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नमोः नारी—गृहलक्ष्मी की कहानियां
Namho Naari

गृहलक्ष्मी की कहानियां-‘आर्यन बाबा नहीं रहे’ खबर सुनकर ही मैं थरथरा उठी थी. कभी कभी
प्रत्याशित खबर भी अप्रत्याशित रूप से झिंझोड़ डालती है. मन कर रहा था
उड़कर देव सर और माला मैडम के पास पहुंच जाऊं। अपनी ओर से उन्हें भरपूर
सांत्वना देने का प्रयास करूँ ,आर्यन बाबा की पार्थिव देह को अंतिम बार
निहार लूँ पर जानती थी ऐसा नहीं हो पाएगा।
 मेरे पहुंचने तक उसका अंतिम संस्कार हो चुका होगा। देव सर और माला मैडम
टूटे बिखरे अपने जीने का वजूद तलाश रहे होंगे क्योंकि उनकी जिंदगी, उनकी
सांसें तो आर्यन बाबा थे।
ट्रेन ने चलने की सीटी दी तो मैं वर्तमान में लौटी। कल रात तक घर पहुंच
जाऊंगी पर आर्यन बाबा के यहां तो परसों ही जाना हो पाएगा।
ओह गॉड , सर और मैडम को इस असीम दुख को सहने की शक्ति देना। मेरी आंखों
के सम्मुख रोती बिलखती माला मैडम की तस्वीर कौंधने लगी।
 बेचारी कितना प्यार करती थीं आर्यन बाबा को! जब जब भी मुझे मैडम को करीब
से देखने का मौका मिला, उनकी ममता के सम्मुख नतमस्तक होने को दिल करता
था। देव सर मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल होने के नाते काफी व्यस्त रहते थे।
सेमिनार, कॉन्फ्रेंस वगैरह में भी जाना होता रहता था। ऐसे मौकों पर वे
मुझसे रात को मैडम के पास रुकने का आग्रह करते थे।
‘वैसे तो कोई परेशानी नहीं है सिस्टर! पर क्या है आर्यन को दौरा पड़ जाए
तो वह अकेले इंसान से काबू नहीं आता। आप माला के पास रहेंगी तो मैं
निश्चिंत रहूंगा।’
ऐसे मौकों पर मुझे देर रात तक मैडम से बतियाने का अवसर मिलता था। मैडम भी
मुझसे खुलकर अपने दिल का दर्द बयां करने लगी थीं।
‘आर्यन बाबा 8-9 साल के हो गए हैं। आपके मन में कभी दूसरे बच्चे का ख्याल
नहीं आता मैडम? या शायद डर लगता होगा कि कहीं वह भी ऐसा ही’ मैंने हिम्मत
जुटाकर पूछ तो लिया था पर दिल धड़क रहा था कि ऐसा सवाल नहीं करना चाहिए
था. लेकिन मैडम संयत थी,‘सच कहूं तो डर यह सोचकर लगता है कि कहीं वह
स्वस्थ निकल गया तो?….तो मैं उसके साथ न्याय नहीं कर पाऊंगी क्योंकि एक
मां को अपनी कमजोर संतान सबसे प्रिय होती है। मैं आर्यन में लगी रहूंगी
और वह बेचारा अवहेलित होता रहेगा। एक डर और भी है यदि वह स्वस्थ हुआ तो
देव अपना सारा लाड़प्यार उस पर उड़ेल देगें। क्योंकि एक पिता को अपनी
प्रतिभाशाली संतान सबसे प्रिय होती है और बेचारा आर्यन जिसे वे अभी ही
इतना कम वक्त दे पाते हैं उनके इस बचे खुचे वक्त और प्यार से भी महरूम हो
जाएगा। सिस्टर, आर्यन बोल नहीं पाता पर समझता सब है। हम कब खुश हैं, कब
उदास हैं, कब झगड़ रहे हैं वह तुरंत पकड़ लेता है। डॉक्टर कहते हैं उसका
मानसिक विकास थम गया है, शारीरिक अंग भी धीरे धीरे शिथिल पड़ते जाएगें.
