भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
Hindi Story: जिन्दगी के वो दिन मुझे कभी नहीं भूलेंगे। जब मैं पल-पल मरती रही और पल-पल जीती रही। मेरे नाजुक पैर अंगारों पर चलने के लिए तैयार हुए। जिन्दगी के वीरान रास्ते पर मैं टूटती रही, जुड़ती रही।
हर रोज दुआ करती हूं, ऐसी मुश्किल घड़ी किसी बेगाने पर भी ना आए।
ऐसे गमगीन वातावरण में जब खुद की पूरी सुरति ना रहे और भविष्य जिन्दगी के प्रश्नों के पहाड़ से रास्ता रोक कर खड़ा हो, तब कितना मुश्किल होता है, कोई फैसला करना।
कभी-कभी सोचती हूं, मेरे पति ने मुझसे किस जन्म का बदला लिया। जन्मों तक साथ निभाने का वायदा करके, बीच रास्ते में ही मुझे रोते-कलपते छोड़ कर चला गया।
अब प्रतिवर्ष सावन का महीना उसकी यादों को ताजा कर देता है। इस महीने बादलों की गर्जना सुन कर मेरा अंग-अंग कांपने लगता है। काली घटाएं, बरसता मेह और मोरों का नाचना किसी खुशगवार मौसम का आगमन नहीं रहा। कभी-कभी लगता है कि बारिश के बहते पानी से मेरा एक किनारा कब का डूब चुका है।
सबसे बुरा हाल उन गरीब लोगों का है, जो छप्पड़ किनारे बसे हैं। बाजीगरों की झोंपड़ियां पानी में तैर रही हैं। दलित परिवारों की कच्ची दीवारें खुरने लगी थी।
बाजीगर अपना छोटा-मोटा सामान उठा कर धर्मशाला में आ बैठे। दलितों ने गांव के स्कूल में अपना डेरा जमा लिया। इस समय सभी एक ही चिन्ता में डूबे हुए थे परन्तु कई बार हमदर्दी की भावना बढ़ भी जाती है।
सबह-शाम इन बेघरों के लिए रोटी. चाय. दध आदि सामान एकत्रित किया जाता। बाजीगर स्वयं ही लोगों के घरों में जाने लगे।
गांव में हर कोई एक-दूसरे के साथ दर्द बंटाने के लिए उतावला था। परन्तु खेतों में लड़ाई-झगड़े का डर भी बना था। गांव से जरा हट कर गुजरते बड़े नाले पर लोग सारी रात पहरा देते थे। डर था कि कहीं पड़ोसी गांव अपने बचाव के लिए पानी का मुंह इस ओर न मोड दे।
मेरे कान आहट लेते रहते। खेतों का शोर दिल को कंपाने लगता। भला जब सिर का साई पास ना हो तो औरत को नींद कहां आती है?
