Board Exam
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Board Exams 2026: बोर्ड परीक्षाओं का नाम सुनते ही जहां विद्यार्थी कड़ी मेहनत में जुट जाते हैं वहीं अभिभावकों की चिंता बढ़ने लगती है। वह इन्हें बच्चों की परीक्षा नहीं बल्कि अपनी परीक्षा मानने लगते हैं। दरअसल, 10वीं की बोर्ड परीक्षा के नंबर के आधार पर स्ट्रीम और 12वीं की बोर्ड परीक्षा के नंबर पर अच्छे कॉलेज में एड्मिशन का रास्ता तय होता है। इसलिए सभी अभिभावक चाहते हैं कि बोर्ड परीक्षा में उनके बच्चे अच्छे नंबरों से पास हों। सालाना आयोजित होने वाली इन बोर्ड परीक्षाओं को लेकर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने कुछ बदलाव किए हैं, जिनकी जानकारी सभी विद्यार्थियों और अभिभावकों के लिए महत्वपूर्ण है।

बदलेगा परीक्षा का तरीका

Board Exams 2026
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सीबीएसई द्वारा किए इन बदलावों का उद्देश्य विद्यार्थियों के रटने की बजाय वैचारिक समझ यानी उनकी समझ का वास्तविक मूल्यांकन करना है और कोचिंग कल्चर को ख़त्म करना है। नई शिक्षा नीति 2020 के तहत इन बदलावों से विद्यार्थी खुद की वैचारिक समझ और मुख्य दक्षताओं पर ध्यान केंद्रित करेंगे, जो सच में उनकी असली शिक्षा होगी। क्योंकि जब परीक्षा रटने के बजाय समझ पर आधारित होगी, तो कोचिंग संस्थानों का रटा-रटाया पैटर्न कम प्रभावी होगा।

प्रश्न पत्र और प्रश्नों का प्रारूप

सीबीएसई ने 10वीं कक्षा के साइंस और सोशल साइंस के प्रश्न पत्रों (Question Paper) को अलग-अलग भागों में बांटा है। साइंस (बायोलॉजी,केमिस्ट्री और फिजिक्स ) का प्रश्न पत्र 3 अलग सेक्शन में रहेगा। वहीं सोशल साइंस (इतिहास, भूगोल, राजनीति और अर्थशास्त्र) का प्रश्न पत्र चार सेक्शन में विभाजित होगा। सीबीएसई द्वारा 2026 की बोर्ड परीक्षाओं को लेकर किये गए बदलाव के अनुसार, मूल्यांकन का आधार अब रटने के बजाय योग्यता पर (Competency) होगा। 10वीं और 12वीं के प्रश्न पत्रों में अब 50 प्रतिशत सवाल योग्यता-आधारित होंगे, जिनमें केस स्टडी और डेटा इंटरप्रिटेशन जैसे व्यावहारिक प्रश्न (Practical Question) शामिल होंगे। इसके अलावा, प्रश्न पत्र में 20 प्रतिशत अंक ऑब्जेक्टिव (MCQ) प्रकार के होंगे और बाकी 30 प्रतिशत अंक लंबे और छोटे प्रश्नों के लिए निर्धारित किए गए हैं। विज्ञान और सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों में प्रश्न पत्र अब विद्यार्थी की तार्किक क्षमता और विषय की गहराई को परखने पर केंद्रित होगा।

10वीं के छात्रों को मिलेंगे दो मौके

सीबीएसई के बदलाव के तहत अब 10वीं के छात्रों को साल में दो बार बोर्ड परीक्षा देने का अवसर मिलेगा। ये उन छात्रों के लिए सुनहरा मौका होगा जो पहली बार में परीक्षा नहीं दे पाए या फेल हो गए। इसके साथ ही यह उन छात्रों के लिए अवसर है जो अपना स्कोर सुधारना चाहते हैं। लेकिन इसके लिए विद्यार्थियों का पहली परीक्षा में कम से कम 3 विषयों में शामिल होना जरूरी है, तभी छात्र दूसरी बार परीक्षा में बैठने सकते हैं।

अटेंडेंस के कड़े नियम

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Attendance Rules

जहां सीबीएसई ने नए नियमों को विद्यार्थियों के लिए सुविधाजनक बनाए हैं वहीं स्कूल में विद्यार्थियों की उपस्थिति यानी अटेंडेंस को लेकर सख्ती भी दिखाई है। बोर्ड परीक्षा में बैठने के लिए 75 प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य कर दी गई है। उपस्थिति की गणना कक्षा 9वीं और 10वीं दोनों को मिलाकर की जाएगी। तय उपस्थिति के कम होने पर छात्र को परीक्षा बैठने नहीं दिया जा सकता।

इंटरनल असेसमेंट में शामिल होना महत्वपूर्ण

जो छात्र इंटरनल असेसमेंट में शामिल नहीं होंगे उन्हें अयोग्य मानकर उनका रिजल्ट घोषित नहीं किया जाएगा। इंटरनल असेसमेंट के हर सब्जेक्ट के अधिकतम अंक 100 हैं, जिसका बंटवारा थ्योरी, प्रैक्टिकल, प्रोजेक्ट और IA कंपोनेंट्स में होगा।