लेकिन मैं उसकी माँ …उसकी संवेदनाएं, भावनाएं अच्छी तरह पहचानती हूँ
….उसे कब,क्या चाहिए, वह कैसा महसूस कर रहा है मैं बखूबी समझ सकती
हॅूं….अब देखो, उसे अच्छा नहीं लग रहा है कि हम उसकी अवहेलना कर इतनी
देर से आपस में ही बतियाए जा रहे हैं इसलिए अब मैं उसकी पसंद का गाना
गाकर उसे सुलाती हूँ आप उधर उस बेडरूम में सो जाइए। जरूरत होगी तो मैं
बुला लूँगी.’
ऐसे ही एक अन्य अवसर पर उन्होंने भावना में बहकर आर्यन बाबा के बारे में
बहुत सी बातें बताई थीं, ‘प्रसूति के समय शायद उसके मस्तिष्क में
पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाई थी, इसलिए ऐसा हुआ होगा। देव डॉक्टर हैं
लेकिन खुद हमें लंबे समय तक पता नहीं लगा कि आर्यन के साथ कुछ समस्या है।
उसका शारीरिक विकास बराबर हो रहा था। नवजात बच्चों की तरह ही वह रोता,
हंसता और चिल्लाता था। फिर चलने भी लगा था पर उसके बाद…..’
‘उसके बाद क्या मैडम?’
‘…देव को ही कुछ असामान्यता लगी
मुझे ज्यादा कुछ बताए बिना उन्होंने उसके सब टेस्ट करवाए और जब हकीकत
सामने आई तब सब कुछ उजड़ चुका था। आर्यन की बीमारी असाध्य है। उसे अपनी
जिंदगी ऐसे ही गुजारनी होगी.’ मैडम की आंखें डबडबाने लगीं तो मैंने
उन्हें संभाला,‘आप तो जी जान से उनकी देखभाल कर रही हैं. आर्यन बाबा बहुत
लकी हैं कि उन्हें आप जैसी मां मिलीं.’
‘मुझे लगता है मैं बहुत लकी माँ हॅूं। और मांओं के बच्चे बड़े होते हैं,
उन्हें छोड़कर चले जाते हैं। मेरा आर्यन तो हमेशा मेरे ही पास
रहेगा….मेरे ही हाथों से नहाएगा, मेरे ही हाथों से खाएगा, मेरे ही पास
सोएगा….मैं तो ममत्व का अमरत्व लेकर इस धरा पर आई हॅूं। एक मां अपनी भी
उम्र अपने बच्चे को लग जाने की कामना करती है लेकिन मैं एैसी खुदगर्ज मां
हॅूं जो कामना करती हूँ कि मेरे बच्चे की अंतिम सांस तक मैं जिंदा रहॅूं।
क्योंकि मैं जानती हूँ औरों की तो छोड़ो खुद देव भी उसकी उतनी अच्छी
देखभाल नहीं कर पाएगें जितनी कि मैं कर सकती हॅूं.’ मातृत्व की अलौकिक
आभा से उनका चेहरा दमकने लगा था तो मैं घबरा गई थी। समझ नहीं पाती थी कि
संवेदनाओं के इस ज्वार को पागलपन समझूँ या ममता का अतिरेक उल्लास। मैं
उनसे सोने का आग्रह कर अपने कमरे में लौट जाती। काश, देव सर मैडम की
भावनाओं को समझने का कुछ अतिरिक्त वक्त निकाल पाते तो यह प्रवाह इतना
असंयत नहीं हो पाता। पर शायद सर को मैडम की मनःस्थिति का भान था तभी तो
उन्होंने एक दिन मेरे सम्मुख वह अप्रत्याशित प्रस्ताव रखा था.
