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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

पूर्णिमा की रात थी। चाँद अपने पूर्णाकार में आसमाँ में मुस्कराते हुए चमचमा रहा था। लेकिन चाँदनी ना जाने क्यों गमजदा, धीरे-धीरे चल रही थी और अंदर ही अंदर घुटती हुई सिसक रही थी। बोल तो सकती नहीं थी क्योंकि बोलने की उम्र में ही दुनिया ने उसे इतना चुप करा दिया कि चुप रहते-रहते जुबां बोलना ही भूल गई। चाँद चाहे पूर्णाकार में होता या अर्धाकार में, यह चाँदनी लाल बत्ती के चौक-चौराहों पर अपनी दो छोटी बहनों के साथ, हाथ में बिस्कुटों के पैकेट उठाए, हमेशा जोर-जोर से मुस्कराती और खिलखिलाती रहती थी।

गुजर-बसर बामुश्किल थी, पर संतुष्टि अपनी चरम सीमा पर थी। गोल चाँद-सा खूबसूरत चेहरा, मधुर-मीठी खनकती आवाज से चौक पर रुकने वाली गाड़ी वालों को बड़े प्यार भरे अंदाज से, साहब बिस्कुट ले लीजिए- दो रुपए, पाँच रुपए, दस रुपए, एक सौ बीस रुपए में पूरा पैकेट। खस्ता, करारे, कुरकुरे और नमकीन, खा के हो जाओगे ताजातरीन… खा कर तो देखिए। उसके बेचने का अंदाज इतना लुभावना था कि लोग ना चाहते हुए भी बिस्कुट खरीद लेते थे। उसमें किसी को भी सम्मोहित करने की कला थी। उस चौक पर बिस्कुट बेचने वालों में सबसे ज्यादा बिक्री चाँदनी की ही होती थी।

निर्माणाधीन साईट के दौरे से वापस आते हुए अनिल को अक्सर चाँदनी की इस लुभावनी, खनकती आवाज से रू-ब-रू होना पड़ता था। साहब बिस्कुट ले लीजिए, खस्ता, करारे, कुरकुरे और नमकीन, खा कर हो जाएंगे ताजातरीन। सस्ते बिस्कुट के पैकेट देखकर अनिल मुँह बनाता और बिना खरीदे दस का नोट पकड़ा देता। लगभग एक सप्ताह तक यह सिलसिला हररोज चलता रहा। आज जैसे ही चाँदनी ने ले लो साहब बिस्कुट…। अनिल ने अपने चिरपरिचित अंदाज में दस का नोट आगे बढ़ाया तो चाँदनी ने उसे लेने से इंकार कर दिया। साहब गरीब है, भिखारी नहीं…, मेहनत, मजदूरी करके खाते हैं और अगली गाड़ी की तरफ बढ़ गई।

साथ बैठे दोस्त दीपक- “यार! नखरे तो देखो इन छोटे लोगों के…, चिढ़ाते हुए… गरीब है…, भिखारी नहीं। इन चौक-चौराहों पर जितनी भी वारदातें होती हैं, सबको यहीं सामान बेचने वाले ही अंजाम देते हैं और रूआब ऐसे दिखाते हैं, जैसे कोई राजा हो… चोर कहीं के।”

अनिल- “यार! उसका अपना स्वाभिमान है। दीपक- स्वाभिमान नहीं… सिर्फ प्रभाव जमा रही थी। वैसे उसकी आवाज में जादू तो गजब था और है भी बला की खूबसूरत… मैले-कुचैले कपड़ों में भी कुछ लग रही थी।”

अनिल- “छोड़ यार! अपने बच्चों के उम्र की, बच्ची हैं।”

दीपक का घर आ जाता है, अनिल उसे गेट पर छोड़कर अपने घर चला जाता है।

लेकिन अनिल के दिलों-दिमाग पर उसकी खुद्दारी नशे सी छा जाती है। साहब! “गरीब है…, भिखारी नहीं…”, रह-रहकर यह संवाद उसके जेहन में कौंधते रहते हैं। लड़की खुद्दार है, तो ईमानदार पक्का होगी। इधर आभा कई दिनों से कामवाली बाई से परेशान होकर, स्थाई नौकर की माँग कर रही थी। सो क्यों ना इसी लड़की को नौकरी पर रख लिया जाए। उसे चौक-चौराहों पर बिस्कुट बेचने से निजात मिल जाएगा और हमें रोज-रोज की काम वाली बाई की परेशानी से।

