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एक चींटी थी—गृहलक्ष्मी की कहानियां
Ek Chitti Thi-Grehlakshmi ki Kahani

एक चींटी थी | एक दिन पेड़के निकट खड़ी थी| उस समय पेड़ की छाँव में दो
मित्र  आपसमें बातचीत कर रहे थे|
   एक मित्र कह रहा था, “हाथी सब से ज्यादा  शक्तिशाली प्राणी है|”
  दूसरा मित्र कह रहा था, “सबसे ज्यादा बलवान तो सिंह है|”
  पहले ने कहा, “मैं नहीं मानता|”
  दूसरे ने कहा, “हाथीको तो एक सामान्य चींटी भी मार सकती है |”
    अपने बारे में यह बात सुनकर चींटी के  कान खड़े हो गए |वह दोनों
मित्रों की बात ध्यान से सुनने लगी|
    पहला मित्र हँसना लगा, “कैसी पागलों जैसी बात करते हो! चींटी तो एक
सामान्य जीव है |उसमें शक्ति कितनी? फूंक मारो तो कहीं से कहीं पहुँच जाए|”


     दूसरेने कहा, “तुम मेरी बात पर हँस रहे हो लेकिन तुम्हें पता नहीं
कि चींटी हाथी के कान में घुस जाए तो हाथी जैसा बड़ा और कद्दावर प्राणी
भी छटपटाकर दम तोड़ देता है |हो सकता है कि तुम्हें इस बारेमें पता न हो|”


   चींटीको इन दोनों की बात  सुनकर अच्छा लगा| वह उछलकर कहने लगी, “मैं
हाथी से ज्यादा शक्तिशाली हूँ… बलवान हूँ|”
   तब उसे याद आया कि दो दिन पहले हाथी उसे देख मुँह फेरकर चला गया
था|”हाँ, अब मेरी समझमें आया कि उसने ऐसा क्यों किया था| वह मुझसे डर गया
होगा|”
   उस दिन से चींटी हर जगह कहती फिरने लगी, “मैं सबसे ज्य़ादा शक्तिशाली
हूँ| मेरा मुकाबला कोई नहीं कर सकता|”
    एक दिन फिर उसी हाथी से रास्ते में उसकी भेंट हो गई |चींटी उसका
पहाड़ जैसा शरीर देखकर पहले तो डर गई, फिर हिम्मत से काम लेकर हाथी ये
बोली, “हाथी भाई, प्रणाम! “
   हाथी अपनी मस्त चाल से चलता रहा|चींटी उसके पीछे दौड़ी और उसके नज़दीक
जाकर फिर से कहने लगी, “हाथी भाई, मैं आपको प्रणाम करती हूँ|”
   अब हाथी को लगा कि कोई उससे बात कर रहा है |वह रुका|इघर-उधर देखा|उसे
कोई दिखाई नहीं दिया, तब चिल्लाया, “कौन है? “
चींटी बोली, “हाथी भाई! मैं हूँ मैं… चींटी… इधर… जमीन पर|”
    हाथीने नीचे देखा|चींटी जैसा कोई छोटा सा जीव उसे दिखाई
दिया|पूछा,”तुम चींटी हो? “
  “हाँ… मैं चींटी ही हूँ… “
  “बोलो क्या काम है? “
  चींटी बोली, “वैसे तो कोई काम नहीं है |मैं आपसे दोस्ती करना चाहती हूँ|”
  “दोस्ती? “हाथी हँसा|”चलो ठीक है |आजसे तुम मेरी दोस्त बस? “और हाथी चलने लगा|
   चींटी सोचने लगी, “हाथी ने तो तुरंत ही मेरी बात मान ली|लगता है वह आज
भी  मुझसे डर गया है | तभी तो वह एक मिनट भी  यहां रुका नही|भाग खड़ा हुआ|”


