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नारीमन की कहानियां
Bharat Katha Mala

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

आज वह दिन है, जिसका जा उसे कई बरसों से इंतजार था। आज उसका सपना सच होने वाला था। कितनी उम्मीदें थी उसे आज के दिन से! काश शाम जल्दी से हो और उसे उसके इंतज़ार का फल मिले!

वाणी नाम था उसका और पेशे से एक रिटायर्ड बैंक अधिकारी थी। पति की मृत्यु पांच वर्ष पूर्व एक कार एक्सीडेंट में हो गयी थी। पति की मृत्यु के बाद जीवन जैसे खाली-सा हो गया था। उसे आज भी वो मनहूस पल याद था जब गौरव के कार एक्सीडेंट का पता चला था। सड़क पर ही वो ज़िन्दगी खतम हो गयी थी, जिससे उसे सबसे ज्यादा स्नेह था। होता भी क्यों न? गौरव था ही ऐसा। एक आदर्श पुत्र, एक आदर्श पिता और एक आदर्श पति। सिर्फ 40 वर्ष की आयु में ही इस संसार को अलविदा कह गया। उसकी सास गौरव की मौत की जिम्मेवार उसे ठहराती रही। “ज़रूर ये करवाचौथ का व्रत ठीक से नहीं रखती होगी। आजकल तो इन सब बातों को ढकोंसला ही मानते हैं। इन नौजवानों को परम्पराओं की क्या कदर। हाय! मेरे लाल को खा गयी, ये चुडैल!” वाणी की सास ने उसका ससुराल में रहना दूभर कर दिया था। आखिर उसे ससुराल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। गौरव की एकमात्र निशानी बेटे विशाल को लेकर वह हमेशा के लिए मायके चली गयी। दो महीनों तक वाणी सदमे से बाहर नहीं आ पायी थी। उसके घर वालों और दोस्तों ने बहुत मुश्किल से उसे इस दुःख से उबारा था।

अपने बेटे विशाल को देखती तो उसे उसमे गौरव ही नज़र आता। अपना सारा दर्द अपनी ममता में मिला कर उसे कुछ आराम मिलता और वो अपने अकेलेपन को भूल जाती। ऑफिस में भी पूरा मन लगा कर काम करती। इसी तरह समय गुजरता चला गया और एक दिन ऑफिस को भी अलविदा करने का समय आ गया।

अब तो किताबें ही उसकी दोस्त और हमसफ़र थी। विशाल अपनी पढ़ाई में व्यस्त रहने लगा तो अपनेपन की तलाश उसे पालतू जानवरों की दुकान तक ले गयी। छोटे से पपी का नाम उसने टॉमी रखा। टॉमी के साथ खेलकर उसका दिन अच्छा कट जाता था। पर टॉमी उससे बात न कर पाता था। अक्सर उसका मन करता कि काश कोई बात करने वाला होता।

आज वही दिन था, जब उससे बात करने वाला आने वाला था। कोई उसका अपना, जो उसके दर्द को समझेगा। हाँ, वो ज़रूर आएगा। उसे पूरा विश्वास था। बार-बार उसका ध्यान टिक-टिक करती घड़ी की तरफ जा रहा था।

डोरबेल की आवाज़ से उसका ध्यान बंटा। “क्या वह इतनी जल्दी …?” ये सोचते-सोचते वो दरवाजे की ओर तेज कदमों से चलने लगी। दरवाज़ा खोला तो सामने एक कॉरियर बॉय था। “श्रीमती संजू शर्मा यहीं रहती हैं? उनके नाम का कोरियर है।” वाणी ने थोड़ी नाराज़गी से कहा, “यहाँ कोई संजू शर्मा नहीं रहती।” जी, तो फिर कहाँ? “इससे पहले की कोरियर बॉय अपना प्रश्न पूरा कर पाता, वाणी ने दरवाजा बंद कर दिया।

“पता नहीं, कहां-कहां से चले आते हैं, मेरा वक्त बर्बाद करने!” बड़बड़ाते हुए वाणी ने सब्जी की टोकरी उठाई और प्याज काटने लगी। “आज शाम को तो तीन सब्जियां, दाल, रायता, चावल और फुलके बनेंगे, आज वह अकेली थोड़ी ना होगी, जो बस दाल-रोटी से पेट भर कर सो जाएगी। “मीठे में क्या बनाऊं?” ये सोच ही रही थी कि डोरबेल फिर से बजी।

“मैम, हमारी कम्पनी की स्कीम का फायदा उठाना चाहेंगी? देखिए शानदार गैस स्टोव के साथ चमचमाते हुए कांच के गिलास एकदम मुफ्त! सेल्समैन का उत्साह देखते ही बनता था। वाणी ने गैस स्टोव को बस एक नज़र देखकर कहा, “आज नहीं, दो-तीन दिन में आना। अभी मैं बहुत बिजी हूं।”

“अरे मैडम, बस पांच मिनट की बात है, सिर्फ तीन हज़ार रुपए मुझे दीजिए और ये सुंदर गैस स्टोव एवं गिलास आप रख लीजिए।” सेल्समैन ने बिना देर किए कहा। “कहा ना, कि दो-तीन दिन में आना। नही, नहीं, अब तो तुम कभी मत आना।” ये कहकर उसने किवाड़ की कुंडी लगा ली। “अरे, नाराज़ मत होइए मैडम, मैं दो दिन के बाद फिर आऊंगा।” सेल्समैन की सीढ़ियां उतरने की आवाज़ सुन कर वाणी कुछ शांत हुई।