वहीं चौराहा, वहीं चिरपरिचित आवाज… साहब! बिस्कुट ले लो…। गाड़ी को सड़क किनारे लगा कर, तहकीकात करने पर पता चलता है कि उसके माँ-बाप भी इसी चौराहे पर बिस्कुट बेचते हैं। चार भाई-बहनों में वह सबसे बड़ी हैं। उसका नाम चाँदनी है। वह उसके माँ-बाबा से मिलकर उसे आठ हजार महीने की पगार पर, अपने साथ घर ले जाने की बात करता है। थोड़ी सी ना-नुकर की जद्दोजहद के पश्चात उसके माँ-बाबा स्वीकृति प्रदान कर देते हैं। अगले दिन उसी चौराहे पर वह बिस्कुटों के पैकेट के स्थान पर, मैली-कुचौली गठरी उठाए, अपने माँ-बाबा के साथ उसका इंतजार करते मिलती है।

अनिल उसको अपने साथ गाड़ी में आगे बिठा लेता है। वह डरी- सहमी, अपनी बंटे जैसी आँखों को हैरानी से फैलाए, कौतूहलवश इधर-उधर ताँकती-झाँकती है तथा गाड़ी के बटनों और शीशे को हाथ से छू-छूकर मन ही मन कुछ बुदबुदाती है। तभी अनिल का घर आ जाता है, घर क्या एक हजार वर्ग फीट में फैला महल था। चाँदनी टुकुर-टुकुर घर की दीवारों को देखती है। चमचमाते फर्शों में अपने चेहरे को निहारते हुए, शीशे के फर्श…, बुदबुदाते हुए, डरते-सहमते घर के अंदर प्रवेश करती है।

दीपक, आभा और अपनी दोनों बेटी निहारिका और श्रावणी से उसे मिलवाता हैं। यह अब स्थाई रूप से हमारे साथ रहेगी और घर के कामों में आभा का हाथ बँटवाएगी। तुम दोनों इसे थोड़ा-बहुत पढ़ा-लिखा दिया करना।

उसे देखकर निहारिका और श्रावणी- दोनों मुँह बनाती हैं। “छि: इतनी गंदी…।”

अनिल उन्हें डाँट कर- “ऐसा नहीं कहते.. तुम्हारे साथ रहेगी तो यह भी साफ-सफाई सीख जाएगी।”

आभा- “यह तो बहुत छोटी है, हमारी बच्चियों के बराबर की, घर का काम कैसे…?”

अनिल- “तुम चिंता मत करो, मेहनती और समझदार है, जल्दी सीख जाएगी।”

उसे रहने के लिए नौकरों का कमरा दे दिया जाता है। कहाँ आठ बाई आठ के कमरे में सात जन ठुँस-ठुँस कर रहते थे और कहाँ यह बारह बाई बारह का अलग से कमरा, साथ में लगता शौचालय अलग।

शहर की आबोहवा, शैंपू और साबुन से रोज नहाने और निहारिका के पुराने कपड़े पहनकर चाँदनी की चाँदनी और भी निखरने लगी थी। धीरे-धीरे उसके नशीले नशे का जादू पूरे परिवार पर छाने लगा। वह तन की खूबसूरती के साथ-साथ मन की भी खूबसूरत थी। हर काम में जल्दी से महारत हासिल कर लेती थी। घर में हर समय केवल चाँदनी-चाँदनी का जाप होता रहता थी। जिस काम को कोई नहीं करता था, उस काम को वह चुटकी में कर देती थी। पूरे परिवार की उस पर निर्भरता इतनी बढ़ गई थी कि वे स्वयं को उसके बिना अपाहिज महसूस करते थे।