‘सिस्टर, आपको तो मालूम ही है माला को कत्थक का कितना शौक है. पहले
क्लासेस भी लेती थी. आप आस—पास की बच्चियों से बात कीजिए। मैं चाहता हूँ,
माला फिर से कत्थक सिखाना शुरू करे.’
‘प…पर सर, आर्यन बाबा?’
‘उसे मैं देख लूँगा या फिर आप संभाल लेना.’
‘सर, मुझे नहीं लगता मैडम राजी होगीं’
‘आपको उन्हें राजी करना होगा सिस्टर! इतना वक्त उनके साथ गुजारने के बाद
अब तक तो आप समझ ही गई होगी कि वे किस मानसिक अवसाद की अवस्था से गुजर
रही हैं! उन्होंने आर्यन को ही अपनी जिंदगी मान लिया है। जरा सोचिए, कल
को आर्यन नहीं रहा तब….’
मेरा सर्वांग सिहर उठा था।
‘गलत मत समझिएगा सिस्टर। पिता हॅूं मैं उसका, पर एक डॉक्टर भी तो हूँ।
सच्चाई से कब तक मुंह मोड़ा जा सकता है? मैं माला की भलाई के लिए ही यह सब
कर रहा हूँ।  वह आर्यन के अलावा सबका अस्तित्व भुला चुकी
है…मेरा…अपना भी! खाना लगा ठंडा होता रहता है लेकिन वह चम्मच से
आर्यन के गले में कौर उतारने में लगी रहती है….रिश्तेदार मेहमान बैठक
में उसका इंतजार करते उबासियां लेते रहते हैं और वह आर्यन के सोने का
इंतजार करती रहती है। उसे अपने नहाने, कपड़े बदलने की परवाह नहीं है लेकिन
आर्यन का डाइपर एक सेकेंड भी गीला नहीं रहना चाहिए.’
‘वे ममता की देवी हैं सर’
‘मैं उसे देवी नहीं, इंसान के रूप में देखना चाहता हूँ सिस्टर। पूजना
नहीं,प्यार करना चाहता हूँ….म….मैं उसका भला चाहता हूँ.’
‘म….मैं समझ गई सर। मैं पूरी कोशिश करूँगी’
जैसा कि अपेक्षित ही था मेरा प्रस्ताव सुनते ही मैडम बिफर गई थीं। मैंने
अनेकानेक तर्क और अनुनय विनय से उन्हें मनाया।‘लड़कियां आपसे ही सीखने की
जिद पर अड़ी हैं मैडम। आप उन बच्चियों का दिल कैसे तोड़ सकती हैं? नृत्य
साधना भी तो एक इबादत है और आपका तो सबसे बड़ा पैशन। जब आप यह साधना
करेंगी तो आपको कितनी खुशी मिलेगी और आपको खुश देखकर आर्यन बाबा भी कितने
खुश होगें?’
मेरे इस अंतिम तर्क ने उन्हें पूरी तरह परास्त कर दिया था और वे राजी हो
गई थीं। कत्थक कक्षा धड़ल्ले से चलनी आरंभ हो गई थीं। शाम के उन 2 घंटों
में देव सर घर पर ही बने रहने का प्रयास करते और मैं भी अकसर पहुंच ही
जाती थी। उन दिनों देव सर एक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की कॉन्फ्रेंस करवाने
में व्यस्त थे। जोर शोर से तैयारियां चल रही थीं।  बैठक में डॉक्टर्स का
जमावड़ा लगा हुआ था।  मैडम डांसक्लास में थी। मैं बैठक और बेडरूम के बीच
चक्करघिन्नी की तरह घूम रही थी। आर्यन बाबा को नींद आने लगी तो सर मुझे
लेकर बैठक में आ गए और फाइल तैयार करवाने लगे।  हम काम में इतना डूब चुके
थे कि वक्त का पता ही नहीं लगा। मैडम की तेज—तेज बोलने की आवाज आई तो हम
काम छोड़कर घबड़ाते हुए अंदर भागे। पता चला आर्यन बाबा उठ गए थे और गीले
डायपर में पड़े मुंह बना रहे थे। मैडम का पारा सातवें आसमान पर था। वह सर
पर बुरी तरह खफा हो रही थीं। मैं बेडरूम के बाहर खड़ी थर—थर कांप रही थी
और अंदर सर मैडम को शांत करने का प्रयास कर रहे थे।‘माला, डार्लिंग शांत
हो जाओ आर्यन की इन्द्रियां अब निष्क्रिय हो चुकी हैं। यदि वह थोड़ी देर
गीले में लेटा भी रहा तो उसे कुछ आभास नहीं होगा.’
