googlenews
grehlaksmi kahani

गृहलक्ष्मी कहानियां – जब तक तीनों अपनी पसंद-नापसंद बात रहे थे तब तक विनीता ने थोड़ा-थोड़ा आलू, प्याज, पनीर का मिश्रण तैयार कर नाश्ता मेज पर लगा दिया। कहने को तो घर में चार ही लोग थे पर सबकी पसन्द अलग होने की वजह से विनीता का अधिकतर समय किचन में ही निकल जाता, फिर केवल खाने का ही तो घर में काम नहीं रहता और भी कितने ही काम होते हैं, यूं तो उसने घरेलू कार्यों के लिए बाई रखी हुई है, पर सफाई पसन्द होने की वजह से अधिकतर काम या तो खुद करती या अपनी उपस्थित में ही बाई से करवाती। अब जो घर के जरूरी काम हैं, जो करने ही हैं उनकी तो बात अलग है किन्तु पति व बच्चों की खाने-पीने सम्बंधित या फिर और जो फरमाइशें दिन पर दिन बढ़ने लगी थीं उनसे अब विनीता थकने लगी थी, करने को तो सबके मन का करती लेकिन उम्र का बढ़ना स्वाभाविक था, साथ ही थक कर तनावग्रस्त 
होना भी।
अभी दो तीन दिन पहले की बात है, नाश्ते में गाजर-मटर सभी सब्जियां मिला उत्तपम बनाया, सोचा इसी बहाने सब्जियां खाने में आ जाएंगी, सब खुश हो खा भी लेंगे। एक तरफ गैस पर कॉफी रख उत्तपम सेंक ही रही थी कि रिया टेबल पर बैठते ही बोली, ‘मां आज साउथ इंडियन खाने का मन नहीं हो रहा, मेरे लिए तो मटर का सैंडविच बना दो। रिया को बोलते देख रोहन भी बोला, ‘मुझे भी उत्तपम नहीं डोसा खाना है, अजय भी अलग से तो कुछ और बनाने को नहीं बोले, हां! इतना ज़रूर कहने लगे, ‘उत्तपम के साथ नारियल-धनिया दोनों चटनी बना लेना।
एक तो सुबह का समय वैसे ही घर में कई काम रहते हैं फिर भी सब खुश हो खा लेंगे यही सोच उत्तपम बना लिया था, अब सबकी अलग-अलग फरमाइशें सुन समझ नहीं आ रहा था क्या पहले बनाऊं क्या बाद में, क्योंकि तीनों एक साथ टेबल पर ब्रेकफास्ट करने बैठ गए थे, वजह कॉलेज या ऑफिस जो जाना था। अब कैसे बनेगा? इससे कोई मतलब नहीं, जल्दी चाहिए तो चाहिए। खैर! फटाफट गैस के तीनों बर्नर पर एक साथ खाने का काम निपटाया। हड़बड़ाहट में थकान हो गई सो अलग, फिर भी जरा देर बैठ नहीं सकती थी क्योंकि अभी सफाई व कपड़ों की धुलाई सारे काम ज्यों के त्यों पड़े हुए थे, धीरे-धीरे सब घरेलू कार्य समाप्त कर खाने की तैयारी करने लगी।

कब शाम हो गई मालुम ही ना पड़ा। रोहन पहले कॉलेज से वापस आ गया। मिल्कशेक पीकर खेलने चला गया। थोड़ी देर में रिया, फिर अजय भी ऑफिस से आ गए। अजय को चाय, रिया को, मिल्कशेक बनाकर दिया तो बोली, ‘मां यह नहीं फ्रूट चाट बना दो’, ‘कहा भी, आज बन गया ले ले, कल सबके लिए चाट बनाकर रखूंगी।
बमुश्किल दो-चार घूंट ही पिया वापिस गिलास टेबल पर रख दिया, अब विनीता का ही मन नहीं माना भूख लगी होगी, सोच फिर फ्रूट चाट बनाकर दी। शाम के सभी काम निपटा घर ठीक-ठाक कर दीया-बाती जला बैठी ही थी कि रोहन आ गया आते ही कहने लगा, ‘मां कल स्कूल में स्पोर्ट्स ड्रेस पहनकर जाना है, तैयार तो है ना, पर कल तो मंगलवार है वो तो शनिवार को पहननी होती है, इसलिए प्रेस के कपड़ों में रखी है, अरे मां! आप खुद ही उस पर प्रेस कर दो, रिहर्सल के कारण पहनकर जाना है। ठीक है, वो भी करती हूं। अब दो घड़ी भी सुस्ताने का टाइम ना था, क्योंकि फिर खाना लगाना था, खाने का काम निपटा रसोई साफ करते-करते वही रात के ग्यारह साढ़े ग्यारह बज गए लेटते-लेटते।