कभी-कभी उसका इस प्रकार आगे-पीछे जाना, मुझे सुहाता नहीं था। मैं रोकती, मगर वह रुकता न।
वह कहता, “तुम क्यों अपना दिमाग खपाती हो। तुम्हें मालूम है, मैं इन कामों से पीछे हटने वाला नहीं।”
एक रात पहरे वालों का बहुत शोर-शराबा था। बंदूक की आवाज सुन, सभी ठंठबर गए। मैं और मेरी सास के सीने तेजी से धड़के। एक पल के लिए मन में आया, सो रही दोनों लड़कियों को जगा कर, सीने से लगा लूं। बच्चों की नींद खराब न हो जाए, इस डर से रुक गई।
लोगों ने अधजगे ढंग से ही रात बिताई।
तड़के जब कुलबीर घर आया तो सारा परिवार उस पर टूट पड़ा। वह सभी की जली-कटी बातें सुनता रहा। फिर सफाई देते हुए बताया, “बापू! अगर हम चार-पांच लोग रात में बीच-बचाव न करते तो कितना खून-खराबा हो जाता।”
“तुम ने सारा जहान का ठेका ले रखा है।” बापू गुस्से में था।
कुलबीर चुप रहा। बापू द्वारा इस तरह घूरने से मेरे मन को चैन मिल गया। बात आई-गई हो गई।
तीसरे दिन गुरुद्वारे के स्पीकर से घोषणा हुई, “नगरवासियों, सभी को सूचना दी जाती है कि नए गांव में बारिश से बहुत नुकसान हुआ है। संगत से विनती है कि सभी मिल कर राशन-पानी इकट्ठा करें और यहां पहुंचाए। दुःख-सुख में आदमी ही आदमी का सहारा होता है।”
मन ही मन मैंने चाहा, यह आवाज कुलबीर के कानों में ना पड़े।
उसे पता लगा तो वह टलने वाला नहीं। घर में क्लेश होगा।
मेरे ससुर ने बुदबुदाते हुए कहा, “लो बीरे के लिए तो काम आन पड़ा।”
मैं बठल में मिट्टी डाल, छत पर जा चढ़ी। बड़े कमरे का एक किनारा, कुछ ज्यादा ही चू ही रहा था। दो बार पहले भी उसे लीपा था। परन्तु अब मैं सिर्फ चिकनी मिट्टी बठल में लेकर गई थी। मिट्टी लीप कर जब मैंने आंगन में निगाह दौड़ाई तो कुलबीर अपनी पूरी टोली साथ खड़ा था। अपने साथियों को वह जानबूझ कर साथ लाया था। शायद उसे बाप की डांट का डर हो या शायद वह हमें दिखाना चाह रहा था कि वह अकेला नहीं, लोगों के पुत्र भी सेवा कार्य में जुटे हैं।
मैं नीचे उतर कर कमरे में गई। वह मेरे पीछे आ गया।
“आ गए, ‘लांगरी’ (लंगर बनाने वाले) इकट्ठे होकर,” स्वाभाविक ही मैंने कहा।
“लोग मर रहे हैं, इसे ‘टिचर’ सूझ रही है।” उसने तल्खी से कहा।
उसने बताया, वे लोग रात को जाएंगे। जाते हुए ढाई सौ रुपया भी साथ ले गया।
ट्रक धर्मशाला के पास खड़ा था। सभी मुहल्लों से लोग रसद-पानी एकत्रित करके ला रहे थे। देर रात तक वे साथ में बैठे बातें करते रहे।
फिर ऊंची आवाज में बातें करते हुए नए गांव की ओर चल दिए। उनके जाने के बाद जैसे सन्नाटा पसर गया।
कुछ लोगों ने बताया, यह गांव अन्य गांवों से कुछ नीचे है। इसलिए जब भारी वर्षा होती है, यहां नुकसान होता ही है। इस बार निकट दरिया ने बहुत तबाही मचाई थी।
दोपहर तक आस थी, ट्रक वापस आ जाएगा। सभी उनके लौटने की प्रतीक्षा कर रहे थे।
एक घटा फिर से पहाड़ की ओर उठने लगी। लगा, भगवान गिन-गिन कर बदला ले रहा हो। फिर रात होने वाली थी। कितनी रातें जाग कर बिताई थी। मैं अभी चिन्ता में ही डूबी थी कि गली में ट्रक के आने की आवाज आई। वो आवाज और हार्न पहचानने में देर ना लगी।
