googlenews
गृहलक्ष्मी की कहानियां

गृहलक्ष्मी की कहानियां- डोरबेल बजते ही रुचिका दीवार पर लगे घड़ी की तरफ देख, गुस्से से पैर पटकती दरवाजे की ओर बढ़ी और दरवाजा खोलते ही सामने खड़े सारांश को देखे, बिना कुछ कहे ही मुंह फुलाए सोफे पर जा बैठी। सारांश भी चुपचाप अंदर आ गया और निढाल हो रिलैक्स की मुद्रा में अपनी आंखों को बंद कर पैर फैला कर बैठ गया। थोड़ी देर तक दोनों के बीच खामोशी की दीवार खड़ी रही, फिर सारांश दीवार गिराता हुआ बोला-

“यार एक अच्छी सी अदरक वाली चाय पिला दो, मैं बहुत थक गया हूं।”
यह सुनते ही शाम से घर पर सारांश के इंतज़ार में ज्वालामुखी बनी रुचिका फट पड़ी और धधकते हुए अंगारे बरसाती हुई बोली-
” क्यों? जहां से आ रहे हो वहां तुम्हें चाय भी नसीब नहीं हुई क्या? क्या तुम्हारी प्यारी मम्मी ने अपने लाडले बेटे को चाय तक को नहीं पूछा ?ऑफिस से सीधे रोज़ वहां जाते हो, वहां का सारा काम करते हो और जब थक जाते हो तो बीवी याद आती है”।
“बस भी करो रुचिका यदि चाय नहीं बना सकती तो मत बनाओ, लेकिन तानों की बौछार तो मत करो”। ऐसा कहते हुए सारांश ने दोबारा अपनी आंखें बंद कर ली।
अपने हाथों में आया सारांश के प्रति प्यार जताने का यह मौका रुचिका हाथ से भला कैसे जाने देती इसलिए वह अपना गुस्सा पी गई और सारांश के लिए चाय के साथ कुछ स्नेक्स भी ले आई।रुचिका अपनी सासू मां से हार नहीं मानना चाहती थी। वह यह साबित करना चाहती थी कि वह सारांश का ख्याल उनसे ज्यादा अच्छी तरह से रख सकती है और वह सारांश को उनसे ज्यादा प्यार करती है।
चाय के साथ स्नेक्स देख सारांश को बड़ा अच्छा लगा और चाय पीते हुए सारांश ने रुचिका से कहा-” सॉरी डियर… आज घर आने में देर इसलिए हो गई क्योंकि कल से मम्मी की तबियत ठीक नहीं है। उन्हें डॉक्टर को दिखा कर और उनके लिए खिचड़ी बनाकर आ रहा हूं। पापा ने कल फोन पर इसलिए नहीं बताया क्योंकि मम्मी ने उन्हें मना कर दिया था। मम्मी नहीं चाहती थी कि हमारा सन्डे स्पोइल हो मम्मी भी ना… हमारे लिए कितना सोचती है। “

सारांश जब यह सब कह रहा था रुचिका के चेहरे का रंगत उड़ने लगा। उसे एक बार फिर यह एहसास हुआ जैसे अब भी सारांश पूरी तरह से उसका नहीं हो पाया है। अब भी सारांश के मम्मी-पापा यहां नहीं होते हुए भी उनके बीच हैं।

छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर के पॉश एरिया विद्या नगर में सारांश अपनी पत्नी रुचिका के साथ अपना पैतृक मकान छोड़ कर पिछले छः महीनों से रह रहा है, जो यहां से 4-5 किलोमीटर की दूरी पर है जहां उसके माता-पिता सुजाता और कैलाश नाथ जी रहते हैं। सारांश अपने माता-पिता का इकलौता बेटा है।