विनीता की आदत थी सोने से पहले थोड़ी देर अपनी प्रिय मैगज़ीन पढ़कर ही सो पाती थी। आज भी पन्ने पलट ही रही थी कि उसकी नज़र उन बीस महिलाओं पर गई जो अपने बलबूते किसी मुकाम पर पहुंची थीं, अपने लक्ष्य अपनी इच्छाओं को पूरा करने में सफल कामयाब हो सकी थीं। लेटे-लेटे अचानक विनीता को कुछ बैचेनी सी होने लगी दरवाजा खोल बाहर बालकनी में आ बैठ गई, सोचने लगी कितना अच्छा लिखा करती थी वो  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में। उसके लेख कहानियां प्रकाशित होते ही रहते थे, धीरे-धीरे लेखनी इतनी अच्छी होने लगी थी कि लगभग हर हफ्ते, हर महीने ही उसके नाम का छपने लगा था। शादी के कुछ दिन बाद तक लिखना जारी रहा लेकिन रिया, फिर रोहन के आने के बाद घर-बच्चों की जिम्मेदारी में इस कदर उलझने लगी कि कई बार मन के विचारों को मन तक ही सीमित रखना पड़ता। लिखने के मौके कम ही तलाश पाती और अब तो शायद ही कागज़-कलम को हाथ लगाती, कभी ये कभी वो काम में ही सारा दिन निकल जाता। रात काफी हो गई थी, पर विनीता की आंखों से नींद कोसो दूर थी। एक मुद्दत बाद अच्छी लेखिका बनने का सपना जो उभर आया था। काश! उसने लिखना जारी रखा होता तो आज वो भी एक मुकाम हासिल कर चुकी होती, एक सफल व्यक्तित्व के साथ उसकी एक अलग ही पहचान होती।

खैर! अब कुछ नहीं हो सकता, भारी मन से 2-4 मिनट और बैठी रही फिर यही सोच बैठे रहने से अब क्या होगा, उठने लगी कि तभी अंतरात्मा से आवाज़ सुनाई दी, निराश मत हो, यदि अभी भी दिल में आस और लगन है तो इस जीवन में कुछ भी खत्म नहीं होता। जहां से चाहो, जब चाहो किसी भी पड़ाव से मनचाही मंजिल पा सकते हो। बस जरूरत है! आत्मबल आत्मविश्वास के साथ अडिग संकल्प कर उस पर डटे रहने की। स्वयं से किये वादे को हर परिस्थिति का सामना कर आजीवन निभाने की। जाने ऐसा क्या हुआ कि इस दिल की आवाज सुन पल भर में विनीता को लगा एक नई चेतना, एक नई उमंग ने शरीर अंतर्मन में जन्म ले लिया है, लगा अब फिर से समय आ गया कि पारिवारिक दायित्वों के साथ अपने सपनों को यथार्थ रूप दे सके क्योंकि जीवन एक ही बार मिला है, इसलिए आत्मिक खुशी व संतुष्टि महसूस कर भरपूर जिए। किन्तु कैसे संभव होगा?

इतनी जिम्मेदारियों के बीच लिखने के लिए व$क्त कहां से आएगा? सारा दिन तो घर के काम खाने-पीने में ही निकल जाता है। ज़रा भी समय नहीं मिलता फिर कुछ लिखने के लिए विचारों को मूर्त रूप देने के लिए एकाध घंटे कहां से लाऊंगी, कैसे यह संभव होगा, कैसे? यही सब सोचते-सोचते विनीता के सिर में दर्द होने लगा था। नींद तो अब भी आंखों में ना थी, किन्तु अगले सारे दिन के काम की सोचते हुए आराम करना जरूरी समझा। मन ही मन उसे लगा हर समस्या का समाधान होता है, मेरा भी होगा कैसे ना कैसे?