‘उसकी इंद्रियां निष्क्रिय हो चुकी हैं लेकिन मेरी सक्रिय हैं। मैं उसे
एक सैंकड गीले में नहीं देख, सह सकती.’ उन्हें चिल्लाता देख आर्यन के
चेहरे पर डर के भाव उभरने लगे थे।
‘ओके डार्लिंग, आई एम सॉरी! आगे से ऐसी गलती नहीं होगी।’ डा. देव संयम से
आर्यन का डाइपर बदल रहे थे और लगातार क्षमा याचना भी कर रहे थे। मैडम
शायद पिघलने लगी थीं। आर्यन का डरना, घर में डॉक्टर्स की मौजूदगी….कुछ
ही देर में उनका चिल्लाना, बड़बड़ाना मंद होता होता शांत हो गया था। डा.
देव फिर से बैठक में आकर काम में व्यस्त हो गए थे। मैं देर तक यही
विश्लेषण करती रह गई थी कि यदि मैडम ममता की देवी हैं तो सर भी अपने नाम
के अनुरूप किसी देव से कम नहीं हैं-प्यार और संयम के देवता। अगले दिन भी
मैडम को डांस क्लास लेते देख मेरी यह धारणा और भी मजबूत हो गई थी. देव सर
ने वादा किया तो निभाना भी. अब जब तक मैडम डांस क्लास में रहती देव सर
आर्यन बाबा के पास ही कुर्सी लगाए बैठे रहते. लैपटॉप पर चलती अंगुलियां
और आंखें, मोबाइल पर लगे कान आर्यन बाबा की देखरेख की जिम्मेदारी भी उतनी
ही तत्परता से निभाने लगे। इंसान को निरन्तर एक ही काम करना पड़े तो फिर
वह उसे अपनी जिम्मेदारी समझकर शिद्दत से निबाहने लगता है।  डा. देव के
साथ भी यही हो रहा था। कॉन्फ्रेंस अच्छे से हो गई, काम का बोझ भी घट गया
लेकिन आर्यन की जिम्मेदारी वे अब भी उसी शिद्दत से निबाह रहे थे। पहले जो
हाल मैडम का था वह अब डा.देव का होने लगा था। मोबाइल खुला रह जाता और सर
आर्यन का डायपर बदलते रहते। रेजीडेंट डॉक्टर्स बैठक में उनकी गाइडलाइन्स
का इंतजार करते ऊंघते रहते और सर चम्मच चम्मच आर्यन को जूस पिलाते,
नैपकिन से उसका मुंह पोछते और बतियाते नहीं अघाते थे।  मैं जानती थी लोग
दबे स्वर में अब मैडम को नहीं उन्हें सनकी कहने लगे थे। उन्हीं दिनों
मुझे अपने भतीजे का विवाह तय हो जाने की खबर मिली तो मैं खुशी से झूम उठी
थी। और जी जान से शादी में जाने की तैयारियों में जुट गई थी। नई बहू के
लिए कपड़े गहने, घरवालों के लिए तोहफे, अपने लिए नए कपड़े, सैंडल, पर्स
आदि। इस चक्कर में कई दिनों तक सर के यहां जाना नहीं हो पाया। फिर एक दिन
दरवाजे से ही सर को शादी का कार्ड और छुट्टी की अर्जी थमाकर मैं शादी के
लिए रवाना हो गई थी। आज फुर्सत से ट्रेन में बैठकर वह सब याद कर रही हॅूं
तो बड़ा अफसोस हो रहा है। मैं कितनी खुदगर्ज हो गई थी शादी में आने के लिए
