हरे कांच की चूड़ियां- गृहलक्ष्मी की कहानियां
Hare Kaanch ki Chhudiyan

Hindi Story: शुभांगी और एकांश की जब शादी हुई थी तब शुभांगी नौकरी नहीं करती थी। एकांश नौकरी करता था। अच्छे पद पर था। उसी ने भाग-दौड़ करके शुभांगी की भी नौकरी लगवा ली थी। तब आज जैसा नहीं था कि नौकरियों के लिए आवेदन ही न होते हों। तब खूब नौकरियों के लिए अखबार भरे रहते थे। जब शादी हुई थी तब वे दोनों एक कमरे के घर में किराए पर रहते थे। नौकरी के बाद थोड़ा सा अच्छा घर किराए पर ले लिया और वहीं एक बेटा और एक बेटी के मां-पिता भी बने दोनों। समय भागा मानो दौड़ा हो। दोनों बच्चे मेहनती निकले और आज दोनों ही बहुत बड़ी-बड़ी कंपनियों में नौकरी करते हैं। सरकारी नौकरी के लिए बच्चों ने साफ मना कर दिया।
चारों की नौकरी से घर में सम्पन्नता आई तो सबने मिलकर बहुत सुन्दर सा बड़ा घर बनवाया जिसमें आजकल की सभी सुविधाएं हैं। कोई देखे तो कहे कि इतना सुन्दर घर भी होता है। शुभांगी और एकांश अब जीवन के दूसरे छोर पर हैं। उनमें बहुत प्यार रहा लेकिन, पिछले तीन साल से उनके प्यार को मानो ग्रहण लग गया हो।
तभी एक दिन…, शुभांगी ने एकांश को एक लगभग जवान महिला के साथ घर से मोबाइल पर बातें करते सुन लिया था। महिला एकांश के ऑफिस की ही थी। एकांश शुरू से ही विनम्र और सहज रहा है। किसी से भी घुलने-मिलने में उसे बहुत कम समय लगता है। देखने में इस उम्र में भी बहुत सुन्दर हैं। महिलाएं उसे सहज अपना मान लेती हैं। उसकी निश्छलता और विनम्रता उसे औरों से अलग बनाती है। उस ऑफिस की महिला से प्यार से बातें करने को तो सहन कर लिया था शुभांगी ने लेकिन जब एकांश के मोबाइल में एकांश को उसके साथ फोटो में देखा तो रह न सकी। बस मन ही मन कुढ़ने लगी और बजाय एकांश से पूछने के उसकी जासूसी शुरू कर दी थी। स्थिति यहां तक आई कि दोनों में दूरियां होने लगीं। घर में कलह का साम्राज्य छा गया जिसका प्रभाव पहले तो बच्चों पर पड़ा और होते-होते स्थिति यहां तक पहुंची कि दोनों में बातचीत बिलकुल बंद हो गई थी।
बच्चों ने एक दिन जब अपने पिता अर्थात् एकांश से पूछा, ‘पापा सच क्या है।’
‘सच यही है कि मैं निर्दोष हूं। रही बात तुम्हारी मां की तो जिनके विश्वास कमजोर होते हैं वहां प्यार की उम्मीद करना बेइमानी है, बेमानी है। फिर भी तुम जिद कर रहे हो तो सुनो। जिस लड़की से तुम्हारी मां मुझे जोड़ रही है वह शादीशुदा है। उसका बहुत सुंदर पति है और एक बच्चा भी। रही बात मेरी तो मेरे साथ कितनी लड़कियां और औरतें फोटो कराती हैं। क्या सभी के साथ मेरे संबंध हो जाएंगे। मेरे ऑफिस के लोग तो मुझे विजय माल्या कहते हैं।’ फिर हंसकर बोले थे, ‘अब तुम्हारे पापा इतने सुन्दर हैं तो इसमें उनका क्या दोष।’
दोनों बच्चों को पापा की बात पर कितना विश्वास आया था कितना नहीं, ये तो वही जानें लेकिन बच्चों ने न तो एकांश से बोलना बंद किया और न ही प्यार करना। लेकिन शुभांगी का शक बढ़ता गया और धीरे-धीरे उसकी जगह अहंकार ने ले ली। वहीं शुभांगी जो एकांश की हर बात मानती थी, अब हर बात का विरोध करने लगी थी और वैसे भी, जहां अहंकार होता है वहां कुछ भी टिक नहीं सकता तो फिर उन दोनों का प्यार कैसे टिकता।
आखिर वह दिन भी आया जब शुभांगी ने एकांश से स्पष्ट कह दिया, ‘आज से मुझे तुमसे कोई लेना-देना नहीं। मुझसे किसी भी बात की कोई उम्मीद न रखना। खाने-पीने से लेकर कपड़े धोने और सोने से लेकर…।’