परिवार के प्रति वह इतनी निष्ठावान थी कि चाहे कितने भी घोर अँधकार के बादल परिवार पर मंडराते, वह अपनी चाँदनी फैला कर उस तम को भगा ही देती। घर की चिंता-फिक्र से बेफिक्र आभा क्लब, किटी पार्टियों और शॉपिंग का लुफ्त उठाती। बच्चियाँ पढ़ाई के अलावा अतिरिक्त गतिविधियों में लगी रहती। चाँदनी घर और घर के कामों में व्यस्त, सबके रहने, खाने-पीने और स्वाद का ध्यान रखती, और तो और साहब और मैडम के दोस्तों की पसंद और नापसंद भी चाँदनी बाखूबी जानती थी। बच्चियों से थोड़ा लिखना-पढ़ना और बात करने का सलीका भी वह जान गई थी।

चाँदनी जैसी नौकरानी के कारण कभी-कभी उन दोनों के दोस्तों को उनकी किस्मत से जलन होती थी। दो-चार मौकापरस्त उसे आकर्षित करके अपने घर में ले जाने को लालायित रहते। लेकिन अबोध चाँदनी को अनिल और आभा में ही अपना सुखद सँसार दिखता था। जब से वह यहाँ आई है, माँ-बाबा ने तो कभी उसे सँभाला नहीं, न ही वे उसे यहाँ मिलने आए हैं और ना ही उन्होंने कभी उसे घर पर बुलाया है। वह साहब से चौक पर ही पगार ले लेते हैं और हर साल चाँदनी को वापस घर ले आने का डर दिखाकर पगार बढ़ावा लेते हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें चाँदनी से कुछ लेना-देना नहीं है।

यौवन दस्तक दे चुका था, चाँदनी पन्द्रहवें साल से सोलहवें में आ गई। उसमें औरत बनने के सारे लक्षण आ चुके थे। यौवन ने अपनी मेहरबानियाँ उस पर कुछ ज्यादा ही लुटाई थी। बिना श्रृंगार के भी गजब की खूबसूरत लगती थी। किसी को भी एक नजर में दीवाना बनाने का मादा रखती थी। उसकी खूबसूरती के जाम में कोई भी बहक कर उस जाम प्याले को पीने को मजबूर हो सकता था। अनिल के कदम भी आजकल इस खूबसूरत जाम को होठों से लगाने के लिए कुछ ज्यादा ही बहक रहे थे। उसकी दीवानगी का आलम था कि उसकी मेहरबानियाँ आजकल चाँदनी पर कुछ ज्यादा ही बरस रही थीं।

अनिल का उसे शॉपिंग पर ले जाना, नए-नए कपड़े दिलवाना, उसके कमरे में नए फर्नीचर का इंतजाम करना, आभा और बच्चों के एतराज जताने पर, अनिल ने बड़े प्यार से समझाते हुए, चाँदनी को आठ साल हो गए हमारी सेवा करते-करते, यह सब उसकी सेवा का प्रतिफल है। हमेशा निहारिका की उतरन पहनने वाली चाँदनी अपने पसंद के नए कपड़े पाकर साहब के प्रति कृतज्ञ भावना से भर गई।

अनिल के बहकते कदमों को अंजाम दिया, चाँदनी के लिए आए नए पलंग ने, जिसे देखने के बहाने चाँदनी की अस्मत तार-तार हुई। जिसका साक्षी बना अर्ध रात्रि का दूसरा पहर। चाँदनी मासूम कली थी, जो अनिल के मजबूत बाहों के बंधन और गर्म साँसों की जकड़न से स्वयं को आजाद नहीं करवा पाई और मसली गई। दो-चार बार दबी घुटी आवाज में विरोध किया, लेकिन अहसानों के बोझ में दबी उसकी सिसकियाँ, चीत्कार, अनुनय-विनय सब अनिल के रुतबे और उसकी गर्म साँसों के धुए में घुट कर रह गई। कई महीनों तक यह खेल लगभग हर रोज चलता रहा और रात्रि इस नंगे खेल में शर्मसार होती रही। चाँदनी जब भी घर में कुछ बोलने की कोशिश करती, अनिल की रोबीली तेज आवाज उसे चुप करवा देती। कितनी बार तुम्हें समझाया है, अब तुम बड़ी हो गई हो, चुप रहा करो और वह डर कर चुप हो जाती। साहब का बदला व्यवहार चाँदनी समझ नहीं पा रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था, वह अपने उभरते यौवन रूप सौंदर्य से नफरत करे या प्रेम।

एक रात तेज गर्म साँसों का धुंआ आभा के नथुनों तक भी पहुँच गया, धुएँ से घुटन और आँखों में पानी का आना स्वाभाविक था। घर में खूब कलेश हुआ, चाँदनी को उसके माँ-बाप के पास वापस भेजने का फैसला ले लिया गया, पर यह क्या चाँदनी तो उल्टियों पर उल्टियाँ किए जा रही थी। आभा का माथा ठनका। घर में ही विश्वासपात्र डॉक्टर को बुलाकर गर्भावस्था की जाँच करवाने पर पता लगा कि वह तीन महीने से गर्भवती है। आभा ने माथा पीट लिया। अनिल को तलाक की धमकी देने लगी। सिसकते-सिसकते माँ-पापा को फोन करके अपने घर ले जाने के लिए कह दिया।

उसके मम्मी-पापा बिना समय गवांए उसके घर आ गए। माँ के गले लिपट कर आभा बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगी। लेकिन उसकी मम्मी ने बड़ी समझदारी से उसे तसल्ली देकर बात को संभाल लिया। एक पल के लिए तो ब्रह्माजी भी अपनी बेटी पर फिसल गए थे, फिर यह तो इंसान है। जो हुआ, सो व्यवस्थित। अगर तुम अनिल को तलाक दे दोगी तो जिंदगी तो तुम्हारी और बच्चियों की ही खराब होगी, क्योंकि अनिल को तो इसका चस्का पड़ गया है। तुम्हें ही उसे माफ करके एक अच्छी पत्नी का फर्ज निभा करके, उसे उसकी गलती का एहसास करवाना है। “लिंग जाँच करवा लो, अगर लड़का है तो तुम्हें करोड़ों की संपत्ति का वारिस मिल जाएगा, समझ लेना सरोगेसी करवाई है, अनिल का ही तो खून है।” आभा को भी लगा कि “अनिल का विश्वास जीतने का इससे अच्छा और कोई मौका हो ही नहीं सकता।”

अतः गुपचुप तरीके से मोटे पैसों की दक्षिणा चढ़ाकर, लिंग जाँच में लड़के की पुष्टि ली गई। बच्चियों को खुशखबरी के साथ नाना-नानी के घर भेज दिया जाता है कि आभा माँ बनने वाली है। बच्चा होने में कुछ जटिलताओं के कारण डॉक्टर ने उसे पूर्ण विश्राम के लिए बोला है। रिश्तेदारों और दोस्तों में यह फैला दिया कि चाँदनी कुछ महीनों के लिए अपने माँ-बाबा के घर गई है। चाँदनी को घर के तहखाने में सुरक्षित, पूर्ण सुख-सुविधाओं के साथ रखा गया। आभा स्वयं उसके आगे-पीछे मंडराती रहती और उसकी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखती, “घर का वारिस जो जनने जा रही थी।”

नियत समय चाँदनी ने खूबसूरत बेटे को जन्म दिया। लेकिन जन्म देते उसे जी भर के गोद में खिलाना तो बड़े दूर की बात, उसको निहारने भी नहीं दिया गया। क्योंकि वह तो केवल एक सरोगेसी थी। उसके स्तनों से दूध बहता रहता, लेकिन उसे पिलाने की इजाजत नहीं थी।

बच्चे का नाम चिराग रखा गया। नामकरण के बाद आभा, अनिल पर उसे घर से निकालने का दबाव बनाने लगी। “अगर यह चिराग से घुल-मिल गई, तो इसका ममत्व जाग जाएगा, फिर इन दोनों को अलग करना मुश्किल हो जाएगा।”

अनिल को अपने कृत्य पर शर्मिंदगी और चाँदनी के प्रति पूर्णतः हमदर्दी थी। इसके अतिरिक्त समाज में अपना नाम और कद बढ़ाने के लिए उसके पास अच्छा अवसर था। अतः उसने अच्छा घर-वर देखकर, पूरा दान-दहेज देकर मोहन के साथ चाँदनी की शादी कर दी। मोहन अच्छी कम्पनी में तीस हजार महीने पर काम करता था। शादी के दो साल तक तो सब कुछ ठीक-ठाक, बहुत अच्छे से चला। लेकिन दो साल बाद कम्पनी किसी कारणवश बंद हो गई। मोहन बेरोजगार हो गया। काफी जगह काम की तलाश की, लेकिन काम तो मिला नहीं, दारू की बोतल अवश्य हाथ लग गई।

