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चींटी उड़ने लगी-21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां गुजरात: Ant Story
Ant Started Flying

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Ant Story: एक चींटी थी। एक दिन पेड़ के निकट खड़ी थी। उस समय पेड़ की छाँव में दो मित्र आपस में बातचीत कर रहे थे।

एक मित्र कह रहा था, “हाथी सब से ज्यादा शक्तिशाली प्राणी है।”

दूसरा मित्र कह रहा था, “सबसे ज्यादा बलवान तो सिंह है।”

पहले ने कहा, “मैं नहीं मानता।”

दूसरे ने कहा, “हाथी को तो एक सामान्य चींटी भी मार सकती है।”

अपने बारे में यह बात सुनकर चींटी के कान खड़े हो गए। वह दोनों मित्रों की बात ध्यान से सुनने लगी।

पहला मित्र हँसने लगा, “कैसी पागलों जैसी बात करते हो! चींटी तो एक सामान्य जीव है। उसमें शक्ति कितनी? फूंक मारो तो कहीं से कहीं पहुँच जाए।”

दूसरे ने कहा, “तुम मेरी बात पर हँस रहे हो लेकिन तुम्हें पता नहीं कि चींटी हाथी के कान में घुस जाए तो हाथी जैसा बड़ा और कद्दावर प्राणी भी छटपटाकर दम तोड़ देता है। हो सकता है कि तुम्हें इस बारे में पता न हो।”

चींटी को इन दोनों की बात सुनकर अच्छा लगा। वह उछलकर कहने लगी, “मैं हाथी से ज्यादा शक्तिशाली हूँ… बलवान हूँ।”

तब उसे याद आया कि दो दिन पहले हाथी उसे देख मुँह फेरकर चला गया था। “हाँ, अब मेरी समझ में आया कि उसने ऐसा क्यों किया था। वह मुझसे डर गया होगा।”

उस दिन से चींटी हर जगह कहती फिरने लगी, “मैं सबसे ज्यादा शक्तिशाली हूँ। मेरा मुकाबला कोई नहीं कर सकता।”

एक दिन फिर उसी हाथी से रास्ते में उसकी भेंट हो गई। चींटी उसका पहाड़ जैसा शरीर देखकर पहले तो डर गई, फिर हिम्मत से काम लेकर हाथी ये बोली, “हाथी भाई, प्रणाम!”

हाथी अपनी मस्त चाल से चलता रहा। चींटी उसके पीछे दौड़ी और उसके नजदीक जाकर फिर से कहने लगी, “हाथी भाई, मैं आपको प्रणाम करती हूँ।”

अब हाथी को लगा कि कोई उससे बात कर रहा है। वह रुका। इधर-उधर देखा। उसे कोई दिखाई नहीं दिया, तब चिल्लाया, “कौन है?”

चींटी बोली, “हाथी भाई! मैं हूँ मैं… चींटी…इधर…जमीन पर।”

हाथी ने नीचे देखा। चींटी जैसा कोई छोटा-सा जीव उसे दिखाई दिया। पूछा, “तुम चींटी हो?”

“हाँ… मैं चींटी ही हूँ…”

“बोलो क्या काम है?”

चींटी बोली,” वैसे तो कोई काम नहीं है। मैं आपसे दोस्ती करना चाहती हूँ।”

“दोस्ती?” हाथी हँसा। “चलो ठीक है। आज से तुम मेरी दोस्त बस?” और हाथी चलने लगा।

चींटी सोचने लगी, “हाथी ने तो तुरंत ही मेरी बात मान ली। लगता है, वह आज भी मुझसे डर गया है। तभी तो वह एक मिनट भी यहां रुका नहीं। भाग खड़ा हुआ।”

अब वह और उत्साह में आ गई। वह हाथी के पीछे-पीछे दौड़ी। पूछने लगी,” हाथी भाई, आप कहाँ जा रहे हो?”

हाथी बोला, मैं जंगल की ओर जा रहा हूँ। आएगी मेरे साथ?”

