Hindi Kahani: रामेश्वरी चूल्हा जलाने की पूरी कोशिश कर रही थी। मगर बारिश के छीटें पड़ने के कारण लकड़ियां नम हो गई थी। उसमें जल्दी आग पकड़ नहीं पा रहा था। उस पर बच्चों की लड़ाई और रोना-धोना। बूढ़ी सास उन बच्चों को अकेले कितना संभालती! ‘अरे बहू, छोड़ चूल्हा और आकर इन्हें संभाल। मुझ बुढ़िया से तो ये चुप होने से रहे।
सास की बात सुनकर रामेश्वरी बच्चों को देखने आ जाती है। बच्चों को चुप करा कर उन्हें शांत बैठने का सख्त आदेश देती है। चार बच्चे थे रामेश्वरी के, बड़े बेटे के बाद दो बेटियां और फिर एक बेटा सबसे छोटा। रामेश्वरी ने तीसरी तक ही पढ़ाई की थी। मां-पिता ने इसके आगे नहीं पढ़ाया। यौवन के आने के साथ ही उसकी शादी ब्रजेश से कर दी गयी।
ब्रजेश एक फैक्ट्री में काम करता था। अपने सीमित घंटे के अलावा वह बीच-बीच में ओवर टाइम भी कर लेता था। इसलिए घर परिवार चलाने भर उसकी आमदनी हो जाती थी मगर शराब और जुए में पैसे लगा देने के कारण घर-गृहस्थी का खर्च बाधित होता था।
रामेश्वरी जब ब्याह कर आई थी तो बस चार लोगों का ही परिवार था। वह स्वयं, ब्रजेश और सास-ससुर लेकिन कुछ वर्ष बीतने के बाद वह आठ लोगों का परिवार बन गया।
ब्रजेश घर में शराब पीकर आता और हमेशा बखेड़ा खड़ा किया करता। सास-ससुर रामेश्वरी को उस समय ब्रजेश से मुंह नहीं लगाने की सलाह देते। वे कहते कि नशे में धुत्त वह सो जाएगा तो माहौल शांत हो जाएगा। रामेश्वरी अंदर से क्रोधित होती मगर बुजुर्गों की बात मानकर चुप्पी साध लेती।
बच्चों से निपटने के बाद वह पुन: चूल्हा जलाने का प्रयास करने लगी। किसी प्रकार लकड़ियां जली। नमी के कारण उसमें तेज आग नहीं उठ पा रहा था, धुंआ अधिक हो रहा था। एक तो बच्चों के कारण पहले ही देर हो गई थी उस पर चूल्हे की ऐसी स्थिति, खाना बनने में देर तो होना ही था।
ब्रजेश शराब पीकर आया और आते ही खाना मांगने लगा। रामेश्वरी ने मजबूरी बतायी मगर उसके सिर पर तो नशा चढ़ा हुआ था। उसका व्यवहार तो बुरा था ही, उसकी जुबान बद से बदतर होने लगी। एक तो बच्चों की किच-किच उस पर चूल्हे का हाल रामेश्वरी तो पहले से ही अपनी खीझ दबाए हुए थी। आज ब्रजेश का व्यवहार उसकी बर्दाश्त के बाहर हो गया। उसने भी पलट कर जवाब दिया। ब्रजेश को पत्नी का यह रूप नागवार गुजरा। उसका क्रोध तीव्र हो गया।
इधर रामेश्वरी का गुस्सा भी बढ़ गया। उसे सास-ससुर ने शांत करना चाहा मगर आज जाने क्या हो आया कि रामेश्वरी आपे से बाहर होकर उन्हें भी जवाब दे डालती थी, ‘बस, मुझे समझाना बंद कीजिए। हर बार मुझे ही क्यों समझाया जाता है! यदि अपने बेटे को शुरू से समझाया होता तो यह हाल नहीं होता।
ब्रजेश के माता-पिता को बहू से इस व्यवहार की उम्मीद नहीं थी। अचानक से बहू का बदला रूप देखकर वो भी सकते में आ गये। माहौल को शांत करने के ख्याल से वे अपने बेटे को समझाने लगे लेकिन बेटा तो उनकी बात सुनने से रहा। बहस से गाली-गलौज होते छोटी-सी बात बड़े झगड़े का रूप ले लेती है।
आज रामेश्वरी भी डट गयी क्योंकि वह अपनी सहनशक्ति को किनारे कर चुकी थी।
रामेश्वरी भी गुस्से में चूल्हे की आग को पानी डालकर ठंडी कर देती है मगर उसके हृदय में जलती आग की लपटे तीव्र थी। उस रात घर में खाना भी नहीं बन सका। बच्चों को घर में रखे खाने वाली चीजों से काम चलाना पड़ा।
