angrej bhee jisake aage thar-thar kaanpate the
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Hindi Immortal Story: बहुत समय पहले की बात है। गुजरात के बोरसाड़ तालुका में एक बहुत ही समर्पित सामाजिक कार्यकर्त्ता देवदास रहता था। वह एक गाँव से दूसरे गाँव पदयात्रा करते हुए गाँव के लोगों को, खासकर किसानों को, यह संदेश देता था कि वे अंग्रेज अधिकारियों को भूमि का लगान न दें या उसका विरोध करें। अंग्रेज सरकार ने भूमि का लगान इतना बढ़ा दिया था कि किसानों को अपना पेट भरना भी मुश्किल हो गया था। देवदास लोगों में अंग्रेज अधिकारियों के प्रति विद्रोह का झंडा बुलंद करने के लिए उनमें अहिंसक क्रांति का जोश भर रहा था। किसानों में अन्याय से लड़ने की हिम्मत और हौसला भर रहा था।

जिस-जिस गाँव में यह देवदास जाता, लोग उसका खूब आदर-सत्कार करते और उसकी बातों को खूब ध्यान से सुनकर उन पर अमल करते। हालाँकि अंग्रेज अधिकारी भी खूब सख्ती कर रहे थे। वे लगान न देने वाले किसानों की जमीन, पशु और घर, सब कुछ की नीलामी कर देते और इस तरह बहुत से किसान कंगाल हो गए थे, पर उनका हौसला बुलंद था। बहुत से किसान तो इसलिए अंग्रेजों के विरुद्ध हो गए क्योंकि उनके द्वारा की गई सख्ती को वे अन्याय मानते थे।

ऐसे ही किसान विद्रोह के समय में उसी इलाके में एक बड़ा कुख्यात डाकू भी था जिसका नाम था बाबर देवा। बाबर देवा लोगों को लूटता था और कुछ लोगों का अपहरण भी करवा लेता था, ताकि उनसे धन-संपत्ति ऐंठी जाए। लोगों का कहना था कि वह इसी इलाके में पहले रह चुके कुख्यात डाकू सैयद मियाँ का चेला था, जिसने कभी कांबे की खाड़ी में लूट का उत्पात मचाया था। कांबे वही कस्बा था जिसके पास ही गोराल नामक स्थान था। गोराल में ही बाबर देवा का जन्म हुआ था।

एक बार रात के समय देवदास एक छोटे से गाँव के पास से गुजर रहा था। रात हो गई थी और खूब अँधेरा था। ऐसी अँधेरी रात में ही उसका सामना अचानक डाकू बाबर देवा से हो गया। उसे सामने पाकर देवदास के भीतर एक थरथराहट सी दौड़ गई। पर उसने हिम्मत नहीं हारी। बाबर देवा ने कड़क आवाज में उससे पूछा, “कौन हो तुम?”

देवदास ने उत्तर दिया, “मैं भी तुम्हारी तरह कानून विरोधी हूँ। एक दूसरा डाकू हूँ।”

“दूसरा डाकू?…नहीं…कभी नहीं। इस इलाके में मेरे सिवा कोई दूसरा डाकू नहीं हो सकता।”

देवदास अब तक अपने डर से उबर चुका था। वह ओज भरे शब्दों में बोला, “क्या तुम्हें मेरी बात पर यकीन नहीं है?”

बाबर ने कहा, “नहीं, पर तुम्हारी बात ने मेरे दिमाग में खलबली मचा दी है।”

देवदास ने कहा, “तो ठीक है मेरे साथ आओ। हम कहीं बैठकर चैन से बातचीत कर लेते हैं।”

बाबर देवा दिग्भ्रमित सा हो गया था। उसका मन कह रहा था कि उसे एक अजनबी पर यों विश्वास नहीं कर लेना चाहिए, और फिर यह तो अँधेरी रात है।’ पर उसने देखा कि सामने वाला बिल्कुल खाली हाथ है। उसके हाथों में कोई हथियार नहीं है और न ही ऐसा लगता है कि उसने कोई हथियार छिपा रखा हो। इसलिए उसने सोचा कि इस अजनबी से कोई खतरा नहीं हो सकता।