ट्रक की ओर से मुझे शोर सुनाई दिया। लोग तेजी से उस ओर जा रहे थे। रोने की आवाज भी सुनाई देने लगी। मुझे लगा नए गांव के रिश्तेदार रो रहे होंगे।
मैं आहट सुनने के लिए आंगन में बढ़ी। देखा, मेरी ननद जोर-जोर से रो रही थी। उसे औरतों ने थाम रखा था। मेरा सीना तेजी से धड़का।
“क्या हुआ,” मैं एकदम कांप गई।
“लट गए भाभी,” मेरी ननद मझ पर गिर पडी।
पता नहीं किसकी आवाज मेरे कानों में सुनाई दी, “कुलबीर डूब गया।”
मेरे पैरों तले से जमीन निकल गई। मैं गश खाकर वहीं गिर गई। फिर किसने उठाया. किसने संभाला. मझे कछ मालम नहीं।
जब होश आई, बापू मेरे सिरहाने खड़ा था।
“मुझे पैदा होते ही क्यों नहीं मार डाला बापू।” मैं बाप से लिपट गई। कौन किसे चुप करवा रहा था और कौन रो रहा था, अब तो कुछ भी याद नहीं।
सुना दाह संस्कार में सारा गांव उमड़ आया था। किसी ने खाना नहीं खाया। उसकी टोली दहाड़ें मार रही थी। वह अपने साथ सारे गांव की रौनक ले गया।
***
मेरे ससुर मेरे बापू को एक ओर ले गए। कुछ और रिश्तेदार भी उनके पास जा खड़े हुए। लगा जैसे मेरे बापू को कुछ समझा रहे हों।
मेरा बापू सब की सुन रहा था परन्तु बोल कुछ नहीं रहा था। उसका पथराया चेहरा बता रहा था कि उसके सिर पर चिन्ताओं की गठरी टिक गई थी।
उसके जाने के बाद मेरी जिन्दगी में नए सवाल उग आए थे। इन सवालों ने मेरे मां-बाप और ससुरालवालों को भट्ठी में झोंक दिया था।
तीसरे दिन अस्थियां चुनने के बाद मायके वाले मुझे अपने साथ ले गए। शायद लगातार रोने-धोने से कुछ राहत दिलाने खातिर उन्होंने ऐसा किया था।
घर भी कई रिश्तेतेदार मिलने आए। मेरे बाप के आंसू दाढ़ी में समा गए, उसने गला साफ करते हुए कहा, “सयाने ठीक कहते हैं, बेटी मर जाए, दामाद न मरे।”
किसी ने हादसे के बारे में जानना चाहा परन्तु बापू कुछ कह न पाया। चाचा ने बात छेड़ी, “गए तो रसद पानी लेकर थे, कहते हैं किश्ती उलट गई। बस दूसरों को बचाते हुए खुद डूब गया। दो-तीन को उसने बचाया भी।” कहने वाले ने बात खत्म कर दी।
“परमात्मा ने कैसा कहर बरपाया, भले लोगों पर ही आंख रखता है।”
“अच्छे कामों से पीछे नहीं हटता था वो।”
“तभी अपनी जान गवां बैठा।”
“जैसी लिखी हो, वैसे ही होता है।”
मेरा रिश्ता मेरी बड़ी बहन अपने देवर के लिए ले कर गई थी। मायके में वह मेरी बड़ी बहन थी, ससुराल में वह मेरी जेठानी बन गई थी। जीजा अब जेठ बन गया था।
मां-बाप ने सुख की सांस ली। सगी बहनें, सगे भाई। बापू कभी इस रिश्ते को अपनी लंबी ‘समझदारी’ बताता। वह सोचता, इस प्रकार शरीकेबाजी में कम रोष उपजता है।
बहन मुझसे बीस साल बड़ी थी। छह बहनों में मैं सबसे छोटी थी। इकलौता भाई मुझसे छोटा था। शायद पुत्र की चाहत में ही हमारी उम्र में इतना बड़ा अंतर था।
अब बहन और जीजा दोनों के सिर सफेद हो गए थे। कभी-कभी तो वह मेरे बाप से भी बड़ा लगता था।
मेरी बहन के दो लड़के थे। मेरी दो लड़कियां थीं। बड़ी आठ साल की और छोटी पांच साल की थी। मेरा भानजा लगभग मेरी ही उम्र का था। शायद मां-बाप को मेरा कोई वारिस न होने की अधिक चिन्ता थी।
