आजाद हूं मैं- गृहलक्ष्मी की कहानी
Azaad Hun Mein

Hindi Kahani: चांदनी चहकती हुई पूरे घर मे घूम रही थी। उसके कॉलेज का दोस्त परिमल अपने परिवार के साथ चांदनी से मिलने आ रहा था। मिलना तो एक औपचारिकता ही थी। परमिल को और उसके परिवार को चांदनी बेहद पसंद थी। चांदनी की मम्मी सरोज हालांकि बराबर ये ही कह रही थी कि एक बार पंडित राधेजी से बात कर लूं। लेकिन चांदनी की बड़ी बहन अनु ने मम्मी की बात को तूल नहीं दिया और परिमल को आमंत्रित कर लिया था क्योंकि परिमल अच्छी खासी सरकारी नौकरी में था और परिवार भी बेहद जाना-माना था।
चांदनी के गोरे गाल शर्म से गुलाबी हो रहे थे, परिमल अपने मम्मी-पापा के साथ पहुंच गया था। थोड़ी देर बातचीत हुई और फिर परिमल की मम्मी बोली, ‘हमारे पास सब कुछ है, बस एक बेटी की कमी है जो चांदनी के आने से पूरी हो जाएगी।’
चांदनी की दीदी बोली, ‘आंटी जी हमें भी चांदनी के लिए ऐसा ही संस्कारी परिवार चाहिए था।’
परिमल की मम्मी जैसे ही चांदनी के गले मे सोने की चेन पहनाने लगी कि सरोज जी बोल उठीं, ‘रुकिये दीदी, माफ कीजिये जब तक पंडितजी से मैं जन्मपत्री ना मिलवा लूं, मैं कोई रस्म नहीं कर सकती हूं।’
परिमल के माता-पिता का चेहरा अपमान से लाल हो गया, वहीं चांदनी की दीदी अनु भी गुस्से से तिलमिला गई। बाहर वालो के सामने अपनी मां को कुछ कह नहीं सकती थी पर फिर भी संयत स्वर में बोली, ‘मम्मी परिमल और चांदनी एक-दूजे को पसंद करते हैं।’
सरोज जी बोलीं, ‘तेरा तो दिमाग खराब हो गया है। भूल गयी, तू आज इतनी खुश इसीलिये है क्योंकि तेरा विवाह जन्मकुंडली मिला कर ही कराया था। अब छोटी बेटी को कैसे धक्का दे दूं।’
परिमल का चेहरा फीका पड़ गया था पर उसे उम्मीद थी कि चांदनी जैसी पढ़ी-लिखी युवती जरूर कुछ कहेगी पर उसने आंखें झुका ली। परिमल के माता-पिता बिना कुछ कहे बाहर निकल गए।
अनु ने मेहमान के जाते ही अपनी मां को आड़े हाथों लिया। ‘मम्मी तुम अजीब हो, इतना अच्छा रिश्ता नसीब से ही आता है और तुम कुंडली मिलान पर अटकी हो।’ पर सरोज जी ने एक ना सुनी। अगले दिन ही वो मंदिर के पुरोहित राधे के पास चली गयी। राधे जी उस मंदिर में पीढ़ियों से स्थापित थे। उनके पूरे परिवार का खर्चा मंदिर की दान-दक्षिणा, जन्मकुंडली और हाथों की लकीरें पढ़ने से निकलता था। वास्तव में उन्हें कितना ज्ञान हैं ये कोई नहीं जानता पर वो हर महिला और उसके परिवार की आर्थिक स्थिति देखकर उन्हें विभिन्न प्रकार के उपाय बताते थे। राधे जी का मंझोला कद और चेहरा गोरा था। उनका पूरा चेहरा दाढ़ी से ढका हुआ था और सारे दांत पान जर्दे से खराब थे लेकिन आंखों में एक सौम्यता थी, जिस कारण महिलाएं उनके पास बिना झिझक के आ कर अपनी समस्याओं का हाल सुनाती थीं। सरोजजी ने भी चांदनी की कुंडली और परिमल की जन्मतिथि सामने रख दी, राधे जी ने स्लेट पर कुछ गणना की और फिर कहा, ‘ये लड़का तो घोर मांगलिक है, अगर चांदनी बिटिया की शादी इससे हो जाती है तो चांदनी का ही अनिष्ट होगा।’ सरोज जी के माथे पर चिंता की लकीर खींच गई और फिर वे चिंतित स्वर में बोली, ‘कोई उपाय है क्या पंडितजी?’ राधेजी की आंखों के सामने इस वर्ष ग्रीष्मावकाश की छुट्टियां आ गई, उनके बच्चे केरला जाने की जिद कर रहे थे और उन्हें सरोज की धर्मभीरुता और आर्थिक स्थिति का अच्छे से ज्ञान था। इसलिये पंडितजी बोले, ‘मैं ऐसी पूजा करूंगा कि चांदनी बिटिया राज करेगी, तीस हजार का खर्चा है। कल आप बिटिया को लेकर आइए, मैं पाठ की तैयारी शुरू कर दूंगा, उसके हाथ से ही संकल्प कराना है।’ जब घर आकर सरोज ने ये बातें बताई तो जहां सरोज के पति इस आकस्मिक खर्चे से तिलमिला गये, वहीं चांदनी का चेहरा बुझ गया। उसने दौड़ कर व्हाट्सप्प पर परिमल को मैसेज कर दिया। परिमल का जवाब आया, ‘मैं तुमसे विवाह के लिये तैयार हूं पर तुम में ही कोई हिम्मत नहीं है। तुम इस सदी में भी इन सड़ी-गली बेड़ियों में फंसी हुई हो।’ चांदनी को बचपन से ही उसकी मां ने ऐसे बड़ा किया था कि पढ़-लिख कर भी अंधविश्वास उसमें कूट-कूट कर भरा हुआ था। राधेजी के कहे अनुसार चांदनी को ये संकल्प सवेरे चार बजे ही लेना था। सवेरे नहा-धो कर दोनो मां-बेटी मंदिर की तरफ चल दीं। ठिठुरती हुई ठंड में चारों ओर सन्नाटा खींचा हुआ था। कंपकपाती हुई दोनों जन मंदिर प्रांगण में पहुंचीं। राधे पहले से ही तैयार बैठे थे। लपक कर नोटों की गड्डी अपने कुर्ते की जेब मे डाली और मंत्र पढ़ने आरंभ कर दिए। करीब बीस मिनट बाद चांदनी के हाथ में कलावा बांधकर कर। एक हांड़ी चांदनी को पकड़ाते हुये राधे जी बोले, ‘बिटिया इसे बीच चौराहे पर रखना पर एक बात का ध्यान रखना, तुम्हे पीछे मुड़ कर नही देखना है।’ जनवरी की कड़ाके की ठंड में चांदनी ने जैसे ही चौराहे पर वो हांडी रखी, वहां पर पसरे हुये आवारा कुत्तों ने भौंकना शुरू कर दिया क्योंकि पंडितजी ने कहा था पीछे मुड़ कर नहीं देखना इसलिये दोनों मां-बेटी ने चाल तेज कर दी थी। कुत्तों को उनकी तेज चाल से लगा कि वो चोर हैं और गली के प्रति अपनी वफादारी निभाते हुए एक कुत्ते ने चांदनी के दाएं पैर में काट लिया। वो दर्द से तिलमिला कर वहीं बैठ गयी और जोर से चिल्लाई। तब सरोज ने पीछे मुड़ कर देखा और चांदनी के दर्द से अधिक, सरोज को इस बात का दर्द हो रहा था कि कुत्तों ने पूरी पूजा सामग्री को फैला दिया था। दर्द से कराहती हुई चांदनी किसी तरह से घर पहुंची तो सरोज के पति महावीर सिंह हक्का-बक्का रह गये पर फिर बिना देर किया वो बेटी को डॉक्टर के पास ले गए। इमरजेंसी के कारण डॉक्टर्स ने दुगनी फीस वसूली, जिसके चलते उन्हें दस हजार की चपत लग गई। मजे की बात ये हैं कि चांदनी आज अपनी नौकरी के साक्षात्कार के लिये भी ना जा सकी। उधर सरोज के मन में ये वहम घर कर गया था कि पूजा खंडित हो गयी है। जरूर कुछ अपशकुन होगा। एक माह पश्चात फिर से चांदनी को देखने कुछ लोग आए थे। लड़का अमेरिका में उच्च पद पर था। इस बार सरोज ने जन्मकुंडली पहले ही मिलवा ली थी। वरपक्ष को देखकर सरोज और चांदनी दोनों ही खुश थे। पंडितजी के कहे अनुसार चांदनी ने फिरोजी रंग की साड़ी पहनी थी लेकिन उसे अभ्यास नहीं था वो लड़के को चाय देते हुए साड़ी में अटक कर गिर गयी। बातों ही बातों में जब वरपक्ष को साड़ी पहनने का राज पता चला तो उन्होंने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘लोग तो चांद से भी आगे निकल गए हैं। हम ऐसी अंधविश्वासी लड़की को बहू बनाकर अपने परिवार को दस पीढ़ी पीछे नहीं पहुंचा सकते हैं।’ सरोज को लगा पूजा खंडित होने का फल मिल गया है। चांदनी अपने कमरे में बैठी हुई सुबकने लगी तो अनु गुस्से में बोली, ‘तुम भी इस बात के लिए उतनी ही जिम्मेदार हो जितनी मम्मी हैं।’ बेटी के जाते ही सरोज ने राधे पंडित को फोन लगाया तो राधे जी बोले, ‘आप चिंता ना करें, बिटिया के भाग्य में राजयोग है। तभी तो लड़केवाले अपने आप पीछे हट गए। लड़के की जन्मकुंडली अच्छी थी लेकिन उसकी कुंडली में राजयोग नहीं था। चांदनी बिटिया तो राजरानी का भाग्य लिखवा कर आई हैं इसलिए लड़के वाले पीछे हट गए।’ सरोज जी को इतना अच्छा रिश्ता हाथ से निकलने का दुख था पर संतोष भी था कि बेटी राजरानी बन कर राज करेगी। करीब एक सप्ताह बाद फिर से वरपक्ष चांदनी से मिलने आए। इस बार वरपक्ष ने ये कह कर मना कर दिया कि उन्हें नौकरीशुदा लड़की चाहिए। एक बार फिर सरोज अपने जीवन के संकटमोचन पंडित राधेजी के सामने बैठी थी। पंडितजी सरोज के भय का फायदा उठाते हुये बोले, ‘बहनजी, चांदनी पर शनि की साढ़ेसाती आरम्भ हो गयी है, वैसे तो इस उपाय में पूरे 20 हजार का खर्चा हैं पर क्योंकि आप मेरी बहुत पुरानी जजमान हो, आपके लिए मैं 15 हजार में ही कर दूंगा।’
‘इस पूजा के पश्चात आप देखेंगी कि बिटिया को ऊंची नौकरी और योग्य वर तुरंत मिल जाएगा।’
सरोज को पता था कि पति महोदय इस बार अपनी जेब किसी भी कीमत पर ढीली नहीं करेंगे इसलिये सरोज ने अपने पास से रुपये राधेजी को दे दिए।
चांदनी बचपन से ही अपनी मां को ऐसे पूजा-पाठ के लिए पैसे खर्च करते हुए देखते आई थी इसलिए चांदनी को पूजा-पाठ का यह मार्ग आसान लगता था। अगर नंबर कम आए तो ग्रहों पर डाल दो, अगर नौकरी नहीं मिल पा रही है तो शनि की साढ़ेसाती पर डाल दो। अपने जीवन की बागडोर इन ग्रहों और नक्षत्रों के हवाले करके चांदनी बहुत खुश थी। ऐसा नहीं था कि चांदनी के पास ताॢकक शक्ति का अभाव था पर वो बिना मेहनत के ही सबकुछ पाना चाहती थी इसलिये वो अपनी मां की हर बात में हां में हां मिलाती थी। इसके विपरीत उसकी बड़ी बहन अनु इन सब पाखंडों का पुरजोर विरोध करती थी पर चांदनी और सरोज जी के कानों पर जूं भी ना रेंगती थी।
अनु को अपनी मां और छोटी बहन की सोच पर गुस्से के साथ-साथ दया भी आती थी लेकिन वो मजबूर थी। चार माह बीत गये थे पर चांदनी को किसी भी कार्य मे सफलता नहीं मिली। उधर पंडित राधेजी अपने बच्चों के ग्रीष्मावकाश के लिए सब बंदोबस्त कर चुके थे। बस पांच हजार की कमी थी तो इसके लिए भी उन्होंने सरोज जी को ही शिकार बना दिया।
उन्होंने सरोज जी को फोन करके कहा, ‘बहनजी मुझे रात स्वपन में दिखाई दिया कि चांदनी बिटिया दलदल में धंसी हुई है, तभी कहीं से एक पीले रंग का पारस पत्थर आया और चांदनी एकदम से रानी में परिवर्तित हो गई।’
सरोज जी डर कर बोल, ‘पंडितजी कुछ भी नहीं हो पा रहा है। किसी पूजा पाठ का कोई असर नहीं दिख रहा है और ऊपर से ये खराब स्वपन।’
राधे जी बोले, ‘मैं बिटिया के लिए 12 रत्ती का पुखराज भेज रहा हूं, सब ठीक होगा, उसे सोमवार में सुबह शुद्ध करके पहना दीजिये। वैसे इसकी कीमत 10 हजार है लेकिन आपकी और मेरी बिटिया में कोई फर्क नहीं है। आप बस पांच हजार भेज दीजिए।’