थोड़ी देर बाद फिर से डोरबेल बजी। अब कौन आ गया? अनमने से मन से वो दरवाजे की तरफ बड़ी। दरवाजा खोला तो सामने अखबार के बिल वाला था। “मैम आपका बिल”, “कितना है?” वाणी कुछ खीजते हुए बोली। “150 रुपये।” “अभी लाती हूं,” ये कहकर वो तेज़ कदमों से अपने पर्स को उठाने चल पड़ी। “ये कोई समय है अखबार के बिल वाले के आने का!” वाणी भूल गयी थी कि उसी ने अखबार वाले को शाम को बुलाया था।

अखबार का बिल देने के बाद वाणी को याद आया की उसने आज का अख़बार नहीं पढ़ा था। “चलो, इंतज़ार के पल अख़बार पढ़ने में बिताएं” ये सोचकर उसने अखबार का पहला पन्ना पढ़ना शुरू किया। “खराब मौसम की वजह से कुछ फ्लाइट्स कैंसिल हो सकती हैं।” इस हैडलाइन ने वाणी का ध्यान आकर्षित किया। “तो क्या आज भी? उसके विचारों की बहती धारा डोरबेल की आवाज़ से फिर से रुक गयी।” आज इतने लोग क्यों आ रहे हैं? क्या इस बार वो तो नहीं? अपने मन की खुशी को वो व्यक्त करना चाहती थी। उसके पैर थिरकते हुए दरवाजे की ओर बढ़े।” आंटी हमारी बॉल आपकी बालकनी में गिर गयी है। आंटी आखिरी बार दे दो, फिर नहीं गिरेगी, “एक बच्चे ने भोली-सी सूरत बना कर कहा।” उफ! ये बच्चे! “वाणी गुस्से में पैर पटकती हुई बालकनी की ओर चल पड़ी।” ये लो अपनी बॉल और आगे से कभी इसे मेरी गैलरी में मत गिरने देना। नहीं तो …” इससे पहले की वाणी अपनी बात पूरी कर पाती, बच्चे बॉल छीन कर सीढ़ियों की तरफ दौड़ पड़े। “हे हे, बॉल मिल गयी” बच्चों की मासूमियत भरी शरारत ने वाणी को मुस्कुराने पर मजबूर कर दिया।

शाम के सात बज रहे थे। वो पल आने वाला था जिसका उसे कितने सालों से इंतजार था। कभी घड़ी की तरफ तो कभी दरवाजे की तरफ उसका ध्यान जा रहा था। इंतजार करना इतना मुश्किल क्यों होता है? आज यही सवाल उसे बैचेन कर रहा था। वैसे तो इतने वर्षों में उसे इंतजार की परिभाषा अच्छी तरह से समझ आ गयी थी। लंबा इंतज़ार वह कांटा होता है जिसके चुभ जाने पर सब्र का सुंदर रंगीन गुब्बारा दम तोड़ देता है और जमीन पर औंधे मुंह गिरता है। सब्र न रहे, तो खुशी और संतुष्टि भी उस जगह से चले जाते हैं। वाणी का सब्र भी उसका साथ छोड़ने लगा था। आखिर कब तक झूठी उम्मीद के सहारे ज़िन्दगी चल सकती है? नकारात्मक सोच के बादल उसकी उम्मीद के सूरज को काफी हद तक छिपा चुके थे। पर उम्मीद की एक हल्की-सी किरण अभी भी उसके मन के आंगन में उजाला कर रही थी। कैसे उम्मीद छोड़ दे आखिर? यही तो उसकी धड़कन और सांसें चला रही थी!

इतने में एक आवाज़ से उसका ध्यान भंग हुआ। इस बार आवाज़ डोरबेल की नहीं, उसके फोन की थी। “हेलो मम्मी, कैसे हो?” फोन पर उसका बेटा विशाल था। “मै, मै, ठीक हूँ, तू कैसा है? तू आया नहीं?” “मम्मी, सो सॉरी! बहुत सारा काम अभी बाकी है। छुट्टी नहीं मिल पा रही। कुछ महीनों में पक्का आऊंगा और तुम्हें हमेशा के लिए अपने साथ ले कर जाऊँगा।” “रहने दे कितने सालों से यही कहता है तू …चल, अपना ध्यान रख।” अपनी आँखों के आंसू रोकते हुए उसने परदेस में बसे अपने बेटे को सलाह दी। आसमान में सूरज अस्त हो चुका था। वाणी की आशाओं का सूरज भी अंधकार की गलियों में गुम हो गया था।

कुछ देर बाद नेटवर्क की खराबी के कारण फोन कट गया। वाणी कुर्सी पर निढाल-सी बैठ गयी। एकटक विशाल की तस्वीर को देखने लगी। विशाल के बचपन से लेकर कॉलेज तक की यादें बार-बार उसके मन के दर्पण पर उसे दिखने लगी। जब पहली बार उसने ‘माँ’ कहा था। जब पहली बार वो स्कूल गया था। जब पहली बार उसने क्लास में टॉप किया था और जब उसे पहली बार इंटरव्यू कॉल आयी थी। वो हर एक पल कितना कीमती था। उसे एहसास हुआ कि उसके दिए संस्कार इतने कमजोर नहीं हो सकते। वाणी की नकारात्मक सोच माँ बेटे के रिश्ते में दरार पैदा कर रही थी. ये गलत था। उसे अपनी परवरिश पर भरोसा होना चाहिए। वह ज़रूर आएगा। हाँ, देर से सही, पर वह ज़रूर आएगा। यही सोचते सोचते पूरे दिन की थकी हुई वाणी की पलकों ने नींद के झूले में बैठ कर इंतज़ार को अलविदा कह दिया और सपनों के संसार में खो गयी।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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