Best Hindi Story: ” सुहागरात को लेकर उसके दिल में एक अजीब-सा डर समाया हुआ था। इस डर का पहला कारण शायद यह था कि मात्र एक महीने पहले ही, उसके मामा ने रवि के साथ उसके रिश्ते की बात की थी।
‘सुजाता बहन, बहू तो एकदम चांद का टुकड़ा है, कहां से ढूंढ कर लाई हो?’ मिसेज गुप्ता ने नई नवेली दुल्हन के चेहरे को देखते हुए कहा। ‘बस, सब ऊपरवाले की कृपा है।’ अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए सुजाता ने कहा। दुल्हन की सुंदरता की तारीफ सुनकर जहां एक ओर सुजाता खुशी से फूली
नहीं समा रही थी, वहीं दूसरी ओर घूंघट के अंदर छुपी रिनी भी शर्म से गुलाबी हुई जा रही थी। लोगों के मुंह से अपने रूप-रंग की तारीफ सुनकर और सासू मां के चेहरे की खुशी देखकर उसके दिल को सुकून मिल रहा था। वरना विदाई के बाद से ही उसके दिल में एक अजीब-सी घबराहट थी। ससुराल का माहौल कैसा होगा? लोग कैसे होंगे? क्या कहेंगे? यह सब सवाल उसे अंदर ही अंदर परेशान कर रहे थे। लेकिन ससुराल के इस माहौल ने उसे थोड़ी राहत दी थी।
मुंह दिखाई और बाकी की सभी रस्में पूरी होते-होते शाम हो गई। ज्यादातर मेहमान भी घर से जा चुके थे। रिनी की सास, सुजाता के चेहरे पर थकान साफ देखी जा सकती थी, मगर फिर भी वह घर के सारे काम बड़े ही खुशी से निपटा रही थीं। लेकिन शाम होते-होते, घूंघट के अंदर, रिनी के चेहरे पर
घबराहट नजर आने लगी। ज्यों-ज्यों सुहागरात का समय नजदीक आ रहा था, त्यों-त्यों उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। यूं तो हर लड़की के दिल में सुहागरात को लेकर थोड़ी घबराहट होती है, मगर रिनी के दिल-दिमाग में अजीब से ख्याल उमड़ रहे थे।
सुहागरात को लेकर उसके दिल में एक अजीब-सा डर समाया हुआ था, जोकि स्वाभाविक भी था। इस डर का पहला कारण शायद यह था कि मात्र एक महीने पहले ही, उसके मामा ने रवि
के साथ उसके रिश्ते की बात की थी। और महीने भर के अंदर ही लड़की देखने से लेकर, सगाई और शादी की सभी रस्में पूरी हो गईं। सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि रवि और रिनी को एक-दूसरे से मिलने या जानने का वक्त ही नहीं मिला। सिर्फ फोन पर ही दोनों की बात हो पाती थी, वह भी बहुत
कम, क्योंकि रवि एक कॉल सेंटर में काम करता था और रिनी एक प्राइवेट स्कूल में टीचर थी। अक्सर शाम को ही दोनों को फोन पर बात करने का मौका मिल पाता था। हालांकि उस थोड़ी-सी
बातचीत में, रिनी को इतना समझ आ ही गया था कि रवि बहुत ही महत्वाकांक्षी और नरम स्वभाव का व्यक्ति है। रवि के स्वभाव ने, रिनी के दिल में उसके प्रति सम्मान की थोड़ीसी जगह बना ली थी। शायद यही वजह थी कि उसने शादी के लिए हां की थी। मगर उसकी घबराहट का दूसरा या शायद मुख्य कारण था- उसकी सहेली विनीता की आपबीती। विनीता, रिनी की सबसे अच्छी सहेली थी। दोनों एक-साथ स्कूल और कॉलेज गई थीं।
