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रिश्तों की डायबिटीज-गृहलक्ष्मी की कहानी: Family Story
Rishton Ki Diabetes

Family Story: रीता एक सरकारी बैंक में कैशियर के पद पर कार्यरत थीं तो उनका मायके आना जाना कम ही हो पाता था|
पति विशाल जी भी अच्छी पोस्ट पर थे। तो साल में मात्र एक हफ़्ते के लिए ही वो मायके जा पाती थीं।
बच्चों के कैरियर व पढ़ाई के चलते उनका रक्षाबंधन या भाई दूज पर भी आना जाना नगण्य होता क्योंकि नौकरी और ज़िम्मेदारी उन्हें इसकी अनुमति कम प्रदान करती थी।
वे हर रक्षाबंधन भाई -भाभी को राखी और गिफ्ट कूरियर करके ही तसल्ली कर लेतीं थी और साथ में एक अच्छी राशि अपने भाई रितेश के एकाउंट में ट्रांसफर करतीं जिसे उन्होंने अपने बेटे जैसा ही प्यार किया शुरू से, उसकी नौकरी लगने तक खूब आर्थिक मदद भी देती रहती थीं।
उनका छोटा भाई एक उच्च पदस्थ प्रशासनिक अधिकारी बन गया था तो भाभी भी अच्छे परिवार से ही आई थी, अहंकार होना स्वाभाविक ही था। भाई के फ़ोन धीरे-धीरे आने लगभग बन्द ही हो गए| 
बस एक रक्षाबंधन या दूज पर तिलक या राखी पर बस एक खबर मिल जाती कि समय से कूरियर मिल गया।
भाभी मधुलिका कभी कभार एक औपचारिकता निभा देती कि दीदी कभी आकर भी राखी बांध दिया करो।
इस बरस भाभी के औपचारिक फ़ोन के बाद उन्हें यह मौका जल्दी ही उपलब्ध हो गया। इत्तेफाक से उनके पति की मायके के शहर में दो दिन की ट्रेनिंग आ गयी तो, उनका मन भी हो गया कि क्यों न मैं भी छुट्टी लेकर इस बार भाई को राखी बांध आऊँ। इसी बहाने मां से भी मिलना हो जायेगा।

ज़रूरी उपहार व खरीददारी कर के उन्होंने बच्चों को सब समझा दिया तो बच्चों ने भी उन्हें आश्वासन दिया कि आप लोग बेफिक्र हो कर जाइये। 
पर जब वह इस सरप्राइज यात्रा के बाद मायके पहुँची तो उन्हें घर के बाहर छोड़कर उनके पति तुरंत ही ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट को रवाना हो गए कि कल रक्षाबंधन की सुबह मैं तुम्हें यहीँ से रिसीव कर लूँगा।
घण्टी बजाते हुए रीता जी मन में अपने बचपन के दिनों को जैसे जीती जा रहीं थी कि जबसे शादी हुई तब से भाई के हाथ पर खुद से राखी नहीं बांध पाई, इतने बरस बाद आज ईश्वर ने संजोग दिया।
इधर भाभी मधुलिका ने जैसे ही गेट खोला तो एक ठंडे से उत्साह के साथ अंदर बुलाया “अरे दी! आप अचानक?”
“हाँ क्यों, नहीँ आना चाहिए था क्या?” अंदर आते हुए रीता बोली।
“नहीं ऐसी कोई बात नहीँ, आप ही का घर है।”
रीता का तो सारा उत्साह ही बुझ गया। खैर चाय नाश्ते के बाद वह मां के कमरे में मिलने चली गयी| वास्तविक खुशी सिर्फ मां के ही चेहरे पर दिखी बेटी को देखकर। शाम तक भाई रितेश भी आ गया।
भाई के साथ मिलने के बाद रीता थोड़ी देर के लिये गेस्ट रूम में आराम करने लगी| थकान की वजह से हल्की सी झपकी लगी ही थी कि कुछ खुसर पुसर की आवाज़ से उसकी आंख खुल गयी।
“दीदी आज अचानक कैसे आ गईं?” यह रितेश की आवाज़ थी
“मुझे क्या पता, मैंने तो बस एक कर्टसी कॉल कर ली थी कि कौन सा आतीं हैं” मधुलिका ने कहा “मुझे क्या पता था कि सच में आ जाएंगी। कल मुझे भी अपने घर राखी बांधने जाना था और इनके आने से मेरा तो सारा प्रोग्राम बिगड़ गया| आपको दो दिन की छुट्टी बड़ी मुश्किल से मिली थी और भैया भी बिजनेस के लिए  नैनीताल जा रहे थे, तो मेरी  ट्रिप का तो पूरा प्रोग्राम अब फुस्स हो ही गया समझो।
एक खर्चा और बढ़ गया अब, भैया मेरे लिए एक डायमंड का ब्रेसलेट लाये थे, तो रिटर्न गिफ्ट में भी मैंने पहले ही अच्छा खासा खर्च कर डाला था।”