वे दोनों सड़क के किनारे बैठ गए और उनकी बातचीत शुरू हो गई। पहल देवदास ने ही की।

बात शुरू करते हुए उसने कहा, “बाबर देवा, मैं भी अंग्रेज सरकार के खिलाफ संघर्ष कर रहा हूँ, इसलिए मैं भी कानून तोड़ रहा हूँ और तुम भी। पर हमारे जैसे अंग्रेजी सरकार विरोधी लोग कभी भी गरीबों, कमजोरों और मासूमों को आतंकित नहीं करते। हम अंग्रेज सरकार से सीधे-सीधे लड़ाई करते हैं। हम जो करते हैं, खुलकर करते हैं; सरकार को चुनौती देकर करते हैं। हम कोई भी आंदोलन या सभा सम्मेलन करते हैं जो कि अंग्रेजी सरकार के विरोध में ही होता है, तो पुलिस को पहले सूचित करते हैं। यहीं पर हमारे और तुम्हारे काम में फर्क है। तुम हर काम छिपकर करते हो, पुलिस से भागते फिरते हो पर हम सब कुछ सरकार की नाक के नीचे करते हैं। हमारे और तुम्हारे रास्ते में यही फर्क है, वरना तो तुम भी कानून-विरोधी हो और हम भी।”

बाबर के लिए ये सब बातें अविश्वनीय थीं।

वह बुदबुदाया, “ऐसा कैसे हो सकता है कि सरकार को, पुलिस को बताकर उसके खिलाफ संघर्ष किया जाए।”

देवदास ने पूछा, “बाबर देवा, क्या तुम्हें मेरी बातों पर यकीन नहीं है।”

बाबर देवा सोच में डूब गया। उसने न हाँ की और न ही ना।

देवदास ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “बाबर, हमने अपना जीवन सत्य के निमित्त कर दिया है। हमारे गुरु महात्मा गाँधी और सरदार वल्लभभाई पटेल हैं।”

बाबर ने अब मुँह खोला, “क्या इन लोगों ने तुम्हें सच्चाई के रास्ते पर चलने और कानून तोड़ने को कहा है?”

“नहीं, हमारे जो लक्ष्य हैं, उन्हें सत्य के मार्ग पर चलकर ही प्राप्त किया जा सकता है, हिंसा के मार्ग पर चलकर नहीं।” देवदास ने बाबर को समझाते हुए कहा।

बाबर ने उसकी बात का विरोध करते हुए कहा, “जिस रास्ते पर तुम चलना चाहते हो ना, वह दुधारी तलवार पर चलने के समान है। उस पर चलकर तुम अपना लक्ष्य नहीं पा सकोगे।”

“पर अंग्रेज सरकार तो तुम्हें भी बेहद नापसंद करती है, वह तुम्हारे पीछे हाथ धोकर पड़ी है।”

“मेरे पीछे!” बाबर ने आश्चर्य से कहा।

“हाँ,” देवदास ने कहा, “भोले-भाले व्यापारियों और ईमानदार किसानों को आतंकित करना कोई अच्छी बात नहीं है।”

“ओह, यह तो ठीक बात है।” बाबर ने कहा।

देवदास ने बात जारी रखी, “तुम धरती जोतने वालों को आतंकित करते हो!”

“मैं तुम्हारी बात समझ रहा हूँ। तुम एक भले आदमी हो। मैं तुम्हारी बातों पर सोच-विचार कर, उन पर चलने की पूरी कोशिश करूँगा।”

तब देवदास ने बाबर को यह कहते हुए आशीर्वाद दिया, “ईश्वर तुम्हें सही रास्ता दिखाए।”

इतना कहकर देवदास अगले गाँव के किसानों से मिलने चल दिया।

बाबर देवा काफी देर तक उसकी कही बातों पर सोच-विचार करता रहा।

इसके कुछ दिन बाद बोरसाड़ के तालुका दफ्तर में एक चिट्ठी आई। यह चिट्ठी बाबर देवा ने महात्मा गाँधी और सरदार वल्लभभाई पटेल को लिखी थी। इस चिट्ठी में बाबर देवा ने लिखा था कि आज से वह भी अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध कानून तोड़ने का काम करेगा। पर उसका रास्ता अपना होगा, वह अहिंसा के मार्ग पर नहीं चल सकता। उसने यह भी लिखा कि अगर किसी कर अधिकारी के मारे जाने की खबर आए, तो समझ लेना कि यह कारनामा बाबर देवा का ही है। इस तरह से एक डाकू ने अपने आपको अंग्रेज सरकार के खिलाफ संघर्ष में योद्धा बनने का वचन दिया।