‘अब इस उम्र में ये सब ठीक रहेगा।’ एकांश ने कहा तो शुभांगी ने साफ कह दिया था, ‘नई-नई लड़कियों के साथ फोटो करवाने और उनसे प्यार की पींगे बढ़ाना क्या इस उम्र में ठीक है।’
एकांश जान गया था अब कुछ भी संभव नहीं है। एकांश के रिटायरमेंट के तीन चार साल ही रह गए थे। रात-दिन की चिंता और कलह ने उसे तोड़ दिया था। एक दिन ऑफिस में ही उसे चक्कर आ गया और गिर पड़ा था।
ऑफिस के लोग उसे अस्पताल ले गए। उसके टेस्ट करवाए गए। पता चला शुगर लेवल बहुत नीचे चला गया था। ब्लड प्रेशर तो पहले से था ही।
शुभांगी ने बिलकुल देखभाल नहीं की। बच्चों की नौकरियां हैं, वे सुबह निकलते तो रात को ही घर में घुसते। शुभांगी जानबूझकर एकांश को चिढ़ाती। रोटी-पानी पूछना तो दूर।
हार थककर एकांश ने एक कामवाली महिला को रख लिया। ‘मेरे लिए खाना बनाना है तुम्हें। मेरे कपड़े धोने हैं, दवाई देनी है, अर्थात् सुबह से शाम तक घर में रहो जो पैसे तुम बताओगी वहीं देंगे। खाना-पीना भी यहीं करना।’ कामवाली महिला के पति ने उसे छोड़ दिया था। एक बेटा और बहू थे उसके। बहू निर्दयी और दुष्ट थी। रोटी की भी नहीं पूछती थी उसे।
एकांश के घर उसे आश्रय मिल गया था। शुभांगी को ज्यादा आपत्ति नहीं हुई थी।
समय निकल रहा था, कामवाली महिला पूरी ईमानदारी और निष्ठा से एकांश का ध्यान रखती। वह एकांश को ‘साब’ कहती। ऑफिस जाते समय उनका टिफिन तैयार करना। ब्रेक फास्ट देना। जूते पॉलिश करके तैयार रखना और कपड़े धोने के साथ-साथ उन पर प्रेस करना। एकांश का मन जीत लिया था उसने। वह एकांश की ऐसे सेवा करती जैसे उसका पति हो। वैसे भी एकांश का स्वभाव और सरलता हमेशा से सभी के लिए प्रिय रही है।
कामवाली और एकांश छुट्टी वाले दिन घंटों बातें किया करते। कामवाली अपने पति की बातें बताती। सुख-दुख के साथी होने का दम भरनेवाला उसका पति एक झटके में ही कैसे उसे छोड़कर न जाने कहां चला गया था। वह बताते-बताते रोने लगती तो एकांश उसे चुप कराता। उसके आंसुओं को पोंछता। और उसे चुप कराते-कराते कितनी ही बार स्वयं रोने लगता। कामवाली अपना दुख भूल उसे संभालती। उसका दुख बांटती। तब नौकर और मालिक का रिश्ता धराशाही हो जाता था। एकांश एक बात हमेशा कहता कामवाली से, ‘एक सपना देखा था, सोचा था, शुभांगी के पैर अपनी गोद में रखकर घंटों उसके चेहरे को निहारता रहा करूंगा। उसे अपनी गोद में लिटाकर उसके माथे पर धीरे-धीरे हाथ से सहलाया करूंगा। उसे खूब प्यार करूंगा और आज देखो, समय ने कहां से कहां पहुंचा दिया। सोचा था, जब बुढ़ापा आएगा तो लाठी का एक सिरा मैं पकडूंगा और दूसरा शुभांगी के हाथ में पकड़ाकर चला करूंगा और बुढ़ापे में भी उसके सफेद बालों में सिंदूर भरकर इतराया करूंगा। जानती हो सिंदूर प्यार की निशानी होती है। मगर कहां पता था ये दिन भी आ जाएंगे।’ फिर कितनी ही बार पूछता कामवाली से, ‘क्या सचमुच मैं बुरा आदमी हूं, अच्छा बताओ मैं एक अच्छा पति नहीं हूं न, मैं सचमुच दोषी हूं। अच्छा तुम बताओ, बताती नहीं हो, बहुत दुष्ट हो तुम।’ उससे कहते-कहते बच्चों की तरह बिलखने लगता तब कहीं से नहीं लगता कि वह इतना बड़ा साहब है। तब कामवाली उसके आंसू पोंछती, माथा सहलाती। उसे सिर्फ इतना ही कह पाती, ‘साहब आप बहुत अच्छा हो।’
‘मैं अगर सच में अच्छा हूं तो ये सब क्या है क्यों मेरी शुभांगी, क्यों, क्यों।’ उसके ऐसा कहने पर कामवाली उसे शांत करती। तब दोनों बिल्कुल चुप हो जाते। लगता जैसे अपने-अपने दुखों को ओढ़ लेते हों या फिर दुखों से निकलने के लिए एक-दूसरे का सहारा बनने की कोशिश में हों। कामवाली आई तो उसकी देखरेख के लिए थी परन्तु न जाने कब उसकी सबसे अच्छी दोस्त बन गई थी।