   अब वह और उत्साह में आ गई |वह हाथी के पीछे -पीछे दौड़ी |पूछने लगी,
“हाथी भाई, आप कहाँ जा रहे हो? “
  हाथी बोला, मैं जंगल की ओर जा रहा हूँ |आएगी मेरे साथ?”
चींटीने उत्तर दिया, “हां, मैं भी आपके साथ आती हूँ |”दोनों चलने
लगे|हाथी आगे -आगे|चींटी पीछे-पीछे|दोनों जंगलमें पहुंचे तब सामने सिंह
दिखाई दिया| सिंहको देखकर हाथी रुक गया|
चींटीने पूछा, “क्यों रुक गए हाथी भाई ? “
हाथी बोला, ” सामने से सिंह आ रहा है |”
चींटी बोली, “तो उसमें डरने की क्या बात है? मैं आपके साथ हूँ न! आपको
सिंह से डर लगता है तो मेरे पीछे छुप जाओ| सिंह को पता भी  नहीं चलेगा कि
पीछे कौन खड़ा है|”
   चींटी के भोलेपन पर हाथी को हंसी आ गई |
   उस दिन के बाद चींटी सदा ही अपनी बढ़ाई करती रही, लेकिन उसकी बातो में
बढ़ाई के साथ भोलापन भी होता था |अत: जो भी सुनता हंस लेता|
  एक दिन की बात है |चींटी  कहीं जा रही थी |सामने हाथी मित्र मिला|
चींटीने उसका अभिवादन किया|
  हाथीने पूछा, ” कैसी हो चींटी बहन? कहां जा रही हो? “
चींटी ने उत्तर दिया, “कपड़े सिलवाने जा रही हूँ| अपने लिए  एक ड्रेस
सिलवाना है|मेरे भानजेका विवाह है|”
“अरे वाह! यह तो अच्छी बात है |”
“मेरे पास जितना कपड़ा है  उतने से मेरा ड्रेस तो बन जाएगा| आप सोच रहे
होंगे कि आपके लिए ड्रेस क्यों नहीं |चिन्ता मत करो… कपड़ा बचा तो आपके
लिए एक  चड्डी सिलना दूँगी| ठीक है न? “
   चींटी की बात पर एक बार फिर हंसी आ गई |
  एक दिन चींटी को पता चला कि हाथी का एक पाँव गड्डे में फंस गया था और
इसी कारण उसके पाँव में मोच आई है |उसे अस्पताल में भरती किया गया है |
  चींटी बोली, “अपने मित्र का हाल पूछने मुझे भी  अस्पताल जाना चाहिए |”
वह भागी अस्पताल की ओर| रास्ते में मकोड़ा मिला| चींटी से पूछा, ” चींटी
बहन, इस तरह दौड़ती कहाँ जा रही हो? “
  चींटी तपाक से बोली, “देखो भाई, मेरे पास समय नहीं है |”
  “लेकिन जा कहाँ रही हो यह तो बताओ|”
  “मेरे हाथी भाई  अस्पताल में है|मैं उनका हाल पूछने  जा रही हूँ | किसी
भी  समय उन्हें  मेरी ज़रूरत पड़ सकती है |”
   मकोड़ा हँसना लगा|
   चींटी पहुँची अस्पताल में| वहाँ कई कमरे थे| उसे पता नहीं था कि हाथी
किस कमरे में है | वह यहाँ से  वहाँ भटकती रही| आखिर उसे हाथी वाला कमरा
मिल गया |वह हाथी से मिली| उसके स्वास्थ्य के बारे में पूछा| फिर उसकी
अनुमति लेकर बाहर एक बेंच पर आकर बैठ गई |
   उस समय एक आदमी भी  बेंच  पर बैठने के लिए वहाँ आया|उसने बेंच पर जमी
हुई धूल को हटाने के लिए  फूँक मारी|फूँक इतनी ज़ोरदार दी कि चींटी उड़ने
लगी |उसने स्वयं को बचाने की बहुत कोशिश की, फिर भी बचा न पायी और दूर
ज़मीन पर जा गिरी|
    चींटी को तब लगा, “अरे! एक मामूली फूँक से ही मैं यों हवा में उड़ने
लगी हूँ,  तो मुझे में शक्ति कितनी! मैं बेकार ही अपने आपको सब से ज्यादा
शक्तिशाली मानने लगी थी| और मैं बेकार ही अपने अच्छे  मित्र हाथी के कान
में धुसूँगी ही क्यों? उसने मेरा क्या बिगाड़ा है|”
  अब चींटी ज़मीन पर धीरे-धीरे चल रही थी |

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