Hindi Motivational Story: श्रद्धा एक छोटे से गाँव में अपने पापा के साथ रहती थी। वह पढ़ने-लिखने में तेज़ थी, कुछ दिन पहले अपने मम्मी को खोने के बाद एकदम बुझी सी रहती थी , किसी तरह उसके पापा थोड़ा बहुत कमा के घर का खर्च चला लेते थे लेकिन श्रद्धा के ताऊ जी बहुत होशियार और लालची व्यक्ति थे उन्होंने अपने भाई यानी श्रद्धा के पिता हीरामन से धोखे से सारी जमीन अपने नाम कर ली। यह सदमा हीरामन बर्दाश्त नहीं कर पाए और बीमार पड़ गए जिस कारण श्रद्धा अंदर से एकदम टूट गई और उसके मन के भीतर हमेशा एक अजीब-सी खालीपन की पीड़ा रहती थी। घर में कलह, पिता की ये हालत, और रोज़मर्रा की परेशानियाँ जिसमें खाने तक के पैसे नहीं थे और इलाज की व्यवस्था सब मिलकर श्रद्धा को बहुत थका देते थे।
श्रद्धा को अब लगता था कि जैसे जीवन में कोई रंग ही नहीं बचा। पिता की इस हालत के बाद वो मरने का सोचने लगी थी।
उनके ही गाँव के मंदिर में *भजन-क्लैबिंग* (यानी अब मिलकर बैठकर भजन गाना) का कार्यक्रम रखा गया। श्रद्धा की दोस्त ने उसे भी चलने के लिए कहा, पर वह मन से बिल्कुल तैयार नहीं थी
“मेरा मूड नहीं है… मैं क्यों जाऊँ?” स्वाति से कहा। एक बार चल के देख तो श्रद्धा , स्वाति ने जोर देकर कहा।
श्रद्धा ने खुद को बहुत रोका लेकिन न जाने क्यों, उसके कदम धीरे-धीरे उस मंदिर की ओर बढ़ गए,
मंदिर में घुसते ही उसने देखा दीपकों की लौ रही थी, हल्का-सा कपूर जल रहा था, और सामूहिक भजन की आवाज़ वातावरण में गूँज रही थी।
सब लोग ताली बजा रहे थे, कोई डमरू बजा रहा था, तो कोई मंजीरा।सबसे आगे बैठी एक दादी बड़ी मधुर आवाज़ में गा रही थीं
**“मन मन्दिर में दीप जला, हर दुख अपना दूर भगा…”**
उस सुर में अजीब-सी मिठास थी…
एक ऐसा सुकून… जो श्रद्धा ने पहले कभी महसूस नहीं किया था।
धीरे-धीरे श्रद्धा मगन हो ताली बजाने लगी।
फिर अगला भजन शुरू हुआ—
**“जो मिला है वही प्रभु का दिया है…”** धीरे धीरे उसकी आँखों में आँसू आने लगे।
वह समझ नहीं पा रही थी कि यह भजन उसे इतना क्यों छू रहा है, पर जैसे उसके अंदर छिपा सारा दर्द, सारी उलझनें संगीत के साथ बाहर निकलने लगी थीं।
उसी समय पुजारी जी ने कहा—
“बेटा, भजन सिर्फ सुर नहीं होते… यह मन का बोझ हल्का करने की एक औषधि है।”
श्रद्धा ने यह सुनकर बस चुपचाप मुस्कुरा दी।
उसे लगा जैसे किसी ने उसके भीतर का अंधेरा पढ़ लिया हो।
उस दिन के बाद श्रद्धा रोज़ भजन-क्लैबिंग में जाने लगी।
धीरे-धीरे उसका स्वभाव बदलने लगा पिता की सेवा में मन लगाने लगी।
जो लड़की छोटी-सी बात में उदास हो जाती थी, वही अब मुस्कुराने लगी।जिसे अपने घर में घुटन लगती थी, अब वह घर में भजन की मधुर धुनें गाने लगी।पिता जो अक्सर दुःखी रहते थे, एक दिन बोले
“आज तुम्हारी आवाज़ सुनकर मन शान्त हो गया।”घर में तनाव कम हो गए।रिश्तों में मिठास बढ़ने लगी।और श्रद्धा को लगने लगा कि शायद… यही वह रंग था जिसकी उसे तलाश थी।
एक दिन मंदिर में एक बड़ा कार्यक्रम हुआ जहाँ लड़कियों को भजन गाने का अवसर दिया गया।अपने दोस्तों की ज़िद पर श्रद्धा ने भी मंच पर जाकर भजन गाया—
**“तेरी ओट है प्रभु, तो डर किस बात का…”**
उसकी आवाज़ में इतनी सच्चाई और भावनाएँ थीं कि पूरा मंदिर शांत होकर उसे सुनता रहा।
गाना ख़त्म होते ही तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी।
श्रद्धा ने आँखें बंद कर लीं
उसने पहली बार खुद को पूरा महसूस किया, हल्का महसूस किया।
अब श्रद्धा गाँव की सबसे प्यारी भजन-गायिका बन चुकी है।
वह कहती है—
“भजन-क्लैबिंग ने मुझे सिखाया कि जीवन में चाहे कितनी अंधेरी रात क्यों न हो,
*सुरों की एक छोटी-सी लौ भी पूरे मन को रोशन कर देती है।*”
उसके लिए भजन अब सिर्फ संगीत नहीं—
**मन की शांति, जीवन की रोशनी, और आत्मा की दवा बन चुके थे।**। और श्रद्धा को भजन के आयोजन में खूब पैसे मिलने लगे जिसमें उसने अपनी जमीन भी वापस ले ली और हीरामन जी का पूरा इलाज भी कराया जिससे हीरामन ठीक होकर बेटी के साथ भजन गाने जाने लगे।