इधर शुभांगी रहती तो घर के फर्स्ट फ्लोर पर थी लेकिन नजर कामवाली पर पूरी रखती। एकांश ग्राउंड फ्लोर पर रहता था। कई बार एकांश और कामवाली हंस-हंसकर बातें भी कर लेते थे जिसे सुनकर शुभांगी अंदर तक जल-भुन जाती और तभी, तभी एक शाम शुभांगी ने कामवाली को अपने पास बुलाया। कामवाली एकांश को खाना परोस रही थी। खाना देकर उसके पास पहुंची तो शुभांगी ने उससे कहा, ‘बहुत खुश मत हो तुम, जिस आदमी की तुम इतनी सेवा कर रही हो। वो तुम्हारा कभी नहीं होगा।’ फिर अपनी ओर अंगुली करते हुए बोली थी, ‘मुझे देख रही हो। क्या नहीं है मेरे पास। इस उम्र में भी मैं तुमसे ज्यादा सुंदर हूं। मेरे पास धन है, दौलत है, रूप है, लावण्य है, चातुर्य है, योग्यता है, बुद्धि है, जलवा है।’
‘दीदी आप बहुत बड़ी हैं मुझसे। मुझसे कहीं ज्यादा पढ़ी-लिखी भी हैं। मैं तो लगभग अनपढ़ हूं। पति मुझे जीवन के बीच रास्ते में छोड़कर चला गया। पति नहीं है मेरा लेकिन सच है आप पति के होते हुए भी विधवा हैं, आपके सामने खुशियां हैं, सुख है, पति का प्यार है लेकिन आपने, अपने अहंकार और शक के कारण सब कुछ गंवा दिया।’ कामवाली फिर से कहती है, ‘मेरे साथ आपकी कैसी तुलना। आप पटरानी हैं और मैं काग उड़ानेवाली, लेकिन दुख इस बात का है कि आज आपके पास कुछ भी नहीं है। और, जहां तक साब की बात है तो मेरे पास शब्द ही नहीं हैं जो मैं उनके बारे में कुछ कहूं। आप उन्हें समझ नहीं पाईं आपका गुरूर आप पर हर समय हावी रहा। पति और गुरूर दोनों साथ-साथ नहीं चलते दीदी और जहां तक मेरा सवाल है तो, वे मेरे भाई भी हैं, पिता भी है और…।’
कामवाली कुछ आगे बोलती कि शुभांगी बोल पड़ी थी, और पति भी।’
‘ठीक कहा आपने, पति भी। मेरा पति आज से चौदह साल पहले मुझे छोड़कर घर से चला गया था। लौटा ही नहीं आज तक। जब एक ने मेरा साथ नहीं दिया तो और से कैसी उम्मीद।’ फिर बिलकुल शुभांगी के चेहरे के सामने अपना चेहरा करके बोली, ‘दीदी आपके इसी व्यवहार ने, इन्हीं बातों ने आज आपको कहीं का नहीं छोड़ा। स्त्री पुरुष का हर रिश्ता पति-पत्नी का ही नहीं होता। कुछ रिश्ते बहुत अलग होते हैं जिन्हें शब्दों में नहीं बांधा जा सकता, कोई नाम नहीं दिया जा सकता, बेनाम होते हैं।’ यह बोलकर वह चलने लगी थी। फिर रूकी और बोली, ‘चलती हूं दीदी, साब ने खाना खा लिया होगा।’ फिर आगे बोली, ‘आज आपकी बातों के चक्कर में उनके पास न बैठ पाई, नहीं तो खाना अपने सामने ही खिलाती हूं उन्हें। आपको तो पता ही होगा। साब को खाना खाते समय पहले ही कौर पर पानी देना होता है। हिचकियां आती हैं उन्हें।’ फिर लगभग भागते हुए बोली, ‘और दवाएं भी तो देनी हैं। हे भगवान!’
कामवाली भागती हुई एकांश के पास आ गई थी। आज खाना देते समय पानी नहीं रख पाई थी उनके पास। एकांश ने पहला ही कौर खाया होगा। हिचकियां रूकी ही नहीं होंगी। पानी था ही नहीं उसके पास। सब्जी पर ही लुढ़क गया था। कामवाली साब-साब कहकर बिलख रही थी। बेटा-बेटी भागकर आ गए थे। शुभांगी भी आ गई थी। दोनों बच्चे भी पापा-पापा करके विलाप कर रहे थे कि कामवाली ने दोनों हाथ जमीन पर दे मारे थे, हरे कांच की चूड़ियां टूटकर बिखर गई थीं। शुभांगी हारे हुए जुआरी की तरह हाथ मल रही थी।

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