मां भी बापू के पास आ बैठी थी। मां के बैठते ही चुप्पी पसर गई। वह एकदम से कुछ न बोली। शायद वह चाहती थी कि जो वह पूछना चाहती है, वही प्रश्न कोई और पूछ ले।
अफसोस प्रकट करने आए सभी ने इस बात को भांप लिया था कि मर्दो में उसके आने का कुछ मकसद ही था। इसलिए शायद सभी चुप हो गए थे।
मां की नजर अभी भी झुकी हुई थी। फिर वह धीमे से बोली, “अब क्या करना है।” उसने जैसे अकेले बापू से नहीं, सभी संबंधियों से मेरी जिन्दगी बाबत पूछा। मां का प्रश्न सुन कर सभी की निगाहें बापू की ओर उठ गईं। बापू ही इसका जवाब देने वाला सही व्यक्ति था। वैसे भी किसी का उत्तरदायित्व कोई अपने सिर पर नहीं लेता।
बापू ने अभी कोई सहमति नहीं दी थी। शायद वह उलझा हुआ था। वह समझ ही नहीं पाया कि किसने क्या पूछा है। मां ने फिर कहा, “कुछ तो करना ही होगा, पहाड़ जैसी जिन्दगी है। जब भगवान की ओर से बिपदा आ ही पड़ी है तो?” मां, बापू से कुछ न कुछ जानने की इच्छुक थी।
“सभी की राय से ही बात बनेगी। अभी उन्होंने कोई खास बात नहीं की।” बाप अभी कोई निश्चय नहीं कर पाया था।
“लड़की से भी राय कर लेते?” मां ने धीमे से मेरा पक्ष लिया।
“उससे क्या बात होगी, बच्ची है अभी। उसे क्या मालूम कबीलदारी के झंझटों के बारे में?” बापू ने बात को यहीं खत्म करना चाहा और गर्दन को एक बार फिर झुका लिया।
मां-बाप के लिए अभी भी मैं बच्ची ही हूं। मुझसे कुछ पूछा नहीं जाएगा? आखिर लड़कियों-चिडियों का क्या है? विवाह से पहले और उसके बाद किसी दसरे की घर की इज्जत बन जाती हैं।
बाप ने दामाद की बजाए. बेटी की मौत के बारे में शायद ठीक ही कहा था। मेरे विवाह के पश्चात गंगा नहा लिए की बात अधूरी रह गई थी।
दूसरे दिन मेरे सुसराल वाले ‘मोडवीं मुकाण’ (गमगीन अवस्था की समाप्ति) लेकर आ गए। दो ट्रालियों में कई मर्द-औरतें। रोने-धोने के बाद गांव का सरपंच, अन्य संबंधी और कई अपरिचित बैठ कर बापू से सलाह-मशविरा करने लगे। फिर उन्होंने मेरी मां और बड़ी बहन भाव जेठानी को भी पास बुला लिया। देखते ही देखते अन्य कई बूढ़ी औरतें मर्दो के पास जा खड़ी हई। शायद मेरी अगली जिन्दगी के भाग्य का फैसला होने वाला था।
मन बेचैन होने लगा। क्या मुझे किसी और के साथ बिठा दिया जाएगा। नहीं भेज दिया जाएगा या बाप के घर पर ही रहूंगी? या कुछ और…?
मुझे कुछ पता नहीं लग रहा था। शायद कोई फैसला हो गया था।
ट्रैक्टर स्टार्ट हो गए। लोग उनमें बैठने लगे। रोने-धोने की आवाजें ट्रालियों की आवाज में मद्धिम पड़ने लगीं।
दूसरे संबंधी भी उठ कर जाने लगे। कुछ ही देर में आंगन खाली हो गया। अब घर में केवल मायके वाले ही रह गए थे।
मां मुझे इशारे से पशुओं की हवेली की ओर ले गई। वहां बिछी चारपाई पर हम बैठ गई। मां जानबूझ कर मुझे एकांत में ले आई थी। वहां हमारी बातें सुनने वाला कोई नहीं था।
“तुम्हारे हिसाब से क्या होना चाहिए,” मां ने मुझे टटोलना चाहा।
एक पल मुझे लगा कि जैसे मेरी राय सिर्फ मेरी मां ही पूछ रही है। क्या मेरी मां में इतनी हिम्मत थी कि वह हो चुके फैसले को पलट सके?