सरोज जी गदगद हो गईं, आज ही तो उनके पति ने उन्हें घर खर्च के लिए पैसे दिये थे, बड़े आराम से वो ये कर लेंगी। बस किसी भी तरह से चांदनी की समस्याएं खत्म हो जाए।
और, जैसा कहते हैं ना भगवान के घर देर है अंधेर नहीं। जल्द ही चांदनी के लिए एक बहुत ही अच्छा रिश्ता मिल गया था। चांदनी और मौलिक, मेट्रिमोनियल साइट के माध्यम से एक-दूसरे से मिले और इस बार चांदनी ने मिलने से पहले मौलिक की जन्मकुंडली सरोज जी को दे दी थी। राधेजी ने कहा, ‘ऐसा मिलान तो कभी नहीं देखा जैसे बिल्कुल राम और सीता का हो, बहुत अच्छा तालमेल रहेगा।’
अगले हफ्ते मौलिक अपने दोस्त के साथ चांदनी के घर पहुंच गया। उसका आकर्षक व्यक्तित्व और मनहोरी बातों से सरोज जी और चांदनी खुशी से फूले ना समा रहे थे लेकिन अनु को दाल में कुछ काला लग रहा था। उसने दबी जुबान में सरोज और महावीर से कहा, ‘आजकल बहुत धोखाधड़ी चल रही है। आप इसके घर और नौकरी का पता कीजिये और फिर आगे बात बढ़ाइए।’
पर सरोज ने ये सोचकर अनु की बात को अनसुना कर दिया कि राधेजी ने तो स्वयं इस बार हां कर दी है और सौ प्रतिशत गारंटी भी ली है।
मौलिक ने अपने घर का पता दिया और फिर उन्हें घर पर आमंत्रित किया। अपने माता-पिता के साथ अनु भी गई और सब कुछ अच्छा होते हुए भी उसे कुछ अटपटा लग रहा था। जब अनु ने चांदनी से बात करनी चाही तो चांदनी गुस्से में बोली, ‘दीदी आपको मुझसे जलन हो रही है कि मुझे आपसे अच्छा घर और वर कैसे मिल सकता है। ये मेरे सोलह सोमवार के व्रत का फल है। ये बात सुनकर अनु सोच में पड़ गई, कौन कह सकता है कि उसकी छोटी बहन पोस्ट ग्रेजुएट है।
अनु ने फिर कुछ ना कहा, चांदनी और मौलिक के विवाह की तिथि भी राधेजी ने तय कर दी थी। राधे पंडित जी को सरोज ने इतना अच्छा घर वर दिलवाने के लिए दिल खोल कर दक्षिणा दी थी। 
देखते ही देखते तीन माह बीत गए और फिर चांदनी के विवाह को बस एक माह शेष रह गया था। अनु को भी लगने लगा था कि राधे पंडितजी के पाठ में कोई शक्ति तो जरूर होगी नहीं तो इन तीन माह में कुछ तो जरूर पता लग जाता। उसके विवाह को भी 5 वर्ष हो गए थे पर वो अब तक मातृत्व सुख से वंचित थी। आखिरकार अनु ने भी सोचा क्यों ना वो भी राधे पंडित से कुछ मदद ले ले। इसलिये वो अपनी मां सरोज जी के साथ मंदिर की तरफ चल दी। मंदिर में जाकर पता चला कि पंडितजी मंदिर बंद करके घर चले गए हैं। अनु उनसे मिलने को बेहद उतावली थी इसलिये उसने घर का पता लिया और जैसे ही घर पहुंची तो अंदर का नजारा देखकर अनु के साथ-साथ सरोज के भी होश उड़ गए।
पंडित राधे जी के सामने मौलिक बैठा था जो राधे पंडित जी को आगे की योजना बनाने में मदद कर रहा था। सरोजजी आग बबूला हो गईं और जैसे ही वो अंदर जा रही थीं। अनु ने उनका हाथ पीछे खींच लिया और बोली, ‘मां अभी अंदर चली जाओगी तो हम इनकी असलियत नहीं पता कर पाएंगे, थोड़ा सब्र रखो।’
सरोज जी बेहद शॄमदा महसूस कर रही थीं क्योंकि उन्होंने तो अपनी दकियानूसी सोच के कारण अपनी छोटी बेटी की जिंदगी बर्बाद ही कर दी थी पर इस मुश्किल की घड़ी में अनु ने हौसला ना छोड़ा और जल्द ही ये राज खुल गया कि मौलिक पंडित राधेजी का ही दूर का रिश्तेदार है।