अगली सुबह रामेश्वरी सामान्य होने की कोशिश करती है। मन तो अभी भी खिन्न था मगर चार छोटे बच्चे और सास-ससुर के बारे में सोचते हुए अपने गृह कार्य में रोज की भांति लग जाती है और खाना बनाकर सबको देती है। सास-ससुर किसी तरह खट्टे मन से कुछ कौर खा पाते हैं। स्वयं रामेश्वरी भी खाना खाने के लिए सामने थाली रखती है लेकिन हृदय की वेदना उसे खाने से रोक देती है। वह सोचती है कि आखिर कब तक बृजेश के दुर्व्यवहार को चुप रहकर झेलती! उसके सब्र का बांध टूट गया था, तभी तो उसके मुख से विरोध की शाब्दिक लहरें तेजधार की भांति बह निकली थी।
दिन बीत गया, शाम हो चली थी। माता-पिता बेटे की बाट जोह रहे थे। रामेश्वरी की आंखें भी दरवाजे की तरफ अनायास मुड़ जाती। उसे आभास हो रहा था कि ब्रजेश फिर से शराब की नशे में आकर हंगामा करेगा। मगर शाम से रात हो गयी, ब्रजेश नहीं आया। मां-बाप बेटे की खोज करने की कोशिश करते हैं। उन्हें पता चलता है कि ब्रजेश सुबह फैक्ट्री नहीं आया था और दूसरे किसी ने उसे देखा भी नहीं।
मां-बाप बेटे के मोह में बंधे रामेश्वरी को कोसने लगते हैं। रामेश्वरी की आंखें उसके दर्द का एहसास करा रही थी। वह स्वयं को यह समझा नहीं पा रही थी कि गलती उसकी थी। हृदय में क्रोध का आवेग भी ऊपर होने लगा।
वह सोच रही थी कि काश वह भी यह सब जंजाल छोड़कर निकल जाती? कहीं दूर अपने जीवन की तलाश में जहां उसकी मर्जी और उसकी आजादी हाथ-पैर बनकर उसके अभिन्न अंग बन जाते। लेकिन इन छोटे बच्चों का क्या! इन्हें किस पर छोड़ जाती। आखिर उन्हें जन्म दिया है तो उस मातृत्व भाव से वह विरक्त भी तो नहीं हो पाती है। थक हार कर उसने नियति के आगे अपनी सोच को समर्पित कर दिया। उसने मन में ठान लिया कि आगे का जीवन क्या कैसा होगा यह ईश्वर जाने, उसे बस अपने कर्म और दायित्व पर ध्यान देना है।
ब्रजेश के इंतजार में दिन के बाद महीने भी बीतने लगे। रामेश्वरी का जीवन तो पहले से ही कठिन था उस पर पति का घर छोड़कर जाना, अब सारी जिम्मेदारियां उसके पर कंधों पर थी। चार छोटे बच्चे और सास-ससुर, घर के कार्य के साथ आमदनी के लिए बाहर कार्य करने की भी आवश्यकता पड़ गयी। समस्या यह कि रामेश्वरी अधिक पढ़ी-लिखी भी नहीं थी कि नौकरी मिल पाती। पास पड़ोस के दो चार घरों में उसने पोछा-बर्तन का काम करना शुरू किया। उन घरों में सुबह जाकर काम करती और वहां से रात का बचा खाना ले आती। ऐसे घर में सुबह के खाने की व्यवस्था भी हो जाती थी।
समय बीतता गया। कुछ साल बाद रामेश्वरी के साथ-ससुर भी परलोक सिधार गए। बच्चे अब तक थोड़े बड़े हो गए थे। बड़े बेटे का उन्नीसवां साल शुरू हो गया था। सरकारी स्कूल से दसवीं पास कर वह इंटर में पढ़ाई कर रहा था। कॉलेज में बस हाजिरी पूरी करने भर ही जाता, बाकी वह मां के आर्थिक सहयोग के लिए एक दवा दुकान में स्टाफ बन गया। वहीं मालिक के साथ बैठकर दवाइयां बेचने का काम करने लगा क्योंकि वह कुछ किताबें दुकान पर ले जाता था इसलिए कभी-कभी खाली समय में वहीं पर कुछ पढ़ाई भी कर लेता। उसके बाद वाली दोनों बेटियां भी बड़ी हो रही थी। घर में मां का हाथ बंटाने लगी थी और साथ में पास ही के सरकारी स्कूल में पढ़ाई भी करती। छोटा बेटा भी स्कूल जाता था।