दिनभर पढ़ाई-लिखाई, खेलकूद और गपशप में ही दोनों का समय बीतता था। मजाल है कि एक दिन तो क्या, एक घंटा भी एक-दूसरे के बिना रह पातीं। कभी-कभी तो एक-दूसरे के घर
पर रात भी बिता देती थीं। रिनी और विनीता की दोस्ती पूरे मोहल्ले में मशहूर थी। इनकी दोस्ती इतनी गहरी थी कि उनके माता-पिता तक सोचते थे कि दोनों की शादी एक ही घर में कर दी
जाए। मगर जात-बिरादरी भी कोई चीज होती है, जोकि इंसान के रिश्तों के बीच कभी-कभी दीवार बनकर खड़ी हो जाती है। शायद अलग-अलग जाति के होने की वजह से ही विनीता और रिनी
के माता-पिता को अलग-अलग घरों में रिश्ता करना पड़ा। यूं तो दोनों हमउम्र थीं, मगर रिनी के लिए एक अच्छा लड़का मिलने में थोड़ी देर हुई। विनीता का जल्द ही रिश्ता तय हो गया।
जब विनीता की शादी तय हुई तो सबसे ज्यादा खुश और सबसे ज्यादा दुखी रिनी ही थी। एक तरफ विनीता की शादी की खुशी थी, मगर दूसरी तरफ अपनी प्यारी सहेली से जुदा होने का दुख भी था। हालांकि रिनी जानती थी कि एक-न-एक दिन तो ऐसा होना ही था, इसलिए उसने विनीता की शादी
में खूब धूम मचाई। मगर जब विनीता की विदाई का समय आया तो दोनों एक-दूसरे से लिपटकर खूब रोईं।
विनीता की हालत तो रिनी से भी ज्यादा खराब थी। एक तो अनजाने घर में जाने का डर और दूसरा अपनी प्यारी सहेली से बिछड़ने का दुख। बड़ी मुश्किल से दोनों को अलग किया और विनीता को
विदा किया। विनीता के जाने के बाद रिनी घंटों अपने कमरे में अकेली बैठी रोती रही। बड़ी मुश्किल से उसने शाम को एक निवाला तोड़ा, वह भी यह सुनने के बाद कि विनीता दो दिन बाद पगफेरे के लिए आने वाली है।

खैर, जिस दिन विनीता आने वाली थी, उस दिन रिनी सुबह से ही उसके घर पहुंच गई और तैयारियों में विनीता की मां का हाथ बटाने लगी। रिनी बार-बार घड़ी देख रही थी कि कब जल्दी से
विनीता घर आए और वह उससे उसके ससुराल के हाल-चाल, उसके पति और नए घर के बारे में ढेर सारी बातें करे। रिनी बेताब थी यह देखने को भी कि नई दुल्हन के रूप में विनीता कैसी लग रही
होगी? माथे में सिंदूर, हाथों में चूड़ियां, होंठों पर लिपस्टिक, एकदम गुड़िया जैसी। रिनी यह सब सोच ही रही थी कि उसे गाड़ी का हॉर्न सुनाई दिया। वह समझ गई कि विनीता आ गई।
“विनीता की हालत तो रिनी से भी ज्यादा खराब थी। एक तो अनजाने घर में जाने का डर और दूसरा अपनी प्यारी सहेली से बिछड़ने का दुख। बड़ी मुश्किल से दोनों को अलग किया और विनीता को विदा किया।”
विनीता गाड़ी से उतरी और दौड़कर रिनी के गले से लिपट गई। वह फूटफूटकर रो रही थी। रिनी को यह समझने में देर न लगी कि कुछ गड़बड़ है। मगर उसने मौके की नजाकत को देखते हुए किसी से कुछ कहना या विनीता से कुछ पूछना उचित नहीं समझा। शाम को जब दोनों अकेले कमरे में थीं, तब रिनी ने विनीता से पूछ ही लिया- ‘रिनी, तू सच-सच बता, क्या तू खुश है?’