सरोज की धर्मभीरुता का फायदा उठाते हुए उन्होंने मौलिक का विवाह चांदनी के साथ तय करा दिया था। मौलिक एक गरीब परिवार का युवक था। उसका वो व्यापार और घर सब किराये पर थे। सरोज जी ने अपने अंधविश्वास के कारण और महावीर जी ने अपने ढीले रवैये के कारण कोई जांच पड़ताल नहीं की थी।
चांदनी को पहले तो विश्वास नहीं हुआ पर बाद में जब सच्चाई सामने आई तो उसके पैरों तले की जमीन खिसक गई थी। अब तो कोई पंडित राधेजी भी नहीं रहा जिसके सहारे वो अब तक जिंदगी जीती आई हैं।
पंडित राधेजी रातोरात परिवार समेत ना जाने कहां चले गए। मौलिक भी रफूचक्कर हो गया था।
महावीर सिंह और सरोज सिर पकड़ कर बैठ गए। मैरिज हॉल, गहने, कपड़े सब खरीदा जा चुका था, वो लाखों का नुकसान नहीं सह सकते थे और फिर शॄमदगी अलग थे। शुक्र था अभी कार्ड नहीं छपे थे पर वो हर हाल में उसी तारीख में चांदनी का विवाह करना चाहते थे।
सरोज जी फिर दो दिन बाद बोली, ‘निर्मला चाची ने एक बहुत ज्ञानी पंडित का पता बताया है जो चौक पर बैठते हैं, उन्हें पैसों का कोई लालच नही हैं।’
‘चांदनी तू चिंता मत कर कल तू और मैं वहां जाएंगे, भगवान ने चाहा तो इसी महूर्त में तेरी शादी हो जाएगी।’
सरोज उन लोगों में से थी जो अपने ऊपर विश्वास करने के बजाय पोंगा पंडितों पर अधिक विश्वास करती थी।
महावीर सिंह गुस्से में दहाड़ उठे, बोले, ‘माफ करो, सब पंडितों की बात सुन ली।’
चांदनी के चेहरे का नूर ना जाने कहां चला गया था, सारे दिन वो अपने कमरे में कैद रहती थी। ऐसा लग रहा था कि एक जिंदा लाश हो। अनु को बेहद दुख हो रहा था कि उसकी छोटी बहन की जिंदगी अंधविश्वास के कारण बर्बाद हो गई है पर वो कुछ भी नही कर पा रही है।
आज चांदनी 12 बजे किसी सहेली से मिलने गयी थी, शाम के 7 बज गये थे पर चांदनी वापिस ना लौटी। अनु ने जब फोन किया तो पता चला कि चांदनी सहेली के घर गयी ही नहीं थी। महावीर और सरोज चांदनी को ढूंढने के बजाय एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे थे।
तभी दरवाजा खुला और चांदनी अंदर आ गई, पूरा परिवार आश्चर्य से उसे देखने लगा। चांदनी बोली, ‘आपने क्या सोचा कि मैं कायरों की तरह मुंह छुपा कर भाग गई हूं या फिर मैंने आत्महत्या कर ली है।’
‘दीदी आप सच कहती थीं मुझे में हिम्मत नहीं थी पर आज मैंने अपने आप को हर सड़ी गली परंपरओं से आजाद कर लिया है, काश! ये बात मुझे पहले समझ आ जाती।’
तभी परिमल ने अपने माता-पिता के साथ प्रवेश किया और तब चांदनी ने कहा, ‘मम्मी-पापा मैंने परिमल से विवाह करने का निर्णय ले लिया है, जो भी होगा मैं उसकी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हूं।’
महावीर जी ने बिना सरोज से कुछ पूछे, परिमल को शगुन के रूप में कुछ रुपये दे दिए।
सरोज जी सिर पकड़ कर बैठ गईं, ‘बेवकूफ लड़की, तूने श्राद्ध में ये कैसा निर्णय ले लिया है।’
चांदनी ने कहा, ‘मां, हमारे पितरो का आशीर्वाद हमारे साथ रहेगा और मैं अब अपने जीवन को अपने हिसाब से जीना चाहती हूं। कोई ग्रह, नक्षत्र मेरा भविष्य तय नहीं करेगा।
अनु ने राहत की सांस ली क्योंकि चांदनी ने अब अंधविश्वास की बेड़ियों से सदा के लिये खुद को आजाद कर लिया था।

Also read: हरे कांच की चूड़ियां- गृहलक्ष्मी की कहानियां