अभिभावक बदले अपनी भूमिका

सीबीएसई के नए नियमों के बाद माता-पिता को भी अपने व्यवहार में बदलाव करना होगा। कोचिंग के लिए बच्चों पर दवाब डालने के बजाए अब उन्हें केस स्टडीज और व्यावहारिक प्रश्न हल करने का माहौल देना होगा। अभिभावकों को अब ‘रिजल्ट’ से ज्यादा ‘सीखने की प्रक्रिया’ पर ध्यान देना होगा।

क्या करें

अखबार और खबरें पढ़ने के लिए प्रेरित करें।
छोटे-छोटे प्रयोग घर में करने की सलाह दें।
रोजाना स्कूल भेजें।
विषय को रटने के बजाए समझने का मौका दें।
चिंता करके बच्चे पर दवाव न डालें।

क्या न करें

घर पर पढ़ लो, स्कूल जाने की क्या जरूरत?
परीक्षा में अधिक नंबर लाने का दवाब न बनाएं।
सिर्फ पढ़ाई नहीं बल्कि स्किल्स भी सुधारने पर ध्यान केंद्रित करें।
कोचिंग कल्चर से बाहर निकले।

बदले नियमों के सकारात्मक पहलू

Positive aspects of the changed rules
Positive aspects of the changed rules

1. मानसिक स्वास्थ्य में सुधार और परीक्षा के तनाव में कमी

पारंपरिक बोर्ड परीक्षाओं का सबसे बड़ा दोष ‘करो या मरो’ वाली स्थिति थी। साल में दो बार परीक्षा का विकल्प मिलने से अभिभावकों की वह चिंता, जो अक्सर ‘आसमान छूती’ थी, अब संतुलित होगी। जब माता-पिता निश्चिंत होंगे, तो घर का वातावरण भी सकारात्मक रहेगा। इससे बच्चों पर पड़ने वाला अनचाहा दबाव कम होगा, जिससे एंग्जायटी, डिप्रेशन और परीक्षा के फोबिया (Exam Phobia) जैसी गंभीर समस्याओं में भारी गिरावट आने की संभावना है। यह बदलाव शिक्षा को भय के बजाय सीखने की प्रक्रिया बनाएगा।

2. ‘फेल’ होने के कलंक और डर से मुक्ति

अक्सर एक खराब दिन या अचानक आई स्वास्थ्य समस्या किसी मेधावी छात्र का पूरा साल बर्बाद कर देती थी। नए नियमों के तहत छात्रों को अपनी रैंक सुधारने या असफल होने पर तुरंत दूसरा मौका मिलने से ‘असफलता का स्थायी डर’ समाप्त होगा। यह न केवल छात्रों को एक ‘सेफ्टी नेट’ प्रदान करता है, बल्कि उन्हें यह विश्वास भी दिलाता है कि एक परीक्षा उनके पूरे भविष्य का फैसला नहीं कर सकती। इससे छात्रों का आत्मविश्वास बना रहेगा।

3. स्वस्थ शैक्षिक वातावरण और संतुलित अभिभावक दृष्टिकोण

भारतीय समाज में अंकों को लेकर होने वाली तुलना बच्चों के मानसिक विकास में सबसे बड़ी बाधा रही है। नए नियमों से ‘रैंक-केंद्रित’ सोच पर अंकुश लगेगा। अभिभावकों का दृष्टिकोण अब ‘पुलिसिंग पैरेंटिंग’ (सिर्फ निगरानी और दबाव) से हटकर एक ‘सपोर्ट सिस्टम’ (मार्गदर्शक) के रूप में विकसित होगा। जब अंकों की अंधी दौड़ कम होगी, तो बच्चों के बीच का प्रतिस्पर्धात्मक माहौल भी विषाक्त होने के बजाय स्वस्थ और सहयोगात्मक बनेगा।

4. आत्मनिर्भरता और योग्यता आधारित विकास

शिक्षा का मूल उद्देश्य रटना नहीं, बल्कि समझना है। मूल्यांकन के आधार को ‘रटने’ (Rote Learning) से हटाकर ‘योग्यता’ (Competency-based) पर केंद्रित करने से छात्र अधिक आत्मनिर्भर बनेंगे। यह बदलाव छात्रों में तार्किक सोच (Logical Thinking) और सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करेगा। छात्र अब केवल उत्तर याद नहीं करेंगे, बल्कि विषय की गहराई को समझेंगे, जो उन्हें भविष्य की वैश्विक चुनौतियों और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए वास्तव में तैयार करेगा।

वर्तमान में गृहलक्ष्मी पत्रिका में सब एडिटर और एंकर पत्रकारिता में 7 वर्ष का अनुभव. करियर की शुरुआत पंजाब केसरी दैनिक अखबार में इंटर्न के तौर पर की. पंजाब केसरी की न्यूज़ वेबसाइट में बतौर न्यूज़ राइटर 5 सालों तक काम किया. किताबों की शौक़ीन...