सुजाता की ननद सुनीता ना जाने किस काम से रसोई में आई थीं और उन्होंने भी सारी बातें सुन ली थीं। वह सुजाता से बोलीं ,”तुम्हें भी अच्छी तरह से मालूम है कि शादी तो मेरी आज से कई वर्ष पहले ही हो चुकी होती पर होनी को तो कुछ और ही मंज़ूर था। पिताजी और माताजी मेरा रिश्ता पक्का कर गए थे पर उनकी असमय मौत ने सब कुछ बदल कर रख दिया ।बड़े होने के नाते सारे घर की ज़िम्मेदारी मुझ पर ही आ गई थी और फिर मैंने अपने छोटे भाई – बहनों को पालने की खातिर खुद ही शादी करने से मना किया था। जब तक सबको उनके पैरों पर खड़ा किया,उनकी गृहस्थी बसायी तब तक मेरी शादी की उम्र भी निकल गयी और उस समय मुझे शादी की ज़रूरत महसूस भी नहीं हुई। मैं तो अपने भाई बहनों के परिवार के साथ मस्त थी और सबकी फरमाइशें पूरी करके खुश होती थी, पर जैसे -जैसे सबके परिवार बढ़ते गये वैसे -वैसे सब उसमें रमते गये और मैं अकेली पड़ती गई ।”

कहने को तो मैं तुम्हारे भरे पूरे परिवार के साथ रहती हूं पर मुझसे मतलब भर की ही बात की जाती है। हंसी – मज़ाक,सलाह- मशविरा सबसे मुझे दूर ही रखा जाता है। हां,जब भी किसी को पैसे की ज़रूरत होती है तो तब सबको ज़रूर मेरी याद आती है।सब यही सोचते हैं कि दीदी का तो कोई परिवार है नहीं ,अकेली छड़ी हैं, कहां ले जायेंगी पैसा ?तो बस किसी ना किसी बहाने से निकलवाते रहो । मैं मोह माया में फंसी मतलबपरस्ती की बातें समझ ही नहीं पायी और यही सोचती रही कि सब मुझे कितना मान देते हैं पर  पिछले महीने जब बीमार पड़ी तो सबकी असलियत सामने आ गई। कोई भी मेरी मदद को नहीं आया । तुमने भी हाथ खड़े कर दिए और जिन भतीजे भतीजी को बच्चों की तरह पाला वो तो मेरे पास आकर झांके भी नहीं।भला हो उस नर्स का जिसकी सेवा की बदौलत मैं खड़ी हो सकी। अब सच में मुझे एक हमसफ़र की चाह शिद्दत से महसूस होती है जिससे मैं बेझिझक अपने मन की बात कह सकूं और अपना अकेलापन दूर कर सकूं। घर के बारे में मैंने बहुत सोच लिया पर अब केवल अपने बारे में सोचना चाहती हूं, ज़िन्दगी का लुत्फ उठाना चाहती हूं,ये मेरा अडिग फैसला है।”

ऐसा कहकर सुनीता जी अपने कमरे की ओर चली गईं और सुजाता ठगी सी खड़ी रह ग‌ई। उसे ऐसा लगा जैसे सोने का अंडा देने वाली मुर्गी हाथ से निकल गई । 

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