इतनी उतावली हो रही थी कि एक बार अंदर जाकर मैडम से मिलना, आर्यन बाबा को
देखना भी मुनासिब नहीं समझा। अब उसी आर्यन बाबा का अंतिम वक्त मुंह न देख
पाने का गम जिंदगी भर सताता रहेगा।
जैसे तैसे सफर कटा और घर पहुंची। मन तो कर रहा था रात को ही मिलने चल
दूं. पर किसी तरह रात काटी और सवेरा होते ही तैयार होकर निकल पड़ी थी।
अस्पताल का पूरा स्टाफ ही वहां जमा था। जितने मुंह, उतनी बातें। देव सर
और मैडम के शोक और विलाप की बातें सुनकर कलेजा मुंह को आ रहा था। ‘मैडम
ने तो फिर भी बार—बार जोर डालने पर चाय और थोड़ा जूस ले लिया है। पर सर की
हालत तो बहुत खराब है। तीसरा दिन है, मजाल है जो पानी की कुछ बूंदों के
अलावा पेट में कुछ गया हो.’
मुझे लगा हलक में रूकी सिसकी अब फूट ही पड़ेगी। किसी तरह मन कड़ा करके मैं
अंदर प्रविष्ट हुई। कुछ रिश्तेदारों के संग सर और मैडम जमीन पर दरी
बिछाकर बैठे हुए थे। सामने चाय के भरे हुए कप और एक तश्तरी में बिस्किट
रखे थे। रिश्तेदार सर से उनके स्वास्थ्य का हवाला देते हुए चाय बिस्किट
लेने का आग्रह कर रहे थे। मैडम को भी यही सब समझा रहे थे। अचानक सबने
देखा मैडम ने चाय का कप उठाया और जबरन सर के हाथों में पकड़ा दिया। सर ने
अचकचाकर थाम लिया और हतप्रभ से मैडम को देखने लगे।
‘आप जानते हैं न हमें दुखी और परेशान देखकर आर्यन कितना विकल हो उठता था।
आज भी हमें भूखा, रोता बिलखता देखकर वह मासूम छटपटा रहा होगा. उसकी आत्मा
की शांति के लिए ही सही….प्लीज़ यह चाय ले लीजिए. एक बिस्किट आप
उठाइए…..फिर एक मैं उठाती हूँ।’
सबने आश्चर्य से देखा डा. देव चाय के साथ बिस्किट कुतरने लगे थे। अगले ही
पल उनकी आंखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा और वे कप रखकर अपनी अर्धगिनी
से लिपट गए। मेरी पनीली आंखें देख सकती थीं कि डा. देव नन्हे शिशु की तरह
मैडम के सीने में दुबके बिलख रहे थे और मैडम हौले हौले उनकी पीठ सहला रही
थी। मैडम की आंखों से बहते निःशब्द आंसू चिल्ला चिल्ला कर कह रहे थे नारी
कमजोर नहीं, सर्वशक्तिमान है। अपने हर रूप में वह नर पर भारी है-चाहे वह
मां के रूप में हो, पत्नी के रूप में हो, बहन के या बेटी के…… सिर्फ
यही नहीं, नारी यह जानने में भी सर्वथा सक्षम है कि उसे कहाँ , कैसे, कब
अपने किस रूप की शक्ति का परिचय देना है।

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