पूर्णिमा की रात थी। चाँद अपने पूर्णाकार में आसमाँ में मुस्कराते हुए चमचमा रहा था। लेकिन चाँदनी ना जाने क्यों गमजदा, धीरे-धीरे चल रही थी और अंदर ही अंदर घुटती हुई सिसक रही थी। बोल तो सकती नहीं थी क्योंकि बोलने की उम्र में ही दुनिया ने उसे इतना चुप करा दिया कि चुप रहते-रहते […]