नहीं चाहते हुए भी सारांश को अपने माता पिता से अलग रहना पड़ रहा था, यह उसकी मजबूरी थी क्योंकि रुचिका और सारांश की मां सुजाता के मध्य हमेशा वैमनस्यता रहती जिसकी वजह से सारांश का अपनी मां और पत्नी रुचिका से रिश्ते बिगड़ने लगे थे और घर का माहौल भी दिन प्रतिदिन तनावपूर्ण होता जा रहा था। सारांश दो पाटों के बीच दब कर रह गया था। ना तो वह अपनी मां को दुखी देखना चाहता था और ना ही अपनी पत्नी का दिल तोड़ना चाहता था।

सुजाता को लगता सारांश अब भी बच्चा है,वह अपना ध्यान सही से नहीं रख सकता और अपनी इसी सोच के चलते सुजाता सारांश का जरूरत से ज्यादा ध्यान रखती।उसका हर छोटे से छोटा काम भी खुद करने लगती, जिसकी वजह से रुचिका खुद को उपेक्षित महसूस करती और फिर दोनों सास-बहू एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करने लगते। ऐसी परिस्थिति में सारांश के लिए किसी एक के पक्ष में बोलना या किसी एक को समझाना दुष्कर हो जाता।

सुजाता को लगता है रुचिका उससे उसका बेटा छीनना चाहती है और इधर रुचिका सारांश पर एकाधिकार पाना चाहती थी। दोनों सास-बहू सारांश को अपनी-अपनी ओर खींचने के न‌ए-न‌ए पैंतरे आजमाती जिसकी वजह से सारांश का जीना दूभर हो गया था। सारांश को अपना बनाने के चक्कर में दोनों सास-बहू एक ही छत के नीचे प्रतिद्वंदी की तरह व्यवहार करने लगी थी, घर कुरुक्षेत्र बन गया था। दोनों सास-बहू अपने आप को श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगी रहती। दोनों के बीच किसी ना किसी बात को लेकर हर रोज तू-तू-मैं-मैं होती ही रहती, जिसका समाधान ना सारांश के पिता निकाल पा रहे थे और ना ही सारांश
शादी के बाद जब सारांश का पहला जन्मदिन आया, रुचिका उस दिन को अपने हिसाब से सेलिब्रेट करना चाहती थी। वह ग्रैंड पार्टी देना चाहती थी और सुजाता सालों से अपने लाडले बेटे का जन्मदिन जैसे मनाती आई थी वैसे ही मनाना चाहती थी।इस बात को लेकर बहस इतनी बढ़ गई कि सारांश को कहना पड़ा कि वह अपना बर्थडे ही सेलिब्रेट नहीं करना चाहता।तब कहीं जा कर दोनों शांत हुए।यह देख सारांश के पिता कैलाश नाथ जी ने कहा
” तुम दोनों हर बात पर आपस में ही क्यों झगड़ने लगते हो, आज सारांश का जन्मदिन है तो उसे तय करने दो कि वह अपना जन्मदिन कैसे मनाना चाहता है तुम दोनों अपनी इच्छाएं उस पर थोपना बंद करो।उसे अपनी मर्जी से जीने दो”।
कैलाश नाथ जी के ऐसा कहने पर सुजाता और रुचिका को अपनी गलती का एहसास हुआ और वे दोनों सारांश का जन्मदिन उसके अनुरूप मनाने को तैयार तो हो गई लेकिन अंदर ही अंदर दोनों यही मना रही थी सारांश उनके ही कहे अनुसार अपना जन्मदिन मनाएं।सारांश दोनों की मनोदशा भांप चुका था,वह ना ही अपनी मां और ना ही अपनी पत्नी को दुखी करना चाहता था इसलिए उसने निश्चय किया कि वह दोनों के मन मुताबिक अपना बर्थडे सेलिब्रेट करेगा।
अपने बर्थडे वाले दिन सारांश अपना सारा दिन अपनी मां की इच्छानुसार अपने बर्थडे को सेलिब्रेट किया और शाम से लेकर रात तक अपनी बीवी के इच्छानुसार।सारांश की लाइफ़ सुजाता और रुचिका के बीच दब कर अब एक सैंडविच से ज्यादा कुछ नही रह गई थी।
