर उमड़ी आंखों से अधिक देर तक नहीं देख पाती, कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा । आंखें मूंद लेती हूं । संवादहीनता से बोझिल लंबी, चुप्पी प्रेतात्मा-सी कमरे में भटकने लगती है…लगता है जैसे हम सबको नींद आ गई है । तभी सहसा दरवाजे की घंटी हमें चौंका देती है। दीदी झपाटे से उठकर दरवाजे की ओर लपकती हैं । निखिल भी उनके पास पहुंच गए हैं और दरवाजा खोलते ही दोनों एक साथ खुशी से चीख पड़ते हैं, “सोनू तू कहां था? मेरा बच्चा!”

सोनू! सचमुच निखिल की बांहों में सोनू को देखती हूं। सहसा किसी अदृश्य शक्ति का संचार स्वयं में फूटते हुए महसूस करती हुई-मैं स्प्रिंग-सी उछलकर उसकी ओर झपटती हूं और निखिल की बांहों में से सोनू को लगभग दबोच अपने सीने से भींच लेती हूं..

आह! मेरी सूखी छातियों से दूध उतरने लगा है या अविरल अश्रुधाराएं कंठ फलांगती वक्षस्थल पर प्रवाहित हो रहीं!

सोनू और मेरी हिचकियों के बीच दीदी सतर्क स्वर में साथ आए हुए अजनबी व्यक्ति से पूछताछ कर रहीं…वह आदमी दीदी को बता रहा है…” मैं फैक्टरी जाता होता रात पाली में, तभी जुहू बीच का सामनेवाला रोड पर ये हमकूं बैग-बीग के साथ रोता दीखा । अपुन पुच्छा-इतना रात गया किधर फिरता तुम, तो जास्ती रोने को लगा-हमको हमारा मम्मी के पास जाना है, सोचा मैं, भले घर का छोकरा दिखता है, गुस्से में भाग-भूगकर आया होगा, अभी घर का याद आता तो पिच्छू रोता है। अपुन पता पूछा और ताबड़तोड़ टैक्सी किया । अभी संभालना, हां..ऐसा किधर छोड़ना नई…दादा लोगों के हाथ चढ़ेगा न तो वो लोग सीधा दारू की भट्टी में झोंक देगा…!”

कृतज्ञ दीदी जबरन उसे टैक्सी का भाड़ा दे रहीं । वह इनकार कर देता है, “अपुन भी बाल-बच्चेवाला ठेरा “…दीदी फिर भी नहीं मानतीं । उपकृत निखिल उस मनुष्य को गले लगा लेते हैं ।

सारी जगहें जहां-जहां रिपोर्ट दर्ज कराई है, निखिल टेलीफोन से रह कर रहे हैं-“बच्चा घर सही-सलामत लौट आया है, ठीक-ठाक है ।”

“बच्चा घर लौट आया है, ठीक-ठाक है’… ‘बच्चा वापस आ गया है’…निखिल का स्फूर्त सधा हुआ स्वर अनायास भीड़ की आहादकारी हर्षध्वनि में परिवर्तित हो रहा है। मुझे लग रहा है मैं भी उस भीड़ का हिस्सा हो रही हूं। कितनी खुश हूं । उसके माथे को विह्वल-सी चूमते हुए मैं उसे गौरैया-सी अपने सीने में समेट लेती हूं । उसके इर्द-गिर्द मेरी बाहें कसती जा रही हैं सोनू बुदबुदा रहा है, “मम्मी, अब कभी मत डांटना मुझे…”

सहसा मेरी बांहें शिथिल हो झूल जाती हैं । लगता है, सोनू मेरी पकड़ से छूट गया है । मैं पूरी ताकत से चीख पड़ती हूं और बेतहाशा उसकी ओर दौड़ती हूं पर महसूस होता है कि मेरी टांगें सूखकर डंडी हो गई हैं । और एक किस्म की पोली जमीन में गहरे धंस रही हैं । मैं इंच भर हिल पाने में असमर्थ हूं । बस, एक पोली खड़खड़ाहट उनमें पैदा हो रही है । मेरी चीख ने एक आरी की शक्ल अख्तियार कर ली है जो मेरी समूची देह को शनैः-शनैः विभक्त कर रही है । मेरा एक हिस्सा मुझसे कटकर अलग हो रहा है…

आभास हो रहा है, मेरे आसपास कुछ आहटें चौकन्नी हैं…” पानी लाओ डॉक्टर…शॉक…” निखिल की आवाज, “कुकी, कुकी…देखो, सोनू खड़ा है तुम्हारे पास, तुम्हारे एकदम सामने आंखें खोलो!”

मेरी मूर्च्छा टूटने लगती है, एकाएक मैं आंखें खोलती हूं । पाती हूं, मैं अस्पताल में खड़ी हूं और…उस दूसरे बच्चे की लाश पर से सफेद चादर का टुकड़ा खींच दिया गया है… ।

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