“मां! यह मौत मुझे क्यों नहीं आ गई?” मैंने आह भरी। मां ने मुझे सीने से लगा लिया।
“जैसा लिखा हो पुत्र! वैसे ही भोगना पडता है।” मां भी कम दुखी नहीं थी।
फिर वह कितनी देर तक खामोश रही। पहले मुझे उम्मीद थी कि मां मेरे लिए गए फैसले के बारे में तुरन्त बता देगी। परन्तु नहीं, वह शायद कुछ बताने से झिझक रही थी।
“बेटी, भगवान अगर एक लड़का दे देता तो चल जाता,” वह मुझे बच्चों समान समझाने लगी।
मेरा मन अंतिम निर्णय सनाने के लिए उतावला था। ताकि मेरे भीतर भटकते सवालों को कोई चैन मिल सके।
वह फिर समझाने लगी, “वैसे तो वो अपने ही पुत्र है, सगी बहन है, उसके लडके हए या तेरे।” वह बोलते-बोलते रुक गई।
“तेरी दो लड़कियां हैं, उसके दो लड़के हैं, पुत्र के बिना सिर ढंका नहीं जाता। सारे परिवार की राय है कि बडी बहन तझे अपना एक लडका दे देगी और तुझसे एक लड़की ले लेगी। बाकी तुम्हारा सगा जीजा है, सगी बहन है। अगर कोई एतराज नहीं तो दोनों बहनें मिल कर दिन काट लो। आखिर आदमी के बिना औरत का क्या अस्तित्व है?” मां ने पीढ़ी दर पीढ़ी दुहराए जाते फैसले को एक बार फिर से ताजा कर दिया।
मेरे सामने सवाल ही सवाल थे। आखिर ऐसा क्यों किया जा रहा है? क्या मर्द के बिना मैं अपने बच्चों का पालन नहीं कर सकती? मुझे एक बूढ़े व्यक्ति के साथ जबर्दस्ती बांधा जा रहा है? इसलिए कि कोई बेगाना पुत्र इस घर की जमीन-जायदाद में हिस्सा न बंटा सके? कितना मोह है इस मिट्टी के साथ? इसके टुकड़ों के लिए मुझे भट्ठी में झोंका जा रहा है? मेरे मां-बाप, भाई-बहन सभी की एक राय कैसे बन गई? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा।
अजीब स्थिति हो गई। मैं सोच-सोच कर थक गई। कोई किनारा नहीं सूझ रहा।
एक-एक करके यह आठ दिन कितने बड़े हो गए। दुःख से भरी घड़ियां बीतती नहीं। कल उसकी अंतिम अरदास होगी। मेरी सास मुझे अपने साथ ही ले आई। मिलने वाले इस प्रकार मिलते, जैसे मुझसे कुछ जानना चाहते हों या मेरे मुंह से कुछ सुनना चाहते हों। मैं क्या कहती। बस नजरें झुकाए धरती पर देखती रहती।
सूरज ढल रहा है। मैं बैठक में अकेली बैठी हूं। छोटी बेटी मेरे पास भागते हुए आई। वह कुछ बोल रही थी। मेरे पास आकर एकदम चुप हो गई।
“मां?” उसने कहा, फिर पीछे मुड़ कर देखा।
“क्या हुआ?’ मैंने पूछ ही लिया।
वह एकदम मेरे पास आकर डरते हुए बोली, “दीदी कह रही थी, अपने मौसाजी, अब हमारे डैडी बनेंगे। मौसी कह रही थी, तुम्हारा कोई बेटा नहीं, तुम्हें एक लड़का दे देंगे और एक लड़की ले लेंगे। मैंने कहा, लड़का बनने में क्या मुश्किल है, मैं लड़का बन जाऊंगी।”
बाहर आवाज सुन कर वह चुप हो गई। मैंने उसे गोदी में बिठा लिया। यह ज्ञानी जी की आवाज थी।
यह बुजुर्ग अध्यापक इधर ही आ रहे थे। कुलबीर को अपने पुत्र समान मानते थे।