पत्र के अंत में उसने एक बार फिर अपनी इस असमर्थता को जताया कि वह कभी भी अहिंसा के मार्ग पर नहीं चल पाएगा।

यह पत्र सरदार वल्लभभाई पटेल ने पढ़ा और फिर इसे महात्मा गाँधी के पास भेज दिया। महात्मा गाँधी ने इसे उच्च अधिकारियों को भिजवा दिया, ताकि वे अपनी सुरक्षा के इंतजाम पुख्ता कर लें। साथ ही यह भी कहा कि अब उन्हें गोरों को बचाने और खासकर अधिकारियों की सुरक्षा के कड़े इंतजाम कर लेने चाहिए।

पर गाँधी जी ने उन अधिकारियों को यह भी लिखा कि यह पत्र लिखने के लिए बाबर देवा को किसी भी तरह से प्रताड़ित न किया जाए।

इसके कुछ ही समय बाद बाबर देवा को अपने गाँव के ही बचपन के दोस्त एक ठाकुर की बेटी की शादी में आना था। वह ठाकुर बहुत अमीर था, इसलिए बेटी की शादी धूमधाम से करना चाहता था। उसने शादी की दावत के लिए साठ कनस्तर शुद्ध घी के मँगवाए थे।

शादी से दो दिन पहले ही ठाकुर के घर में चोर घुस गए और वे शुद्ध घी के साठों कनस्तर चुराकर ले गए। ठाकुर के हाथ-पाँव फूल गए। घी के बिना भला क्या पकवान बनते? पर इतनी जल्दी साठ कनस्तर फिर से कहाँ से आएँगे? वह सोच में पड़ गया। ठाकुर ने तुरंत बाबर देवा को मिलने का संदेशा भिजवाया। बाबर के आने पर ठाकुर ने सारा किस्सा सुना दिया।

बाबर देवा ने दृढ़ता से कहा, “ठाकुर चिंता मत कर, लंबी तानकर सो। कल तड़के ही साठ कनस्तर शुद्ध घी तुम्हारे घर पहुँच जाएगा।”

और सचमुच अगली सुबह सूरज निकलने से पहले ही ठाकुर के घर के आगे दो बैलगाड़ियाँ खड़ी थीं जिनमें शुद्ध घी के साठ कनस्तर लदे थे।

ठाकुर ने बाबर देवा को मन से धन्यवाद देते हुए कहा, “बेटी की शादी में आना है, तेरे बिना फेरे नहीं होंगे। देख लेना।”

बाबर ने ठाकुर से वादा किया और उसे निभाया भी। इस शादी में अंग्रेज सरकार के अनेक उच्चाधिकारी भी शामिल थे पर किसी को कानोंकान खबर न हुई कि बाबर देवा भी इस विवाह में शामिल हुआ है।

हाँ, फेरे पड़ने के बाद बाबर वहाँ से तुरंत चल दिया और जाते-जाते हवा में एक गोली चलाई, ताकि लोगों को अहसास हो सके कि बाबर देवा सचमुच इस विवाह में शामिल हुआ था।

बाबर देवा को अगर उसे किसी पर शक हो जाता कि उसके बारे में कोई पुलिस को या अंग्रेज अधिकारियों को कोई खबर दे रहा है, तो फिर वह उसे छोड़ता नहीं था, भले ही वह उसका कितना ही प्यारा या सगा क्यों न हो। एक बार की बात है। बाबर रात के समय घर आया। उसने पत्नी से कहा कि उसे भूख लगी है, वह कुछ जल्दी से बनाकर ला दे। पत्नी ने फटाफट भोजन बनाया और उसे परोस दिया। खुद भी सामने बैठ गई।

बाबर देवा ने जब भोजन खत्म कर लिया तो उसकी पत्नी ने बड़े प्यार से पूछा, “मैंने सुना है, आप बहुत अच्छे निशानेबाज हैं।”

बाबर ने ध्यान से पत्नी की ओर देखा कि वह आज ऐसा प्रश्न क्यों पूछ रही है? उसने जवाब दिया, “हाँ, तुमने ठीक सुना है।”

“अच्छा, क्या आप उस आदमी को छोड़ सकते हो, जिसकी ओर निशाना लगाते हो?”