दारुबाजों की सोहबत का परिणाम था, किसी शराबी की सलाह से “उसके निकम्मे, नकारे दिन फिर से फिरने लगे। किस्मत से रोजगार भी मिल गया और लक्ष्मी भी मेहरबान हो गई।” अब वह चाँदनी के लिए ग्राहक लाने लगा। ना-नुकर करने पर पीटने लगा और भद्दी-भद्दी गालियाँ देकर “उसे चुप रहने को कहने लगा।”

कभी-कभी उसे शादी करने पर पछतावा होता। अनिल साहब की कोठी में तो केवल एक ही लुटेरा था, वह भी नेक दिल सज्जन, जिसने अपने बहके कदमों के पश्चाताप की अग्नि में जलकर उसके सुनहरे भविष्य की कामना की “लेकिन भाग्य लकीरें तो वह विधाता से लिखवा कर आई थी, सारा दोष तो उसके कर्मों का है।” काश! उस समय वह शादी के लिए ना कर देती और कह पाती कि मैं तो आपके घर की दासी ही सही हूँ। यह समाज तो सुंदरता का दुश्मन है और यहाँ पग-पग पर अस्मिता के लुटेरे हैं। बीसवों साल हो गए थे, उसे इस नर्क में। अँधेरी रात्रि के साथ-साथ, अब दिन का उजाला भी इसका साक्षी था। हुस्न के बाजार का वह एक चर्चित नाम थी। जिसका पहरेदार लंपट मोहन था, जो पहरेदारी के बदले ग्राहकों से मोटे-मोटे नोट वसूलता। रोज नए लुटेरे आते, अपनी कामुक पिपासा शांत करते और चले जाते। लेकिन रूप-सौंदर्य की मल्लिका वह अभी भी प्यासी थी। वह अपनी प्यास किसी से कह नहीं पाती थी क्योंकि सभी ने अपने कुकृत्य पर पर्दा डालने के लिए उसे इतना चुप करा दिया कि उसकी जुबान बोलना ही भूल गई।

सब दिनों की भाँति आज का दिन भी आम था। सूर्यदेव अपनी परिधि में उसी तरह से घूम-घूम कर प्रकाश फैला रहे थे। लेकिन मोहन कुछ खास अंदाज में, खुशी से झूमता हुआ इस प्रकाश की आभा में कुछ ज्यादा ही नहा रहा था। मोटी-मोटी नोटों की गड्डियाँ हाथ में झूला रहा था, सुन प्यारी जान चाँदनी! आज सौंदर्य प्रसाधन से सजाने वाली को घर पर बुला कर बड़े अच्छे से इत्र लगाकर तैयार हो जाना, अनिल सेठ का बेटा चिराग आ रहा है- आज रात। सुना है! वह सुंदरता का रसैया है। एक बार तू पसंद आ गई तो नोटों की बारिश कर देगा।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी खूबसूरती को वरदान माने या अभिशाप। सीने में तूफान का बवंडर अभी थमा नहीं था। वहीं रात्रि का दूसरा पहर था, उसने भी अँधकार की ओट में अपनी आँखें मूंद ली थी, शायद इस कृत्य की विभीषिका का साक्षी बनना उसे मंजूर नहीं था।

“वहीं गर्म साँसों के धुएँ से उठने वाली गंध उसके नथुनों में समा रही थी। वह दरवाजे को धकेल कर अंदर आ जाता है। हूं-ब-हूं अनिल साहब की कॉपी।”

“उसकी गर्म साँसों से निकलने वाली धड़कनों की आवाजें रात के सन्नाटे को चीर रही थी। वह हवस का नादान कामुक पिपासा चाँदनी को अपने आगोश में भीचता है, “चाँदनी, माँ हूँ… ना बबुआ- मैं माँ हूँ तेरी…।” लेकिन वर्षों से चुप आवाज का साथ लगता है जुबान ने छोड़ दिया। वह पूरा जोर लगाकर उसे पीछे धकेलती है। लेकिन उसका सिर जोर से पीछे दीवार में जाकर लगता है- “लहूलुहान, ” जोर से चिल्लाती है- “बबुआ मैं तेरी माँ हूँ- माँ” और हमेशा के लिए चुप हो जाती है।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’