बैठक में घुसते ही वह चुप हो गए। उनके साथ मेरा भानजा भी था। मेरी बड़ी लड़की भी पीछे-पीछे बैठक में आ गई।
कुछ देर बाद वह धीमे से बोले, “बहत जल्म किया दाता ने, क्या किया जा सकता है, उसका ‘भाणा’ मानना ही पड़ता है।” इतना कह कर वह चप हो गए। मेरी नजर झुकी रही। मेरा भानजा उठ कर बाहर चला गया। शायद चाय-पानी लेने गया हो।
वह समझाने लगे, “देखो बीबा, अब हिम्मत करनी होगी। तुम्हारी पहाड़ जैसी जिन्दगी सामने है। तुम्हें संभलना होगा। वह कोई आम लड़कों जैसा नहीं था। मुझे मालूम है, उसके इरादे कितने ऊंचे थे, तुम हौसला रखो। यहां रहना किसी ने भी नहीं। बस इन बच्च्यिों की ओर देख कर सोच-विचार करो।” इतना कह कर वह उठ खड़े हुए। मैंने उन्हें चाय के लिए कहा लेकिन वह मुझे बैठे रहने का कह कर बाहर निकल गए।
रात उतर आई। दोनों लड़कियां बैठक में ही मेरे पास सो गई। घर में धीरे-धीरे आवाजों का शोर कम होने लगा। शायद सभी सो गए या किसी चिन्ता में डूबे हुए हैं।
मुझे नींद नहीं आ रही। बैठक की सामने दीवार पर कुलबीर की कई तस्वीरें लगी हैं। एक तस्वीर में वह ज्ञानी जी के साथ खड़ा है। लगा, जैसे वह मुझे ज्ञानी की बात, ध्यान से सुनने और विचार करने के लिए इशारा कर रहा हो।
मेरी सोच स्थिर होने लगी। इरादा मजबूत होने लगा।
कोई भी व्यक्ति मौत के साथ ही खत्म नहीं हो जाता। बहुत कुछ उसकी मौत के बाद महसूस होता है। यह एहसास आदमी की सोच पर निर्मित करता है। मैंने कभी सोचा न था कि कभी ऐसा दिन भी आएगा कि मुझे अकेले पत्थरों से टकराना होगा।
वह कहा करता था कि आदमी की परख तो संकट के समय में ही होती है। मैं चारों ओर से अजीब मुश्किलों में घिर गई हूं। यह अपने आप में एक बहुत बड़ा इम्तिहान है। इम्तिहान से हमेशा अकेले ही गुजरना पड़ता है।
आखिर भविष्य के रास्ते पर मुझे अकेले ही चलना होगा। इस बारे में कोई और क्यों फैसला करे। मैं खुद कोई निर्णय क्यों न लूं। मुझे एहसास हुआ कि आदमी का सच्चा प्यार मर कर भी उसका पीछा नहीं छोड़ता। यदि कोई मर्द औरत के मन में समा जाए तो मौत के बाद भी औरत के मन में वही जीवित रहता है।
ज्ञानी जी ठीक ही कह कर गए है। वह साधरण आदमी नहीं है। मैंने अपनी आंखों से उसे खास बनते हुए देखा है। वह पहले से ही साधारण से कुछ अधिक था।
विवाह के समय तक उसे पंजाबी अच्छे से नहीं आती थी। अटक-अटक कर पढ़ता। जब भी टाईम मिलता, ज्ञानी जी के पास जा बैठता। फिर वह अखबारें पढ़ने लगा। पढ़ते हुए अपनी गलतियों के बारे में पूछता। इस प्रकार रोज पढ़ते-लिखते हुए उसका स्वाभिमान और भी ऊंचा होने लगा।
कभी-कभी मुझे लगता, उसने मुझे भी काफी हद तक बदल दिया है। वह बात की तह तक जाने की कोशिश करता। कभी हमारी आपस में बहस हो जाती। मेरे बहुत सारे सवालों के जवाब वह दे देता, कभी अटक जाता तो ज्ञानी जी से पूछ लेता।