जैसे-तैसे मध्य का रास्ता चुन सारांश ने अपना बर्थडे तो सेलिब्रेट कर लिया था लेकिन हर बार यह संभव नही था।ये सास-बहू की लड़ाई यहां पर थमने वाली नहीं थी। हर रोज़ नया मुद्दा दानव बन कर सिर उठाए खड़ा हो जाता और सारांश को हर रोज एक न‌ई लड़ाई लड़नी पड़ती।कभी सारांश को टिफिन में क्या देना है इस बात पर बहस छिड़ जाती तो कभी उसे खाने में क्या पसंद है इस बात पर, सारांश आज क्या खाएगा यह भी रोज का मुद्दा हो गया था।सारांश अपनी पत्नी की पसंद का खाना खाएगा या फिर अपनी मां की पसंद का।
सुजाता यह समझने को तैयार ही नहीं थी कि उम्र और समय के अनुसार पसंद बदलते रहते हैं और फिर अब सारांश कोई बच्चा नहीं है कि उसे जो कल पसंद था या अच्छा लगता था उसे आज भी वही पसंद हो।वही हाल रुचिका का भी था। वह यह जाने बगैर कि सारांश को क्या पसंद है उसे क्या अच्छा लगता है सारांश पर अपनी पसंद लादती रहती। रुचिका को लगता जो उसे पसंद है वही सारांश को भी पसंद होना चाहिए।
सारांश पूरी तरह से इन दोनों के बीच फंस कर पिसता जा रहा था। सारांश की स्थिति उस वक्त और ज्यादा उलझ ग‌ई जब रुचिका ने ज़िद पकड़ ली कि अब वह सारांश के माता-पिता के साथ एक छत के नीचे नहीं रहना चाहती।सारांश के लिए यह निर्णय लेना कठिन हो गया कि वह क्या करे? सारांश अपने माता-पिता को इस तरह छोड़ कर नहीं जा सकता था लेकिन रुचिका यह बात समझना ही नही चाहती थी।रुचिका को ऐसा लगने लगा था कि सारांश अपने माता-पिता के साथ रहते हुए कभी भी पूरी तरह से उसका नही हो पाएगा इसलिए रुचिका अपनी ज़िद पर अड़ी रही।
रुचिका का इस प्रकार जिद करना और हर रोज़ सास-बहू के मध्य होने वाले कलह से परेशान हो कर सारांश को रुचिका की खुशी और घर की शांति के लिए घर छोड़ना ही पड़ा। घर छोड़ने के बावजूद सारांश अपने माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्यों को नहीं भूला। हर दिन वह ऑफिस से सीधे अपने माता-पिता के पास जाता उनकी जरूरतों का ख्याल रखता और जरूरत का सारे सामान मार्केट से ला कर देता।
सारांश के चाय पीते ही रुचिका यह पूछने के बजाय कि मम्मी की तबियत कैसी है, उसने बड़े उत्साह से कहा-
“सारांश आज डिनर में मैंने मंचूरियन और फ्राइड राइस बनाया है।तुम फ्रेश हो कर आ जाओ फिर हम साथ में डिनर करते हैं।”
ऐसा कहती हुई रुचिका किचन में चली गई और सारांश अपने दर्द को सीने में दबाए हौले से मुस्कुरा दिया। अपना घर छोड़ने के बाद भी सारांश की जिंदगी सास-बहू और अब दो घरों के बीच में झूलने लगी थी।दिन यूं ही कट रहे थे कि एक दिन अचानक रुचिका ने सारांश को उस वक्त फोन किया जब वह ऑफिस में था और फौरन घर आने को कहा, साथ में रुचिका ने सारांश से यह भी कहा कि वह अपने मम्मी-पापा को भी अपने संग लेते हुए आए।