अगले दिन यंत्रवत सी विनीता काम तो करती रही किन्तु आज उसका मन यही सोच अधीर व्याकुल हो रहा था कि अपनी दिनचर्या को किस तरह व्यवस्थित करूं, जिससे खुद के लिए वक्त निकाल सकूं, पर कहते हैं न उम्मीद नहीं खोनी चाहिए कुछ ना कुछ रास्ता निकल ही आता है। आदतन सारे काम कर ही रही थी डिनर में छोले भटूरे बना रखे थे, जैसे ही रोहन रिया को खाने का मालुम हुआ दोनों बोलना शुरू हो गए, रिया बोली, ‘मां भटूरे नहीं खाना, मेरे लिए पूरी बना देना।Ó फिर रिया की सुन रोहन कहने लगा, ‘मुझे तो छोले के साथ परांठे खाने हैं।’

अब पतिदेव की बारी थी, ‘यार छोले के साथ पुलाव तो बना ही लेना?’ जल्द से जल्द खाने का काम खत्म हो जाये और अच्छा भी रहेगा, यही सोच छोले भटूरे बनाए थे, लेकिन ऐसा हुआ कहां? सबके कुछ ना कुछ अलग खाने के कारण देर में देर हो ही जाती है? खैर! खाने का और बिस्तर वगैरा सब काम निपटा आज फिर बालकनी में आ बैठ गई। पूरे दिन के काम का विश्लेषण तथा क्रियाकलाप के बारे में सोचती रही, आखिर इस निष्कर्ष पर पहुंची कि जो रोज़मर्रा घर-गृहस्थी के कामकाज हैं वो तो करने हैं ही, चाहे कितना भी समय लगे, किन्तु खाना तैयार होने के बावजूद भी तकरीबन ये बना दो, वो बना दो की जो रट लगती है, उससे काफी समय व्यर्थ हो जाता है। इसके अलावा बच्चों ने जो कहा, जो चाहा वे सभी काम उसी पल करने की आदत भी काफी समय गंवाने की एक बड़ी वजह है, थोड़ा बहुत अपने लिए मिलने वाला समय फिर ऐसे ही निकल जाता है।
अंत में विनीता इसी निष्कर्ष पर पहुंची कि बहुत हुआ अब जितना आराम से तनावमुक्त रहकर कर सकेगी उतना ही करेगी। मन ही मन उसने सोचा,
‘जिन्न नहीं हूं मैं,
इंसान ही हूं,
जो चाहा जो मांगा,
तत्काल ही हाजि़र कर दिया,
अब ऐसा हरिगज़ नहीं होगा,
आखिर इंसान हूं मैं… इंसान हूं मैं।’
एक अटल संकल्प कर उठ खड़ी हुई, क्योंकि अब उसकी आंखों में सपने हकीकत में बदलने की उम्मीद निश्चिंत्ता की ओर आतुर हो चुकी थी। अगली सुबह नाश्ता टेबल पर लगा अजय व दोनों बच्चों को आवाज़ लगाई। आशा के अनुरूप फिर वही ये नहीं खाना, वो बना दो, तभी अपने को संयत कर शांत भाव से विनीता तीनों की ओर देख बोली, ‘तुम लोगों से कुछ कहना चाहती हूं आजकल घर के काम में मुझे बिलकुल समय नहीं मिलता। मैं भी चाहती हूं कुछ वक्त मिले ताकि पहले की तरह कुछ लिखकर अपने मन की कर सकूं, इसलिए जो भी ब्रेकफास्ट, लंच व डिनर में एक बार बन जाएगा वही सबको खाना होगा। मैं फिर से कुछ नया नहीं बनाऊंगी। हां, जो भी मनपसंद खाना हो मुझे पहले से बता दिया करो वही बना दिया करुंगी लेकिन जो बन गया वो बन गया, वही खुश हो सबको खाना होगा। और हां… आज से हर समय मम्मी ये कर दो, वो कर दो, अभी कर दो, ऐसा नहीं होगा। एकदम से ना बताकर थोड़ा पहले बताना होगा, जिससे बिना अफरातफरी के आराम से कर सकूं, बेवजह की थकान या तनाव को अपने ऊपर हावी ना होने दूं और सबसे अहम् स्वयं के लिए समय निकाल सकूं। आखिर मेरी अपनी कुछ इच्छाएं तथा वजूद हैं।’

तीनों जो एकदम बिना पलक झपकाए विनीता की ओर देख रहे थे समझ नहीं पाए कि आज क्या हो गया? पर फिर भी समय की नज़ाकत को समझते हुए अजय बोले, ‘जैसी आपकी मज़ीर् हुज़ूर, आपके आदेशों को सिर आंखों पर हम सब मिलकर निभाएंगे।Ó
‘तो फिर ठीक है, अब जो बना है, यही आप सब खा लो ताकि मैं जल्दी-जल्दी बाकी काम निपटा सकूं।’ इतना कह विनीता स्वयं को बहुत हल्का व तनाव रहित महसूस कर रही थी।
आज उसकी अंतरात्मा बहुत खुश थी आखिर लेखिका बनने का सपना पूरा करने की ओर कदम जो उठा लिया था।

यह भी पढ़ें– उम्मीद – गृहलक्ष्मी कहानियां