पढ़ने में मैं होशियार थी। गांव में आठवीं तक स्कूल होने के कारण मुझे पढ़ाई से हटा लिया गया। उम्र का तकाजा था शायद, अब मैं बहुत अच्छी पंजाबी पढ़ने-लिखने लगी थी। दूसरे लड़कों से कुलबीर भिन्न था।
अपनी विलक्षण शख्सियत के कारण ही वह अपने गांव भर का दुलारा बना। वह लोगों के लड़ाई-झगड़े निपटाने जाता बल्कि लोग बाग उसे स्वयं ले जाते थे।
देखते ही देखते, वह मुझसे काफी आगे निकल गया। उस दिन वह मुझसे बहुत नाराज हुआ, जब दूसरी लड़की होने से पहले मैंने टैस्ट करवाने की सलाह की। उसने मुझे डांट दिया। दूसरी बेटी पैदा होने पर मुझे हौसला देते हुए बोला, “पगली! यह बताओ, अब यह कहां जाए? हमारी मांएं भी तो किसी की बेटियां थीं, भला इनका कसूर क्या है? आखिर अपनी औलाद है। बेटा-बेटी में कोई अंतर नहीं। अगर लड़का नहीं हुआ तो क्या मर जाएं, लड़कों की क्या गारंटी है कि वह झूला झुलाएंगे। मेरे तो यही पुत्र हैं। आने वाला समय सारे भेद मिटा देगा।”
कभी-कभी लगता. वह खद पर हंस रहा हो। वह अपने जट भाईचारे पर हंसता। वह कहता, “अपनी जट कौम भी निराली है। अब यह समझ नहीं आता कि पहले ऐसी थी या बाद में ऐसी हुई। जमीन के कारण इसने क्या-क्या कारनामे किए। जमीन के बिना सुन्दर, तगड़े नौजवानों का विवाह नहीं होता, मूर्ख मेढ़क इसके पीछे ही मर जाते हैं, जमीन के चक्कर में पड़े रहते हैं।”
आज भी सारा स्यापा जमीन का ही था। लड़कियां अपने घरों में ब्याही जाएंगी। दामाद आएंगे और जमीन बंटाएंगे। सारे टब्बर को यही चिन्ता खाए जा रही है। लेकिन समझ में नहीं आता कि यही चिन्ता मेरे मां-बाप को क्यों है?
रात बीत गई। मैं सोई या नहीं, कुछ पता नहीं।
अंतिम अरदास की तैयारी होने लगी। दस बजे के करीब रागी जत्था आ गया। इस रागी के साथ भी कुलबीर की बहुत निकटता थी। उसका स्वर सच में गम में डूबा प्रतीत हो रहा था। वह बीच-बीच में कुलबीर के जीवन के बारे में बताने लगते। जिस घटना में कुलबीर की मौत हुई, वह उसे काफी महत्त्व दे रहे थे।
मां ने मुझे एक झोला थमाया। उसमें पगड़ी थी। शायद मां ने जानबूझ कर मुझे यह थमाया था। अब तो बात एकदम साफ थी कि यह पगड़ी मेरे जेठ के सिर पर ही बांधी जाएगी।
मेरे अंदर कंपन आरंभ हो गया। अंतिम अरदास हुई। रागी ने सूचना दी कि ज्ञानी जी सिर्फ दो मिनट के लिए श्रद्धा के फूल अर्पित करेंगे।
ज्ञानी जी ने माईक के सामने कहना शुरू किया, “गुरु की साजी निवाजी साधसंगत जी बोलो, वाहेगुरू जी का खालसा, वाहेगुरू जी की फतेह। जैसाकि आप सभी जानते हैं कि आज की यह एकत्रितता अपने प्रिय कुलबीर को श्रद्धांजलि देने के लिए जुड़ी है। सभी जानते हैं, यहां सदा के लिए कोई नहीं रहेगा। ‘वारी वारी आपो आपणी’ फिर भी उसकी इस उम्र में हम सभी को छोड़ कर चले जाने की उम्र नहीं थी। इस नगर को, भविष्य के लिए उससे बहुत उम्मीदें थीं। वह अपनी उम्र से कहीं आगे की सोचने वाला था। प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं, आज उसने जो अपनी जान गंवाई, वह लोगों का भला करते हुए, अपना कर्तव्य निभाते हुए…।