“मैं जिस पर निशाना लगाता हूँ, उसे सिर्फ भगवान ही मेहरबान हो तो बचा सकता है वरना कोई नहीं।”

“प्राणनाथ, क्या मैं एक और प्रश्न पूछ सकती हूँ?”

“निश्चित रूप से।” बाबर देवा ने कहा।

हालाँकि उसकी शंका बढ़ती जा रही थी और क्रोध भी। पर वह यह सोचकर चुप रहा कि देखें बात किस गहराई तक जाती है। वह बात की तह तक जाना चाहता था।पत्नी ने फिर कहा, “क्या आप मुझे दिखा सकते हैं कि निशाना कैसे लगाया जाता है?”

इस प्रश्न ने बाबर देवा के मन में संदेह को पक्का कर दिया कि उसकी पत्नी पुलिस अधिकारियों को उसके बारे में खबरें देती होगी।

वह सोचने लगा, ‘अगर ऐसा नहीं होता तो क्यों कोई औरत पूछेगी कि बंदूक कैसे चलाई जाती है? वह क्यों निशाना लगाना सीखना चाहती है? यह एक औरत का काम नहीं है। कुछ न कुछ जरूर गड़बड़ है। इसके दिमाग में कोई न कोई योजना जरूर है जो आज ऐसे प्रश्न पूछ रही है।’

“मेरे बहादुर स्वामी, क्या आपने सुना जो मैंने कहा?” पत्नी बोली।

बाबर ने कोई उत्तर देने की बजाय अपने हाथ धोए फिर खूँटी से बंदूक उतारी, बारूद लिया और ये दोनों चीजें लेकर पत्नी के सामने आया। उसने बंदूक की नली पत्नी की छाती के सामने कर दी।

फिर उसने निशाना साधते हुए कहा, “निशाना ऐसे साधा जाता है।”

इतना कहते हुए उसने बंदूक का घोड़ा दबा दिया। कुछ ही पल में उसकी पत्नी धरती पर अपने ही खून में लथपथ पड़ी थी। बाबर देवा उसे इसी हालत में छोड़कर निर्ममता से निकल गया।

इस घटना के कुछ महीने बाद बाबर देवा ने एक दूसरी औरत से शादी कर ली। उससे उसकी एक बेटी हुई। उसने पैसे को लेकर अपनी पत्नी और बेटी को कभी कोई तंगी नहीं आने दी। बेटी विवाह योग्य हो गई। बाबर देवा महीनों बाद ही घर लौटता था। उसकी बेटी का विवाह तय हो गया था। उसकी पत्नी की एक ही इच्छा थी कि वह बेटी का कन्यादान अपने हाथ से करे। बाबर देवा ने पत्नी से वादा किया था कि वह बेटी का कन्यादान खुद करेगा।

बेटी के विवाह के दिन वह आया और एक औरत के वेश में विवाह के सारे कार्य किए। वह विवाह के लिए घर की महिलाओं के साथ गीत गाते हुए कुम्हार के घर से मिट्टी के बरतन लाने भी गया। ये सारे कार्य करते समय वह साड़ी पहने रहा और खूब अच्छी तरह घूँघट निकालकर सारे काम करता रहा। इसी रूप में उसने अपनी बेटी का कन्यादान किया और वादा पूरा करके वह तुरंत घर से निकल गया।

बाबर देवा की बहुत सी बहनें थीं। उनके पति थे और उनके बच्चे थे। ये सभी एक ही स्थान पर बने बहुत से घरों में रहते थे। बाबर देवा के माँ-बाप भी वहीं रहते थे। बाबर देवा ने बहुत धन लूटा था अमीर सेठों से। उस पैसे से खूब बड़े-बड़े मकान बनाए गए थे। गोगल में ही बाबर देवा के ये सारे घर थे जिनमें उसकी बहनें और भाई-बंधु रहते थे। आज भी उस गली का नाम ‘बाबर देवा गली’ है।