विनीता ने कोई जवाब नहीं दिया, मगर उसकी चुप्पी ही काफी थी। रिनी ने फिर पूछा, ‘रिनी बता, आखिर क्या बात है? तू जानती है कि मुझसे कुछ न छुपा पाएगी।’ रिनी की बात सुनकर विनीता
पहले तो खूब रोई, लेकिन फिर अपने आपको संभालते हुए बोली- ‘रिनी, यह शादी-ब्याह, जैसा हम फिल्मों में देखते हैं, वैसा नहीं होता। फिल्मों में सब कुछ बहुत अच्छा-अच्छा दिखाते हैं, जबकि हकीकत फिल्मों से बहुत अलग होती
है।’ ‘ऐसा क्या हुआ विनी? बता, तेरे ससुराल वालों ने कुछ कहा? उन्होंने दहेज की मांग की क्या?’ ‘नहीं रिनी, ससुराल में किसी ने दहेज जैसा कुछ नहीं कहा।’ ‘तो फिर क्या देवेन? क्या देवेन
अच्छा आदमी नहीं है?’ ‘हां, कुछ ऐसा ही समझ ले।’
‘कुछ मतलब? सीधे-सीधे बता, आखिर बात क्या है?’
‘रिनी, देवेन ऊपर से जितना सभ्य और शरीफ दिखता है, अंदर से उतना
ही वहशी है।’
‘वहशी! क्या मतलब विनी?’ ‘हां रिनी, वह सचमुच एक दरिंदा है।
हर लड़की की तरह मैंने भी सुहागरात के कुछ सपने सजाए थे। मैंने सोचा था, देवेन जैसे सभ्य और शरीफ जीवनसाथी के साथ मैं खुशी-खुशी अपना जीवन शुरू करूंगी। जब वह कमरे में आएगा,
तो हम दोनों एक-दूसरे से खूब बातें करेंगे, एक-दूसरे को जानेंगे। प्यार भरे समर्पण के साथ हम अपने नवजीवन की शुरुआत करेंगे। मगर…’ कहते-कहते विनीता चुप हो गई। ‘मगर क्या विनी? बोल, तू चुप क्यों हो गई?’
‘मगर देवेन तो एकदम हैवान निकला। उस रात, मैं सजी-धजी सुहागरात की सेज पर देवेन का इंतजार कर रही थी। मेरे मन में हलचल थी और आंखों में ढेर सारे सपने। मगर इंतजार करते-करते
मेरी आंख लग गई। थोड़ी देर बाद मुझे कुछ आहट सुनाई दी, और मैं डर से उठकर बैठ गई। देखा तो देवेन अंदर से दरवाजा बंद कर रहा था। उसके हाथ डगमगा रहे थे। किसी तरह चिटखनी लगाकर वह मेरे पास आकर बैठ गया। उस पर शराब की दुर्गंध आ रही थी। वह पूरी तरह नशे में धुत था। मैं उसकी
यह हालत देखकर सहम गई। आते ही बिना कुछ बोले उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे अपनी तरफ खींचने लगा। मैंने छुड़ाने की बहुत कोशिश की, मगर उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि
मैं खुद को बचा न सकी। उसने जबरदस्ती मेरे कपड़े पकड़कर उतार दिए और मेरे ऊपर भूखे भेड़िए की तरह टूट पड़ा।’
‘मैंने विरोध किया, मगर उसने मुझे बहुत मारा। जगह-जगह मेरे शरीर पर अपने दांतों से काटा और मुझे बुरी तरह रौंद डाला। मैं दर्द से कराह रही थी, मगर वहां मेरी सुनने वाला कोई नहीं
था। अपनी हवस मिटाने के बाद उसने सिगरेट सुलगाई और पीने लगा। जब सिगरेट खत्म होने को
आई, तो जानती हो उसने उसे कैसे बुझाया?’ विनीता
ने अपना आंचल हटाकर अपने सीने पर सिगरेट से जले हुए दाग को दिखाया।
उसने अपने शरीर के अन्य जख्म भी रिनी को दिखाए। रिनी
चीख पड़ी और बिलख-बिलखकर रोने लगी। रिनी की चीख सुनकर विनीता की मां दौड़कर उनके कमरे की तरफ आई और दरवाजा खटखटाया। रिनी ने दरवाजा खोला। जब उन्होंने दोनों को रोते देखा, तो वे समझ गईं कि बात गंभीर है।
उन्होंने रिनी से सारी बात पूछी। रिनी ने उस वक्त विनीता की मां से कुछ भी
छुपाना उचित नहीं समझा और रोते-रोते सारी बात उन्हें बता दी।
विनीता के साथ हुए अत्याचार के कारण ही रिनी के मन में शादी को लेकर डर बैठ गया था। वह शादी करना ही नहीं चाहती थी। मगर जब सब घरवालों और खुद विनीता ने उसे समझाया कि दुनिया के सभी पुरुष एक जैसे नहीं होते, तब कहीं जाकर रिनी शादी के लिए राजी हुई थी।
जब विनीता की मां ने अपनी बेटी के शरीर पर जख्मों के निशान देखे, तो वे समझ गईं कि उन्हें इंसान नहीं, एक दरिंदा दामाद के रूप में मिला है। विनीता की मां बहुत सुलझी हुई और निडर महिला थीं। उन्होंने समाज की परवाह न करते हुए विनीता को दोबारा ससुराल नहीं भेजा और जल्द ही विनीता और देवेन का तलाक करा दिया।

विनीता के साथ हुए अत्याचार के कारण ही रिनी के मन में शादी को लेकर डर बैठ गया था। वह शादी करना ही नहीं चाहती थी। मगर जब सब घरवालों और खुद विनीता ने उसे समझाया कि दुनिया के सभी पुरुष एक जैसे नहीं होते, तब कहीं जाकर रिनी शादी के लिए राजी हुई थी। लेकिन
शादी के लिए हां कह देने या रवि से फोन पर बातचीत कर लेने के बाद भी उसका मन का डर पूरी तरह खत्म नहीं
हुआ था। वह मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी कि उसका पति रवि, देवेन जैसा न हो।
आखिर वह घड़ी आ ही गई, जिसकी वजह से रिनी के दिल में बेचैनी थी।
जैसे ही रवि कमरे में आया, रिनी का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसे लगा कहीं रवि भी भूखे भेड़िए की तरह उस पर झपट न पड़े, कहीं वह भी शराब में धुत न हो। मगर रवि अंदर
आया और रिनी के पास आकर बैठ गया। वह मुस्कुराकर रिनी को देखने लगा। उसकी मुस्कान देखकर रिनी की
धड़कन कुछ धीमी हुई।
रवि ने बड़े ही प्यार से रिनी का हाथ पकड़ा। रिनी थोड़ी सहम गई। रवि समझ गया, लेकिन उसने रिनी की उलझन को समझते हुए भी उसका हाथ नहीं छोड़ा। उसने अपने दोनों हाथों में
रिनी का हाथ कसकर पकड़ते हुए कहा’
‘देखो रिनी, आज से हमारे जीवन की नई शुरुआत हो रही है। मैं चाहता हूं कि यह शुरुआत हम एक-दूसरे को अच्छे से जानकर और समझकर करें। हमारी लव-मैरिज नहीं हुई, कि हम पहले से
एक-दूसरे को जानते हों। अरेंज मैरिज में एक-दूसरे को समझने का मौका बहुत कम मिलता है। इसलिए मैं चाहता हूं कि हम पहले अच्छे दोस्त बनें। अगर हम अच्छे दोस्त बनेंगे, तो ही हम अच्छे
पति-पत्नी भी बन पाएंगे।
‘जब पति-पत्नी के मन में एक-दूसरे के लिए प्यार और समर्पण आ जाता है, तो जीवन की हर रात सुहागरात होती है। मैं समझता हूं कि तन का मिलन तभी पूर्ण आनंद देता है जब पहले मन
का मिलन हो जाए। तो बताओ, क्या
तुम मेरी दोस्त बनना चाहोगी?’ रवि की बातें सुनकर रिनी के कलेजे को ठंडक पहुंची। उसकी सारी घबराहट कुछ ही पलों में उड़नछू हो गई और वह खिलखिलाकर हंस पड़ी। उसने अपना
दूसरा हाथ रवि के हाथों पर रखकर कहा- ‘मंजूर है, पार्टनर!’
रिनी, रवि के इस प्यार भरे स्पर्श और उसकी मीठी-मीठी बातों से समझ गई कि उसे एक प्यारा और समझदार जीवनसाथी मिला है। ‘