इस प्रकार आगे की जिंदगी कटने लगी। इस दौरान रामेश्वरी कुछ अन्य दुखद परिस्थितियों से भी गुजरी। जिन घरों में वह काम करने जाती थी, वहां के पुरुष तो कभी मोहल्ले वाले या अन्य जाने कितने ही लोगों की बुरी नजर उस पर पड़ी। उस पर महिलाओं के बुरे वचनों की बौछार भी यदा-कदा हो जाती। अपने चरित्र को बचाए रखने की जद्दोजहद में उस पर कितनी बार लांछन भी लगे। मगर वह स्वयं को दृढ़ बनाए रखती। कभी-कभी वह स्वयं समझ नहीं पाती थी कि उसमें इतनी क्षमता आयी कहां से जो हर परिस्थिति से गुजरते हुए भी दृढ़ बनी हुई है।
रामेश्वरी को समय बीतने के साथ जवान होती बेटियों को ब्याहने की भी चिंता होने लगी। बिना पिता के अकेली मां की बेटियां कौन विवाह करेगा! उसने दो-एक जगह बेटी की शादी को लेकर बातें भी की लेकिन उसकी स्थिति को देखते हुए बेटी के लिए अच्छा रिश्ता मिलना कठिन लग रहा था।
बड़ा बेटा परिस्थितियों और जिम्मेदारियों के कारण अपनी उम्र से अधिक परिपक्व हो गया था। वह घर चलाने में बराबर मां का सहयोग कर रहा था। वह मां के जीवन को सुखद बनाना चाहता था। बहनों और छोटे भाई को खुशियों का संसार देना चाहता था।
बहन की शादी के लिए उसने भी योग्य लड़के की तलाश शुरू कर दी। कुछ समय बाद एक लड़का मिलता है जिससे बहन के रिश्ते की बात पक्की भी हो जाती है। घर में शादी की तैयारियां शुरू हो जाती है। बड़े बेटे ने दुकान के मालिक से कुछ रुपये उधार ले लिए थे। इधर रामेश्वरी को घर की महिलाओं से भी शादी के लिए मदद मिल गया। बेटी की शादी ठीक से हो गयी। रामेश्वरी को थोड़ी-सी राहत मिली। दामाद अच्छे व्यवहार का मिल गया था। रामेश्वरी को ब्याही गयी बेटी के लिए अब कोई फिक्र नहीं करनी थी।
उसे एहसास हो गया था कि दामाद भले ही कम कमाये मगर उनकी बेटी के साथ बुरा बर्ताव नहीं करेगा। अब रामेश्वरी अपने दूसरे बच्चों और सामान्य दिनचर्या में लग गयी। अब तक छोटे बेटे ने भी अपना पॉकेट खर्च निकालना शुरू कर दिया ताकि छोटी-छोटी चीजों के लिए मां और भाई से मांगना न पड़े। वह अखबार बांटने का काम करने लगा। अब हर सुबह घरों में अखबार बांटने के बाद वह पढ़ाई करने जाता।
जिंदगी सही-सही चल रही थी कि वक्त ने पुन: करवट बदली और रामेश्वरी के समक्ष टीस और दुविधा से भरा पल यक्ष प्रश्न की भांति खड़ा हो गया। हुआ यूं कि अचानक एक शाम घर पर ब्रजेश का आगमन हो गया। बच्चे तो उसे पहचान नहीं पाए कि वही उसके पिता हैं मगर रामेश्वरी अपने पति को पहचान गयी और यूं सामने देखकर आवाक् रह गयी। ब्रजेश की स्थिति बहुत खराब हो चुकी थी। उसके एक तरफ का अंग लकवा ग्रस्त हो चुका था। वह डंडे के सहारे बमुश्किल चल पाता था। शरीर से भी उम्र से अधिक बूढ़ा दिखने लगा था।
‘रामेश्वरी, मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हें बहुत तकलीफ दी। सब कुछ छोड़ कर चला गया।
रामेश्वरी कुछ बोल नहीं पा रही थी। उसे अपने दर्द भरे लम्हे पुन: आंखों के आगे तैरने लगे। उसके संघर्ष भरे दिन उससे अपनी बात दोहरा रहे थे कि तुम आज भी मजबूत बनी रहो। भावनाओं के वशीभूत होकर कमजोर मत पड़ना। वह तय नहीं कर पा रही थी कि अपने बीते वर्षों का अफसोस करे या पति के आने की खुशी जाहिर करे।