“चलो छोड़ो अब चाय पिला दो एक अच्छी सी मधु| अब मैं भी थोड़ी देर दीदी के पास बैठ लूँ” रीता ने भाई को उसी कमरे में बुला लिया जहाँ उनका सामान रखा था।
उनकी पसन्द हमेशा ही बेहतरीन रही थी तो उन्होंने सबको उनके उपहार जैसे ही दिए सारा सीन ही बदला लगने लगा, अब एक दूसरा ही मुखौटा उनके सामने था उनके अपनों का।
मधुलिका और बच्चे भी अब कुछ दुरुस्त ही बातचीत कर रहे थे।
अब अंदर मधुलिका को यह चिंता खाये जा रही थी कि इतने महंगे उपहारों के बदले दिया क्या जाए नन्द जी को। इधर रीता जी मन में कुछ और ही सोच चुकी थी।
रितेश बच्चों को लेकर बाज़ार की ओर निकल गया और मधुलिका मेड को रसोई में रात के खाने की तैयारी समझाने लगी कि उसने रीता को अपना सामान समेटते पाया। लगभग आधे घण्टे बाद ड्राइवर उन्हें लेने आ गया और वह मां से मिलकर सीधे कार में यह कहकर बैठ गईं कि पति को कुछ ज़रूरी काम आ गया है।
हड़बड़ाई मधुलिका उन्हें ठीक से विदा भी न कर पाई| जैसे ही वह अंदर गई, उसे मेज़ पर उपहारों के नीचे ही एक पत्र मिला जिसमें लिखावट रीता की ही थी।
प्रिय
रितेश और मधुलिका, सदा खुश रहो| मैं यहाँ तुम्हारा त्यौहार खराब करने नहीँ आयी थी| आयी थी तो बचपन के कुछ खट्टे मीठे पल ताज़ा करने। वो बचपन के प्रेम और संघर्ष की यादेँ।
पर मुझे एक अच्छा सबक मिल गया, कि दिखावटी और बनावटी रिश्तों की अपेक्षा अकेले रहना उचित है।
यह भूल गयी थी कि अब रिश्तों में भी डाइबटीज की बीमारी हो गयी है जिसे समय-समय पर महँगे उपहारों का डोज़ मेंटेन करता रहता है।
तुम्हारी बातें मेरे कानों में पड़ गयीं थी, तो सोचा कम से कम विशाल की रक्षाबंधन अच्छी हो जाये| 
स्नेह उसी को करो जो आप की करे। फ़िज़ूल में किसी रिश्ते के पीछे भागने का कोई मतलब नहीं। एकतरफा कब तक निभाती रहूँगी, तुम लोग थक कर पीछे छूट चुके हो तो मेरा भी अब आगे बढ़ना
उचित रहेगा। 
खैर मैं राखी वापस ले जा रही हूँ खुद के लिए ताकि अपने स्वाभिमान की रक्षा खुद कर सकूँ। क्योंकि परम्परा निभाने का काम बस हम बहनों का है, तो ईश्वर से बड़ा रक्षक कोई नहीं| भाई अब रिश्ते को ही पहचान ले यही बहुत है।
इधर रितेश ने  आकर एक साड़ी का पैकेट मधुलिका को पकड़ा कर रीता को पूछा तो उसने  हैरान  रितेश को काँपते हाथों से पत्र पकड़ा दिया।

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