चींटी ने उत्तर दिया,” हां, मैं भी आपके साथ आती हूँ।” दोनों चलने लगे। हाथी आगे-आगे। चींटी पीछे-पीछे। दोनों जंगल में पहुंचे, तब सामने सिंह दिखाई दिया। सिंह को देखकर हाथी रुक गया।

चींटी ने पूछा, “क्यों रुक गए हाथी भाई?”

हाथी बोला. “सामने से सिंह आ रहा है।”

चींटी बोली, “तो उसमें डरने की क्या बात है? मैं आपके साथ हूँ न! आपको सिंह से डर लगता है तो मेरे पीछे छुप जाओ। सिंह को पता भी नहीं चलेगा कि पीछे कौन खड़ा है।”

चींटी के भोलेपन पर हाथी को हंसी आ गई।

उस दिन के बाद चींटी सदा ही अपनी बढ़ाई करती रही लेकिन उसकी बातों में बढ़ाई के साथ भोलापन भी होता था। अतः जो भी सनता हंस लेता।

एक दिन की बात है। चींटी कहीं जा रही थी। सामने हाथी मित्र मिला। चींटी ने उसका अभिवादन किया।

हाथी ने पूछा, “कैसी हो चींटी बहन? कहां जा रही हो?”

चींटी ने उत्तर दिया, “कपड़े सिलवाने जा रही हूँ। अपने लिए एक ड्रेस सिलवाना है। मेरे भानजे का विवाह है।”

“अरे वाह! यह तो अच्छी बात है।”

“मेरे पास जितना कपड़ा है, उतने से मेरा ड्रेस तो बन जाएगा। आप सोच रहे होंगे कि आपके लिए ड्रेस क्यों नहीं। चिन्ता मत करो…कपड़ा बचा तो आपके लिए एक चड्डी सिलने दूंगी। ठीक है न?”

चींटी की बात पर एक बार फिर हंसी आ गई।

एक दिन चींटी को पता चला कि हाथी का एक पाँव गड्डे में फंस गया था और इसी कारण उसके पाँव में मोच आई है। उसे अस्पताल में भरती किया गया है।

चींटी बोली, “अपने मित्र का हाल पूछने मुझे भी अस्पताल जाना चाहिए।”

वह भागी अस्पताल की ओर। रास्ते में मकोड़ा मिला। चींटी से पूछा, “चींटी बहन, इस तरह दौड़ती कहाँ जा रही हो?”

चींटी तपाक से बोली, “देखो भाई, मेरे पास समय नहीं है।”

“लेकिन जा कहाँ रही हो यह तो बताओ।”

“मेरे हाथी भाई अस्पताल में है। मैं उनका हाल पूछने जा रही हूँ। किसी भी समय उन्हें मेरी जरूरत पड़ सकती है।”

मकोड़ा हँसने लगा।

चींटी पहुँची अस्पताल में। वहाँ कई कमरे थे। उसे पता नहीं था कि हाथी किस कमरे में है। वह यहाँ से वहाँ भटकती रही। आखिर उसे हाथी वाला कमरा मिल गया। वह हाथी से मिली। उसके स्वास्थ्य के बारे में पूछा। फिर उसकी अनुमति लेकर बाहर एक बेंच पर आकर बैठ गई।

उस समय एक आदमी भी बेंच पर बैठने के लिए वहाँ आया। उसने बेंच पर जमी हुई धूल को हटाने के लिए फूंक मारी। फूंक इतनी जोरदार दी कि चींटी उड़ने लगी। उसने स्वयं को बचाने की बहुत कोशिश की, फिर भी बचा न पायी और दूर जमीन पर जा गिरी।

चींटी को तब लगा, “अरे! एक मामूली फूंक से ही मैं यों हवा में उड़ने लगी हूँ, तो मुझमें शक्ति कितनी! मैं बेकार ही अपने आपको सब से ज्यादा शक्तिशाली मानने लगी थी। और मैं बेकार ही अपने अच्छे मित्र हाथी के कान में घुसूं ही क्यों? उसने मेरा क्या बिगाड़ा है।”

अब चींटी जमीन पर धीरे-धीरे चल रही थी।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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