“मैं आपको बताना चाहता हूं कि वह भले-भूखे लोगों के लिए रसद लेकर गया था परन्तु जब उसने सामने एक किश्ती को पलटते देखा, जिसमें काफी लोग सवार थे, तो उन डूबते लोगों को बचाने के लिए उसने तुरन्त पानी में छलांग लगा दी। तीन बच्चों को वह बचा लाया। परन्तु कुदरत को जो मंजूर…एक बुजुर्ग को बचाते-बचाते वह खुद डूब गया।”
यह बातें सुन कर अधिकतर लोगों की आंखें भीग गईं।
लेकिन जैसे मेरी आंखों में आंसू सूख गए हों। वास्तव में मेरे भीतर से कुछ फूटने लगा था। कोई नया पल। लगा कहीं कुलबीर कह रहा हो, “तुम क्या इसी प्रकार भौंचक्की बैठी रहोगी। जो हो गया सो हो गया, अब समय डगमगाने का नहीं, अपने पैरों पर खड़े होने का है। इस घर में तुम अकेली नहीं हो, तुम्हारे साथ तुम्हारी दो बेटियां भी हैं। तुम्हें उनके बारे में भी सोचना चाहिए।”
मेरे अंदर कुछ धधकने लगा।
“बुलाएं फिर दामाद को?” किसी ने ऊंची आवाज में कहा।
मेरा मामा उठ कर हमारे कमरे में आया। मां ने झोले से पगडी निकाल कर उसे थमा दी. मामा ने पगडी मेरे बाप को दे दी।
मेरे अंदर एक कंपकंपी-सी उठी। देखा, मेरी बेटियां कभी मुझे और कभी मेरी मां की ओर देख रही हैं। लगा, जैसे कुछ कहना चाह रही हैं। फिर दोनों खड़ी होकर मेरे बापू की ओर देखने लगीं।
बापू पगड़ी को खोल कर संवार रहा था। किसी ने इस काम में उसकी मदद की।
“बुलाए भई, सभी को जाना भी है,” मेरे मामा ने खड़े होकर अंदर की ओर इशारा किया।
मेरा जेठ भीतर से निकला। उसकी निगाह झुकी हुई थी। वह धीरे से चलते हुए मेरे बापू के पास जा बैठा।
अचानक जैसे मेरे अंदर आग भड़क उठी हो। मैं अपने स्थान से उठ खड़ी हुई। कुछ औरतें मेरी ओर अजीब नजरों से देखने लगीं।
बापू ने मेरी ओर सरसरी निगाह से देखा और पगड़ी का लड़ हाथ पर लपेट लिया। मेरा जेठ उठ कर बापू के और पास जा बैठा।
“बाप!”
मेरे मुंह से ऊंची आवाज निकली।
आज मैं पहली बार अपने बापू को संबोधित कर, इतनी जोर से बोली थी, वह भी भरी पंचायत में। मेरी आवाज सुनते ही बापू के हाथ से पगड़ी छूट गई।
मैं तेजी से बापू की ओर बढी। दोनों लड़कियां मेरे पीछे चल दीं। मैंने देखा तो नहीं, लेकिन मुझे मालूम था, सारे पंडाल की निगाहें मुझ पर थीं। बापू के पास जा कर मैंने पगड़ी उठा ली। मेरे हाथ कांप रहे थे। वापस मुड़ते हुए मेरे हाथों में पगड़ी का एक ही लड़ था और दूसरा लड़ धरती पर घिसटने लगा। बैठक के पास आकर पीछे मुड़ कर देखा, दूसरा लड़ दोनों लड़कियों ने थाम रखा था।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