बाबर देवा के सारे जीजा लोग और भानजे उसी के गिरोह के सदस्य थे। घर की स्त्रियाँ, बूढ़े माँ-बाप और बच्चे तो इन घरों में रहते थे, पर बाबर और उसके गिरोह के लोग गाँव से बाहर जंगलों में तंबुओं में रहते थे। और इन तंबुओं की जगह भी वे जल्दी-जल्दी बदलते रहते थे।

एक बार बाबर देवा अपने सारे परिवार के सदस्यों के साथ फुरसत से बैठा था। उसने सहज भाव से ही पूछा कि उन्हें कोई पुलिस या अंग्रेज अधिकारी या गाँव का सरपंच आदि तंग तो नहीं करता है?

बाबर देवा के ऐसा पूछने पर बाकी सबके चेहरों पर तो मंद मुसकान थी संतुष्टि का भाव था, पर एक बहन कुछ ज्यादा ही चतुर-चालाक और चापलूस भी थी। बाबर के सुनने में आया था कि यह बहन कभी-कभार बाबर देवा के विरूद्ध खबरें पुलिस को देती है।

इस बहन ने अतिरिक्त चापलूसी करते हुए कहा, “जिसका भाई बाबर देवा जैसा बहादुर हो, उसे तो भगवान भी नुकसान नहीं पहुँचा सकता। ईश्वर ही मेरे भाई की ताकत और बुद्धि को जानता है। इसलिए हमें किसी से भी डरने की क्या जरूरत है? भले ही वह पुलिस का आदमी हो, गाँव का सरपंच हो या कोई और।”

“मैं तुम्हारी कारगुजारियाँ अच्छी तरह जानता हूँ। तुम और मेरी प्रशंसा करो, यह हो ही नहीं सकता। मैं अच्छी तरह जानता हूँ, तुम्हारे मन में मेरे लिए कितना प्यार और इज्जत है। इसलिए अपनी बकवास बंद करो।” बाबर ने गुस्से को पीते हुए कहा।

“तुम ऐसा क्यों कह रहे हो, क्या तुम यह कहना चाहते हो कि मैं तुमसे प्यार नहीं करती?”

पर बाबर ने फिर भी गुस्से को दबाते हुए कहा, “मैं अच्छी तरह जानता हूँ, तुम मुझसे कितना स्नेह करती हो। अब जल्दी से यहाँ से दफा हो जाओ। मेरी आँखों से दूर हो जाओ।”

वह बहन तमककर उठी और बाबर देवा को घूरते हुए निकल गई।

पर उसका आँखों में बाबर देवा के लिए निरादर था। और देख लेने की धमकी भी।

अब बाबर देवा को यह समझते देर न लगी कि उसकी बहन वाकई पुलिस के अधिकारियों से मिली हुई है और कभी न कभी उसे पकड़वा सकती है। उसने तुरंत बंदूक उठाई और उस पर गोली चला दी। बहन के उसी ठौर प्राण-पखेरू उड़ गए।

पर बाबर देवा ने देवदास की बात को कभी नहीं भुलाया। उससे मिलने के बाद उसने कभी किसी गरीब आदमी को नहीं सताया। बल्कि गरीबों की वह मदद करता था और लोग उसे फरिश्ता मानते थे। हाँ, जो अंग्रेज अधिकारी गरीब लोगों को सताते थे, उन्हें वह चुन-चुनकर मारता था। इसलिए बाबर देवा का नाम सुनते ही वे ऐसे थर-थर काँपने लगते थे, जैसे उन्होंने काल को अपने सामने देख लिया हो। बाबर देवा की हिम्मत और बहादुरी की कहानियाँ देखते ही देखते दूर-दूर तक फैलती चली गईं। लोग कहते, “अकेले एक बाबर देवा ने ही अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। अगर ऐसे सौ बाबर देवा मिल जाएँ, तो अंग्रेज इस देश से भागते नजर आएँगे।”

ये कहानी ‘शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं Shaurya Aur Balidan Ki Amar Kahaniya(शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ)