Saffron Color in Hinduism
Saffron clothes importance in Kanwar Yatra

Summary: भगवा वस्त्र पहनकर शिवभक्तों को क्यों मिलती है मानसिक और शारीरिक शक्ति?

कांवड़ यात्रा में भगवा वस्त्र त्याग, तपस्या और शिवभक्ति का प्रतीक माने जाते हैं। यह रंग भक्त को आत्मबल, अनुशासन और आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ता है।

Saffron Color in Hinduism: सावन के पवित्र महीने में कांवड़ यात्रा निकाली जाती है। हिंदू धर्म में कांवड़ यात्रा का विशेष महत्व होता है। इस यात्रा में श्रद्धालु दूर-दूर से पवित्र नदियों का जल लेकर शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। ऐसे में कांवड़ यात्रा में हमेशा श्रद्धालु भगवा वस्त्र पहने हुए ही दिखाई देते हैं। आखिर कांवड़ यात्रा में भगवा वस्त्र क्यों पहना जाता है और इसके पीछे क्या कारण, आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।

हिन्दू धर्म में भगवा रंग सेवा, त्याग, तपस्या, संकल्प, श्रद्धा, साधना और भक्ति का प्रतीक है। भगवा रंग यह दर्शाता है कि इसे धारण करने वाला व्यक्ति सांसारिक मोह-माया के जाल से छूट गया है और वह भगवान की भक्ति में लीन हो गया है। भगवा रंग साधु और संन्यासियों का भी रंग माना जाता है।

Saffron Color in Hinduism
Saffron color is a symbol of spiritual powers

भगवा रंग संकल्प, श्रद्धा और साधना का प्रतीक माना जाता है। कांवड़ यात्रा में भगवा रंग भगवान शिव और भक्त को आपस में जोड़ता है। इस यात्रा में भगवा रंग का वस्त्र कांवड़िओं के तपस्वी भाव को दर्शाता है। यह रंग भक्त के अंदर ऊर्जा, आत्मबल और आध्यात्मिक शक्तियों को बढ़ाता है और अनुशासन व एकजुटता का प्रतीक भी होता है। यह रंग समर्पण और धार्मिक चेतना का भाव जागृत करता है।

कांवड़ यात्रा आसान नहीं होता है। इस यात्रा में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन इस रंग को धारण करने के बाद शिवभक्तों को शारीरिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करने की शक्ति मिलती है और वे आसानी से अपनी इस पावन यात्रा को पार कर पाते हैं।

  • भगवा वस्त्र धारण करने के बाद मांस और मदिरा से दूरी बनाना जरूरी होता है। इस वस्त्र को धारण करने के बाद इन चीजों की मनाही होती है।
  • भगवा वस्त्र धारण के बाद कभी भी झूठ नहीं बोलना चाहिए।
  • भगवा वस्त्र धारण करने के बाद ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
history of Kanwar Yatra
What is the history of Kanwar Yatra

कांवड़ यात्रा के संबंध में कई अलग-अलग पौराणिक मान्यताएं प्रसिद्ध हैं। एक मान्यता के अनुसार कांवड़ यात्रा सबसे पहली बार भगवान परशुराम ने की थी। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने अपनी इस यात्रा में उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के पास स्थित पुरा महादेव मंदिर में जल चढ़ाने के लिए गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लेकर आए थे।

ऐसी मान्यता है कि त्रेतायुग में सबसे पहले श्रवण कुमार ने ही कांवड़ यात्रा की थी। पौराणिक कथा के अनुसार श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता की तीर्थ यात्रा की इच्छा पूरी करने के लिए उन्हें कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार लाया और गंगा स्नान कराया। साथ ही लौटते समय वे गंगाजल भी लेकर गए और यहीं से इस यात्रा की परंपरा शुरू हुई।

Lord Ram and Babadham
The journey of Lord Ram and Babadham is also special

भगवान प्रभु श्री राम ने भी कांवड़ यात्रा की थी। भगवान राम ने बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल भरकर देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम के शिवलिंग पर जल अर्पित किया था। इसे भी कांवड़ यात्रा की शुरुआत माना जाता है।

ए अंकिता को मीडिया इंडस्ट्री में 9 वर्षों का अनुभव है। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रिंट मीडिया से की और खास तौर पर लाइफस्टाइल और एंटरटेनमेंट बीट में रुचि रखती हैं। लेखन के अलावा वेब सीरीज़ देखना, घूमना, संगीत सुनना और फोटोग्राफी...