रुचिका की बातों से ऐसा लग रहा था जैसे वह बहुत परेशान है। जब सारांश अपने मम्मी-पापा के साथ घर पहुंचा तो रुचिका बैचेन सी हॉल में टहल रही थी, यह देखते ही सुजाता ने रुचिका से पूछा-
“क्या हुआ रुचिका तुम इतनी परेशान क्यों लग रही हो और तुमने इस वक्त हमें यहां क्यों बुलाया है”।
रुचिका हड़बड़ाती हुई बोली-
” मम्मी जी आप सब चलिए जल्दी चलिए, मम्मी का फोन आया था, मेरे मम्मी-पापा तकलीफ में है उन्होंने हम सब को फौरन घर बुलाया है।”
रुचिका के माता-पिता भी इसी शहर में रहते थे रुचिका के घर से उनके घर की दूरी करीब 10 से 12 किलोमीटर थी।
रुचिका को इस प्रकार घबराया देख सारांश ने कहा -“आखिर मम्मी ने हम सब को इतनी जल्दी में क्यों बुलाया है और उन्होंने ऐसा क्या कहा कि तुम इतनी बैचेन हो गई हो, ये तो बताओ।”
“अभी घर चलिए वहां पहुंच कर सब पता चल जाएगा।” जब रुचिका सब के साथ अपने मायके पहुंची तो उसने देखा उसकी भाभी गुस्से में तमतमाई हुई खड़ी है।उसके भैया और पापा चुपचाप सर झुकाए खड़े हैं और उसकी मम्मी कोने में खड़ी रो रही है।यह दृश्य देख रुचिका की आंखों में भी आंसू आ गए।
बात करने पर पता चला की रुचिका की भाभी अपने सास-ससुर के साथ नहीं रहना चाहती। वह अपने पति के साथ अलग घर में रहना चाहती है।यह जानते ही रुचिका अपना आपा खो बैठी और अपनी भाभी पर बरसती हुई बोली-
” भाभी आप ऐसा सोच भी कैसे सकती है। भैया मम्मी-पापा को छोड़कर आप के साथ अलग कैसे रह सकते हैं इस उम्र में मम्मी-पापा को कभी भी मेडिकल इमरजेंसी की जरूरत पड़ सकती है।”
यह सुनते ही रुचिका की भाभी चिढ़ती हुई बोली- “जब तुम अपने सास-ससुर से अलग रह सकती हो तो मैं क्यों नहीं और फिर जिस प्रकार तुम्हारे पति सारांश अपने माता-पिता से दूर रह कर उनकी देखभाल कर रहे हैं वैसे ही तुम्हारे भैया भी करेंगे और दूसरी बात हर वक्त तुम्हारी मम्मी साये की तरह तुम्हारे भैया के पीछे पड़ी रहती है जब देखो तब अपना प्यार जताती रहती हैं। तुम्हारी मम्मी मेरे पति को पूरी तरह से मेरा बनने ही नहीं दे रही”।

यह सुनते ही रुचिका गुस्से में बोली- “ये आप क्या कह रहीं है भाभी, आप और भैया में तो मां की जान बसती है और भैया तो मम्मी-पापा से इतना प्यार करते हैं कि उन्हें छोड़कर अलग रहना भैया के लिए दूभर हो जाएगा। भाभी ज़रा भैया के बारे में तो सोचिए, भैया आप और मम्मी-पापा के बीच पिसकर रह जाएंगे। भाभी परिवार का हर सदस्य शरीर के एक अभिन्न अंग की तरह होता हैं जिन्हें अलग नही किया जा सकता और बच्चें तो मां के दिलों की धड़कन होते हैं, अगर शरीर से दिल की धड़कन ही अलग हो जाएगी तो शरीर जिंदा कैसे रहेगा और फिर मम्मी भला भैया को आपका क्यों नहीं होने देना चाहेंगी। भैया तो आप के ही है आप दोनों तो जिंदगी भर के हमसफ़र है”