वह दुविधा में खोयी थी कि तभी बड़ा बेटा आ जाता है। वह बड़े बेटे को पिता से परिचय करवाती है, ‘बेटा लंबे अरसे के बाद तेरे पिता लौट आए हैं। अब आगे की जिंदगी हमारे साथ ही गुजारना चाहते हैं।
‘हुंह, इतने वर्षों के बाद हमें याद करने का कारण? बड़े बेटे ने एक तीखा सवाल उछाला।
रामेश्वरी और ब्रजेश दोनों चुप। रामेश्वरी अपने दर्द को दबाने का प्रयास कर रही थी तो ब्रजेश अपनी हीनता को। मगर बड़े बेटे की आंखों में सवाल अब भी तैर रहे थे।
पसरे सन्नाटे को खत्म करते हुए वह बोलता है, ‘मां मैं नहीं जानता कि तुम्हारे मन में क्या चल रहा है। तुम्हारा क्या फैसला है। मगर जो भी फैसला लेना उसे वेदना में टूट कर नहीं वेदना को शक्ति बना कर लेना।
यह सुनकर रामेश्वरी आश्चर्य भरी नजरों से बेटे को देखती है।
‘मां, मैं नहीं जानता कि तुम्हारे मन में क्या चल रहा है। तुम्हारा क्या फैसला होगा लेकिन मैं चाहता हूं कि तुम अपनी भावनाओं के घेरे से निकलकर वास्तविकता के आधार पर सोचो। तुम ध्यान रखना कि यह वही व्यक्ति है जिन्होंने न तो पुत्र धर्म निभाया न ही पति धर्म। इन्हें पिता धर्म का भी ज्ञान नहीं। ये सारे कर्तव्य तो तुमने अकेले निभाया है। अब जबकि इनको एक आसरा और सहारा चाहिए तो वापस आए हैं परिवार के सदस्य की पहचान लिए। मगर मैं इनसे पूछता हूं कि इस परिवार में इतने सालों से इनकी क्या भूमिका रही? अब किस आधार पर यह हमसे आश्रय की उम्मीद करते हैं? जबकि इन्होंने हमें बेसहारा छोड़ा था!
बड़े बेटे के अंदर ब्रजेश के लिए रोष साफ दिख रहा था। रामेश्वरी को भी खुशी से अधिक तकलीफ और दर्द से भरे दिन दिख रहे थे जो उसने बिताये थे। इतनी उम्र गुजार दी उसने दर्द से लड़ते हुए। उसने एक फैसला किया।
‘सुनो, जब तुम्हारा स्नेहिल साथ मुझे और बच्चों को चाहिए था, तब तुमने जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अपनी मनमर्जी की स्वच्छंद जिंदगी चुनी। हमारी छोड़ो, बूढ़े माता-पिता के लिए भी तुम कोई दायित्व नहीं निभा पाए। अब हमारे पास आए हो तो अपने लाभ और जरूरत के हिसाब से।
‘मुझे माफ कर दो रामेश्वरी। ब्रजेश इससे अधिक नहीं बोल पाया। उसके लिए उसके बच्चे में स्नेह और लगाव का अभाव था। रामेश्वरी भी अपनी पीड़ा को महसूस कर रही थी जो उसे पति के कारण मिले थे। वह लांछन भरे कठिन दिनों को याद करती है जो वह पति के जाने के बाद गुजारी थी।
अब तक वहां आसपास के कुछ लोग जमा हो गए थे। उन लोगों ने रामेश्वरी और बच्चों को समझाने की कोशिश की कि पिता की गलतियों को माफ करके उसे अपना ले और आश्रय दे। आखिर ब्रजेश उसका पति है।
‘पति! कैसा पति! मेरा इससे कोई रिश्ता नहीं। कोई भी रिश्ता आत्मीयता पर आधारित होता है। प्रेम और फिर निभाई गई जिम्मेदारियां उस रिश्ते को और भी सुदृढ़ बनाते हैं। मगर हमारे रिश्ते में इनका अभाव है, कहते हुए रामेश्वरी की आंखें गीली हो जाती है।
‘अब यह मृत रिश्ते को अपने स्वार्थ के कारण जीवित करने की कोशिश कर रहा है जो शायद संभव नहीं।
रामेश्वरी की बात सुनकर ब्रजेश ठगा-सा महसूस करता है। वह वापस मुड़ जाता है अनजान रास्ते की तरफ मन में एक अपराधबोध लिए कि वह अपने जिम्मेदारियां और रिश्तो से दूर भागता रहा। अब उसे जीवन के इस कठिन सच को अपनाना पड़ेगा।
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