“बिल्कुल सही, हर मां की जान अपने बच्चों में बसती है तुम्हारी सास की जान भी तुम्हारे पति सारांश और तुम में बसती है।जिस तरह तुम्हारे भैया अपने मम्मी-पापा से बहुत प्यार करते हैं उसी तरह सारांश भी अपने माता-पिता से बेहद प्यार करता है।जिस तरह तुम्हें लगता है तुम्हारे भैया, मेरे और अपने माता-पिता के बीच पिसकर रह जाएंगे,उसी तरह तुम सास-बहू के झगड़े में सारांश सैंडविच बन कर रह गया है कभी तुमने सोचा इस बारे में…? और रही तुम्हारी सास की बात तो वह भी सारांश को तुमसे कभी दूर करना नही चाहती क्योंकि तुम दोनों भी जीवन भर के साथी हो।
यह सुन रुचिका नि:शब्द, शांत चुपचाप सिर झुकाए खड़ी हो गई।तभी रुचिका की मां रुचिका के दोनों हथेलियों को अपनी हथेलियों में लेती हुई बोली-
“बेटा सास-बहू दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वंदी नहीं सुख दुःख के साथी होते हैं और जिस प्रकार बेटे पर केवल मां का अधिकार नहीं होता इसी तरह पत्नी का भी अपने पति पर एकाधिकार नही होता।यह बात सास-बहू दोनों समझ जाएं तो किसी भी घर का बेटा सैंडविच बनने से बच जाएगा। साथ ही साथ यदि सास-बहू दोनों एक-दूसरे के पूरक बन जाएं एक दूसरे से सीखने लगे तो सारी लड़ाई ही समाप्त हो जाएगी। न‌ए ज़माने का जोश और पुराने जमाने का अनुभव साथ मिल जाए तो हर घर में शांति और प्रगति दोनों बनी रहेगी “
यह सुन रुचिका ने आश्चर्य से अपनी मां की ओर देखा, मां मुस्कुरा रही थी। रुचिका को और वहां मौजूद सभी लोगों को समझने में देर नही लगी यह सारा खेल रुचिका की मां और उसकी भाभी का रचा हुआ है।
रुचिका को अपनी गलती का एहसास हो गया। उसकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे और वह एक तरफ खड़ी अपनी सास के करीब जा कर बोली- ” मम्मी जी मुझे माफ़ कर दीजिए, अब मैं केवल सारांश के साथ ही नहीं बल्कि आप सब के साथ रहना चाहती हूं।”
यह सुनते ही सुजाता रुचिका के माथे को चूमती हुई बोली- “गलती तो मुझसे भी हुई है।माफी तो मुझे भी चाहिए। मुझे भी अपनी गलती का एहसास हो गया है।पुत्र मोह में मैं यह भूल ग‌ई थी की एक मां से उसके बेटे को कभी भी कोई छीन ही नहीं सकता।”
ऐसा कहती हुई सुजाता ने रुचिका को अपने गले से लगा लिया फिर रुचिका के मां के पास जा कर सुजाता अपने दोनों हाथों को जोड़ती हुई बोली- ” आप जैसी समधन क़िस्मत वालों को मिलती है मैं बड़ी नसीबों वाली हूं जो मुझे आप जैसी समधन मिली यदि हर किसी को आप जैसी समधन मिल जाए ना तो कभी कोई भी घर ना टूटेगा और ना ही बिखरेगा।
अब सारी बातें और एक दूसरे के लिए दिल में चढ़े धूल साफ हो चुके थे। अगली सुबह जब सारांश जागा तो उसने देखा सुजाता और रुचिका दोनों किचन में एक साथ काम कर रही हैं। उसी वक्त रुचिका ने कह -“मम्मी जी आप मुझे भरवा करेला बनाना सिखा दीजियेगा”। तभी सुजाता हंसती हुई बोली-
“बिल्कुल सिखा दूंगी लेकिन तुम्हें भी मुझे मंचूरियन बनाना सिखाना होगा’।
यह सब सुन सारांश मुस्कुराते हुए सोचने लगा कि खाना तो अब भी उसे अपनी पसंद का नहीं, ये दोनों सास-बहू की पसंद का ही खाना पड़ेगा।

Leave a comment